भोला पंछी

हरि के आने के समाचार तो मिले, पर उससे मिलने का मन नहीं हुआ। किसी समय वह मेरा प्रगाढ़ मित्र के साथ अत्यंत ही गूढ था। उसके मन में कब-कैसी लहर उठे और वह क्या करे, यह कहना असंभव था। मेरी हरि के बारे में सोची गई धारणाएँ झूठी सिद्ध हुई थीं। मैं क्या सोचता, पर वह करता कुछ और ही। तदुपरांत एक बात सुनिश्चित थी कि वह समय-समय पर अपना मन मेरे सामने खोलता था। हँसते-हँसते अपनी भूलें स्वीकार कर लेता था। वह कहता था, ‘शकुन, मुझसे कैसी-कैसी भूलें हो जाती हैं, आदमी ही तो हूँ! नाम भले ही हरि है।’

एकदम खाली हो जाता और सहजता से मुसकराता। इसीलए मैंने उसका नाम रखा—‘भोला पंछी’।

मेरा मित्र उम्र में मुझसे बड़ा था। मुझसे एक-दो साल बड़ा होने से वह यदाकदा बड़े होने का लाभ उठाता और कहता कि इस बारे में तुम मेरी तरह समझ ही नहीं सकते।

एकदम गोरा, लंबा व प्रभावशाली चेहरा, मंद मुसकान, बातचीत करने की अनूठी कला, मुँह से निकलते संगीतमय स्वर से कभी मैं प्रसन्न तो कभी अप्रसन्न हो जाता। तबला वादन की एक उच्च स्तरीय परीक्षा उसने अच्छी श्रेणी में उत्तीर्ण की थी। वह दूसरी के लिए कमर कसके तैयारी कर रहा था। संगीत-क्लास में भगवती प्रसादजी भी सिखाते, बताते व सुधार करते। उसे ध्यान से गाँठ में बाँधकर रियाज कराते।

संगीत-कक्षा के समय का भरपूर सदुपयोग करना, तत्पश्चात् शिवानी को सितार का रियाज करवाने के लिए तबले पर संगत करवाता। यह काम भगवती प्रसादजी ने सौंपा था—‘शकुन, तुझे संगत करवानी है।’

बारह छात्र-छात्राएँ थे। नीचे आवास और ऊपर संगीत-कक्षा। घर पर गंधर्व संगीत का पुराना बोर्ड, जीर्ण-शीर्ण घर, संगीत के वाद्य यंत्र, पुस्तकों से भरी दो अलमारियाँ भी थीं। दो व्यक्तियों की उदरपूर्ति लायक फीस आ जाती थी।

शिवानी सबकी हाजरी लेती, फीस का हिसाब लिखती। नीचे रहनेवाली मंजरी बहन यह सब देखती रहती। प्रातःकाल दो घंटों के लिए वातावरण स्वरपूरित व कोलाहलपूर्ण ही रहता था।

सिखाने का तरीका एकदम अनूठा था इस राग में ग अनुपस्थित—ठीक तपन सा ‘ग’ वर्जित।

तबले इस तरह से रखे होते। बायाँ तबला इस तरह गोद में, बीच में गोल भाग पर यह स्याही। जय, तू तो आशा सा ही करता है। इस तरह रागों की बंदिशें, विशिष्टताएँ, गाना, उदाहरण सिखाए जाते।

तबला पर संगत करती हुई शिवानी कभी पास में पहुँच जाती। यदाकदा उसका पल्लू छू जाए, कभी श्वास के स्वर सुनाई पड़ें, कभी थोड़ी सी बातें करना जरूरी हो जावे?...खिलखिलाए, गंभीर हो जाए, उदासीनता भी आ जाए।

वह विधवा माँ के साथ ही रहती थी और अभावों में जीती थी। उसका एक अभाव यकायक तीव्र हुआ है। लगा जैसे वह कल्पवृक्ष के नीचे खड़ी माँगती है और उसे एक सितार मिल गया।

मैंने पूछा, ‘शिवानी, सितार का मूल्य कितना होता है?’ ‘मूल्य-शकुन, भगवती प्रसादजी को ज्ञात होगा!’ उसने कहा। उसके चेहरे पर उदासी थी।

‘यह सितार तो पुराना है। इसके तार भी ढीले हैं और आधे घंटे का रियाज! घर बैठे-बैठे मात्र उँगलियाँ ही हिलाना। शकुन, कैसी विवशता?’

‘बस, ऐसे ही...?’

मैंने उसकी पीड़ा को हरि तक पहुँचा दिया था। वह गहन विचारों में डूब गया।

‘ठीक है...बच्चू! कुछ तो करना ही होगा।’ उसने कहा। पर मुझे यह ज्ञात था कि वह कुछ नहीं करेगा। वह स्वयं ही काका पर आश्रित था। काका पैसेवाले तो थे, पर हरि को कुछ भी मिलनेवाला नहीं था। मात्र आश्रय। उँगलियों में जो दो सोने की अँगूठियाँ थीं, वे उसकी माँ की थीं।

पर कुछ दिनों बाद शिवानी के लिए नया सितार आ गया। हरि खुद ही सितार ले आया था। वह बता रही थी कि एक अच्छी चीज मिल गई। सूरत में जरीवाले की दुकान है। माया की पहचान के कारण सस्ते में ही मिल गई।

मैंने देखा कि हरि के हाथ में अँगूठियाँ नहीं थीं। शिवानी की दृष्टि भी वहीं लगी थी। उसने बड़ी भावुकता से कहा, ‘हरि, तुझे ऐसा करने की क्या आवश्यकता थी। अब तेरा यह ऋण किस जन्म में चुकाऊँगी।’ वह रो रही थी और हरि मंद-मंद मुसकरा रहा था।

भगवती प्रसादजी ने सितार का खूब गुणगान किया था। चीज अच्छी है। सूरत में ही बन सकती है। मुझे अब प्रथम श्रेणी प्राप्त करनी होगी। हरि ने गजब कर दिया। तुझे क्या कहा? अब हरि मंद-मंद मुसकरा रहा था।

शिवानी ने गुरु के चरण छुए और मेरी ओर  देखकर कहा, ‘शकुन, तू मुझे तबले पर संगत दे!’ और हरि की ओर देखकर कहा, ‘हरि, मैं यह ऋण कभी नहीं चुका सकूँगी।’ हरि ने प्रत्युत्तर दिया, ‘शिवानी, तुझे विस्मृति का वरदान फले-फूले। मैंने क्या किया? तुझे साज दिया, सुख दिया तो मुझे भी सुख मिला ही न?’

वह एक यादगार अवसर था। भगवती प्रसादजी ने क्षण-भंगुरता को याद किया था, सफेद बालों पर हाथ फेरा था। ‘हम कितने दिनों के...? अंततः यह कक्षा आपमें से किसी एक को ही सँभालनी है।’

तत्पश्चात् हरि ने कई हास्यास्पद प्रसंग कहे। शिवानी कैसे हँसी थी। उस पल यह जरूरी लगा।

शिवानी ने कहा, ‘रियाज में तू भी आना।’

दूसरे दिन शिवानी तबलों की जोड़ी लेकर वहाँ पहुँची। उस समय वहाँ रियाज चल रहा सा लगा। हरि तबलों पर ताल दादरा बजा रहा था और शिवानी जय जयंती का गायन कर रही थी।

मुझे यह गम्मत भली लगी। हरि को तबला बजाने का कितना अल्प ज्ञान था।

‘शकुन चाहे न आए, पर मैं तो हूँ न? अरे, गीत गाना है, तो कंठ से संगत दी जा सकती है।’ दोनों ही खिलखिलाकर हँसे थे। दूसरे दिन सुबह मैं क्लास में उसको संगत दे रहा था, पर उसका ध्यान रियाज में नहीं था। वह हरि को ढूँढ़ रही थी। शिवानी...मैं जब ताल बजा रहा हूँ...मेरे ध्यान खोने पर उसने कहा था, ‘जब से नई सितार बजाई है, तब से शकुन पुराना सितार दिखाई ही नहीं देता है। कब ध्यान रखूँगी?’

पर उसने घर आने को नहीं कहा।

यकायक उसे ध्यान आया कि वह शंकर की अत्यंत एहसानमंद है। पर शिवानी का ऐसा करना सहज था। मुझे उसका श्वासों के स्पंदन और संवाद याद आए।

वह हताश होकर कहती कि इस परिस्थिति में एक अठारह-उन्नीस वर्षीया युवती क्या करे? फिर कहती, ‘शकुन, मुझे तुम्हारी बात भली लगती है। तुझे ही कह पाती हूँ।’ वह यदाकदा तबलों पर नाचती भी थी, मेरी उँगलियों पर मुग्ध हो जाती। तब तो हरि की उँगलियों को देखकर भी ऐसा ही होता होगा?

एक दिन हरि ने अपनी अनूठे अंदाज में कहा था, ‘शकुन, एक समाचार है—तेरा मित्र हरि एक सितारवादक युवती के प्रेम में पड़ गया है। वह युवती बाईस वर्षीया है और मंजरी बहन उसे जानती है।’

ये सब सुनकर मुझे लगा, जैसे मेरे पाँवों के नीचे की धरती खिसक गई। मुझे क्या हो रहा था, मानो उसकी वेदनाएँ ही गाली हों। यह सहानुभूति के कारण ही हुआ था। वह तबले पर नाचती उँगलियों को मुग्ध होकर देखती रहती थी। जबकि वह तो प्रेम में पड़ गई थी। हरि कहता है कि वह झूठ नहीं बोलती है। मंजरी बहन जानती थी। कल अन्य छात्रों व गुरुजी को भी पता चलेगा तथा इस इलाके के व्यक्ति और सारे गाँव को भी। प्रेम अर्थात् क्या? वह जानता था। मुझे लगा जैसे मुझसे कुछ छीना जा रहा है। दूसरे ही क्षण लगा कि यह कैसे मान लिया जाए कि शिवानी मात्र तेरी ही है? क्या कभी स्वीकार सा कुछ कहा था। गांधर्व संगीत में पहले अनियमित जाना, तदुपरांत जाना ही बिल्कुल बंद।

अब वहाँ ही नहीं, ऐसा दृढ़ निश्चय कर लिया था। शिवानी क्या सोचेगी? उसे कुछ होगा, हरि को? क्या कोई खबर लेने आएगा? कोई मनाने आएगा? इसमें उन दोनों का क्या था? सितार से सारा खेल ही बिगड़ गया। मैंने आयास एक्ट खत्म कर दिया, पार्ट टाइम जॉब ढूँढ़ लिया। कॉलेज बंद, संगीत-कक्षाएँ बंद हो गईं, तब मेरे मन में एक नए मानव ने जन्म लिया। माँ-बापू चकित रह गए। ‘देखो तो शकुन में कितनी समझ आ गई है।’ बापू कहते थे। एक ही साल में स्थायी नियुक्ति मिल गई थी। हरिकथा कह रहा था। हाँ, वह बच्चा ही तो था। एकदम सीधा आदमी। जहाँ वह नौकरी करता था, वहाँ उसको कुशल माना जाता था। पर अब वे लोग मुझे भाग्य से ही याद आते थे। एक बार एक नया छात्र भगवती प्रसादजी का पत्र लेकर आया था। पत्र देखकर मैं भावुक हो गया था। उसने कहा कि शरीर बुढ़ापे के कारण जर्जर हो गया है। मंजरी की आँखों पर चश्मा लग गया है। हरि-शिवानी शिक्षण कार्य में मदद करते थे। शिवानी द्वितीय श्रेणी में उत्तीर्ण हुई थी। ‘भाई एक बार आ जा’ से समापन किया था। मैंने गोलमोल अंदाज में कागज का उत्तर दिया था।

उन दोनों में से किसी का भी उल्लेख नहीं किया था।

दूसरे साल में वे यदाकदा ही दिखाई पड़ते थे। मैं पैदल या मोपेड पर होता तो हरि का स्कूटर वहाँ से गुजरता, आवाज भी सुनता, ‘ओ शकुन!’

एक बार शिवानी भी मिली थी। वह जैसी थी, वैसी ही थी। हाँ, कुछ भारी हो गई थी।

मैंने उसकी कुशल-क्षेम पूछी तो वह भावुक हो गई। उसने हरि व सितार के बारे में कुछ भी नहीं पूछा। पर उसने उसे संन्यास आश्रम तक पहुँचाने की याचना की थी। वह मोपेड पर बैठ गई। सात मिनट की यात्रा अश्रु परिपूरित नहीं थी। उसकी हिचकियों की आवाज सबल सुनाई पड़ती रही। वे लोग हर गुरुवार को वहाँ भजन गाने जाते थे। शिवानी ने शकुन से पूछा, ‘शकुन, क्या मुझे देखकर घृणा होती है?’

अपने विवेकानुसार मैंने उसका उत्तर दिया, ‘अब तक तो नहीं की, तेरा कोई दोष हो तो...?’

उसने कहा, ‘शकुन, जब माँ मरी, तब भगवती प्रसादजी मंजरी बहन के ही पास रहते थे। दोनों साथ-साथ ही रहते थे।’ उसने कहा, ‘ओह! कितना कष्टकारक!’

उसने बिना संन्यास आश्रम की ओर देखे ही आश्रम के अंदर पाँव रखा। मुझे लगा कि वह दुःखी है।

पर यह विचार नहीं आया कि क्या किया जाए—उसके पीछे संन्यास आश्रम में जाऊँ या उसे आवाज देकर बुलाऊँ! दूसरे ही दिन पता चला कि हरि और शिवानी ने शादी कर ली। यह भी समाचार मिला कि संगीत-कक्षा के समीप ही चँदोवा बँधा था। अब यह अध्याय पूरा हुआ।

फिर लगा कि कहीं शिवानी बिना इच्छा के विवाह तो नहीं कर लिया। उसकी हिचकियाँ क्योंकर सुनाई पड़ रही थीं? शायद मेरे प्रति सहानुभूति हो? नहीं, घृणा तो नहीं होगी! हरि उसकी विवशता हो! एक सितार इतना मूल्यवान हो गया कि उसकी इच्छा न होने पर भी वह शादी के लिए तैयार हो जाए?

और मुझे अंदर में से किसी ने पूछा, ‘उलटे मार्ग कैसे चल पड़ा? अभी भी शादी की इच्छा है? क्या कभी उसे एक बार भी पूछा था? उसने दो बार मिल चुकी सुनंदा को स्पष्ट रूप से ‘हाँ’ कहने में क्यों टाल दिया?’

घर जाने पर बाबा ने याद दिलाया, ठाकुर तूने अब तक उत्तर नहीं दिया। कल तो उत्तर देना ही होगा!”

उसने बातों-ही-बातों में ‘हाँ’ कहा था। शकुन मुझे सुनंदा योग्य लगती है। क्या तेरे मन में क्यों क्या कोई?”

मुझे शिवानी दिखाई दी थी। मैं उसकी तबले पर नृत्य करती उँगलियों पर मुग्ध होकर देखता रहा कि ये नृत्य करतीं उँगलियाँ मुग्ध होकर अधिकार से रियाज को बुला रही हैं। उसके पास हँसती-रोती, शरारतें करती मैंने उत्तर दिया, ‘मैं सोच लूँ, सुबह निश्चित रूप से तय हो जाएगा।’

रात के बारह बजे दरवाजा खटखटया तो मुझे लगा कि हरि का ही संदेश होगा, पर यह तो खुद हरि ही था। उसके हाथ में सूटकेस था और चेहरे पर गंभीरता। भले ही वह शिवानी के साथ विवाह करना चाहता था।

‘हरि का यह कौन सा स्वरूप था? वह तो कहीं जा रहा था। इसे तो हरि से घृणा है?’ हरि ने शिवानी का ही प्रश्न दोहराया। अंदर आने को कहा भी।

हरि ने पुरानी भाषा में बोलना शुरू किया, ‘शकुन, कैसी भूलें कर रहा है? तू मुझे क्यों नहीं टोकता है?’

वाक्य समझा और शायद अर्थ भी?

‘सुन, मैंने गुरु को पत्र लिखा है, शिवानी से व्यक्तिगत बात भी हुई है। तुझसे मिलने व शिक्षा लेने आया हूँ। सूरत में एक संगीत-शिक्षक की नौकरी है। जो भी किंचित् ज्ञान है, उससे ही काम चलेगा। नोट्स भी साथ में ले लिये हैं। कल...तू उसके साथ शादी कर लेना। मंडप सज गया है। बालिकाएँ मंगलगीत गाएँगी। शकुन वास्तव में तुझे ही चाहती थी, व्यथित थी। मैंने उसे सितार देकर उपकृत किया। शकुन ने मुझे नहीं टोका? यह तो पास में ही है। चल, कुछ देर ये जागे तो हैं। शिवानी से क्षमायाचना तो की ही है, अब तेरी भी...बस देखो, शादी कर लेना! सुखी रहने का आशीर्वाद कैसे दूँ? इस लायक तो नहीं रहा। शकुन तुझे प्रसन्न रखे!’ वह बबंडर की तरह आया और चला गया। उसकी आँखें नम थीं। मुख पर किसी से मूक होने का संतोष झलक रहा था। वह वास्तव में भोला पंछी ही था। भूलें स्वीकार करने में कितनी सहजता थी। रेशमी स्पर्श की भाँति मर्मस्थल को स्पर्श कर गया था वह।

जिस तरह गया था, उसको भूलना मुश्किल था। मैंने फोन लगाया—‘शिवानी!’

श्रीनगर, अजमेर, राजस्थान-305025

दूरभाष : 09414981944

— गिरीश भट्ट

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