निस्तार

निस्तार

कई-कई दिनों तक राजू, रेशमा, नौबू असहाय से जो भी करने को कहा जाता, खामोश उनके आदेशों का पालन करते रहे। यहाँ से पलायन करने की उनकी योजना धरी-की-धरी रह गई। उन पर और गहरी नजर रखी जा रही थी।

वैसे उन्होंने मतलब राजू और रेशमा ने एक नई नीति अपना ली थी। दिनभर में जो भी भीख में मिलता, उसमें से न्यूनतम राशि को वे अपने पास छिपाकर रखने लगे थे। रेशमा कमर के नजदीक साड़ी या सलवार की चुन्नटों में तो राजू पैंट के अंदरूनी खीसे में। यह वे इसलिए कर रहे थे कि जब भी अवसर मिलेगा भागने का, तब खाली जेब थोड़े न साथ देंगी।

राजू ने देखा कि नौबू जो कुरता और चड्ढी लाया, तब से पहन रहा था, वे तार-तार और छोटे हो चुके थे। उसका एक छुपाया हुआ ड्रेस अब भी दरी के नीचे पड़ा था। वह अपेक्षाकृत पुराने से बड़ा था, फिर भी तंग हो रहा था। उसने उसको निकालकर लोन लगी गंदी दीवार पर थोड़ी देर रगड़ा। जब वह बदरंग होकर जूना लगने लगा तो उसे नौबू को देते हुए इशारे से पहनने को कहा।

वह पहलेवाले को कहीं फेंकने की फिराक में था कि उसे उसके पट्टे के नीचे एक लेबल दीखा। पढ़कर वह जान गया कि किसी ने उसका पता यहाँ टाँक दिया है। उसका अभी तो कोई उपयोग नहीं हो सकता था। उसने नए ड्रेस के पॉकेट में उसे सुरक्षित रख ही नहीं दिया, नौबू को संकेतों में उसकी महत्ता समझा भी दी।

अगले रोज शाहदरा के मेट्रो स्टेशन के परिसर में उनकी ड्यूटी लगाई गई थी। नई दिल्ली के क्षेत्र में पुलिस को सतर्क कर दिया गया था। भिखारियों की धर-पकड़ की जा रही थी।

मेट्रो से उतरकर आनेवाले हर व्यक्ति के सामने वे चार-पाँच लोग दीनता की मूर्ति बने पुकार लगा रहे थे। उनके साथ एक अपाहिज बूढ़ा भी था, जो इनकी गैंग का नहीं था। राजू-रेशमा-नौबू को देख वह समझ गया कि ये पराश्रित आपस में जुड़े हुए हैं।

उसने रेशमा से जानना चाहा, ‘तुम तीनों मेरे को कुछ अलग लग रहे हो, इसलिए पूछ रहा हूँ...कहीं तुम बंदी भिखारी तो नहीं हों?’

रेशमा के हामी भरने पर उसने निश्वास छोड़ते हुए सवाल किया, ‘तुम लोग भाग जाने की हिम्मत क्यों नहीं करते?’

उत्तर राजू ने दिया, ‘दादा, यह इतना आसान नहीं है। हमारी चौकसी पर एक गुंडा लगा हुआ है। और किसी तरह उसे छकाकर निकल भी गए तो जाएँगे कहाँ...हमारा यहाँ कोई नहीं है।’

बूढ़े को उनकी बेबसी समझ में आ गई। वह अपने बेटे-बहू के दुर्व्यवहार के कारण इस स्थिति को आ पहुँचा था। उनके बहिष्कार के उपरांत उसने शाहदरा-दिलशाद गार्डन के फ्लाई-ओवर के नीचे अपना आशियाना बना लिया था। पढ़ा-लिखा था नहीं, दोनों घुटने जवाब दे रहे थे। किसी तरह झुक-झुककर आस-पास भीख माँगकर गुजारा कर रहा था।

उसे अपनों के छूट जाने का दर्द सालता रहता था। इन तीनों के आपसी जुड़ाव में उसे कहीं अपनों की तलाश की इतिश्री दिखाई दे रही थी। बुढ़ापा जिस मानसिक और शारीरिक सद्भाव का मुंतजिर होता है, शायद वह इनके बहाने हासिल हो जाए।

उसने जिम्मा उठाया इनको आजाद करने का। सौहार्दता किसी की बपौती नहीं होती, हरेक में बर्फ की तरह जमी होती है। तरल होने की राह तकती रहती है। जमीर में वह ताकत होती है कि सही तापमान पर उसे ले आए। उसका एक पुराना परिचित ऑटोवाला मेट्रो के बाहर से सवारियाँ उठाता था। उसने उससे बात की।

ऑटोवाला उसके साथ पार्किंग तक आया। आँखों-आँखों में उसने रेशमा-राजू से उसकी पहचान करा दी। अब वह बूढ़ा, जिसका नाम माधव था, राजू के बताए उस रखवाले के पास गया।

माधव बहुत चतुर था। उस मुस्टंडे के समीप जाकर धीमे से बोला, ‘साब, लड़की माँगता क्या...’

गुंडा तो गुंडा था। उसने यहाँ आने से पहले देसी का एक पव्वा अंदर उँड़ेल लिया था। यह वही था, जिसने रेशमा को पीटते-पीटते उसको छेड़ने की कोशिश की थी। वह पलटा, ‘कितना देना होगा, जवान है ना?’

‘हाँ सर,’ माधव ने उसे विश्वास दिलाया, ‘एकदम मस्त, पैसा थोड़ा ज्यादा लगेगा।’

‘कितना?’

‘दो सौ रुपए।’

‘चलेगा। कहाँ है वो माल?’

‘साब, आप मेट्रो स्टेशन में जाएँगे तो टिकट खिड़की के सामने वो खड़ी है। नीली साड़ी में। रुपए उसको बाद में देना। वह तुमको साथ लेकर उसकी खोली (कमरे) पर ले जाएगी।’

पिया हुआ तो था ही, उसने सोचा, लड़की को लेकर यहीं आ जाएगा और इन भिखमंगों को चकमा देकर अपना काम कर आएगा।

उसके जाते ही माधव के इशारे पर राजू और रेशमा नौबू को साथ लेकर बाहर भागे। ऑटोवाले ने उनको बैठाया और फौरन ऑटो बढ़ाकर ब्रिज के नीचे से दूसरी तरफ निकाल ले गया।

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ऑटोवाले ने तीनों—रेशमा, राजू और नौबू को सुरक्षित स्थान पर उतार दिया। उनसे पैसे भी नहीं माँगे। उसने ये अपने परोपकार खाते में जोड़ लिये। इतना ही नहीं, उनको माधव की रिहाइश तक छोड़ दिया। रिहाइश?...शाहदरा के उस फ्लाईओवर के नीचे माधव ने अपना क्षेत्रफल कंताननुमा ईंटों से घेर रखा था। छत ऊपर थी ही। यों जानो कि खुला आशियाना था उसका। एक ओर चूल्हा बना रखा था। उसके पड़ोस में थोड़ा ईंधन बिखरा हुआ था। एक अलगनी पर चंद चिथड़े लटके हुए थे। शेष स्थान पर फटी-टूटी दरी बिछी हुई थी। कुछ बरतन और डिब्बे यहाँ-वहाँ पड़े ज्यों अपने उपयोग की प्रतीक्षा में थे।

तीनों इस नए आवास को देखकर खुश हुए। इसलिए नहीं कि उनको कोई बँगला आवंटित हो गया था, किसी ऐरे-गैरे लेकिन मूरख जनता के मतों से चुने जाने पर बन गए विधायक अथवा सांसद की तरह बल्कि खुली हवा में साँस लेने की सुविधा की बनिस्बत।

वे बेचारे इस मुक्ति की थकान से सराबोर उसी आलीशान दरी पर लेटे और जरा सी देर में खर्राटे भरने लगे। कितना सुकून, कितना सुख, कितनी शांति उनकी उस गहरी नींद में समाविष्ट थी, यह किसी साहित्यकार के लिए शब्दों में बाँधना नामुमकिन है। यह स्वातंत्र्य की संतृप्ति थी।

माधव आया काफी समय बाद, क्योंकि उससे पैदल चलना तीव्र गति से होता नहीं था। वह इनके पीछे-पीछे ही वहाँ से निकल पड़ा था, कि कहीं वह गुंडा उससे भिड़ न जाए। आया तो इन तीनों को यों बेफिक्री से (गधे-घोड़े बेचने के लिए थे नहीं) सोते देख बैठ गया एक किनारे। सोच में डूबा हुआ। वह जानता था कि शाहदरा के मेट्रो स्टेशन लौटना उन सबके लिए बेहद खतरे से भरा है। अब भीख, क्योंकि इसके सिवा कोई चारा उन मुफलिसों की ताब में था नहीं, माँगने का ठौर कौन सा चुना जाए, वह इसी विचार में खोया हुआ था।

तभी नौबू जागा। नई जगह को पहचानने के यत्न में उसे माधव दिखाई दिया। बीता दृश्य उसके नयनों में साकार हो गया। उसने माधव की ओर मुट्ठी भींचकर छोटी उँगली उठाई। माधव ने उसकी बाँह पकड़ी और बाईं ओर एक कोने में ले गया।

अचानक इस दिशा ने उसे उचित स्थान इंगित कर दिया, अरे! दिलशाद गार्डन के मेट्रो स्टेशन पर वे अपना ‘रोजगार’ नए सिरे से प्रारंभ कर सकते हैं। वहाँ कोई बदमाश आ गया, तब की तब देखेंगे। फिलहाल सुरक्षा की दृष्टि से वही ठीक रहेगा। पुल के नीचे के रास्ते से उस तरफ जाने में कुछ कठिनाई तो होगी, लेकिन इतना कष्ट तो झेलना ही पड़ेगा। वैसे झिलमिल मेट्रो के आस-पास भी अड्डा जमाया जा सकता है।

इस निर्णय के साथ-ही-साथ उसकी निगाह नौबू के कपड़ों पर पड़ी। नौबू की यह बढ़ती उम्र थी। उसका शरीर वस्त्रों की सीमा से बाहर निकलने को उतावला था। फटने की राह पर। उसने फौरन अपने पड़ोस में लगी ठेली से नौबू को संग ले जाकर उसे नए फैशन के सस्ते पैंट-शर्ट दिलवा दिए। लौटे। कपड़े बदलते समय चौकस नौबू ने अपनी जेब से राजू का रखा हुआ लेबल निकालकर पॉकेट में सुरक्षित रख लिया।

अगले दिन माधव के मार्गदर्शन में वे पुल के नीचे तथा आसपास बसी गंदी बस्ती में से बचते-बचाते राह तलाशते दूसरी ओर झिलमिल क्षेत्र तक आ गए। बैसाखी के सहारे चलते राजू एवं रेशमा को तो ज्यादा दिक्कत नहीं पेश आई, माधव और नौबू को वह कई मीलों का सफर लगा। आगे जी.टी. रोड के दाहिने टूटे-फूटे फुटपाथ पर या सड़क के किनारे चलते हुए तेजी से दौड़ते वाहनों से डरे-सहमे नौबू की तो सिट्टी-पिट्टी गुम होने को थी।

खैर, धीरे-धीरे वे जब दिलशाद गार्डन मेट्रो स्टेशन के सामने जा पहुँचे, तब उनकी जान में जान आई। उन्होंने आ-जा रहे मुसाफिरों से उनमें रच-बस गई आदत के मुताबिक झट से भीख माँगना शुरू कर दिया।

दिल्ली में कई प्लेसमेंट एजंसियाँ कार्यरत हैं। उनमें से अधिकतर घपलेबाज ही होती हैं। गाँव-देहात से लाई लड़कियों का यौन शोषण करना ही उनका उद्देश्य होता है। कुछेक घरों में काम तो दिला देते हैं, लेकिन लगाए हुए व्यक्ति के सारे अधिकार उनके कब्जे में रहते हैं। मतलब पगार जो भी मिलती है, वह सीधे उनको। उसमें से थोड़ा-बहुत वे उसको देकर उस पर उपकार ही करते हैं।

ऐसा ही एक बंदा मेट्रो के इर्द-गिर्द अपने शिकार की तलाश में घूम रहा था। उसने जैसे ही रेशमा को देखा, उसे वह जँच गई। बाईं बाँह अधकटी थी तो क्या हुआ!

‘अरे सुनो!’ रेशमा के करीब जाकर उसने कहा।

रेशमा ने पलटकर देखा। उसने सोचा कि क्या कहना चाहता है, सुन लेने में क्या हर्ज है। आँखें तरेरकर पूछा, ‘क्या है?’

‘देख, मैं तेरे को एक अच्छी नौकरी दिला दूँगा।’

रेशमा ने उसे टालने की गरज से आगे बढ़ते हुए उपहास किया, ‘नौकरी!...कहाँ पर?’

‘एक बड़े अफसर के बँगले में। तेरे को सारा घरेलू काम करना पड़ेगा।’

‘ठीक है।’ रेशमा ने गरदन घुमाई, ‘आप मेरे बाबा से बात कर लो। वे वहाँ हैं।’ उसने माधव की ओर इशारा किया।

वह बंदा माधव के पास गया, ‘बाबा, आपकी बेटी को एक बड़े घर में काम दिलवाने के लिए कह रहा था। उसने आपसे बात करने को कहा है।’

जब रेशमा नहाकर, कपड़े बदलकर बाहर आई, मालकिन उसे इस नए रूप में देखकर आश्चर्यचकित रह गई। उसे उसका यह धुला-निखरा परिवर्तन भा गया। वह किसी सभ्य सुसंस्कृत परिवार की लग रही थी। अब उसके कामकाज का जायजा लेना बकाया था। रेशमा को इसका लंबा तजुरबा था। उसने खाना जो बनाया, वह पति-पत्नी ही नहीं, बच्चों को भी रुचिकर लगा। उनको संतुष्ट पाकर रेशमा को अनुभूति हुई कि एक अरसे बाद वह सही तट पर आ लगी है।

माधव ने उसे ऊपर से नीचे तक निरखा। उसको यह प्रस्ताव इतनी दूर भीख माँगने हेतु रोज की कसरत करने से ज्यादा वाजिब लगा। बहरहाल, उसने दुनिया देख रखी थी, इतनी सरलता से मान जानेवाला नहीं था। उसने उस एजेंट को आड़े हाथों लिया, ‘कौन से घर में?...मैं तेरे साथ आकर खुद मालिक से मिलूँगा। और...तेरी शर्तें क्या रहेंगी, वह भी बता दे।’

माधव के अनुभवी प्रश्नों से वह थोड़ा सकपका गया। था तो मँजा हुआ खिलाड़ी। उसने दोनों हथेलियाँ जोड़ते हुए कहा, ‘मैं कोई फ्रॉड नहीं हूँ, दादा। आप चलो मेरे साथ। मालिक से पक्की बात कर लेंगे। अगर वो राजी हो गए तो इसकी पगार का आधा हिस्सा हर महीने मैं रखूँगा। बोलो, मंजूर है?’

उसके इस अंदाज ने माधव को विचारमग्न कर दिया। उसने अपना प्रति-प्रस्ताव उसके सम्मुख रखा, ‘भाई, इसको काम दिलवा दो, लेकिन ये जो आधी पगार की तुम्हारी जिद है, इसे जरा ढील देनी पड़ेगी। और वह रहेगी कहाँ?’

‘उसकी फिकर मत करो। उन्हीं के बँगले में दिन-रात काम करना है, वहीं रहना-खाना-सोना है।’ एजेंट ने सुविधाओं की सूची थमाई। वह किसी सूरत अपने पारिश्रमिक से समझौता नहीं करना चाहता था, ‘रहा सवाल मेरे मेहनताने का। वह तो रहेगा ही।’

‘ऐसा करो, हम बीच का रास्ता निकालते हैं।’ माधव बूझ रहा था कि हरदम के वास्ते इससे रेशमा का जुड़े रहना कल को आफत भी ला सकता है। वह बोला, ‘काम मिलने पर जो भी पगार तय होगी, वो तुम तीन महीने तक पूरी रख लेना। उसके बाद नहीं।’ माधव ने एक तरह से उसे ललचाया।

‘तू बड़ा होशियार है बुड्ढे! बस तीन की जगह छह महीने कर दे। फिर वो ‘फीरी’...ठीक है?’

माधव ने पुनः सभी नुक्तों पर मनन किया। उससे कहा, ‘चल, हम चलते हैं तेरे संग।’ फिर रेशमा, जो कुछ फासले से सारी बातचीत सुन रही थी, को पुकारा, ‘रेशमा, इधर आ बेटे।’

ज्यों ही रेशमा पास आई, उस एजेंट ने उसे परामर्श दिया, ‘पहले तू पीछे की तरफ पार्किंग में जो नल लगा है, वहाँ हाथ-मुँह धोकर, बाल सँवारकर आ। ऐसी जाएगी तो कोई काम पर नहीं रखेगा।’

रेशमा के लौटते ही वे तीनों दिलशाद गार्डन के बी ब्लॉक की ओर बढ़े। वहाँ एक भव्य बँगले पर एजेंट ले गया। मालिक तो थे नहीं, मालकिन से विस्तार से चर्चा हुई।

मालकिन ने रेशमा को टोका, ‘बायाँ हाथ नहीं है तो कैसे काम करोगी?...’

रेशमा ने उन्हें आश्वस्ति दी, ‘मुझे आदत हो गई है। उसके न रहने से कोई अंतर नहीं पड़ता। उसकी कोहनी और दाएँ हाथ से मैं सब कर लेती हूँ।’

‘चलो, देख लेंगे।’

छह महीनों पश्चात् पूरा वेतन रेशमा को ही देने का करार हुआ। उनका ऐश्वर्य बता रहा था कि रहने-खाने का प्रबंध समुचित ही रहेगा। पति-पत्नी और दो छोटे बच्चे थे। घर के सभी काम झाड़ू-पोंछा, रसोई आदि के अलावा उन बच्चों को भी सँभालना था। वैसे कोई परेशानी नहीं थी। माधव ने रेशमा को अलग ले जाकर उसकी सम्मति ली और ‘हाँ’ कर दी।

लीना प्रबुद्ध थी। उसने उन्हें साथ में खड़ा कर मोबाइल से उनका फोटो ले लिया। फिर एजेंट से कहा, पाँच-छह दिन बाद आ जाना। तुम्हें एक फॉर्म भरना होगा। उसके साथ यह फोटो जाएगा पुलिस स्टेशन सत्यापन के लिए। कोई एतराज तो नहीं?’

‘नहीं, नहीं मैडम, हम शरीफ लोग हैं। कोई रुकावट नहीं आएगी।’

‘अभी मुझे रेशमा का स्थायी पता बता दो।’

एजेंट ने माधव की ओर देखा। माधव ने अपने घर का पुराना पता नोट करा दिया। वैसे भी उसने उसे अपनी बेटी तो मान ही लिया था।

रेशमा वहीं रुक गई। मालकिन ने सबसे पहले उसे बाथरूम में ढकेला, ‘ये साबुन ले। रगड़-रगड़कर अपना सदियों से जमा मैल छुड़ा। मैं तेरे को अपने पुराने कपड़े दे रही हूँ। उन्हें पहनकर बाहर आ। हमको सब साफ-सुथरा पसंद है। समझी!’

‘जी मालकिन।’ रेशमा इस नए मुकाम से वैसे ही बाग-बाग थी। उसने मालकिन से दबी जबान में कहा, ‘मैम, मैं पढ़ी-लिखी हूँ। यह तो किस्मत मुझे गर्दिश में उलझा गई। आपको मुझसे कभी कोई शिकायत नहीं रहेगी।’

मालकिन लीना ने पहली नजर में ही ताड़ लिया था कि यह औरत वाहियात नहीं है, गंदी जरूर है। इसे अपने हिसाब से ढाला जा सकता है। और उनकी जो तकलीफ  बनी हुई थी—कोई सुयोग्य कामवाली की खोज की, उस पर विराम-चिह्न लग जाएगा। फिर जब कुछ गलत करेगी, लात मारकर बाहर करने में क्या देर लगेगी?

जब रेशमा नहाकर, कपड़े बदलकर बाहर आई, मालकिन उसे इस नए रूप में देखकर आश्चर्यचकित रह गई। उसे उसका यह धुला-निखरा परिवर्तन भा गया। वह किसी सभ्य सुसंस्कृत परिवार की लग रही थी। अब उसके कामकाज का जायजा लेना बकाया था। रेशमा को इसका लंबा तजुरबा था। उसने खाना जो बनाया, वह पति-पत्नी ही नहीं, बच्चों को भी रुचिकर लगा। उनको संतुष्ट पाकर रेशमा को अनुभूति हुई कि एक अरसे बाद वह सही तट पर आ लगी है।

लीना ने यह भी महसूस किया कि न सिर्फ वह भोजन स्वादिष्ट बनाती है, बल्कि बच्चों के प्रति भी उसका बर्ताव ममतामयी रहता है। वह अनायास मिल गई इस नौकरानी से इतनी प्रभावित हुई कि छह महीनों तक उसका तय वेतन एजेंट को देने के अलावा उसकी झोली में भी कुछेक रुपए डालती रही। अपने वे वस्त्र, जो सेवा-निवृत्ति की सीमा तक नहीं भी जा पाए थे, उसको दे दिए। उनके बँगले में सीढ़ियों के नीचे एक छोटा-सा कमरा निकाला गया था। वहाँ एक खाट, गादी और ओढ़ना भी उसको उपलब्ध करा दिया।

लीना ने यह सारा यों ही नहीं कर दिया। नौकरानी से सबसे अधिक अपेक्षा होती है कि वह पूरी ईमानदार हो। लीना ने उसकी एकाधबार परीक्षा लेने के लिए अपने गहने-पैसे जान-बूझकर यहाँ-वहाँ खुले में छोड़ दिए। रेशमा ने उन्हें बुलाकर वे उठाकर रखने के लिए दिए, बिना एक शब्द बोले अपनी दृष्टि से सावधानी बरतने का संकेत देते हुए।

कुल मिलाकर रेशमा को तकदीर की यह रेशम-सी मुलायम चमक सीमातीत संतोषप्रद तृप्ति देने लगी थी। इसका अपेक्षित परिणाम उसकी कार्य-कुशलता पर हुआ। लीना पर यह असरकारक होना स्वाभाविक था। दोनों की जुगलबंदी सभी परिजनों को स्तब्ध, परंतु मन से उर्जित तालियाँ पीटने को प्रोत्साहित करती रही।

दुःख एक ही था रेशमा का। वह राजू के अनुरागी स्पर्शों-बातों से वंचित अकेले में उदास हो जाती थी।

दूसरी तरफ यही हाल राजू का था।

उन लोगों ने दिलशाद गार्डन मेट्रो का ठिया बदल दिया था। शायद वह एक दिन, जब गए थे, केवल रेशमा के लिए ही उदित हुआ था। वह दूर पड़ता था, कम समय में कमाई भी पर्याप्त नहीं होती थी, अड़चन भरा भी था। उन्होंने शाहदरा के ही छोटा बाजार जाना शुरू कर दिया। वहाँ दुकान-दुकान, भीड़ से लदे-फँदे सँकरे से मार्ग पर आ-जा रहे ग्राहकों से काफी कुछ मिल जाता था। नौबू क्या, किसी भी अभावग्रस्त तथा भिखारी की लंबी पारी खेल चुके अवश जन के भाग्य में और विकल्प होता भी क्या है?

फिर एक रोज अपने विरह से व्यथित राजू ने माधव से कह ही दिया, ‘बाबा, क्यों न हम एक बार रेशमा से मिल आएँ। पता नहीं वह किसी तकलीफ में हो?’

बाबा यानी माधव की भी रेशमा को यों अकेले छोड़ आने के अनंतर चिंता बनी रहती थी। उसे राजू का सुझाव औचित्य लिये लगा। अतएव भीख माँगने की अपनी दिनचर्या त्यागकर वे तीनों दिलशाद गार्डन की ओर बढ़ लिये।

कहना न होगा कि लगी हुई लत के चलते वे सरे-राह किसी उदार दीख रहे शख्स के सामने हाथ फैला ही देते थे, ‘साब, रुपया-दो रुपया दे दो, भगवान् आपका भला करेगा।’ नौबू मात्र दोनों हथेलियाँ आपस में जोड़कर, ‘ओ...आं...का आधा-अधूरा नाद ही निकाल पाता। और होता अकसर यह कि उसे ही सबसे अधिक ‘दान’ मिल जाता।

खैर, ज्यों ही वे रेशमा के ठिकाने पर पहुँचे, सिक्युरिटी गार्ड ने माधव को पहचान तो लिया, लेकिन गेट पर ही रुकने को कहा। वह जब भीतर से वापस आया, उसके पीछे रेशमा भी थी।

‘ओफ्फोह! यह तो कोई और लग रही है, रेशमा ऐसी तो न थी...’ वे तीनों अवाक् उसे निहारते रह गए।

रेशमा ने झट माधव के पैर छुए, नौबू को लगभग उठाकर बाजुओं से घेर लिया, जबकि वह अब उतना छोटा नहीं रह गया था और अंत में राजू के कंधे को दबाया, ‘कैसे हो मेरे राजू!’

देर तक वे आपस में बतियाते रहे। नौबू भी उसमें शरीक था—बिना सुने, बिना बोले। माधव एवं राजू को रेशमा की वर्तमान खुशहाली जानकर अपार प्रसन्नता हुई कि भीख माँगने की कष्टप्रद तथा निकृष्ट कशमकश से उसे छुटकारा मिल गया था।

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एक पखवाड़ा बीता होगा। राजू बेचैन रहने लगा था। उसे अपने पुराने बंदीगृह के बाहर के उस पेड़ का चबूतरा और वह रात बारहा याद आती रही। आना सहज था, क्योंकि रेशमा का उसके लिए संबोधन अपने आप में संपूर्ण था, ‘मेरे राजू!’

उसने माधव से सुबह-सुबह बहाना किया, ‘बाबा, आज मेरी तबीयत ठीक नहीं लग रही।’

‘क्या हो गया, बेटे।’ माधव ने उसके कपाल पर स्पर्श करते हुए पूछा।

‘नहीं, बुखार नहीं है, पर मेरे समूचे बदन में दर्द हो रहा है। सर भी बहुत दुःख रहा है।’ राजू ने झूठ बोला।

माधव ने विश्वास कर लिया, ‘तू लेटा रह। मैं लौटते हुए मेडिकल से गोली लेकर आऊँगा।’

माधव अपने साथ नौबू को लेकर अपने हर रोज के तयशुदा काम पर चला गया।

उनके जाते ही राजू उठा। अपनी बैसाखी का सहारा लेकर मुँह-हाथ धोए और रेशमा से मिलने निकल पड़ा।

वह दिलशाद गार्डन के गोल चक्कर से बैंकों के सामने की सड़क पर जाने हेतु दाहिने मुड़कर जा रहा था। कई गाड़ियाँ तीव्र गति से चक्कर काटकर आ रही थीं। मालूम नहीं ये दिल्लीवाले क्यों इतनी जल्दी में होते हैं, जबकि अगले चौराहे की पान की दुकान पर पंद्रह मिनट खड़े होकर बेवजह सिगरेट फूँकते रहते हैं। और उसमें ट्रकवाले तो किसी के बाप को नहीं बख्शते, चाहे दिन हो या रात।

टर्निंग पर उस ट्रक ड्राइवर ने चक्कर के काफी अंतर से अंधाधुंध रफ्तार से बाईं ओर के रास्ते पर जाने के लिए ऐसे मोड़ा कि बिल्कुल सड़क के कोने पर थम गए राजू के ऊपर चढ़ गया। वह गिर पड़ा। उसकी बैसाखी टुकड़े-टुकड़े होकर छितरा गई।

बी-40, एफ-1, दिलशाद कॉलोनी, दिल्ली-110095

दूरभाष : 9971744164

— अशोक गुजराती

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