अंदमान के बंदीगृह में

काला पानी पहुँचते ही कैदियों को धुआँकश से उतारा जाता है और उन्हें सीधे उस द्वीप पर, सागर की ढलान पर बनाए हुए भव्य, मजबूत, विशाल तथा प्रमुख कारागृह में सशस्त्र पुलिस-पहरे में पहुँचाया जाता है।

इस प्रकार के कारागृह को ‘कक्ष-कारागार’ (Cellular Jail) कहा जाता है। बंदियों की बोली में इसी ‘सेल्युलर जेल’ का ‘सिलबर जेल’ (रुपहली बंदीशाला) जैसा मनमोहक रूपांतर हो गया है। जो अर्धशिक्षित बंदी थे—वे पुलिस के यह कहने पर कि ‘इन्हें सिलबर जेल में ले जाओ’ हक्के-बक्के-से देखते रहे। भई, रुपहली बंदीशाला में जाना है! क्या बात है! कुछ मंदिरों के खंभों अथवा कंगूरों पर जिस प्रकार चाँदी की चादरें जड़ाई जाती हैं, उसी प्रकार उनकी नजरों के सामने ‘सिलबर जेल’ नाम सुनते ही किसी विलक्षण तथा भव्य कारागृह, जिसका कम-से-कम दर्शनीय हिस्सा रुपहला हो, दृश्य आ जाता। भई, काले पानी की सारी बातें ही न्यारी हैं। क्या कहा जाए, जिस तरह काला पानी उसी तरह बंदीशाला रुपहली क्यों नहीं हो सकती?

कम-से-कम कैदियों तथा पुलिसवालों के मुँह से बार-बार ‘सिलबर जेल’ नाम सुनकर कंटक को बड़ा आकर्षक प्रतीत हुआ। वास्तव में भयानक पापियों को उनके भीषण पापों का कठोर दंड देने के लिए जिस द्वीप में ले जाना है, उसका नाम जिस तरह ‘काला पानी’ प्रचलित हो गया जिससे रोंगटे खड़े होना स्वाभाविक है, उसी तरह उस कारागृह का नाम भी ‘नारकीय विवर’ अथवा ‘छलघर’ प्रचलित होना चाहिए था, जिससे अच्छा-खासा दबदबा निर्मित होता। परंतु यह नाम कम-से-कम लुभावना तो है—वाह! ‘सिलबर जेल’—रुपहली बंदीशाला!

भई, केवल नाम ही प्यारा नहीं है—वह देखिए, वह भव्य बंदीगृह दिखाई दे रहा है—वही है सिलबर जेल। आँ वह! बिल्कुल सिलबर—रुपहला न सही, पर कितना आकर्षक है वह भवन। रेखांकन करके ठीक-ठाक, साफ-सुथरा, टीप-टाप, बिल्कुल कोरा, प्रदीर्घ, प्रशस्त, समानांतर, बढ़िया खिड़कियाँ-ही-खिड़कियाँ—एक मंजिल पर खड़ी तीन सुघड़, सुडौल मंजिलें, बीचोबीच पक्का सुगठित टावर। पल भर के लिए कंटक को अहसास हुआ, कहीं यह पुलिस मेरा मजाक तो नहीं उड़ा रही! काले पानी के प्रमुख बंदीभवन के बहाने कहीं कोई आरोग्य भवन तो नहीं दिखा रहा, जो रईस धनवान् अफसरों के लिए बनाया गया है! भई, यह सिलबर जेल है या सैनिटोरियम!

भीतर कदम रखते ही बंदीगृह नाम से जो एक उदास, दारुण, वीरान अँधेरे दबदबे का अनुभव आम भारतीय बंदीगृह में भी होता है, उसका यहाँ नामोनिशान तक नहीं है। रोशनी, हवा की विपुलता। तीन मंजिलों के पाँच-छह ‘विंग्ज’—जिनमें एक जैसी कोठरी से कोठरी सटाकर बनाई गई हैं—सुडौल, सुगठित मध्यस्थित उस टावर के चारों ओर दूर-दूर तक कायदे से फैले हुए। बीच में बड़े-बड़े आँगन रखे हुए—गोलाकार—चारों ओर नारियल—केले का घना वन। अंदमान के घने जंगल में कभी-कभी नरम-नरम मुलायम, सुस्त, तीस-तीस फीट लंबे, सुंदर प्रचंड अजगर कुंडली मारकर लेटे हुए पाए जाते हैं, उसी तरह यह वन भी जैसे एक अजगर ही है। अजगर जैसा ही मनमोहक!

उसपर हर बंदी के लिए अलग-अलग कालकोठरी, जिसमें लोहे की सीखचों का बंद दरवाजा। इस प्रकार उसमें सात-साढ़े सात सौ काल कोठरियाँ हैं। इसीलिए उसका सेल्युलर जेल जैसा सार्थक नाम रखा गया था।

उसे हर कोठरी में भरपूर रोशनी दिखाई देती। परंतु उस रोशनी की विशेषता यह थी कि उस कोठरी में कदम रखने और द्वार को एक बार बाहर से ताला लगने के बाद चर्मचक्षुओं को भले ही साफ-साफ दिखाई दे, परंतु दिल में घुप अँधेरा छा जाता, एकदम घुटन-सी महसूस होती; वह प्रशस्त, विशाल कमरा कालकोठरी बन जाता।

उसी प्रकार की एक-एक कालकोठरी में बंदियों के उस चालान के भी एक-एक कैदी को अलग-अलग बंद किया गया। तीन-चार दिन तक उन कालकोठरियों में अकेले-अकेले कैदी को गाड़ने के बाद उनके दंड-पत्रक की जानकारी का निरीक्षण करके उनके अपराध तथा पूर्ववृत्त के अनुसार विभिन्न श्रेणी विभाजन किया गया। जो तात्कालिक उक्षोभ में अपराध कर गए और प्रथम बार दंडित हुए थे, उनकी गणना सुधारणीय श्रेणी में की गई। जो घुटे हुए अपराधी थे, उनकी भयंकर दुःसुधारणीय के रूप में दूसरी श्रेणी—इस प्रकार अपराधी विज्ञान (Criminology) के अनुसार दो वर्ग किए गए। कंटक प्रथम श्रेणी में था और अंग्रेजी, हिंदी शिक्षित होने के कारण महीने-दो-महीने में ही उसे लेखालय में, जो बंदी लेखक-वर्ग होता है उसमें, थोड़ा-बहुत लिखा-पढ़ी का काम मिल गया और यह स्पष्ट हो गया कि चंद दिनों में बंदियों में ‘बाबू’ के रूप में उसका बोलबाला होगा। परंतु रफीउद्दीन के दंड-वृत्तांत की ‘भयंकर’ श्रेणी में गणना हुई, अर्थात् पाँच वर्षों तक उसे उसी कारागार में बंद रखने तथा तब तक कड़े पहरे में सख्त काम करने का दंड दिया गया जब तक उसका आचरण चोखा नहीं दिखाई देता।

आजकल अंदमान में भयंकर तथा निघरघट बंदी नहीं भेजे जाते, अतः वहाँ के कैदियों को काफी सहूलियतें मिलती हैं। परंतु तीस-पैंतीस वर्ष पूर्व भयंकर, निघरे, छँटे हुए दंडितों को प्रायः उधर भेजे जाने के कारण उनसे कड़ी मेहनत लेने के लिए वैसे ही कठोर नियम तथा उनकी दुष्ट मस्ती झाड़ने के लिए उतना ही कठोर काम आयोजित करना पड़ता था। इसके अतिरिक्त अन्य किसी भी ढुलमुल, कमजोर व्यवस्था से इस प्रकार के राक्षसी दंडितों को सही रास्ते पर लाना, उनसे वह कार्य करवाना जो समाज के लिए हितकर था, कम-से-कम समाज को उनके स्वैर अस्तित्व से जो उपद्रव भोगना पड़ता था, उसे टालना लगभग असाध्य ही होता था।

रफीउद्दीन जैसे निर्दयी कैदी उस प्रकार की कठोर, कड़ी व्यवस्था के भी दाँत खट्टे करके काले पानी से भाग जाते, स्वदेश वापस जाते और पुनः समाज पर घोर अत्याचार करते। इस बात पर गौर करते हुए रफीउद्दीन के कारागार से भाग निकलने पर बीच के कालखंड में यह व्यवस्था और भी अधिक सख्त की गई थी। इस बीच उस कक्ष-कारागृह पर ऐसे अधिकारियों की नियुक्ति की गई थी, जो उसके लिए नहले पर दहला हों, आवश्यकता पड़ने पर उससे भी कठोर व्यवहार करें, चालाक हों। रफीउद्दीन को अब जब पुनः काला पानी भेजा गया, तो उसकी मुठभेड़ ऐसे ही एक सवाई दंडम बंदीपाल के साथ होनेवाली थी।

रफीउद्दीन ने आते ही इस बात पर गौर किया तथा अपनी पूर्वपरिचित व्यवस्था तथा अधिकारियों की आँखों में धूल झोंकने के लिए जहाँ जो-जो इलाज लागू हो, वहाँ क्रमशः चुगलियाँ, मनुहार करना, पाँव पकड़ना, वाहियात अंटशंट बकबक, गाली-गलौज, पागलपन का स्वाँग, धींगामुश्ती, हँसते-खेलते मुख प्रशंसा, शोख निर्लज्जता आदि विविध प्रकार के व्यवहारों का प्रयोग करना प्रारंभ किया।

उस नए बंदीपाल ने, जो भयंकर तथा अधम बंदी था, आते ही उनके पूर्ववृत्त की सरकारी टिप्पणियों के अनुसार, मन में निश्चित किया था कि उनके संबंध में कौन सी नीति अपनानी चाहिए। और फिर उनकी प्रस्तुत मनोवृत्तियों को टटोलने के लिए वह एक-दो बार उनसे प्रत्यक्ष साक्षात्कार करता। जहाँ आवश्यकता पड़ती वहाँ खुल्लम-खुल्ला बातचीत करने का दिखावा करता। नरमी से पेश आता और फिर उनका पुरजा उतना ही कसता जितना वह चाहता था। अपनी पद्धति के अनुसार उसने उस नए चालान के बंदियों को भी धीरे-धीरे टटोलना आरंभ किया। पाँच-छह दिनों तक उन्हें कालकोठरी में सड़ने देने के बाद एक दिन वह मुखिया जमादार के साथ रफीउद्दीन की कोठरी के सामने अचानक आ धमका।

बंदीपाल साहब स्वयं जिसकी कालकोठरी (Solitary Cell) में बिन बुलाए जाते हैं, अन्य उपेक्षित कैदियों में उस बंदी का तुर्रा एकदम सातवें आसमान पर चढ़ जाता है। वह यह समझकर अभिमान करने लगता है कि इन नगण्य साधारण लोगों में वह भी एक गण्य हस्ती है। रफीउद्दीन मियाँ भी घमंड से छाती फुलाने लगे। वह इतने कड़े पहरे में, ‘कैदे-तनहाई’ में सड़ रहा था कि जहाँ परिंदा भी पर नहीं मार सकता था। ऐसे में किसी का भी वहाँ आना वह अपना अहोभाग्य समझता। अब दस्तुरखुद ‘जेलर साब’ उसके पास अपनी मरजी से आए और आते ही पूछने लगे, “क्यों रफीउद्दीन! ठीक-ठाक हो न? कुछ शिकवे-शिकायत?”

“सरकार, आप हमारे माँ-बाप! मैं तो आपके गुलाम का तिलाम हूँ जी!” रफीउद्दीन विनम्रता का चोला पहनकर घिघियाने लगा। फिर बोला, “हुजूर, चाहे मुझे फाँसी पर लटकाओ। लेकिन इस कालकोठरी में अकेले मत ठूँसो। अरे हुजूर, तनिक चीं-चपड़ करना भी दुश्वार हो गया है जी! यदि इस प्रकार मैं अकेले इस भयानक सन्नाटे में कुछ दिन और रहा तो पागल हो जाऊँगा, पागल!”

“अकेले रहने से उकता गए हो!” बंदीपाल मुसकराया, “बस इतनी ही है न तुम्हारी छटपटाहट, परेशानी की वजह! अच्छा, जमादार सुनो, भई मियाँ को एक जोरू ला दो सोहबत के लिए। हमारे जनाना कैदखाने में तो बीवियाँ-ही-बीवियाँ हैं।”

यह सूँघकर कि बंदीपाल बड़ा हँसोड़ तथा खुशमिजाज है, रफीउद्दीन भी खुल गया—उसपर बात छेड़ी गई बीवी की। उसकी मुद्रा एकदम रंगीन हो उठी। कहने लगा, “सरकार, उसे आप जनाना बंदीखाना कहते हैं? लगभग सभी कैदी उसे बीवीघर कहते हैं, हुजूर! लेकिन हम लोगों में जो असली शौकीन, रंगीन तबीयत के हैं वे उसे चिड़ियाखाना कहते हैं—‘पाँखीवन’। लेकिन सरकार, उस पाँखीवन का पाँखी, पँखेरू आप हमारे भाग में थोड़े ही आने देंगे? वह सामने बैठकर नारियल की जटाएँ जो कूट रहा है—अजी वही काला-कलूटा, भद्दा कोयला, ऐसे भद्दे डोमकौओं को ही तो आप हसीन बुलबुल देंगे। हुजूर, वाकई सरकार, आप उनके इतने हिमायती क्यों हैं जी? वह डोमकौआ—अजी वही कंटक—मेरा चालानी है—वह भी धोखेबाज, दंडित, आजन्म कारावासी, काला पानी पानेवाला अपराधी। मैं भी बिलकुल उसीकी तरह हूँ। लेकिन मुझे पूरे पाँच साल तक इस बंदीशाला में, इस एकांतवास में, कैदे-तनहाई में सड़ने का दंड और उस साले बदमाश को फौरन कालकोठरी से निकालकर नारियल की जटाएँ कूटने का हलका-फुलका काम दिया गया और कहा गया कि जल्दी ही उसे बंदी लेखकों में नियुक्त किया जाएगा। भई, उस बाबू को लिखना-पढ़ना आता है तो हुजूर, हमें लड़ना आता है—फौज में था सरकार। मर्द का बच्चा हूँ, साब! लेकिन यह कैसा अन्याय है, मेरे मालिक! ककड़ी के चोर को कटारी से मारा जाता है यहाँ। हमपर ‘खतरनाक’ का ठप्पा मारकर इस काले पानी पर कालकोठरी में सड़ने के लिए डाल देते हैं और बाबू लोगों को, उन ससुरे डोमकौओं को, उन पुरुषों को ‘सुधारणीय’ के रूप में चुनकर उन्हें शादी करने की अनुमति दे देते हैं, और उन चिड़ियों में से कोई भी चिड़िया पालने की उन्हें अनुमति दे देते हैं। क्या यह सरासर अन्याय, नाइनसाफी का नियम नहीं है जी! हम ठहरे सिपहसालार, दर के शिकारी कुत्ते। जान पर बीतने से उसके लिए अपनी जान की बाजी लगाने में पीछे नहीं हटेंगे जो हमें पालेगा। ऐसे मर्द के बच्चों को कोठरी में सड़ने के लिए छोड़ने की बजाय सरकार हमें किसी भी जंग पर भेजे, दुश्मनों की तोपों के मुँह में दे दे। सरकार के लिए अपने सिर पर कफन बाँधने के लिए भी पीछे नहीं हटूँगा, हुजूर!”

“सरकार, वह मेरा अक्षम्य अपराध है। लेकिन पहले से ही पश्चात्ताप से मेरा मन बिलकुल राख हो चुका है। उस दुष्कर्म से क्या पाया मैंने? पहले से सौ गुना अधिक यातनाओं में फँस गया, फिर से उसी कोठरी में आकर बेड़ियों से हाथ-पाँव जकड़े बंदियों में सड़ने लगा हूँ। अब आपके निकाल देने पर भी मैं इस काले पानी से जाने का नाम भी नहीं लूँगा जी! कुछ भी काम करूँगा, जो आप देंगे, जब आप कहेंगे तब यहीं घरबार बसाऊँगा! हाँ, पर मेरी शादी सरकार रचाएँ तो बड़ी कृपा होगी। अब मेरी माटी इसी धरती पर गिरेगी। आपके चरणों में यही प्रार्थना है कि इस कालकोठरी से मुझे निकाला जाए।”

“वा भई, वाह! बिल्कुल उचित समय पर अपना इरादा प्रकट किया तुमने। सरकार को वैसे एक शेर की आवश्यकता आ ही पड़ी है। वे जरर्रेवाले हैं न! अरे वही इस काले पानी के घने जंगल के राक्षस। सुना है, मनुष्य की खोपड़ी उतारकर उसे तराशते हैं—अच्छी तरह से घिस-घासकर उसमें रंग-बिरंगी सीपियाँ खोंसते हैं और उसका एक ऐसा खूबसूरत मदिरा-चषक बनाते हैं कि बस देखते ही बनता है। उसी तरह का एक प्याला सरकार लंदन की एक प्रदर्शनी में रखना चाहती है। उस जरर्रेवालों के यहाँ अभी रवाना करता हूँ तुझे। ऐसी खोखली खोपड़ी की पूर्ति करने में जैसी वे लोग चाहते हैं, तुम्हारा सिर सोलह आने फिट और बढ़िया है।”

“मेरा सिर! बिलकुल नहीं। अजी, सामने बैठे उस डोमकौए की—उस कंटक की खोपड़ी ही इस काम के लिए अधिक उचित है, हुजूर! जनाब, दिमागी काम के लिए बाबू लोग ही अधिक अक्लमंद होते हैं। बड़ी ही लचीली खोपड़ी होती है उनकी, और इस प्रकार के जड़ाऊ काम के लिए तराशने-घिसने में आसान होती है।”

“लेकिन, भई उस कंटक का सिर तो ब्राह्मण का है। क्यों ठीक है न जमादार? ब्राह्मण की खोपड़ी तो भरी-भरी सी होती है—उसमें भेजा होता है। हमें तेरी जैसी खोखली—थोथी खोपड़ी की आवश्यकता है। थोथा चना बाजे घना। पुलिस ने हमें सूचित किया है कि उस कंटक का खानदान ऊँचा, कुलीन तथा बुद्धिमान समझा जाता है और सुना है, उसका पिता प्रकांड पंडित, शास्त्र था।”

“हाँ जी, हाँ। न केवल शास्त्र, भई उस कंटक का बाप बड़ा ज्ञानी तथा परोपकारी ब्राह्मण था, हुजूर! उसके बाप ने अपनी अपार धन-दौलत अंत में एक अनाथालय को धर्मार्थ दान की!”

“अच्छा! भला कितना धन था उसके पास!” फटी-फटी आँखों से जमादार ने बीच में ही पूछा।

“तीन मरियल, अस्थि-पंजर बने बेटे और एक बेटी।” खी-खी करके रफीउद्दीन ने अपनी बत्तीसी दिखाई। बेचारा भोला-भाला जमादार खिसिया-सा गया। रफीउद्दीन आगे कहने लगा, “उन सभी बच्चों को उसने अनाथालय में भेज दिया। उन कँगले, खंगर लगे, घटिया बच्चों में यह कंटक सबसे बड़ा भाई था जो यहाँ बाबू बनना चाहता है, और वह बहन कलकत्ता में पूरे मछली-बाजार की दुलहनिया बनकर पनवाड़ी की दुकान में बैठती है, हुजूर! मैंने खुद अपनी आँखों से उसे देखा है, पान भी चबाया है उसकी दुकान का। कैसा खानदान और काहे का चरित्र जी! पुलिस को इसीने छू-छू बनाकर सफेद झूठ बोला जिसे उन्होंने भी अपनी रिपोर्ट में दर्ज किया। और क्या! ऐसे घटिया किस्म के, दो टके के आदमी को आप बाबू बनाते हैं, उसे सिर-आँखों पर बैठाते हैं और हमारे जैसे सरकार के वफादार जाँबाज, दिलेर फौजियों को कुत्ते की मौत मरवाते हैं इन कोठरियों में। यह कैसी अंधेर नगरी है!”

“लेकिन तुम यह मत भूलना कि तुम पहले काले पानी से भागे हुए कैदी हो।”

“सरकार, वह मेरा अक्षम्य अपराध है। लेकिन पहले से ही पश्चात्ताप से मेरा मन बिलकुल राख हो चुका है। उस दुष्कर्म से क्या पाया मैंने? पहले से सौ गुना अधिक यातनाओं में फँस गया, फिर से उसी कोठरी में आकर बेड़ियों से हाथ-पाँव जकड़े बंदियों में सड़ने लगा हूँ। अब आपके निकाल देने पर भी मैं इस काले पानी से जाने का नाम भी नहीं लूँगा जी! कुछ भी काम करूँगा, जो आप देंगे, जब आप कहेंगे तब यहीं घरबार बसाऊँगा! हाँ, पर मेरी शादी सरकार रचाएँ तो बड़ी कृपा होगी। अब मेरी माटी इसी धरती पर गिरेगी। आपके चरणों में यही प्रार्थना है कि इस कालकोठरी से मुझे निकाला जाए।”

“अच्छा, जमादार, कल से इसे कोल्हू में लगा देना। यदि तुम यह काम ठीक-ठीक पूरा करते रहोगे तो तुम्हें छह महीनों के बाद कुछ हलका-फुलका काम दूँगा। हाँ, पर देखो, तुम्हें यह वाहियात, ऊलजलूल बकबक, बेकार मगज के कीड़े दौड़ाकर दूसरों का दिमाग चाटने की बुरी आदत छोड़नी होगी। किसी से भी अवज्ञाकारी, चीं-चपड़ नहीं करनी होगी और याद रखो, यदि आइंदा फिर कभी इस बंदीगृह के रास्ते को भंग किया, धींगामुश्ती या कोई हंगामा खड़ा किया तो तुम्हारी हड्डी-पसली एक कर दूँगा। भगोड़े दंडित को एकदम गोली से उड़ाने का नया अधिकार अब हम लोगों को दिया गया है। पिछली सरकारी ढील के भरोसे पर पहले जैसा चक्कर मत चलाना। बच्चू, अब मुझसे तुम्हारा पाला पड़ा है। तुम्हारे पिछले गुनाहों को चलो मैं भूल जाता हूँ। हाँ, आइंदा समाज को किसी भी प्रकार का उपद्रव न देते हुए मेहनत की रोटी कमाओगे, तभी। जमादार, इसे इस कालकोठरी से निकालो और कोल्हू पर भेज दो। दिन भर वहीं पर वहाँ के बंदियों में घुल-मिलकर रहने दो। रात में इसे यहीं पर बंद किया करो।”

उस कक्ष-कारागृह में हर इमारत के आँगन में एक छपरी बनाई गई थी। उसी में कोल्हू का—जो पाँव से चलाया जाता था—काम चलता था। लकड़ी के एक बड़े से कोल्हू में एक जुए जैसा बड़ा सा डंडा जोड़कर उसके हर तरफ दो आदमी लगाए जाते। कोल्हू में सरसों डाल हर एक व्यक्ति को तीस पौंड तेल शाम तक निकालना अनिवार्य था। बैलों के स्थान पर लगाए गए ये आदमी दिन भर उस कोल्हू के चारों ओर गिरगिराते रहते। इसमें किसी ने काम से जी चुराकर जरा सी भी ढिलाई की तो ऐसे वार्डरों की वहाँ नियुक्ति की गई थी जो उन्हें बैलों जैसे ही हाँकते थे। उस छपरी में इस प्रकार के कोल्हुओं की लंबी कतारें थीं और उन सभी लोगों की निगरानी के लिए एक मेट या मुखिया नियुक्त किया जाता। यह मेट उन दंडितों में से ही चुना गया एक दूसरी श्रेणी का जमादार होता। उस काम की मेहनत इतनी कठिन तथा पीड़ादायी होती कि परले दरजे का घुटा हुआ कैदी भी इस छपरी में कदम रखते ही रुआँसा होकर निढाल हो जाता और उसे नानी याद आ जाती। उनमें से जो पहुँचे हुए शोहदे होते वे जब टालमटोल करने लग जाते तो शाम को उन्हें तब तक उसी तरह जोता जाता, जब तक तेल का निश्चित कोटा पूरा नहीं हो जाता। आवश्यकता पड़ने पर रात सात-आठ बजे तक भी। शाम का भोजन भी उन्हें तब तक नहीं दिया जाता जब तक तेल का कोटा पूरा नहीं होता। इस प्रकार सख्ती बरती जाती, इसीलिए तो बड़े-बड़े पहुँचे हुए डाकू-लुटेरे, हत्यारे, ग्रामकंटक आदि छँटे हुए कैदियों पर भी कुछ अंकुश रहता, उनसे थोड़ा-बहुत काम लेना संभव होता। जो दुर्बल अथवा उस बंदीशाला में रहते हुए भी सदाचारी रहते हैं, उन्हें इस कठोर परिश्रम के काम पर सहसा नहीं लगाया जाता, कम-से-कम यही रिवाज था कि उन्हें इस तरह के काम पर नहीं लगाया जाना चाहिए।

इस कोल्हू के काम से रफीउद्दीन पूर्वपरिचित था ही, इसलिए वह उन अंतस्थ खूबियों से भी परिचित था कि यह काम न करते हुए किस प्रकार किया जा सकता है। उसपर वह कोल्हू ही नहीं, वह मेट जो कैदियों में से ही दूसरे दर्जे का अधिकारी था और जिसे उसपर निगरानी के लिए नियुक्त किया गया था, वह रफीउद्दीन से उस जमाने से परिचित था जब उसका काले पानी पर पहले वास्तव्य था। अतः वही कोल्हू, जो बंदीपाल ने कठिन से भी कठिन काम के रूप में उसे दिया था, उसे बाएँ हाथ का खेल लगने लगा। पहले ही दिन उस मेट के हाथ में रफीउद्दीन के हाथ चलाते-चलाते ‘हलदी की एक गाँठ’ चुपचाप देते ही उनकी पुरानी यारी नई, तरोताजा बन गई और रफीउद्दीन कुंडली मारकर बैठा इतमीनान से गप्पें हाँकते रहने लगा। उसके स्थान पर वह मेट किसी अन्य कैदी को झाँसा-पट्टी देकर चोरी-छिपे लगाता। शाम ढलने से पहले रफीउद्दीन के हिस्से का तेल पूरा-पूरा रफीउद्दीन के नाम पर नाप-तोलकर दे दिया जाता। यह कार्यक्रम तीन-चार दिन तक चलता रहा।

इस दंडित मेट के अधिकार में जो दंडित वार्डर थे, उनमें जोसेफ उसका बड़ा मुँह-लगा बन गया था, क्योंकि वह उसे चोरी-छिपे बड़े-बड़े लोटे भर-भरके दही ला देता। बंदियों को हफ्ते में दो बार दही मिलता। उसका बँटवारा होते ही इस इमारत के कैदियों के हिस्से का सारा-का-सारा दही जोसेफ डाँट-डपटकर, डरा-धमकाकर छीन लेता और वह उस मेट को दे देता। वह छपरी की ओट में बैठकर गुपचुप उसे गटक लेता। इस जोसेफ को जेवर और पैसे हड़प लेने के लालच से अपने दोनों नन्हे-नन्हे सालों को बहला-फुसलाकर भोजन के लिए घर बुलाकर भोजन में विष मिलाकर उन्हें जान से मारने के घोर अपराध के लिए आजन्म कारावास हो गया था। और यह मेट जलनवश कुल्हाड़ी से अपनी बीवी की बोटी उड़ाने के अपराध के लिए पिछले दस वर्षों से काला पानी, आजन्म कारावास का दंड भुगत रहा था। इस प्रकार मेट तथा जोसेफ वार्डर की अनूठी जोड़ी थी। इस इमारत में कोल्हू के बैल बनाए गए चालीस-पचास बंदियों को धता देकर निकालने का काम और साम-दाम-दंड-भेद किसी भी उपाय से उनसे तेल पिसवाने का दायित्व इस जोड़ी पर होता। जो पैसे खिलाते अथवा अत्यंत धृष्ट इस मेट के दास होते उन्हें आराम से बैठाया जाता और उनके काम की कसर उनकी तुलना में सुशील, कायर, सहिष्णु कैदियों से कलेजा तोड़-तोड़कर मेहनत करवाकर पूरी की जाती।

मेट के सारे कर्मों की सहायता करने के कारण उसका जोसेफ पर पूरा-पूरा विश्वास था। वह उससे कुछ भी नहीं छिपाता। हाँ, छिपाना भी मुश्किल था। रफीउद्दीन ने जोसेफ को भी भरपूर तंबाकू तथा कभी-कभी जरा सी सरसों जितनी अफीम की गोली चटाकर वश में किया था। लेकिन जोसेफ कभी इस बात को भुलाता नहीं था कि वह मेट चाहे कितना भी प्रसन्न क्यों न हो, उसे वार्डर के ऊपर तरक्की देकर अपना नेता पद तो कभी अर्पित नहीं कर सकता। यह अनहोनी होनी में तभी बदल सकती है, जब वह बंदीपाल का कृपापात्र बन सके। अतः बंदीपाल की कृपा पाने के लिए जोसेफ सतत प्रयत्नशील रहता था। कारागृह में उसका तरक्की का प्रायः एक ही महापुण्यदायी साधन होता—चुगली खाना। इसके लिए कोल्हू की छपरी के उस मेट के अनेक दुष्कर्मों का कच्चा चिट्ठा, जिसमें अपने गुप्त व्यवहार का खास संबंध नहीं होता, जिसमें अपनी खास हानि नहीं होती, जोसेफ इस सावधानी के साथ और समय साधकर कि किसी को कानोकान खबर तक न हो, बंदीपाल के पास जाकर गुपचुप उसके कानों में उगलता था। ‘ठठेरे-ठठेरे बदलाई’ अर्थात् जैसे-को-तैसा वाले न्याय से ठगों के राज्य की व्यवस्था रखना अनिवार्य होने के कारण बंदीपाल साहब भी ऐसे जासूसों को हमेशा अपनी सहायतार्थ रखते। वह उन चुगलियों में से अनेक दुष्कर्म अटल समझकर पेट में रख लेता और जो बिलकुल ही अक्षम्य होते, उन्हें स्वयं जाकर अचानक रँगे हाथ पकड़ लेता। लेकिन इस अंदाज से कि बंदीवान सहसा इस बात पर गौर न करें कि जोसेफ जैसे एक निपुण जासूस ने ही यह चुगली खाई है और इस बात की पोल न खुले कि लोग जासूसी करते हैं, अन्यथा उनके समक्ष उन्हीं पर भरोसा रखकर कोई भी माई का लाल कभी दुष्कर्म नहीं करेगा।

आठ दिन बाद दोपहर बारह बजे लेखालय के तमाम लेखक, गणक घर गए थे तब बंदीपाल असमय अकेले ही लेखालय में टपक पड़ा और उसके ‘सिपाही’ पुकारते ही पहरे पर खड़ा सिपाही भीतर आ गया।

“जोसेफ वार्डर को बुलाओ!” बंदीपाल के यह आदेश देते ही सिपाही ने बंदीगृह में जाकर जोसेफ को बंदीपाल के पास भेजा और स्वयं बाहर पहरे पर जाकर खड़ा रहा।

“क्यों जोसेफ?” बंदीपाल ने पूछा, “तुम्हारी इमारत की छपरी में कोल्हू का काम कैसे चल रहा है? वह नया कैदी रफीउद्दीन अपने हिस्से का तेल पूरा करके देता है कि नहीं? उसकी किसी से साठ-गाँठ तो नहीं हो रही?”

“हुजूर, अपना तेल वह पूरा नाप-तौलकर देता है।”

“ऐं! पहले दिन से ऐसा अड़ियल, जिद्दी दंडित भी पूरा काम करता है! सच बताओ, घबराओ मत।”

“सरकार, तेल तो पूरा-पूरा नापकर देता है, लेकिन पूरा वह स्वयं नहीं निकालता। सुबह बंदीगृह का चक्कर लगाने का आपका समय जब तक नहीं टलता, वह ज्यों-त्यों करके कोल्हू खींचता है। लेकिन इसके बाद बैठा रहता है और उसका काम कोई दूसरा कैदी दिन भर कोल्हू खींचकर पूरा करता है। वह मेट ही दूसरा आदमी देता है।”

“क्या?” बंदीपाल ने त्योरियाँ चढ़ाईं, “तुमने इतने दिन मुझे अँधेरे में क्यों रखा? फिर तुम्हें टोह लेने के लिए किसलिए रखा था?”

“क्षमा चाहता हूँ, हूजूर! पीछे एक बार मैंने ऐसे ही चुपचाप आपको सूचित किया था कि कुछ दंडितों को इसी तरह बैठालकर मेट दूसरा आदमी देकर काम करवाता है, परंतु आपने उसपर कान नहीं दिया, अतः अब भी मैं आपसे कुछ कहने से डरता था।”

“यह मेरी मरजी है, कब कान देना चाहिए और कब नहीं। जो सचमुच ही दुर्बल या सुधारणीय होते हैं, उनके सिलसिले में कभी अनुशासन में ढील भी चल सकती है—बस काम पूरा होने से मतलब है। लेकिन यह रफीउद्दीन कई अधमाधम अपराधों का जनक है—उसपर काले पानी से भागा हुआ। उसका किसी से भी गठबंधन नहीं होना चाहिए। बोलो, मेट उसे क्यों बैठाता है? वह उसके किस उपकार के बोझ तले दबा हुआ है?”

“सरकार, यह मैं अभी तक निश्चित रूप से समझ नहीं सका हूँ, अन्यथा वह रहस्य मैं आपको कब का बता देता। पर हो न हो, रफीउद्दीन ने मेट को पैसा खिलाया होगा।”

“पैसा, और रफीउद्दीन ने! सुबह-शाम स्वयं जाकर उसकी तलाशी लेता है न! मेरा ऐसा सख्त आदेश है।”

“जमादार कसके तलाशी अवश्य लेता है जी, पर यह सच है कि रफीउद्दीन के पास नकद नारायण जरूर हैं जो उसने कहीं छिपाकर रखे हैं। वरना वह मेट अपने पैसों से उसके लिए चोरी-छिपे बंदीगृह में तंबाकू और अफीम किसलिए ले आता है भला!”

“हाँ। और उसमें से कुछ तंबाकू और अफीम तुम्हें भी खिलाते होंगे, इसीलिए अभी तक तुमने मेरे पास उनकी चुगली नहीं की।”

“भगवान् कसम, सरकार! मैंने उसकी चुटकी भर तंबाकू को भी कभी छुआ तक नहीं जी! परंतु जब तक इसका निश्चित प्रमाण नहीं मिलता कि वह मेट को पैसा खिलाता है, मैं आपसे चुगली करता तो आप ही मुझे झुठलाते, इसलिए मैं उसपर सिर्फ नजर रखता था। मेट के पेट में घुसकर जल्दी ही सारा भंडा फोड़ दूँगा, हुजूर! शायद उनमें कल ही पुनः कुछ लेन-देन होनेवाला है। मैंने ऐसा कुछ छपरी की ओट में छिपकर सुना है। हुजूर, मुझे मेट से डर लगता है। आप मालिक मुझे मेट बनाएँगे न!”

“फिर तो तुम उस मेट से भी ज्यादा पैसे खाकर दुर्जन बनोगे। अच्छा, तुम सप्रमाण उस मेट को रफीउद्दीन से पैसे लेते हुए रँगे हाथों पकड़ा दो अथवा कम-से-कम यह तो बताओ कि रफीउद्दीन पैसे कहाँ छिपाता है। फिर मैं देखूँगा तुम्हारी तरक्की का। जाओ, अपना काम शुरू करो। हाँ, तनिक ठहरो, मैंने तुम्हें अकेले ही बुलाया, अतः बंदीवानों को तुम्हारे जासूस होने का संदेह होगा। इसलिए कुछ प्रकट काम लेते जाना। मेट को बताना, सरसों के तेल के तीन बड़े ड्रम्स अभी इसी वक्त भरो। तुरंत उन्हें मद्रास के जहाज पर चढ़ाना है। हाँ, यह लो चिट्ठी। अब जाओ, बताना कि इसी के लिए बुलाया था।”

प्रायः सभी बंदीगृहों में दोपहर बारह से दो का समय ढिलाई का होता है। सभी वरिष्ठ उत्तरदायी अधिकारी अपने-अपने घर जाते हैं। अतः सिपाही, बंदी अधिकारी (Convict Officers) अनुशासन की पाबंदी छोड़कर पाँव पसारे लेटते हैं। बस, उतनी ही व्यवस्था, अनुशासन और काम किए जाते हैं जो बिलकुल अपरिहार्य होते हैं।

इस समय हमेशा की तरह बंदीपाल कक्ष-कारागृह के महाद्वार के पास स्थित अपनी कोठी की खिड़की के निकट खड़ा था। इतने में उसने नीचे से जोसेफ वार्डर को अपने पास आते हुआ देखा। ऊपर से ही बंदीपाल ने उसे कोठी पर आने की आज्ञा दे दी। जोसेफ को पहरेदार सिपाही ने कोठी के भीतर जाने दिया।

आते ही बंदगी बजाकर जोसेफ ने कहा, “सरकार, अभी इसी वक्त चलेंगे तो मेट को रँगे हाथ पकड़ा जा सकता है। रफीउद्दीन ने मेट को सोने का सिक्का दिया, उसे मेट ने अपने कुरते के नीचे की पट्टी की गुप्त जेब में रखकर सी लिया है। रफीउद्दीन के बदन पर कम-से-कम और दो सिक्के हैं। मेट उसके लिए अफीम और तंबाकू ले आया। उसे भी सरसों के बोरे में फिलहाल ठूँसकर वे दोनों छपरी के पिछवाड़े की ओर किसी की आड़ में लेटे लापरवाही से ऊँघ रहे हैं। मैं कपड़े धोने का बहाना बनाकर इमारत के बाहर खिसक गया और यह देखकर कि आस-पास कोई नहीं, सीधा आपकी कोठी में आया हूँ। लेकिन मालिक, मेरा नाम मत लेना, अन्यथा वे किसी कैदी से मेरी खोपड़ी तुड़वा देंगे।”

“ठीक है। तुम चले जाओ। ये सारे लोग पकड़े गए तो तुम्हें तरक्की मिलेगी। तुम अपने काम पर चुपचाप उस छपरी में जाकर बैठ जाओ।”

(प्रभात प्रकाशन से प्रकाशित पुस्तक ‘काला पानी’ से साभार)

विनायक दामोदर सावरकर

हमारे संकलन