ज्ञान-विज्ञान व मनोरंजन का साथी रेडियो

ज्ञान-विज्ञान व मनोरंजन का साथी रेडियो

आज रविवार था। पड़ोस के घर से बुजुर्ग मि. गुप्ता का रेडियो बज रहा था। राजन अपने कमरे में बैठा स्कूल से दिए कार्य को निपटाने में व्यस्त था। तभी रेडियो से बाल-कहानी का प्रसारण शुरू हो गया। राजन हर रविवार इन बाल कहानियों का बेसब्री से इंतजार करता था। राजन कुछ समय के लिए अपने स्कूल के काम को एक तरफ रखकर कहानी सुनने में मस्त हो गया। उसे रेडियो से कहानी सुनानेवाले की आवाज बहुत ही आकर्षित करती थी। इसी समय राजन के पापा भी कमरे में दाखिल हो गए और राजन के साथ ही वे भी कहानी सुनने लगे। राजन के पापा विज्ञान अध्यापक हैं।

जब कहानी समाप्त हुई तो राजन ने अपने पापा से कहा, ‘पापा, यह रेडियो भी कमाल का अविष्कार है। हर तरह से सबका मनोरंजन करता है।’

‘बिल्कुल सही बात है बेटा। क्या तुम इसके आविष्कारक का नाम जानते हो?’

‘जी पापाजी। जी. मार्कोनी।’ राजन ने एकदम जवाब दिया।

‘शाबाश राजन। मैं तुम्हें जी. मार्कोनी अर्थात् गुल्येल्मो मार्कोनी के बारे में बताता हूँ। वैसे आजकल रेडियो का उस तरह से प्रयोग नहीं होता, जैसा आपके दादा या हमारे समय में होता था। उस समय रेडियो ज्ञान-विज्ञान, संगीत, गीत, कृषि, समाचार से लेकर हर तरह के मनोरंजन का सबका साथी हुआ करता था।’ पापा की बातों को राजन बड़े ध्यान से सुन रहा था।

‘बिना तार के हर प्रकार का संदेश भेजने के लिए रेडियो एक बहुत बड़ा अविष्कार था। इस आविष्कार ने दुनिया को बहुत नजदीकी से एक-दूसरे के साथ जोड़ दिया था। रेडियो के आविष्कारक जी. मार्कोनी का जन्म इटली के बोलोग्ना में २५ अप्रैल, १८७४ को हुआ था। अमीर घराने में जनमे मार्कोनी को बचपन से ही भौतिक विज्ञान और विद्युत् से जुड़ी नई-नई खोजों में बहुत दिलचस्पी थी। मार्कोनी को घर में ही शुरुआती शिक्षा की ट्यूशन दी जाती थी, लेकिन मार्कोनी को इसमें जरा भी दिलचस्पी नहीं थी। वह जब इस पढ़ाई से ऊब जाता तो कहानी की किताबों को पढ़ता या फिर हॉकी खेलता।’

‘कैसी कहानी की किताबें, पापाजी?’ राजन ने सवाल किया।

‘अमूमन ग्रीक की पौराणिक कहानियाँ।’

‘जी।’ राजन संतुष्ट होते हुए बोला।

‘मार्कोनी जब १६ वर्ष के थे, तब उन्होंने भौतिक विज्ञानी हाइनरिख हर्ट्स की विद्युत् चुंबकीय तरंगों की खोज के बारे में पढ़ा। इस आलेख को पढ़कर वे बहुत प्रसन्न हुए। वे जान गए थे कि विद्युत् ऊर्जा के संचार के लिए तार की आवश्यकता नहीं होती। यही बात उनके आविष्कार की आधार बनी। वे इसे व्यावहारिक रूप देने में जुट गए। उन्होंने अपने कमरे को एक प्रयोगशाला का रूप दे दिया। उनके कमरे में पड़े खंभे, तार, टीन के डिब्बों को देखकर सब उन पर हँसते थे और उनका मजाक बनाते थे। लेकिन उन्होंने इस बात की जरा भी परवाह नहीं की और जल्द ही बेतार से तार के आविष्कार को पूर्ण कर लिया। इसे देखकर दुनिया दंग रह गई थी।’

‘पापा, क्या मार्कोनी के माता-पापा भी उनकी इस काम में सहायता करते थे?’ राजन का अगला प्रश्न था।

‘मार्कोनी के पिता का रवैया तो उनके इस कार्य के लिए नकारात्मक था, लेकिन उनकी माँ ने मार्कोनी का पूरा साथ दिया। शोध के दौरान जब वे अपने कार्य में व्यस्त होते, जो उनकी माँ उनका खाना उनके कमरे में ही ले आती थीं। फिर एक दिन वह भी आया, जब मार्कोनी ने १५ फुट की दूरी तक हवा में घंटी बजाकर अपने प्रयोग की पहली सीढ़ी चढ़ी। सबसे पहले यह बात उन्होंने अपनी माँ को ही बताई। इसके बाद तो मार्कोनी ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। १८९६ में मार्कोनी ने २ मील तक हवा में संदेश भेजने में सफलता हासिल की और फिर यह दूरी बढ़ती ही चली गई। इस तकनीक ने समुद्री जहाजों को सही दिशा बताने और अन्य उपयोगी जानकारी देने में काफी सहयोग किया। दूसरे विश्व युद्ध में इटली को इस तकनीक से बहुत लाभ मिला।’

‘यह तो उस समय बहुत ही आश्चर्यजनक बात हुई होगी न, पापा?’

‘बिल्कुल बेटा! यह विज्ञान की दुनिया में एक नए अध्याय की शुरुआत थी। जब वैज्ञानिक फ्लेमिंग ने वाल्व बनाया तो मार्कोनी को अपनी इस खोज में नए पंख मिल गए। वाल्व के आविष्कार से रेडियो तरंगों को बहुत विस्तार मिला। इसके बाद तो रेडियो ने पूरी दुनिया को ही अपनी मुट्ठी में कर दिया था। अब रेडियो विश्व में कहीं भी अपनी बात पहुँचा सकता था। इस दौरान जेम्स फोर्ड में एक रेडियो स्टेशन का निर्माण किया गया, जो उस समय का सबसे बड़ा रेडियो स्टेशन था।’

‘पापा, फिर हम रेडियो के आविष्कार को कब माने?’

‘बेटा, १८९५ में मार्कोनी ने अपने बगीचे में ही पहला रेडियो संदेश भेज दिया था। इसी वर्ष को रेडियो का आविष्कार वर्ष माना गया है। इस महान् आविष्कारक मार्कोनी को १९०९ में भौतिक शास्त्र का नोबल पुरस्कार भी प्राप्त हुआ।’

‘पापा एक और बात पूछूँ?’

‘जरूर बेटा, पूछो।’

‘पापा, रेडियो हम तक अपनी बात कैसे पहुँचाता है?’

‘ओह हाँ, यह बहुत अच्छा प्रश्न किया तुमने। दरअसल, रेडियो एक ऐसी तकनीक है, जिसमें पहले आवाज को रेडियो वेब में बदलकर ट्रांसमिट किया जाता है और रिसीवर इस वेब को आवाज में बदलकर हमारे सामने प्रस्तुत करता है।’

‘जी पापा, आपने बहुत अच्छी जानकारी दी।’ राजन खुश होते हुए बोला।

‘चलो बेटा, अब समय काफी हो गया है। दोपहर का खाना खा लिया जाए।’

‘जी पापा।’

राजन और उसके पिता अपनी जगह से उठ गए थे। पड़ोस के रेडियो से आती फिल्मी गाने की मधुर आवाज कानो में मिसरी घोलती जा रही थी।

गाँव व डाक-महादेव, तहसील-सुंदरनगर
जिला-मंडी-१७५०१८ (हि.प्र.)
दूरभाष : ०९८०५४०२२४२
—पवन चौहान

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