नकली गहने

लैंटिन जब अपने ब्यूरो सहायक प्रमुख के घर आयोजित पार्टी में था, उसकी मुलाकात एक युवा लड़की से हुई। उसे उस लड़की से बेशुमार प्यार हो गया।

वह कई वर्ष पहले दिवंगत हो चुके प्रांतीय टैक्स कलेक्टर की बेटी थी। पिता की मृत्यु के बाद वह और उसकी माँ रहने को पेरिस आ गईं। उसकी माँ ने अपने पड़ोस के परिवारों से जान-पहचान बढ़ाई। उसे आशा थी कि इस तरह वह अपनी बेटी के लिए जीवनसाथी खोज सकेगी।

उनकी आय साधारण थी। वे इज्जतदार, सुशील और शांतिप्रिय थीं। युवा लड़की पूर्णतः भली थी। किसी भी समझदार युवक का यह स्वप्न हो सकता है कि वह अपनी खुशियों के लिए अपना जीवन उसके हाथों सौंप दे। उसके सरल सौंदर्य में सम्मोहित करनेवाली दिव्यता थी। उसके होंठों पर निरंतर खेलनेवाली उसकी अबूझ मुसकान उसके सुंदर और पवित्र मन की पहचान थी। हर ओर उसकी प्रशंसा ही सुनाई देती थी। लोग कहते हुए नहीं थकते थे—‘वह व्यक्ति कितना खुशनसीब होगा, जो उसका प्यार पा सकेगा! उसे उससे बेहतर पत्नी मिल ही नहीं सकती।’

लैंटिन तब इंटीरियर विभाग में चीफ क्लर्क था और उसे साढ़े तीन हजार फ्रैंक का सामान्य वेतन मिलता था। इससे वह वैवाहिक जीवन की जिम्मेदारी उठा सकता था। उसने इस अनुपम युवा लड़की के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखा तो उसकी ओर से यह मान लिया गया।

वह उसके साथ इतना खुश था, जिसका बयान नहीं किया जा सकता। उस लड़की ने गृहस्थी और इसके खर्च को बखूबी सँभाला और उनका जीवन सुखपूर्वक व्यतीत होने लगा। उसने अपने पति की छोटी-से-छोटी जरूरत का अच्छे से ध्यान रखा, उसे खुश रखा और प्यार किया। वह इतनी मोहक थी कि विवाह के छह वर्ष बाद लैंटिन को लगा कि वह अपनी पत्नी को अपने हनीमून के दिनों से भी अधिक प्यार करने लगा है।

लैंटिन को केवल उसकी दो बातें ठीक नहीं लगीं—एक तो उसका थिएटर प्रेम और दूसरा नकली गहनों के प्रति उसका आकर्षण। उसकी सहेलियाँ (कुछ छोटे अधिकारियों की पत्नियाँ) बहुधा नए नाटकों की प्रथम प्रस्तुतियों के समय थिएटर में उसके लिए बॉक्स आरक्षित करा देतीं और उसके पति को भी उसके साथ जाने के लिए बाध्य होना पड़ता, चाहे वह ऐसे मनोरंजक कार्यक्रमों में जाना चाहे या नहीं। ये कार्यक्रम दिनभर के ऑफिस के बाद उसे बहुत ही उबाऊ लगते।

कुछ समय बाद लैंटिन ने अपनी पत्नी से अनुरोध किया कि वह थिएटर जाने के लिए अपने पहचान की किसी महिला से विनती करे कि वह उसके साथ जाए और वापस घर आने तक उसका साथ दे। आरंभ में उसने इस उपाय का विरोध किया, किंतु काफी अनुनय-विनय के बाद वह अपने पति की खुशी के लिए ऐसा करने को राजी हो गई।

थिएटर के प्रति अपने प्रेम के साथ-साथ अब गहनों के प्रति भी उसकी इच्छा उमड़ पड़ी। उसकी वेशभूषा तो पहले की ही तरह अच्छी, सादगीपूर्ण और शालीन थी, किंतु अब उसने अपने कानों में स्फटिक युक्त बड़ी बालियाँ पहनना शुरू कर दिया, जिनकी चमक ऐसी थी, मानो वे असली हीरे की हों। अपने गले में उसने नकली मोतियों का हार और हाथों में नकली सोने के कंगन पहने। उसकी कंघी में काँच के रत्न जडे़ हुए थे।

उसका पति उसे प्रायः उलाहना देता, ‘‘प्रिये, यदि तुम असली गहने नहीं खरीद सकती हो तो तुम्हें केवल अपने सौंदर्य और शालीनता के गहनों से सजा होना चाहिए—ये एक स्त्री के नायाब गहने हैं।’’

किंतु मधुर मुसकान लिये वह कहती, ‘‘मैं क्या करूँ, मुझे गहनों का बड़ा शौक है। केवल यही मेरी कमजोरी है। हम अपना स्वभाव तो नहीं बदल सकते।’’

वह अपनी उँगलियों में मोती का हार लेकर इस तरह घुमाती कि उसमें लगे मणि चमचमाने लगते। वह अपने पति को मनाने के अंदाज में कहती, ‘‘देखो! क्या यह सुंदर नहीं है? कोई भी यकीन करेगा कि यह असली है!’’

लैंटिन फिर मुसकराते हुए जवाब देता, ‘‘प्रिये, तुम्हारी पसंद दुनिया से अलग है।’’

कभी-कभी शाम को वे जब आग के पास बैठकर निजी वार्त्तालाप कर रहे होते, तब वह टी-टेबल पर मोरक्को लेदर बॉक्स रख देती और लैंटिन कह उठता, इसमें ‘कूड़ा’ है। किंतु वह नकली गहनों को ऐसा ध्यान लगाकर देखती, मानो वे उसे कोई गहन अबूझ खुशी प्रदान कर रहे हों। प्रायः वह अपने पति को एक नेकलेस पहनने पर मजबूर करती और दिल खोलकर हँसते हुए कहती, ‘बड़े अजीब लग रहे हैं आप!’ फिर वह अपने पति की बाँहों में समा जाती और उसे प्यार से चूम लेती।

सर्दियों की एक शाम वह नाट्य-संगीत का कार्यक्रम देखने गई और ठंड में ठिठुरते हुए घर लौटी। अगली सुबह उसे जोरों की खाँसी हो गई। फेफड़ों के संक्रमण के कारण आठ दिनों बाद उसका देहांत हो गया।

इस घटना से लैंटिन बुरी तरह टूट गया और उसके बाल एक माह में ही सफेद हो गए। उसका दिल टूट चुका था। दिवंगत पत्नी का आकर्षण, उसकी आवाज, उसकी मुसकान वह भुला न पाता और उसका रुदन चलता रहा।

समय व्यतीत हुआ, पर उसका दुःख कम न हुआ। ऑफिस में प्रायः कामकाज के दौरान जब उसके सहयोगी किसी प्रमुख विषय पर विमर्श कर रहे होते, अचानक ही उसकी आँखें डबडबा जातीं और उसकी सिसकियाँ उसे दुःख से राहत प्रदान करतीं। उसकी दिवंगत पत्नी के कमरे की सभी चीजें उसी तरह पड़ी रहीं, जिस तरह वे उसके जीवित होने के समय थीं। उसके सभी फर्नीचर, यहाँ तक कि उसके कपड़े भी उसी तरह पड़े रहे, जैसे वे उसकी मृत्यु के दिन पड़े थे। समाज से दूर एकांत में रहना और अपने जीवन की उस अमूल्य खुशी के बारे में सोचना ही उसका एकमात्र काम रह गया था।

शीघ्र ही उसका जीवन एक संघर्ष हो गया। उसकी आमदनी, जिससे उसकी पत्नी घर के सभी खर्च पूरे कर लेती थी, अब उससे उसकी तत्काल जरूरतें भी पूरी नहीं हो पा रही थीं। उसे आश्चर्य हुआ कि उसकी पत्नी उस आमदनी में कैसे बढि़या शराब और एक-से-एक व्यंजन की व्यवस्था कर लेती थी, जो अब वह अपनी नियमित आय से नहीं कर पा रहा है।

उसने अब उधार लेना शुरू कर दिया और जल्द ही कंगाल हो गया। एक सुबह उसने पाया कि उसकी जेब में एक सेंट भी नहीं बचा है, तब उसने कोई सामान बेचने का निश्चय किया। तुरंत ही उसे अपनी पत्नी के चमकीले जवाहरात बेचने का विचार आया; वैसे भी नकली जेवरों के प्रति उसके मन में एक प्रकार का विद्वेष था। इन गहनों को देखने मात्र से ही उसके मस्तिष्क में दिवंगत पत्नी की स्मृति मलिन होने लगती।

अपने जीवन के अंतिम दिनों में उसने लगातार खरीदारी की थी और लगभग हर शाम वह नए जेवर लेकर ही लौटती। लैंटिन ने एक समय तक तो उन गहनों की ओर ध्यान नहीं दिया, किंतु अब उसने उस भारी नेकलेस को बेचने की सोची, जो उसकी पत्नी को बहुत पसंद था और जिससे लगभग छह या सात फ्रैंक मिल सकते थे। इस नेकलेस की कारीगरी बहुत सुंदर थी, पर था तो यह नकली।

उसने इस नेकलेस को जेब में रख लिया और किसी भरोसेमंद जौहरी की दुकान का पता लगाने निकल पड़ा। थोड़ी ही दूरी पर उसे एक दुकान मिली, जहाँ वह इसे बेचने के लिए घुसा। वह अपनी तंगहाली पर शर्मिंदगी भी महसूस कर रहा था। उसने दुकानदार से कहा, ‘‘सर, मैं यह जानना चाहता हूँ कि यह नेकलेस कितने मूल्य का है?’’

दुकानदार ने नेकलेस की जाँच की, अपने क्लर्क को बुलाया और दबे स्वर में उससे कुछ बात की, इसके बाद उसने गहने को काउंटर पर रखकर उसका प्रभाव जानने के लिए उसे जरा दूर से देखा।

लैंटिन को ये हरकतें पसंद नहीं आईं और वह बस यह कहने ही वाला था कि ‘ठीक है, मुझे यह पता है, यह बेकार है’, उतने में ही जौहरी ने कहा, ‘‘सर, इस नेकलेस की कीमत तो बारह से पंद्रह हजार फ्रैंक होगी; पर मैं इसे तब तक नहीं खरीद सकता, जब तक आप मुझे यह न बता दें कि यह आया कहाँ से?’’

लैंटिन की आँखें फटी रह गईं! वह इधर-उधर देखने लगा। उसे कुछ समझ में नहीं आया। लड़खड़ाती जुबान में उसने कहा, ‘‘तुम्हें यकीन है कि तुम क्या कह रहे हो?’’ जौहरी ने रूखे स्वर में कहा, ‘‘आप इसकी कीमत का कहीं और पता लगा सकते हैं; मुझे नहीं लगता कि इससे ज्यादा कीमत कोई दे पाएगा। अधिक-से-अधिक मैं पंद्रह हजार फ्रैंक के लिए इस पर विचार कर सकता हूँ। यदि कोई दूसरा इससे अधिक न दे पाए तो आप मेरे पास दुबारा आ सकते हैं।’’

आश्चर्यचकित लैंटिन ने नेकलेस उठाया और स्टोर के बाहर निकल आया। वह इस पर सोच-विचार करने के लिए कुछ समय लेना चाहता था। बाहर निकलने के बाद उसे हँसी आ रही थी। उसने मन-ही-मन कहा, ‘मूर्ख है! मूर्ख है वह! क्या उसकी बात विश्वास करने लायक थी! उस जौहरी को तो असली और नकली हीरे का भेद ही नहीं पता।’

कुछ मिनटों के बाद वह ‘रू द ला पे’ (एक शॉपिंग स्ट्रीट) में एक दूसरी सुनार की दुकान में गया। दुकान का मालिक उस नेकलेस को देखते ही जोर से बोल उठा, ‘‘ओह, इसे तो मैं अच्छी तरह जानता हूँ; यह यहीं से खरीदा गया था।’’

परेशान लैंटिन ने प्रश्न किया—‘‘क्या कीमत होगी इसकी?’’

‘‘जी, मैंने इसे बीस हजार फ्रैंक में बेचा था। मैं इसे अठारह हजार फ्रैंक में वापस ले सकता हूँ किंतु इसके लिए कानूनन आपको मुझे यह बताना होगा कि यह आपके पास कहाँ से आया?’’

लैंटिन हक्का-बक्का रह गया। उसने कहा, ‘‘किंतु...किंतु इसकी अच्छी तरह से जाँच कर लें। अभी तक मैं यह समझता था कि यह नकली है।’’ जौहरी ने पूछा, ‘‘अच्छा, आपका नाम क्या है?’’

‘‘लैंटिन, मैं ‘मिनिस्टर ऑफ दि इंटीरियर’ में काम करता हूँ। मैं ‘१६ रू ड मार्टर्स’ में रहता हूँ।’’

दुकानदार ने अपनी लेखा-पुस्तक की जाँच की और जानकारी दी—‘‘यह नेकलेस २० जुलाई, १८७६ को ‘१६ रू ड मार्टर्स’ के पते पर मैडम लैंटिन को भेजा गया था।’’

दोनों एक-दूसरे को घूरकर देखने लगे। लैंटिन आश्चर्य से अवाक् था। जौहरी को लगा कि वह कोई चोर है, पर उसने चुप्पी तोड़ते हुए कहा, ‘‘क्या तुम यह नेकलेस चौबीस घंटों के लिए मेरे पास छोड़ सकते हो; मैं तुम्हें इसकी रसीद दूँगा।’’ लैंटिन ने तुरंत कहा, ‘‘हाँ, ठीक है।’’ फिर वह रसीद लेकर दुकान से चला गया।

वह घोर भ्रम की स्थिति में था और इधर-उधर सड़कों में भटकता रहा। उसके मन में बहुत से सवाल उठ रहे थे। उसकी पत्नी के पास पैसे ही कहाँ थे कि वह इतना महँगा गहना खरीद सके। नहीं, यह संभव नहीं। तब तो यह कोई उपहार होगा उपहार! पर यह उपहार किसने दिया होगा? और उसे यह क्यों दिया गया?

वह रुका और सड़क के बीच खड़ा रहा। अपनी पत्नी के बारे में उसे भारी संदेह होने लगा। तब तो अन्य सभी गहने भी उपहार ही होंगे! उसके नीचे की धरती हिलने लगी, सामने का वृक्ष उसे गिरते हुए लगा और वह चक्कर खाकर जमीन पर गिर पड़ा। उसे दवाखाने में होश आया, जहाँ राहगीर उसे उठाकर ले गए थे। उसने कहा कि उसे घर पहुँचा दिया जाए। घर पहुँचते ही उसने अपने आपको एक कमरे में बंद कर लिया और रात होने तक रोता रहा। अंततः थका हुआ वह बिस्तर पर लेट गया। वह पूरी रात बेचैन रहा।

अगली सुबह उठकर वह धीरे-धीरे ऑफिस जाने की तैयारी करने लगा, पर ऐसे सदमे के बाद उसे काम करने का मन नहीं हो रहा था। अतः उसने नियोक्ता को पत्र भेजकर ऑफिस न आने के लिए माफी माँगी। उसे याद आया कि उसे जौहरी के पास जाना है। उसे इच्छा तो नहीं थी, किंतु वह नेकलेस उसके पास नहीं छोड़ सकता था। वह तैयार होकर घर से बाहर निकला।

दिन सुहाना था। व्यस्त शहर के ऊपर स्वच्छ, नीला आकाश मुसकरा रहा था। कुछ लोग फुरसत में थे और जेब में हाथ डाले टहल रहे थे। उन्हें देखते हुए लैंटिन ने मन-ही-मन कहा, ‘अमीर लोग वास्तव में बड़े खुश हैं। पैसा होने पर भारी-से-भारी दुःख को भुलाया जाना संभव है। जिसे जहाँ घूमने जाना हो, जा सकता है। यात्रा में ध्यान दूसरी ओर चला जाता है और यह दुःख का सबसे सही इलाज है। काश! मैं धनवान होता!’

उसे अब भूख लग रही थी, लेकिन उसकी जेब खाली थी। उसने फिर से नेकलेस को याद किया। अठारह हजार फ्रैंक! अठारह हजार फ्रैंक! बड़ी धनराशि!

वह शीघ्र ही ‘रू द ला पे’ पहुँचा और जौहरी की दुकान के सामने सड़क के उस पार खड़ा था। अठारह हजार फ्रैंक! उसने दूकान में जाने के लिए बीसों बार सोचा, पर वह झिझक रहा था। वह भूखा था। बहुत भूखा और जेब में उसके पास एक सेंट भी नहीं था। उसके पास सोच-विचार का समय नहीं था। उसने दौड़कर सड़क पार की और सीधे दुकान में घुस गया।

मालिक तुरंत आगे आया और विनमतापूर्वक उसे बैठने को कहा। दुकान के क्लर्कों ने उसे बड़े गौर से देखा।

जौहरी ने कहा, ‘‘मैंने पूछताछ कर ली है और यदि आप गहने को बेचना चाहते हैं तो मैं प्रस्तावित कीमत देने को तैयार हूँ।’’

‘‘जी, हाँ! बिल्कुल ठीक!’’ यह कहते हुए लैंटिन की जबान लड़खड़ाई।

मालिक ने दराज से अठारह बड़े नोट निकाले और लैंटिन के सामने गिनकर उसे सौंप दिए और रसीद पर उसके हस्ताक्षर लिये। लैंटिन ने काँपते हाथों से पैसे अपनी जेब में रख लिये।

दुकान से निकलते समय वह फिर दुकानदार की ओर मुड़ा, जिसके होंठों पर चिर-परिचित मुसकान थी। उसने नजरें झुकाते हुए कहा, ‘‘मेरे, मेरे पास और भी गहने हैं, जो उसी स्रोत से मेरे पास आए हैं। क्या आप उन्हें भी खरीद सकते हैं?’’

दुकानदार ने सिर हिलाते हुए कहा, ‘‘जी, सर! अवश्य!’’

लैंटिन ने गंभीर होते हुए कहा, ‘‘मैं उन्हें आपके पास लेकर आता हूँ।’’ घंटे भर बाद वह गहनों के साथ दुकान पर आ पहुँचा।

बड़े हीरे की बालियों की कीमत बीस हजार फ्रैंक थी, कंगन पैंतीस हजार फ्रैंक, अँगूठियाँ सोलह हजार, पन्ने और नीलम का सेट चौदह हजार, मणियुक्त लटकन सहित सोने की चैन चालीस हजार, सब मिलाकर एक सौ तिरालीस हजार फ्रैंक।

जौहरी ने चुटकी लेते हुए कहा, ‘‘एक महिला ने अपनी सारी बचत इन कीमती गहनों में लगा दी थी।’’

लैंटिन ने गंभीरतापूर्वक कहा, ‘‘पैसे निवेश करने का यह भी एक तरीका है।’’

उस दिन उसने ‘वायसिन’ में लंच किया और शराब पी, जिसकी कीमत बीस फ्रैंक प्रति बोतल थी। इसके बाद उसने एक वाहन किराए पर लेकर ‘बॉइस’ का दौरा किया। चारों ओर वह तिरस्कार भरी नजरों से देखता रहा और लोगों से चीख-चीखकर यह कहने से खुद को नहीं रोक सका—

‘‘मैं भी अमीर हूँ! दो सौ हजार फ्रैंक की पूँजी है मेरी।’’

अचानक ही उसे अपने नियोक्ता की याद आई। वह वाहन से ऑफिस पहुँचा और बड़ी खुशमिजाजी के साथ प्रवेश करते हुए कहा, ‘‘सर, मैं अपने पद से इस्तीफा देने आया हूँ। मुझे तीन सौ हजार फ्रैंक विरासत में मिले हैं।’’

उसने अपने पूर्व-सहयोगियों से हाथ मिलाया और उन्हें विश्वसनीय ढंग से अपनी भावी योजनाओं के बारे में बताया। उसके बाद वह भोजन करने ‘कैफे एग्ने’ चला गया।

भोजन के दौरान वह आभिजात्य वर्ग के एक सज्जन के पास बैठा और उसे बड़े ही गोपनीय अंदाज में बताया कि उसे भाग्यवश चार सौ हजार फ्रैंक विरासत में मिले हैं।

वह अपनी जिंदगी में पहली बार थिएटर से नहीं ऊबा और शेष रात एक मस्ती भरे मनोरंजक कार्यक्रम में व्यतीत की।

छह माह बाद उसने दुबारा शादी की। उसकी दूसरी पत्नी प्रतिभावान पर गर्ममिजाज थी। उससे वह बहुत दुःखी रहा।

११ सूर्या अपार्टमेंट,
रिंग रोड, राणाप्रताप नगर
नागपुर-४०००२२
दूरभाष : ०९४२२८११६७१
—गी.द. मोपासाँ

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