बड़ा लेखक बनने के सरल उपाय

बड़ा लेखक बनने के सरल उपाय

किसी भी क्षेत्र में बड़ा होने के लिए कठिन और सरल उपाय होते हैं। समझदार लोग सरल उपाय अपनाते हैं और शेष लोग मेहनत-मशक्कत करते हुए आगे बढ़ते हैं। दूसरी तरह के उपाय कठिन होते हैं और उनमें समय भी बहुत नष्ट होता है। इस प्रकार आजकल किसी भी क्षेत्र में त्वरित सफलता पाने के लिए सरल उपाय अपनाने का चलन लोकप्रिय है। वह बात अलग है कि कभी-कभी सरल उपाय अपनाने के चक्कर में आदमी औंधे मुँह गिर पड़ता है। इस बात से ज्यादा डरने की जरूरत नहीं है, क्योंकि जब ऐसी स्थिति आती है, तब उससे उबरने के लिए भी सरल उपाय उपलब्ध रहते हैं। जब हर क्षेत्र में सफलता के लिए सरल उपाय अपनाने का दौर चल रहा है, तब लेखन का क्षेत्र इससे अछूता कैसे रह सकता है? यहाँ भी बड़ा लेखक बनने के सरल उपाय चलन में आ गए हैं, जिन्हें अपनाते हुए बड़े लेखकों की भीड़ बढ़ती चली जा रही है। जब सफलता की गंगा इतनी नजदीक बह रही हो, तब क्यों न उसमें लगे हाथ हाथ धो लिये जाएँ।

जब आपने साहित्य के क्षेत्र में बड़ा बनने के लिए सोच ही लिया है और प्रतिभा आपके पास धेले भर की नहीं है, तब नई कविता का क्षेत्र आपके लिए बहुत ठीक रहेगा। आप मनुष्य हैं तो सोचते जरूर होंगे, बस इतना आपके लिए पर्याप्त है। कवि बनने के लिए जरूरी है कि आप सोचिए और खूब सोचिए। क्या सोचिए? यह किसने पूछा? कुछ भी सोचिए, लेकिन सोचिए जरूर! जब आप लगातार ऊल-जुलूल कुछ भी सोचते रहेंगे तो आपके दिमाग में भब्बड़-सी मच जाएगी, समझिए कि आप अब कवि बनने लग गए हैं। अब इन विचारों के जंजाल को आप एक तरफ से अपनी डायरी में लिखना प्रारंभ कर दीजिए। यहाँ किसी अनुशासन और विधान आदि की जरूरत नहीं है। आप तो बस लिखते जाइए टेढ़े-मेढ़े किसी भी क्रम में। स्थानीय कवि-गोष्ठियों और सम्मेलनों में सम्मिलित होते हुए आपको स्वयं लगेगा कि शहर में आपके जैसे बहुत सारे लोग यही खटकरम कर रहे हैं और वे स्थापित कवि कहे जाते हैं। धीरे-धीरे आप भी वहाँ स्थापित होने लगेंगे। कभी-कभी आपको लग सकता है कि यार, जो मैं लिख रहा हूँ तथा दूसरे लोग कविता के नाम पर कुछ भी लिख रहे हैं, वह समझ में क्यों नहीं आता? इस झंझट में आपको पड़ने की कतई जरूरत नहीं है। तथाकथित नई कविता की यही तो विशेषता है कि वह कवि तो कवि, कवि के बाप के भी समझ में नहीं आती। आपको कवि बनना है कि नहीं? यदि सचमुच आपको कवि बनना है तो कविता को समझने की कोशिश कतई मत करिए। जैसे आपको अपनी कविता समझ में नहीं आती, वैसे यहाँ किसी को किसी की कविता समझ में नहीं आती, परंतु सब कवि हैं और कई तो महाकवि! आपको भी महाकवि बनना है न? तो लिखते रहिए ऐसे ही, जैसे लिख रहे हैं। लगातार! अब तक आपकी डायरी भर गई होगी? भर गई है। बधाई!

बड़े ही हर्ष की बात है यह। अब इस डायरी को किसी अच्छे टाइपिस्ट को देकर टाइप करा डालिए। लो, तैयार हो गया आपका पहला काव्य-संग्रह! प्रकाशन? इसकी फिक्र बिल्कुल मत करिए। ढूँढि़ए आपके आसपास कई प्रकाशक अपनी दुकान खोले बैठे होंगे। वरना आपके कवि मित्र कब काम आएँगे? वे इस दिशा में जरूर आपकी मदद करेंगे। सस्ते में छपा देंगे आपका कविता-संग्रह वहीं से, जहाँ से उन्होंने अपने कई कविता-संग्रह छपवाए हैं। थोड़ा-बहुत मोलतोल करना पड़ेगा, परंतु आपका कविता-संग्रह छप जाएगा। वाजिब दामों में। अब आपको अपने प्रथम काव्य संकलन का लोकार्पण समारोह कराना है। कराइए, शौक से कराइए। जैसा बजट, वैसा कार्यक्रम। मुख्य अतिथि को दिल्ली से बुलवाइए। वहाँ कई लोग इसी फिराक में बैठे हैं कि उन्हें कोई बुलाए। हवाई मार्ग से आने की बात कहेंगे, परंतु आपके लगातार आग्रह करने पर यह सोचते हुए कि किसी और को न बुला ले, वे तृतीय श्रेणी के मार्ग व्यय पर आपके शहर में आ जाएँगे और आपने पीने-पिलाने की उचित व्यवस्था कर दी तो वे मंच से आपको मुक्तिबोध से बड़ा कवि सिद्ध कर देंगे। इस प्रकार पूरे शहर में आप कवि के रूप में खासे चर्चित हो जाएँगे।

अब तो आप स्थापित कवि हैं। आपका एक कविता-संग्रह प्रकाशित है। आपने कई समीक्षक मित्रों को उसकी प्रतियाँ भेजकर यत्र-तत्र उसकी बढि़या समीक्षाएँ भी छपवा ली हैं। शहर में कोई भी साहित्यकार आता है तो आप उसे अपना प्रथम काव्य संकलन ‘सप्रेम भेंट’ करना नहीं भूलते। इन दिनों आपको लगता है कि कवि तो मैं हो ही गया हूँ, अब गद्य की विधाओं पर भी कुछ उपकार कर दिया जाए। इस संदर्भ में मेरा सुझाव है कि कहानियाँ इन दिनों खूब छप रही हैं। कहानी पर आपके द्वारा हाथ साफ करना आपके लिए ज्यादा उपयुक्त रहेगा। पर कहानी लिखी कैसे जाए? वेरी सिंपल! यह बहुत सरल सी बात है। आखिर हम आपको सरल उपाय बताने के लिए ही तो यह लेख लिख रहे हैं। आप अखबार पढ़ते हैं न? जरूर पढ़ते हैं। बस हो गया काम! अखबार में आप रोज चोरी, डकैती, बलात्कार, हत्या और जाने कैसे-कैसे सच्चे समाचार पढ़ते रहते हैं। ये समाचार ही तो आपके लिए कहानियाँ हैं। आप उन सभी महत्त्वपूर्ण समाचारों की कटिंग अपने पास सुरक्षित रखिए। फिर उठाइए एक-एक घटना को। क्रमशः उस समाचार में आपको पात्रों को फिट करना है बस! हो गई कहानी।

आजकल छप रही ढेरों कहानियों में सिवाय सूचनाओं के और क्या है? भाषा, संवेदना, विचार, दर्शन, शैली और किस्सागोई की अब कोई जरूरत नहीं। ये अतीत की बातें हैं। आप अतीत के चक्कर में बिल्कुल मत पड़ना, वह लंबा रास्ता है, कठिन और उबाऊ भी। आपको नया कहानीकार बनना है कि नहीं? बनना है तो प्रचलित और लोकप्रिय सरल उपाय अपनाइए और फटाफट प्रतिष्ठित कथाकार बन जाइए। पत्रिकाओं में अपनी कहानियाँ छपाने के गुर आप जानते ही हैं। संपादक भले ही गधा टाइप कोई भी हो, परंतु आप उसे युगप्रवर्तक कहिए। यत्र-तत्र उसे कार्यक्रमों में मुख्य अतिथि बनाकर बुलाते रहिए, वह लगातार अपनी पत्रिका में आपकी कहानियाँ छापता रहेगा। पत्रिकाओं में छपते रहने का दूसरा सरल उपाय है, पत्रिकाओं को अपने संस्थान या विभाग, जहाँ आप नौकरी करते हैं या अफसर हैं, वहाँ से फुल पेज के विज्ञापन यदा-कदा दिलाते रहिए। संपादक आपकी घटिया कहानी को बढि़या बताकर जरूर छापेगा। इस प्रकार कम समय में आप बड़े कहानीकार बन जाएँगे। दर्जनभर कहानियाँ हो जाएँ तो उनका एक संकलन छपा डालिए। इस प्रकार पहले आप कवि हुए, अब कहानीकार भी हो गए। शहर की साहित्यिक बिरादरी आपको भलीभाँति जानने लगी है।

शहर में व्यंग्यकारों की लंबी जमात देकर आपका मन भी व्यंग्य लिखने के लिए अकुलाने लगता है तो व्यंग्य भी लिखना शुरू कर दीजिए। यहाँ भी आपको कोई दिक्कत नहीं आएगी। आजकल व्यंग्य का मतलब है, किसी भी घटना, समाचार या नेताओं की बयानबाजी पर त्वरित टिप्पणी। आज कोई घटना घटी, कल व्यंग्यकार ने उस पर व्यंग्य लिखा और परसों अखबार के कॉलम में छप गया, ऐसा आप नहीं कर सकते क्या? जरूर कर सकते हैं। आप स्थापित कवि हैं। नामी कथाकार हैं। भाषा में थोड़ा खिलंदड़ापन पैदा करिए और टिप्पणियाँ करना प्रारंभ कर दीजिए। इस प्रकार आपके व्यंग्य भी अखबारी कॉलमों में छपने लगेंगे। आजकल व्यंग्यकार इतने सजग रहते हैं कि उन्हें पूर्वानुमान रहता है कि किस घटना पर पक्ष और विपक्ष की क्या प्रतिक्रिया रहेगी। उन्हें यह पता होता है कि इस घटना पर किस प्रकार के बयान आनेवाले हैं। व्यंग्यकार अपना कॉलम पहले लिख मारते हैं, घटना पर पक्ष-विपक्ष के बयान बाद में आते हैं। इस प्रकार व्यंग्यकार बनने के भी मैंने आपको सरल उपाय बता दिए।

इधर आपके मन में अब कुलबुलाहट होने लगी है कि हो जाए कोई पुरस्कार अपने नाम भी। यह कोई बड़ी बात नहीं है। जब आपने कविता को साध लिया। कथाकार आप हो ही गए। व्यंग्यकार के रूप में भी लोग अब आपका नाम लेने लगे हैं, फिर पुरस्कार समिति वालों को पटाना कौन सी बड़ी बात है? यह तो आपके बाएँ हाथ का काम है। बाएँ से याद आया, आप कुछ दिनों के लिए वामपंथी हो जाइए न! विचारधारा वाले, जनवादी, प्रगतिशील टाइप कुछ भी। इसके लिए आपको करना कुछ नहीं है। यह भी आपको जानने की जरूरत नहीं है कि विचारधारा क्या है? आपको बस संगठन ज्वॉइन करना है। मेंबर भर बनना है आपको, अपने शहर की जनवादी या प्रगतिशील लेखक संघ की स्थानीय इकाई का। अब आप विचारधारा वाले लेखक हो गए, बिना विचारधारा को जाने। साहित्य के क्षेत्र में पुरस्कार चीन्ह-चीन्ह कर दिए जाते हैं। पुरस्कार समिति में लोग वामपंथी हैं तो वे अपनी विचारधारा वाले घटिया लेखक को भी समिति का बड़ा पुरस्कार अवश्य देंगे। यहाँ कृति पर नहीं, कृतिकार के स्वभाव, सेवा और भविष्य में उसके द्वारा मिलनेवाले लाभों को देखते हुए पुरस्कार दिए जाते हैं। इस शैली को आपके द्वारा साधना कौन सी बड़ी बात है? आदान-प्रदान की संस्कृति से आप भलीभाँति परिचित हैं ही। गैर-वामपंथी समितियों के पुरस्कार भी इसी शैली को अपनाने से मिलते हैं। तो जब जैसा मौका आप देखें, उसी अनुरूप अपने आपको ढाल लीजिए, फिर साहित्य के क्षेत्र में बड़े पुरस्कार प्राप्त करने से आपको कोई नहीं रोक सकता।

कवि, कहानीकार, व्यंग्यकार सब तो हो गए आप। साहित्य के कुछ बड़े पुरस्कार भी आपने हथिया लिये। अब आपकी उम्र भी हो चली होगी। निश्चित है, युवा तो आप होंगे नहीं, अधेड़ हो चले होंगे। साहित्य में पकी हुई उम्र का बड़ा महत्त्व है। इस उम्र में पहुँचकर हर लेखक किसी भी कार्यक्रम में अध्यक्ष और मुख्य अतिथि बनने का जुगाड़ जमाने लगाता है। आप भी जमाइए। आखिर हर कार्यक्रम में आयोजकों को अध्यक्ष एवं मुख्य अतिथि की दरकार रहती ही है। शहर के बड़े नामों में अब आपका नाम शुमार हो गया है। उम्र भी आपकी अध्यक्ष एवं मुख्य अतिथि बनने लायक हो गई है। अब तक शहर में आपके कुछ चेले-चपाटे जरूर बन गए होंगे। उन्हें समय-समय पर आप जरूरी ज्ञान देते रहिए। वे हर समिति में आपके नाम की सिफारिश करना नहीं भूलेंगे। पहले आप किसी भी कार्यक्रम में अध्यक्ष एवं मुख्य अतिथि बनने के लिए नखरा करिए। अपनी व्यस्तता का रोना रोइए, फिर समितिवालों के विनम्र और बार-बार के आग्रह को स्वीकार कर कार्यक्रम में जाना सहर्ष स्वीकार कर लीजिए।

अब आप सचमुच बड़े लेखक हो गए हैं। बड़े लेखक की साहित्य जगत् में चर्चा भी होनी चाहिए। चर्चित होने के लिए आपको संस्मरण लिखने पड़ेंगे। यहाँ कई लेखक ऐसे हैं, जिनके लेखन कार्य से उन्हें कोई नहीं जानता, परंतु उनके संस्मरण प्रकाशित होते ही वे रातोरात चर्चा में आ गए। आपने एक लंबा जीवन साहित्य में गुजारा है। निश्चित है, आपके संबंध, संपर्क, दोस्तियाँ, मनमुटाव और आपके कठिन संघर्षों की दास्तान आपके पास है। उसे लिख डालिए। अब समय आ गया है, संस्मरण या आत्मकथा टाइप कुछ लिखने का। लिख डालिए। मत चूको चौहान। यहाँ ‘सत्य के प्रयोग’ जैसा कुछ भूलकर भी आप मत लिखिएगा। मनगढ़ंत बातें, रसदार किस्से और कुछ भी विवादास्पद लिख मारिए, यही यहाँ सार्थक लेखन माना जाता है।

लो, अब आप चर्चित लेखक भी बन गए। ये सरल उपाय आपके बहुत काम आए। आगे और लोगों के लिए भी ये उपयोगी सिद्ध होंगे। आमीन!

५२५-आर, महालक्ष्मीनगर
इंदौर-१०
दूरभाष : ९४२५१६७००३
—अश्विनी कुमार दुबे

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