महल और झोंपड़ी

उस गली में एक बहुत बड़ा महल है! उस रास्ते से जानेवाले लोग सिर उठाकर महल की ओर देखने लगते हैं तो फिर झुकाने का नाम नहीं लेते। चकित होकर ही रह जाते हैं।

वे सब उस महल के सौंदर्य को देखते हैं या इसमें बसनेवाले धन-देवता को देखते हैं अथवा इसमें रहनेवालों की कल्पना में लीन हो जाते हैं—यह कहना कठिन है।

उस महल के चारों ओर इसी का आसरा लेकर और कई मकान बने हुए हैं। उनमें दुतल्ले मकान भी हैं, झोंपडि़याँ और पर्णशालाएँ भी हैं! उस भवन की बगल में रामचंद्रजी का एक मंदिर है। वह ऊँची अट्टालिका गगन-मंडल से मंदिर की ओर गुस्ताखी से देखती हुई दिखाई देती है। ऐसा मालूम होता है कि उस अट्टालिका दृश्य को देख संकोचवश रामचंद्रजी एक कोने में दुबककर बैठे हुए हैं।

उस महल का निर्माण धन-संपत्ति ने किया। पर झोंपडि़यों और पर्णशालाओं आदि का निर्माण आन और इज्जत से हुआ। मंदिर का निर्माण भक्ति के परिणामस्वरूप हुआ।

उस महल के आश्रय में अनेक लोग हैं, जो सदा रुपयों की झनझनाहट में मग्न दिखाई देते हैं। उन रुपयों की झनझनाहट में उन्हें बगल के रामचंद्रजी के मंदिर में होनेवाला घंटा-घडि़यालों, शंख तथा तुरियों का नाद सुनाई नहीं देता। बगल के कुटीरों में रहनेवाले शुभ्र हृदयों के परिमल की तो वे सुगंध भी सूँघ नहीं पाते हैं।

इस अट्टालिका में घोंसला बनाने के लिए एक भी गौरैया नहीं आती। उस महल की छत पर आराम करने के लिए एक कबूतर तक नहीं फटकता। गाय भी उस भवन के सामने नहीं ठहरती।

किंतु इधर उन झोंपडि़यों में कुछ मानव निवास कर रहे हैं। उन झोंपडि़यों के छज्जों में कुछ गौरैये अपने नीड़ बनाए हुए हैं। उन झोंपडि़यों के पार्श्व में उगे हुए पेड़ों पर तोते वार्त्तालाप करते हैं। नीचे मेमने शौक से खेलते हैं।

वहाँ पर मनुष्य, पशु-पक्षी सभी बिना भेदभाव के निवास कर रहे हैं।

मंदिर में जब से श्रीरामचंद्र की मूर्ति प्रतिष्ठित हुई है, तब से प्रतिदिन रामचंद्र की चरण-सेवा करने उन झोंपडि़यों के मनुष्य उस मंदिर में इकट्ठे होते हैं।

रामचंद्रजी के दर्शन के माध्यम से धनदेवी लक्ष्मी की उपासना करने और वरदान-स्वरूप लक्ष्मीजी की प्रसन्नता प्राप्त करने के हेतु महल के लोग फूल-फल, वस्त्र इत्यादि रिश्वतें भगवान् को भेंट करने प्रतिदिन प्रातःकाल वहाँ पर पहुँच जाते हैं।

मंदिर के आलों में कबूतरों ने अपने नीड़ बनाए। मंदिर के सामने स्थित धान के बालों का गौरैये स्वेच्छापूर्वक उपभोग कर रहे हैं। मंदिर के गोपुरों पर तोते विश्राम करने बैठ जाते हैं और आत्मबोध पाते हैं। उस रास्ते से जानेवाली गाएँ मंदिर के सामने रुककर पलकों से नमस्कार कर आगे बढ़ती हैं। मंदिर की छत्रच्छाया में गौरैये सुख-शांति का असीम अनुभव करती हैं।

रामचंद्रजी के स्वर का अनुकरण करने में असफल तोतों को देख वे मुसकरा उठते हैं। उनके वसंतोत्सव के अवसर पर तूर्यनादों के साथ अपने स्वर मिलाकर कोयल उस उत्सव में अपूर्व शोभा का वातावरण पैदा करती है।

भवन के निवासी बाजार से देवता की अर्चना के लिए जो फूल खरीदकर लाते हैं, उन्हें अपनी चोटियों में धारण करते हैं, झोंपडि़यों के आगे खिले हुए फूल रामचंद्रजी की देह का संपर्क प्राप्त कर पवित्र हो जाते हैं और फिर झोंपडि़यों के लोगों की चोटियों में गूँथे जाते हैं।

इसी भाँति समय बीतता जा रहा है। कुछ दिनों के बाद संक्रांति-पर्व आया। लोग प्रतिदिन रामचंद्रजी के उत्सव मनाने लगे। उन उत्सवों को देख पशु-पक्षी, मनुष्य—सभी वर्गों के लोग संतोष पा रहे थे। संक्रांति-पर्व के दिन सभी झोंपडि़याँ सजाई गईं। झोंपडि़यों के सामने तरह-तरह के चौक पूरे गए, जो उस स्थान की शोभा बढ़ाने में सहायक सिद्ध हुए। महल भी अलंकृत हुआ। लेकिन मंदिर की तुलना में महल का अलंकार अस्वाभाविक व नकली जँचता था।

मंदिर दिव्य प्रकाश से दमक उठा। रामचंद्रजी का हृदय भक्तों की प्रार्थनाओं के परिणामस्वरूप महा समुद्र की उत्ताल तरंगों की तरह आनंद से भर उठा। उनके फैलाए हुए हाथों में जाकर असंख्य लोग दिव्य सुख का अनुभव कर सकते हैं। उस भगवान् के आलिंगन में समस्त लोक सिमट सकते हैं। उस आलिंगन की परिधि अनंत है। कल्पनातीत आनंद उस आलिंगन में समाया हुआ है और वह आनंद नया जीवन प्रदान कर सकता है। वैसा भव्य आलिंगन उस दिन रामचंद्रजी की अपार कृपा के कारण ही प्राप्त हुआ है।

झोंपडि़यों के लोग उस आलिंगन में फँस गए। तोते, गाय इत्यादि सभी भक्त आलिंगन का भोज पाकर सुख का अनुभव कर रहे हैं। लेकिन महल के लोग रामचंद्र के आलिंगन के सुख का तनिक भी अनुभव नहीं कर पाए। रामचंद्र के अलंकार मात्र को देख वे मुग्ध हुए।

मंदिर के सामने भी संक्रांति के निमित्त चौक पूरा गया था। इस पूरे हुए चौक में मंदिर के सामने विशाल रथ, घंटियों से सजे रथ तथा झंडियों से सजाए हुए रथ, सभी कलाओं से प्रकाशमान हैं। रथ फूलों से सजाए जाने के कारण अमित शोभा को प्राप्त हो रहा है। हल्दी और कुमकुम उन रथों की पावनता का परिचय दे रहे हैं। ऐसा लगता है, मानो उस पर रामचंद्रजी आसन लगाकर बैठे हुए हों। उस ऊँची अट्टालिका के सामने भी चौकापूरन है। रथ, सरोवर, कछुए, साँप, कुम्हड़े इत्यादि तरह-तरह के रँगीले चौके पूरे हुए हैं। उन पूरे हुए चौकों पर फूल हैं। वे सब ऐसे दिखाई दे रहे हैं, मानो ऊँघ रहे हों।

अत्यंत वैभव के साथ अलंकृत हुए अपने अलंकार को देख बगल की झोंपडि़यों की सजावट को भी उन्हीं आँखों से देखकर महल हँस पड़ा। झोंपडि़याँ भी अपनी सजावट को देख ऊँचे महल के अलंकार को न देख सकने की हालत में मंदिर की तरफ झुककर प्रतिकार-स्वरूप हँस पड़ीं। इस पर क्रोधित हो महल ने पूछा, ‘‘मुझे देख तुम क्यों हँस रही हो?’’

झोंपडि़यों ने जवाब दिया, ‘‘तुम्हारी हँसी के प्रतिकार में हम भी हँस रही हैं।’’

महल ने छाती फैलाकर गर्व से कहा, ‘‘मेरी मंजिलें विशाल हैं। उनमें सुंदर कला से पूर्ण स्तंभ हैं। महल की दीवारों पर के चित्र-विभिन्न रंगों से पुलकित होते दिखाई पड़ते हैं। महल के शिखर पर के गोपुर, लता इत्यादि अलंकारों से किरीट जैसी शोभा पा रहे हैं। समस्त सौंदर्य मुझमें समाया हुआ है। इन सबसे अधिक मेरी ऊँचाई है, जिसे तुम लोग आँख उठाकर भी देख नहीं पाओगी। अब मेरी हँसी का कारण तुम लोगों की समझ में आ गया न?’’

झोंपडि़यों ने जवाब दिया, ‘‘ओह, तुम अपनी उस उन्नति को देखकर शायद हँस रहे हो। किंतु उन मंजिलों का मिलान हमारे साहस के कारण ही हो सका है। कला से शोभित वे स्तंभ हमारे कौशल को ही प्रकट कर रहे हैं। प्राचीरों पर के वे चित्र हमारी सहनशीलता के उदाहरण हैं। तुम्हारे मुकुट को हमने ही प्रदान किया। तुम्हारी उन्नति हमारे द्वारा ही हुई है।’’

‘‘तुम्हारे साहस, कौशल व सहनशीलता को मैंने उचित मूल्य देकर खरीदा है। इसलिए अब उसकी बड़ाई तुम्हें नहीं करनी चाहिए।’’

‘‘हमारे कौशल तुच्छ धन से नहीं तुल सकते!’’

इस वार्त्तालाप को सुन मंदिर हँस पड़ा। उस हँसी को सुन झोंपडि़यों ने शर्म के मारे सिर झुकाए।

उस हँसी को सुन महल अपार आनंदित हुआ।

बहुत समय बीत गया।

झोंपडि़यों के स्थान पर एक जंगल उगा। उस वन में फल, फूल, घास और पौधे फैल गए। सदाबहार फूलों के पेड़ों पर अब तितलियाँ, भ्रमर मँडराते और खेलते रहते हैं। फलों के वृक्षों पर अपने नीड़ बनाकर तरह-तरह के उनके फल खाकर गान करते रहते हैं। घास-फूस में छोटे-छोटे कीड़े, पक्षी निवास कर रहे हैं। वह समस्त जंगल सदा कलरव व कोलाहल द्वारा शोभायमान रहता है।

मंदिर की जगह एक पीपल का पेड़ उग आया है। वह वृक्ष आस-पास के समस्त प्राणियों को ठंडी छाया प्रदान करता रहता है। उस पेड़ के तने पर, शाखाओं और पत्तों पर पक्षी तथा अन्य प्राणी रहते हैं। उस वृक्ष के पत्तों की ध्वनि समस्त प्राणियों को थपकियाँ-सी देती रहती है।

बड़े महल के स्थान पर अब पत्थर के टीले हैं। उन टीलों के चारों तरफ कँटीली झाडि़याँ उगी हैं, उनमें साँपों की बाँबियाँ हैं। रात्रि के समय उन टीलों पर उल्लू बोलते दिखाई देते हैं।

पीपल का पेड़ उन टीलों पर भी अपने फल गिराकर पेड़ उगाना चाहता है, लेकिन वे जानवर उन अंकुरों को उगने नहीं देते।

(‘तेलुगु की लोकप्रिय कहानियाँ’ पुस्तक से साभार)
—चिंता दीक्षितुलु

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