रेवा तोरे रेत कनों में रमता मन

रेवा तोरे रेत कनों में रमता मन

यह अहसास तो हिया में रुमुक-झुमुक रहा है। भीतर-भीतर एक लहराव है। हाँ, बारिश की बूँदों के टिपका-टिपका टपा-टप, टपा-टप पड़ते ही धूली फूली नहीं समाई थी। सुरसुरी ने बादल की थैली की सरपूँद जो उसकारी कि सूत के तार सिरज उठे। फिर झरझराहट भरा झंझावात जो चला कि चौगान भर आई। हाँ, तो तरबतर होने का मन हुआ तो उघाडे़-पुघाडे़ होकर बहते सोता में खेलना कितना आनंददायक था! हाँ, जी बहती हुई पतली सी धार से छने हुए रेत कनों का पुल्ला बाँध लेना, फिर पाल से पानी के उतरते ही बहती रेत को पसा-पसा में भर-भरकर फिर पुल्ला रोकने का बचपन का वह खेल आँखों में रमा हुआ है—

रेवा के उथले जल पर दोपहर में धुपकली की रंग-रेखाएँ उतरते ही रेवा का रूप तो मन मोह लेता है और साँझ उतरते ही गोधूली की धूप घाट पर रँगोली माँड़ती है। भुनसारे में रेत कनों में काँस का कूचा लेकर रेवा की धार में कसेंड़ी चोघीचट चमचमाती है। रेत के घोरे पर बैठे बच्चे चिल-बिल कर रहे हैं। हाँ, पैरों को गीली रेत में धाँसकर पंजे के ऊपर तक रेत को गदेली से दबाकर धीरे से पैरों को हटाते हुए घरौंदे बना रहे हैं। पोली आकृति को कुरेदकर गहरा करते जाते हैं। इसी घरौंदे के सामने खेल-खेल में सड़क-पुल, सुरंग, बाँध, मालगोदाम, भवन बनाते हुए प्रकृति के बीच नन्हे हाथ कैसे रमे हुए हैं!

तो नर्मदा के दक्षिण तट पर है यह होशंगाबाद का पोस्ट ऑफिस घाट। और नजदीक में है हर्बल पार्क। हाँ, माई की बगिया। यहाँ से बागली नदी तक कोमल-कोमल रेत का बिछौना है। रंग-बिरंगी सतरंगी है जी। यही भाव जेहन में है, सो धीरे-धीरे पायती-पायती कगरिया से लचकते-लदकते उतरा हूँ माई की तलहटी में। तरी है सो ओल चढ़ आई है मखमली छुअन से, पगथली में सिहरन भर आई है। टुहुक है कि निगाह भर देख रहा हूँ कि ढिक पर हर्बल पार्क में रेतीली माटी की तासीर में ही वृक्षों को पुस्ताई मिली है। सो अब इन वृक्षों ने भैराट रूप ले लिया है। कुछ वृक्षों की छाया तो तरी में उतर आई है। हाँ, रेत मिलमाँ माटी उलात से तरबतर हो जाती है तो उतनी ही फुरती से बतर भी आ जाती है। किनारे के छोटे-छोटे नाने-नाने गोपटाओं को पालने-पोसने में माई तो मगन है। और जी हाँ, माई के रेत के सुनहरे कण, भूरकण, मटमैले कण, धौले-धौले कण के सुर से सुर मिल जाते ही तुरतई हजारों रूपों का विस्तार होता है।

ओ हो! जी और ये हजारों रूपों से आवेष्ठित है दूर निगाह तक फैला हुआ जुगला का रेत टापू। नर्मदा ने अपने आँचल में कैसे-कैसे छिपाया है कि जुगला के दोनों ओर से बहती है माई। कैसा-कैसा! वात्सल्य है माई का। जुगला का यह आदरास्पद रूप तो आँखों में टुकली सजाता रहता है। माई ने कैसी जमा कर रखी है इतनी सारी रेत। शायद सारी नदियों में रेत चुक जाएगी, तब यह गुप्त बुखारी आड़े दिनों में काम उरकाएगी। बाबरी घाट के उत्तर तट और दक्षिण तट से मैंने पैदल चलकर किनारे से खूब निहारा है। नर्मदा के बीचमबीच में कई मीलों तक सुनहरी एकदम धुली हुई स्वच्छ महीन रेत सिगासिग भरी हुई है। दो हजार अठारह तक मैंने कितने ही बार इन रेत के थापों को निहारा है। कल-कल करती निरमल धाराएँ तो जुगला को थपथमाती हुई प्रवहमान हैं।

और कुछ नानी सी धाराएँ ठुमुक रही हैं। इनके बीच से मैंने ठुमा भर रेत उठाकर निहारा जी, कितने रंगों में, आकारों में, प्रकारों से सजी सबरी है प्रकारांतर से। छोटे-छोटे शंख-सीपी हैं। छन्ना से छनकर मोटी-पतली बजरी तो किनारे में छूटी हुई है। कीड़े-मकोड़ों ने किरकिन्ना मांडे हैं। तो रेत पर सरसराती लिपियाँ हैं। तो ये कहीं-कहीं उछली सी कहीं बिछली सी। पर गीली रेत में खोज के छापे उरेहे हैं। कहीं पानी से भरे हुए हैं गीली रेत के खोज। हाँ, स्वच्छ छने जल में है यह प्रतिकृति। और उमगती उथली धारा के प्रवाह में सरसती रेत से पाँव-पाँव चलने की सुखानुभूति तो साँसों में सरगम भरती रहती है।

और मेरी साँसों में संपट नहीं बँध पा रही थी, जब मैंने पूरी समझ की आँखों से कोई आधा कोस फैले हुए रेत के पाट से विस्तारित तवा नदी को देखा। यह स्थान है बांद्राभान। आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा जी। सोच रहा था, इतना लंबा-चौड़ा पाटवाला तवा नर्मदा में कैसे समाया होगा? थोड़ा चिंतन चला। हाँ, हिया से उत्तर फूटा जी, ‘हाँ, नर्मदा की गंभीरता में तवा का उथलापन समाहित हो गया।’ पर तवा के उथले-चौड़े पाट में बस रेत ही रेत भरी हुई है। नर्मदा से मिलते-मिलते रायपुर और चपलासर गाँव के बीच नीचे तली की खूब गहराई तक अपार रेत भरी हुई है। हाँ, अक्षय रेत का अद्भुत-अद्भुत भंडार। तो बरसात में जगबोला के समय तवा उपहारस्वरूप इसी रेत खजाने से नर्मदा का खोला भरता है। मैं अब सोच में पड़ गया हूँ कि लोक ने इसके उथलेपन और फैले हुए पाट के कारण तवा नामकरण किया है। तो यह उथला है पर! कितना उदार है कि बांद्राभान में विशाल रेत भंडार के साथ नर्मदा में विलीन हो जाता है, नर्मदामय हो जाता है। तो बांद्राभान के दक्षिण तट पर तवा से मथी-मथाई रेता का विशाल क्षेत्र है। हाँ, इसी रेत के बिछोने पर स्व. श्री अनिल माधव दवे के संयोजन में नदी महोत्सव आयोजित हुए हैं। मंथन हुआ है। मथते-मथाते हैं माथा-पच्ची होती है पर! समाज के सुर-से-सुर जुड़ते ही नहीं। तो हम देखते हैं सहायक नदी तवा अपना स्व अहं विसर्जित करते हुए नर्मदा से जुड़ती है।

नदियों से जुड़ने का महाभाव तो मेरे हिया में बचपन से है। हाँ, जी हरहराती हिलोर उठती है—तो इसी संगम स्थल बांद्राभान से कोई छह किलोमीटर ऊपर दक्षिण में तवा के विस्तृत पाट पर एक किलोमीटर लंबा पुल है। मैंने ७ अगस्त, २०१२ के जगबोला में तवा की वनस्पति को धुलते देखा था। और संयोगतः २०१३ में बाबई में पदस्थापना होने पर होशंगाबाद से बाबई जाते समय तवा के एक किलोमीटर लंबे पुल को बस से पार करते हुए जाना होता था। समय का चक्र चलता है जी, ७ अगस्त, २०१२ के बाद तवा और नर्मदा में पूर आई ही नहीं। पर २०१२ से २०१८ तक के इन छह वर्षों में तवा की रेत का रूप देखते हैं तो गहरा अवसाद उपजता है। इस अवधि में रेत का खूब दोहन हुआ है। खदानें उलीची जा रही हैं। ऊबड़-खाबड़ हो रहा है चौड़ा-चकला पाट। पुल के दोनों ओर की उस मनोहारी रूपराशि पर जैसे काजल उरेह दिया हो। हाँ, जी, वनस्पतियाँ छछल आई हैं। तवा नदी का फैला हुआ विस्तृत पाट कॅजी, काई, छारी से आच्छादित है। तो कॅजी-काई जमते-जमाते कछार हो जाना है। रुपहली रेत तो पुल के दोनों ओर अब है ही नहीं। पुल के आर-पार बड़े-बड़े रेत के भीमकाय ढेर बरसात के पहले लगाए हैं। तवा के होशंगाबाद की ओर के तट पर भवानी कुंज है। और तवा के बाबई की ओर के तट पर माखन कुंज है आँखों में। तो भवानी प्रसाद मिश्र और माखनलाल चतुर्वेदी, ये दोनों आज जीवित होते तो क्या कहते? शायद यही कि नदी अपना पेट चीरकर ही भला किसी-न-किसी का पेट भर रही है। तवा के पुल से सरसराती बस निकलते ही कारूआँ सुनते हैं कि कूलती-कँजारती नदी की कारुणिक कुहेलिका भर है। नदी की छाती को चीरते हुए रेत के डंफरट्रक भी तवा के पुल से धड़धड़ाते भोपाल जाते हैं। पर नदी की छाती में थोड़ी ठंडक तो आई है कि आज २१ दिसंबर, २०१८ के दैनिक भास्कर में समाचार छपा है, ‘बाबई माखननगर में १७ ओवर लोड ट्रक डंफर पकड़े हैं। तौल काँटों ने बताया कि तादाद से ज्यादा रेत भरी थी।’ जुर्माना लगाना नैतिकता है। पिछले दिनों रेत पर खूब राजनीति हुई, पर बेचारी नैतिकता कुआँ-खाई के बीचोबीच पिस रही है। भोली-भाली जनता तो सड़क किनारे डंफरों से बुरबुराती रेत में फिसलती रहती है। डंफरों की दुर्घटना के दर्द से नर्मदा माई की छाती में लपट उठती है। रेत चोरी के चुरफंदे से माई को चुरचुरा लगा रहता है। और माई यह भी देख रही है कि रेत भराई में जेसीबी मशीनें चल रही हैं। तो मजूर हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं। माई का जी ‘कल-कल’ करता है। ओ हो! जी माई का ‘कस’ निकल रहा है और वे मालदार तो खनखनाते कलदार बटोर रहे हैं। सिलक जोड़ रहे हैं। और हम सुबक रहे हैं, आँखें छलछला आई तो हिया से हूक सिरज आई—

तवा की ढी पे कुकुड़-मुकुड़ बैठे, टुकुर-टुकुर देखें डोकरा डोकरी।

जे.सी.बी. चल रई न मिले मजूरी, उघारी भई टूटी सी छानी छपरी॥

और इन्हीं टूटी सी छानी में बैठे मजूरी करनेवालों के द्वारे पर जब नर्मदा परिक्रमावासी रात्रि विश्राम के लिए सहारा चाहते हैं, तब बड़े ही आदर-सम्मान के साथ नर्मदा परिक्रमावासियों की सेवा करते नहीं अघाते। मैंने १० जनवरी से १६ जनवरी, २०१७ तक नर्मदा सेवा यात्रा के दौरान दुधी के संगम से होशंगाबाद तक पैदल यात्रा करते हुए जाना और १८ जनवरी, २०१८ से बस द्वारा २२ दिन में नर्मदा संपूर्ण परिक्रमा करते हुए सजूगर आँखों से लोक के महाभाव को देखा कि ‘नर्मदा मैया, तेरी हो रई जय जय कार’ की गूँज का शब्दातीत उछाह है। यह कहना समाचीन है कि नर्मदा की देह में पगडंडी, गोया, गढवाट, गुठान, घाट, पूजा-पाठ, मेला-ढेला, अलाव-चौपाल, गीत-बाद्य और खेती बाड़ी में अदम्य लय है। लोक कह उठता है, ‘सुन्ने की दोई बनी रे कगरिया, हीरा लाल जड़े री माई।’ तो कह सकते हैं दुर्लभ जिजीविषा है माई की। इधर गढवाट की धूलि में सिर भराई करते नर्मदा दर्शन के लिए कुटुंब-कुनवा संग गाते-बजाते जा रहे हैं, हिया से चौसर धार फूटती है—

नर्मदा मैया तेरे चरणों की धूल,

जा रेता धूली मोहे प्यारी लगे।

उड़-उड़ धूल मोरे माथे लगे,

नमन करू भरपूर॥

मन तो रेवा की रंग धूलि में रमना चाहता है, बस इतना ही है कि फूल पखरी का नमन है और यह नमन घाटी में व्याप्त है तो मिलने का उछाह भी है। हाँ जी, सतपुड़ा से निकलनेवाली सहायक नदी-शक्कर, दुधी, मोरन, गंजाल हथेड़ रेत और पानी की झिर नर्मदा में छोड़ती हैं। तो नर्मदा में इन सहायक नदियों से रेत बहकर आती है। पर यह जानें कि रेत का सृजन कैसे होता है। सहायक नदियों में रेत कैसे आती है?

ओ हो! जी रेत के सृजन का वह प्राकृतिक स्वरूप के दर्शन करते हुए मैं तो अभिभूत हूँ। मेरी सेवानिवृत्ति जनवरी २०१६ से तीन वर्ष पूर्व ही पचमढ़ी के चौराबाबा से नीचे के ‘नादिया’ गाँव में चुनाव ड्यूटी लगी थी, तब सतपुड़ा पहाड़ की उन अलौकिक शंक्वाकार श्रेणियाँ को देखा तो आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। हवा, पानी, धूप के प्रभाव से चट्टानें घिसघिसकर रेत कण बिखेर रही हैं। यही कारण है कि पहाड़ की श्रेणियाँ शंक्वाकार हो गई हैं। हजारों वर्षों से रेत का कितना सृजन हुआ होगा तो नोनी सी, सलोनी सी एक दिल निखालिस रेत लेकर पंचमढ़ी, क्षेत्र के नाने-नाने सोता बरसात में सरसते हैं, फिर नाले वेदरा में रेत छोड़ते हैं। और ये नाले बेदरे देनवा में रेत छोड़ते हैं, और देनवा तवा का भंडार भरती है।

और इधर सिवनी मालवा के पास सतपुड़ा पहाड़ के बूढ़ीमाई के जंगल में १९ फरवरी, २०१० को पैदल चला हूँ। तो देखा अडूली गुत्थम-गुत्था होती चट्टानों के पिघलने से शिलाजीत की बूँदें टपकती हैं और उपकार है चट्टानों का कि चटक धूप में चिटककर खिर-खिर कर सोने के कनों का रूप ले लेती हैं। जंगल की जूनी ग्वाड़ी, कोदूबाली ग्वाड़ी मग्गरपाटी, जामुन पाटी में फैली रेत बरसात के दिनों में सोनापानी, डुलारा, ठूँठा आम नाला, चीरा पत्थर नाला, भूरा पानी नाला, मग्गरपानी नाला, त्रिशूल पानी नाला जैसे नाले बहाकर ले जाते हैं। बूढ़ीमाई के दक्षिण में मोरन नदी में बैतूल जिले की दून नदी बहाकर छोड़ती है रेत। और काजल नदी भी मोरन को उपहार देती है। और ये मोरन भी गंजाल नदी को रेत की भेंट प्रदान करती है। और गंजाल भी सारी रेत साथ लेकर गोदागाँव गगेसरी घाट पर नर्मदामय हो जाती है। रेत कनों का यह लालित्य मैंने लोखरतलाई गाँव से बूढ़ीमाई के पहाड़ होते हुए हथेड़ नदी के गोलनडो और मानाटेकर तक देखा है। और सतपुड़ा पहाड़ से निकलती हुई अनेक नदियों की तासीर से रेत के परिवहन को जाना है। चट्टानों के घिसने-टूटने की प्रक्रिया को गुना है। प्राकृतिक गतिविधि चलती रहती है, प्रकृति की रेत सृजन-लीला के वे क्षण तो अद्भुत-अद्भुत रहते हैं। हाँ जी, क्या बताऊँ? नम हैं आँखें तो थोड़ा गुनगुनाऊँ—

सतपुड़ा तपे सपरे तबई शिला-शिला, खिरे-खिरे, झुरे-झुरे, थोरी-थोरी,

रूमुक-झुमुक रेला चले रे उढ़ेलें, झोरा-झोरी रेनु की झारी-झारी।

रेत कनों की मृदुल स्मृतियों की सरणियाँ तो अब झुरती रहती हैं। हाँ, मामा के गाँव काथड़ी से बैलगाड़ी से नर्मदा के गोदागाँव गगेसरी घाट से नाव से उत्तर तट उतरे थे तो खूब जल में भींगकर रेतकनों में लोट लगाने का वह किशोर वय आनंद है आँखों में तो अपने गाँव रतवाड़ा से टिगारिया घाट जाने की पगडंडियाँ बिसूरती ही नहीं। हथेड़ नदी को उलाककर जाने की उलात है तासीर में और जैसे कल ही तो यात्रा पर गया हूँ, इसी भाव से रेवा के आँवलीघाट, भिलाडि़या घाट, बाबरी घाट मेरे हिया में रमे हुए हैं। और भोली सी हुलस तो बाबली हुई जा रही हैं—बालमन की स्मृतियाँ मलकनी मारती हैं, गोद में लेने को। तो दस-बारह बरस की कच्ची उमर में उमगती तवा नदी को मैंने देखा था। हमारे गाँव रतवाड़ा सोनखेड़ी से कृष्णा बाई हमारी भानजी के विवाह में सीहोर जिले के नांदनेर गाँव बैलगाड़ी से ममीरा लेकर गए थे। तवा के कच्चे पुल से हमारी बैलगाड़ी पार उतरी थी। बैलगाड़ी से उतरकर चमकती चिलचिलाती रेत की मसर से पैर धँसते-धँसाते चले थे। वह साफ-सुथरी रेत का मनोहारी रूप आँखों में टुहुक भरता रहता है। हाँ जी, फिर तवा की ढिक से बैलगाड़ी में बैठकर नर्मदा के ढाना घाट पहुँचे। यहाँ की मखमली रेत पर हमारी बैलगाड़ी छूटी। पल्लेपार से नाव आने तक नर्मदा के रेतकनों पर खेलने-कूदने का आनंद तो बस आँखों-आँखों में ही है। और खेल-खेल में थोड़ी-थोड़ी रेत उलीची तो उसकारते ही नानी सी झिरिया में झिर फूट पड़ी थी। जरई में रेत की कारीगरी से पानी छन गया था। ओक से मीठे जल को सुड़क लेने के उस निष्कपट महाभाव में रमने की मलमली आती है। स्तुत्य है कि झिरिया में रेवा माई का दुलार ही तो था।

और अब तो रेत उलीचते-उलीचते हाथ-पाँव थरथरा जाएँ, पर पानी का थाव नहीं मिलता। यदा-कदा धारा फूट पड़ी तो कूलती-कँजारती ही क्षणभर में अलोप हो जाती। ओ हो! अरे, कहाँ चला गया वह रेत का फैला हुआ पाट। होशंगाबाद में नर्मदा के इस पोस्ट ऑफिस घाट पर आँखें गड़ाकर देख रहा हूँ। रेत का वह छह वर्ष पूर्व का विस्तारित फैलाव तो अब झाड़ी झुरमुट से अँटा-अँटाया है, काँस-कुंदा दोंगली, छुरिया जमीन तलाश रही हैं। किनारे पर केल मुछेल की फुनगी सरसने को है। अरे! जी अब तो गुड़ूमाडू जड़ें तो रेत कनों पर आच्छादित है, सो माई के गहना गुरियाँ-सीपी-शंख गढ़नेवाले जल जीव तो हिरा गए हैं। हाँ, मलकती धाराएँ अब उमलती जा रही हैं, सो रेत का वह मनोहारी रूप कहाँ है? बस कीचा-काई से सना हुआ है पाट का जल। हम देख रहे हैं कि आव की रेत तो अखेटी कर ली। और अब ‘आँखों का तारा’ जुगला की अकूत रेत अमेठने की आवभगत कर रहे हैं। सिगासिग रेत से भरे जुगला के थापों की सिग मुंडी करने की जुगत में हैं। बची-खुची रेत निकालने के लिए तनातनी मची हुई है। तो तमतमाते हैं तमगेधारी, आँखें तरेरते हैं कि रेत भी पानी के पैकेट की तरह पैकिंग पैकेट में बिकने लगे। ‘समरथ को नहिं दोष गुसाईं।’ यह खेल ही तो है। और इधर बच्चे खेल-खेल में गीली रेत में घरौंदे के सामने सड़क पुल, माल, भवन बना रहे थे। बच्चों का तो खेल था, पर सच्चाई यही है कि इन विकास के नवनिर्माणों की आपाधापी को हम सब सजग आँखों से देख ही रहे हैं, कैसी होड़ा-होड़ी मची हुई है कि रेत भंडारों का दोहन हो रहा है। हाँ, राजस्व, रोजगार, रोकड़ी का रुमुक-झुमुक रेला चल रहा है। रेत रिरया रही है। हिचकोले खाते-खाते पोस्ट ऑफिस घाट की तरी से निकल रहा हूँ, देख-देख हिलकियाँ आई हैं तो लटालूम बुँदिया लरक आईं—

रेवा तोरे रेत कनों में रमता मन।

कैसे बचाएँ मैया, ये तेरे रेता कन?

ऑफिसर रेसीडेंसी, कंचन नगर,
एस.पी.एम. गेट नं.-४ के सामने,
रसूलिया, होशंगाबाद (म.प्र.)
दूरभाष : ९९२६५४४१५७
—नर्मदा प्रसाद सिसोदिया

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