जनता की गवाहियाँ

हंटर कमीशन ने सिर्फ सरकारी अफसरों और मुलाजिमों के बयान लिये थे। इसमें प्रशासन के उच्चायुक्त मुख्य थे। इसके अतिरिक्त सैनिक अफसरों तथा पुलिस अफसरों, निचले दरजे के पुलिसकर्मियों तथा खुफिया पुलिस के गिने-चुने लोगों की गवाहियाँ शामिल थीं। हंटर कमीशन ने जनसाधारण से एक भी बयान दर्ज नहीं किया। इस तथ्य से उनकी निरपेक्षता के अनुपात का अनुमान लगाया जा सकता है। यदि कांग्रेस न होती तो हंटर कमीशन भी नहीं बना होता। हंटर कमीशन कांग्रेस के बार-बार जोर देने के कारण और भारत के अंग्रेजी प्रशासन के कड़े विरोध के बावजूद गठित करने की बाध्यता में ही लंदन की सरकार ने कुछ राहत महसूस की।

यह अचानक क्या हो गया था सरकार के सर्वोत्तम तथा लाड़ले सूबे पंजाब को, जिसने सन् १८५७ से अभी तक अंग्रेज सरकार की बहाली के लिए बेजोड़ योगदान दिया था? जिसके लोग आड़े वक्त हुकूमत के काम आते रहे थे? जिसके लोगों ने १८५७ के बाद हिंदुस्तान को दुबारा विजित करने में गोरी सरकार की भरपूर तथा निर्णायक सहायता की थी? जिन्होंने महायुद्ध के दौरान देश के सभी प्रांतों में जनसंख्या के अनुपात से कहीं ज्यादा रंगरूट देकर अंग्रेजों को चिंतामुक्त किया था? जिन्होंने लाम-कोष में अपने जेवर भी गिरवी रखकर पैसा दिया था? जिन्होंने करों की अदायगी से सरकार के खजाने भरे थे? जिन्होंने कड़े श्रम से धरती में गेहूँ-चावल उपजा पूरे देश का पेट पालने में योगदान किया था? यही अनाज विदेशों की क्षुधापूर्ति के लिए भी निर्यात किया जा रहा था। क्या हो गया था सरकार के वफादार, राजभक्त और लाड़ले पंजाब को?

अंग्रेज सरकार का मत था कि इस कायाकल्प के लिए कांग्रेस का ‘घिनौना नेतृत्व’ और मुख्यतः उसके वरिष्ठ, मगर सिरफिरे नेता ‘गांधी’ ही जिम्मेवार हैं। भोली-भाली और अनपढ़ जनता के मस्तिष्क में सत्याग्रह की ‘विषबेल’ वही बो रहे हैं;  ‘खिलाफत’ में मुसलमानों का साथ देकर हिंदू-मुसलमानों के अस्थायी सहयोग व भाईचारे के कृत्रिम ढकोसले के मुरदा तन में हवा भर रहे हैं।

: दो :

९ अप्रैल, १९१९। अमृतसर, लाहौर, पंजाब। हिंदू तथा मुसलमानों ने अभूतपूर्व एकता का प्रदर्शन किया। विशेषकर रामनवमी के त्योहार पर। एक ही जुलूस में कंधे-से-कंधा भिड़ाकर, भाग लेकर। इससे अंग्रेज हुक्मरान के होश उड़ गए; पर साथ ही उन्हें लगा कि इस एकता के मूल में अवश्य कोई षड्यंत्र छिपा है!

जलियाँवाला बाग के नृशंस हत्याकांड के उपरांत अंग्रेजी सरकार ने मगरमच्छी आँसू बहाना भी मुनासिब नहीं समझा। अचंभे की बात है कि १३ अप्रैल के हत्याकांड के उपरांत उन्हें ऐसा नहीं लगा कि उन्होंने कोई गलती की हो।

अंग्रेज सरकार ने पश्चात्ताप करने अथवा नरमी दिखलाने की अपेक्षा १३ अप्रैल के उपरांत अपने रवैये में लगातार बढ़ती निर्दयता तथा बर्बरता का प्रदर्शन ही किया। उन्होंने उन सभी लोगों की चुन-चुनकर ‘खबर लेना’ प्रारंभ किया, जिन्होंने सत्याग्रह आंदोलन के प्रति अपनी सहानुभूति दिखलाई थी या हड़ताल में भाग लेने के लिए लोगों को उत्प्रेरित किया था।

पंजाब के अधिकतर प्रमुख नगरों में मार्शल लॉ लागू कर दिया गया था। नागरिक प्रशासन अनुभवी प्रशासकों के हाथों से निकालकर सैनिकों के अधीन कर दिया गया। यह सब पंजाब के गवर्नर सर माइकल ओ’ डायर की निजी सिफारिश तथा प्रबल दबाव के कारण किया गया। बाद में वाइसराय तक को कबूल करना पड़ा कि पंजाब में हुए उपद्रवों की सही वास्तविकता से उन्हें कई महीनों तक अनभिज्ञ रखा गया था।

दावा यह पेश किया गया कि पंजाब में ‘बगावत’ के हालात थे। इसीलिए वहाँ मार्शल लॉ लगाना जरूरी हो गया था। साथ-ही-साथ अफगानिस्तान सीमा पर बढ़ते तनाव तथा युद्ध के हालात पैदा हो रहे थे। ओ’ डायर साहब ने केंद्रीय सरकार को यही जतलाया। वे यह भूल गए कि इंग्लैंड जैसी विख्यात दिग्-दिगंती शक्ति, जिसने जर्मनी को हार की ‘धूल चटवाई’, को अब अफगानिस्तान जैसी ‘क्षुद्र मक्खी’ से आतंकित होने का खतरा कैसे पैदा हो गया है?

जगह-जगह अंग्रेज हुक्मरान रोज स्वयं आ धमकते। अमृतसर में जनरल डायर और लाहौर में ओ’ डायर साहब अन्य शहरों में वरिष्ठ सैनिक अफसर तथा नए-नए मनमरजी के काम करवाते, मनपसंद कानून चलवाते, जिनका मुख्य ध्येय जनता को दंडित, प्रताडि़त तथा अपमानित करना होता। ‘अच्छा, तुमने हड़ताल करने की जुर्रत दिखाई!’ ‘सत्याग्रह की शपथ खाई!’ ‘गांधी के भाषण सुने!’ ‘उनके मत से सहानुभूति प्रकट की!’ ‘उनकी कांग्रेस का समर्थन किया।’ आओ, तुम्हें सबक सिखाते हैं! ऐसा कि तुम्हारी सात पीढि़याँ भी याद रखें! तुम्हारे सगे-संबंधी और देखने-जाननेवाले-सभी आँखें फाड़कर देखें कि सरकार का विरोध करनेवालों की क्या दुर्दशा होती है! उनकी कैसे मिट्टी पलीद की जाती है! अब रोते-कराहते क्यों हो? अब जाओ न अपने आका गांधी के पास! माँगो उसी से मदद!

प्रतिशोध तथा सबक सिखाने की भावना उबाल पर थी।

: तीन :

वकील समुदाय को सार्वजनिक रूप से कुलियों की तरह काम करने के लिए विवश किया गया। उनसे सरेआम, भरी सभा में कुरसियाँ-मेज उठवाई गईं। वकीलों के द्वारा ही शहर की मुख्य इमारतों पर मार्शल लॉ के पोस्टर चिपकवाए गए, ताकि लोग देख लें कि उनके ‘अपने’ वकीलों की असली औकात क्या है। उन्हें नाम की जगह ‘नंबर’ दे डाले गए। हर बार उनके नंबर पुकारे जाते और स्कूल के बच्चों की तरह उनकी हाजिरी लगती। उन्हें ‘तिकड़ी’ का मुआयना करवाया गया, जिसे देखते ही लोगों के हृदय भय तथा आतंक से काँप उठें। इस प्रकार की ‘कई तिकडि़याँ’ सार्वजनिक स्थलों व चौराहों पर खड़ी की गईं। इनमें ऊपर से जुड़ी खड़ी दो बल्लियों के बीच एक हथकड़ी लटकती थी। अभियुक्त के हाथ इन्हीं हथकडि़यों से बाँध दिए जाते थे और कपड़े उतारकर उसकी नंगी पीठ पर कोड़े मारे जाते थे। वकील समुदाय को इस प्रकार के कई हृदय-विदारक दृश्य देखने के लिए विवश किया गया।

वकीलों को लेफ्टिनेंट न्यूमैन नामक नौसिखिया अफसर के ‘अधीन’ कर दिया गया। वह स्वभाव से जल्लाद जैसा था। संभ्रांत तथा शिक्षित वर्ग के लोगों को गाली-गलौज देने और उन्हें जलील करने में उसे मजा आता था। वह वकीलों को गालियाँ देता और कोड़ों से मारने, यहाँ तक कि गोलियों से उड़ा डालने की धमकियाँ देता; उनकी सैनिक कवायद करवाता—इस बहाने से कि उन्हें सलाम करने की तालीम देकर अनुशासित किया जा रहा है।

: चार :

लोगों की गवाहियों से यह प्रत्यक्ष हो गया कि १० अप्रैल को दोपहर तक अमृतसर में तब तक किसी भी सरकारी इमारत में आग नहीं लगाई गई थी, जब तक प्रशासन द्वारा भीड़ पर अवांछित फायर खोलकर, उनमें से कई लोगों को ढेर कर भीड़ को उत्तेजित नहीं किया गया। लोगों के मत में डिप्टी कमिश्नर ने अपना काम शालीनता, होशियारी तथा दिलेरी के ‘अभाव से’ किया। संगीन हालात में लोगों की भीड़ से कैसे पेश आया जाता है, इसके बारे में वह नितांत अज्ञानी तथा नौसिखिया सिद्ध हुआ। उसने जो कुछ किया, हड़बड़ाकर और उत्तेजना में घबराकर किया, जिससे परिस्थिति सुधरने की बजाय और बिगड़ती ही चली गई।

पंजाब के लोगों ने ३० मार्च को व्यापक हड़ताल की। ६ अप्रैल को दुबारा हड़ताल करने का उनका इरादा नहीं था। मगर सरकार ने पंजाब के प्रमुख नेताओं डॉ. किचलू तथा डॉ. सत्यपाल के साथ जो दुर्व्यवहार किया, उसी ने लोगों को ६ अप्रैल को भी हड़ताल करने के लिए उकसाया। ९ अप्रैल को हिंदू-मुसलमानों की एकता का प्रदर्शन देखकर अमृतसर के डिप्टी कमिश्नर के हाथ-पाँव ढीले पड़ गए। वह अपना मानसिक संतुलन खो बैठा और स्थिति का निरपेक्ष अवलोकन एवं उचित आकलन करने में सर्वथा असमर्थ हो गया। घबराकर उसने स्थिति को अत्यधिक संवेदनात्मक प्रदर्शित करनेवाले पत्र लिखकर अपने उच्चाधिकारियों को स्थिति का अतिशयोक्तिपूर्ण जायजा दिया और इस प्रकार उचित निर्णय लेने की राह में गंभीर बाधा बना।

इसी प्रकार पंजाब की सरकार तथा केंद्रीय सरकार ने गांधीजी के आंदोलन को सही ढंग से देखने में अपनी असमर्थता प्रकट की। ‘हड़ताल’, ‘सत्याग्रह’ सरकार के कानों में पड़नेवाले इन नए शब्दों का सटीक अनुवाद तथा सूझ सरकार के पल्ले नहीं पड़ी। इसके मूल में वही ओ’ डायर किस्म की सोच थी, जो किसी भी प्रकार के राजनीतिक आंदोलन अथवा स्वाधिकार माँग को ‘बगावत के घेरे’ में ला खड़ा करती थी। इन लोगों ने गांधीजी को पढ़ने-समझने में भारी भूल की। सरकार उन्हें एक ‘चंट-चालाक राजनीतिज्ञ’ के लिबास में देखने की आदी हो गई थी। उनके पंजाब तथा दिल्ली प्रवेश पर रोक लगा दी गई।

: पाँच :

जैसी भूलें पंजाब सरकार ने डॉ. किचलू व डॉ. सत्यपाल को लेकर कीं, ठीक वैसी ही भूलें केंद्रीय सरकार ने शायद ओ’ डायर की हठधर्मिता के कारण गांधीजी के बारे में कीं।

सरकार कदम-कदम पर नहले-पर-दहला चलाने का दस्तूर निभा रही थी।

वह रॉलेट ऐक्ट को लागू करने पर तुली थी, भले ही हिंदुस्तानी जनता कितना ही विरोध क्यों न करें। जब लोग विचलित तथा उत्तेजित हुए तो उन्हें आँखें दिखलाकर डराने-धमकाने की नीति अपनाई गई। निश्चय ही हुक्मरान सोचते थे कि लोगों पर आतंक जमाने की नीति अंततः कारगर होगी।

: छह :

जलियाँवाला बाग में एकत्र अधिकतर लोग सभाबंदी की किसी भी घोषणा से अनभिज्ञ थे। क्या यह ऐलान मनगढ़ंत ढंग से किया गया था? क्या इसका अक्षरशः कथानक बाद में रचा गया—हंटर कमेटी से थोड़ा पहले? क्या यह ऐलान फुसफुसाकर किया गया, जिससे साँप भी मरे और लाठी भी न टूटे? त्योहार के दिन इस प्रकार के ऐलान करने के पीछे आखिर हुक्मरान तबके का इरादा क्या था? शहर में बिजली-पानी आदि बंद रखकर जान-बूझकर लोगों को यों भी दंडित किया जा रहा था। सरकारी काररवाइयों के पीछे बदले की यह भावना प्रमुख लगती थी कि हम ईंट का जवाब पत्थर से देंगे, वरना इन लोगों की क्या मजाल कि ये जर्मनी जैसे राष्ट्र को हरानेवाली ताकत के विरोध में खड़ा होने की धृष्टता करें? यदि करें तो शीघ्रातिशीघ्र उन्हें कैसे अपनी औकात से परिचित करा डाला जाए?

(मे. जनरल सूरज भाटिया की पुस्तक ‘जलियाँवाला कांड का सच’ से साभार)
—मे. जनरल सूरज भाटिया

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