भावनाओं के संवेदनशील चितेरे प्रो. नामवर सिंह

भावनाओं के संवेदनशील चितेरे प्रो. नामवर सिंह

नामवर सिंह ध्वंस के शिकंजे में जकड़े हुए इस संसार में सृजन का वर थे। वे मेरे गुरु थे—जीवन को गति देनेवाले, दिशा देनेवाले तथा मकसद देनेवाले। वे मेरी कलम की प्रेरक शक्ति थे। मेरी कलम जब कभी थक जाती थी, जीवन के दूसरे उद्देश्यों में फँस जाती थी तो वे ही उसमें ऊर्जा की स्याही भरते थे; हौसले का आकाश दिखाते थे। मैं आज भी जब कलम उठाता हूँ तो कानों में उनके शब्द गूँजते हैं, मानो एक अदृश्य सी शक्ति कलम की देह में नई साँस भर रही हो; जेहन में आते नित नए विचार सृजन की भोर में जगमगा रहे हों। ये सब गुरुदेव की आत्मीय भावनाओं का सजल आशीर्वाद ही तो है। उनके न रहने की वेदना असह्य है। ऐसा लग रहा है, मानो भीतर कुछ टूट गया हो—कुछ अपूरणीय सा, असहनीय सा। हिंदी आलोचना अनाथ हो गई है। नामवर सिंह के न रहने से उसकी तीसरी पीढ़ी तिरोहित हो गई। आचार्य रामचंद्र शुक्ल, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के बाद अब नामवरजी थे। साहित्य का एक स्वर्णिम युग एकाएक विलीन हो गया। अक्षर अमिट होते हैं, शाश्वत होते हैं। नामवर सिंह का रचा-बसा संसार मुझे इसकी याद दिला रहा है। वे अब नहीं हैं, मगर उनका रचा-जिया-लिखा मुझसे निरंतर संवाद कर रहा है। वे जिस मृत्यु का हवाला देकर मुझे शीघ्रातिशीघ्र अयोध्या पर किताब पूरी करने का तकादा करते थे, वही मृत्यु उनके जाने के बाद बेहद बौनी नजर आ रही है। मेरी दराज में समाई नामवर सिंह की किताबों की शृंखला उस मृत्यु के ललाट पर पराजय का अमिट स्मृति-चिह्न बनकर अट्टहास कर रही है।

कुछ दिनों पहले ही उन्हें देखने गया था। वे एम्स में भरती थे। उस दौरान उनकी तबीयत में सुधार हुआ था। वेंटिलेटर हट गया था। रक्तचाप, हृदयगति सामान्य थी। चेतना लौट आई थी। हलकी-फुलकी बात भी कर रहे थे। दिमाग में चोट थी, इसलिए थोड़ी गफलत महसूस कर रहे थे। बातचीत भटक रही थी। फेफड़ों में संक्रमण बना हुआ था। डॉक्टरों  का कहना था कि स्थिति में सुधार है। पर उनकी उम्र को देखते हुए अभी खतरे से बाहर नहीं कहा जा सकता था। मैं उनसे आई.सी.यू. में मिला। वे मुझे देखते ही पहचान गए। हालाँकि मैं आई.सी.यू. की वर्दी में था—सिर पर टोपी, चेहरे पर मास्क। सामान्य आदमी को पहचानने में वक्त लगता। वे तो गंभीर बीमारी के सदमे में थे। मुझे सिर्फ अपना नाम बताना पड़ा, और वे हमेशा की तरह मुसकरा दिए थे। उनके भीतर का जिंदादिल शख्स इस अवस्था में भी बोल पड़ा था—

‘‘आ गईला। अब सब ठीक हो जाईं। हमार पट्टी हटवावा।’’ उनके दोनों हाथ में पट्टियाँ बँधी थीं, ताकि वे तंद्रा में अपनी जीवन रक्षक प्रणाली न हटा दें। मैंने कहा, ‘‘डॉक्टर से बात हो गई है, वो एक दिन बाद खोल देंगे।’’ वे इस बात पर अड़े रहे कि तुम कहो, तुम्हारे कहने से खोल देंगे। फिर इधर-उधर की बातें करने लगे, जो ज्यादा समझ में नहीं आ रही थीं। फिर बोले, ‘‘तुम्हारी किताब की समीक्षा करनी है मुझे।’’ मैंने उनसे बताया कि आप ही ने भूमिका लिखी है। वे बोलते रहे—मुझे दूरदर्शन पर समीक्षा करनी है। मैं उनकी गफलत समझ गया था, इसलिए उनके कहे में सिर्फ हाँ-में-हाँ मिलाने लगा। तब तक डॉक्टर आ गए थे।’’ उन्होंने बताया कि गुरुजी पहले से ठीक हैं। इतनी जल्दी ऐसी रिकवरी की उन्हें उम्मीद नहीं थी। उस रोज डॉक्टर की उम्मीद मेरे जेहन की तमाम आशंकाओं को परास्त कर गई। मैं व्यग्र होकर रह गया था, उम्मीद से वापस लौटा।

हालाँकि बिस्तर पर नामवरजी को लाचार देख मन उद्विग्न हो गया। जिस आदमी को पूरे ताप के साथ मैंने देखा था, जम्मू से लेकर तिरुवनंतपुरम् तक जिस व्यक्ति की तेजस्विता के सामने तमाम हिंदी विभाग काँपते थे। जिसकी मर्जी तीस बरस तक हिंदी आलोचना की धारा तय करती रही। जिसका कहा एक-एक शब्द हिंदी आलोचना का बीजशब्द बनता था। मैंने उन नामवर की तेजस्विता का सूर्य देखा था। आनेवाली नस्लें इस बात के लिए हम पर रश्क भी कर सकती हैं कि मैं गुरुदेव के प्रिय शिष्यों में रहा हूँ।

उनका न रहना नामवर युग का अंत है। नामवर सिंह ने आचार्य द्विवेदी के बाद साहित्य का एक संसार गढ़ा था। इसे आप ‘नामवर का संसार’ कह सकते हैं। साहित्य में इतना बड़ा संसार किसी लेखक-आलोचक का नहीं था। उन्होंने भाषिक संस्कार से लैस एक पूरी पीढ़ी गढ़ी। कभी-कभी तो मुझे समझ नहीं पड़ता था कि वे आलोचना के नामवर थे या फिर नामवर की आलोचना। मैनेजर पांडेय कहते हैं कि नामवर के संसार में भाँति-भाँति के लोग हैं, जो उन्हें तो परेशान नहीं करते, पर दूसरों को काट भी सकते हैं। ऐसा क्यों न हो, वे शिव की नगरी के थे। भोला-भंगड़ तो बराती होंगे ही। उनका कौन सा परिचय दूँ यहाँ? हिंदी साहित्य के शिखर पुरुष, आलोचना की धारा, आलोचना की संस्कृति, तर्क के डिक्टेटर, आलोचना की कसौटी, उन्हें न जाने कितने नाम दिए गए थे। मेरा मानना है कि आलोचक और अध्यापक होने के साथ ही वे अपने युग के सबसे बड़े वक्ता भी थे। वे अपनी जुबान से कलम का काम करते थे। अपने भाषण से मंत्रमुग्ध करते थे।

वे सचमुच नामवर थे। माता-पिता का बचपन में दिया नाम सार्थक किया। उनका नाम बड़ा था, दिल भी बड़ा था। दो साल पहले नामवरजी नब्बे के हुए थे। नब्बे के नामवर पर इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में संवाद रखा गया था। राम बहादुर राय आयोजक थे। गृहमंत्री राजनाथ सिंह मुख्य अतिथि थे। दोनों ही दक्षिणपंथी। उस आयोजन में नामवर सिंह के होने से वामपंथी खेमे में तूफान मच गया। नामवर वहाँ कैसे? उन पर न जाने का दबाव पड़ा। डिगाने की कोशिशें हुईं। सोशल मीडिया पर नामवरजी के सठियाने जैसी टिप्पणियाँ हुईं। पर वे अविचलित रहे। अडिग रहे। वे समारोह में आए और सौ साल तक जीने की इच्छा प्रकट थी। ये नामवर थे। वे किसी खेमे के नहीं थे। सभी के थे और सबसे बढ़कर मानव की स्वतंत्रता के।

काशी हिंदू विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में वे सेमिनार के लिए आते रहते थे। उनसे मिलकर ही हम खुद को आलोचना का अरस्तू मान बैठते। नामवरजी बहुत समय तक बी.एच.यू. में आते नहीं थे। एक लोकसभा का चुनाव लड़ने के कारण गुरुदेव को दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थितियों में बी.एच.यू. छोड़ना पड़ा था। फिर उन्होंने आना-जाना बंद किया। पर जब उनके व्यक्तित्व का सूर्य पूरी प्रखरता पर था, उस दौरान कुलपति के निवेदन पर वे विश्वविद्यालयी संगोष्ठियों में आने लगे थे। मुझे गुरुदेव की कृपा तभी से मिलने लगी थी। नामवर सिंह हिंदी के इकलौते आलोचक थे, जो आदिकाल से लेकर उत्तर-आधुनिक युग तक बारह सौ बरस के हिंदी साहित्य की किसी भी कृति की समीक्षा के आधिकारिक विद्वान् थे।

मैं जब ‘जनसत्ता’ में आया तो मेरी जो रिपोर्ट उन्हें अच्छी लगती, फौरन मुझे फोन करते। वे जनसत्ता के नियमित पाठक थे। बाद के दिनों में वे ‘तमाशा मेरे आगे’ के कॉलम पर मुझे नियमित फोन करते। ‘वाह! पंडितजी अईसन कौउनव बनारसीए लिख सकला।’ गुरुदेव जब मुझे मिलते, हमेशा मेरे लिखे हुए किसी लेख की चर्चा करते और हर बार  कुछ नया लिखने के लिए प्रेरित करते। अयोध्या वाली किताबें तो हर इतवार तगादा करके उन्होंने ही लिखवाईं।

गुरुदेव के जाने के बाद उनसे जुड़ी स्मृतियों ने मेरे मानस-पटल को घेर रखा है। ये स्मृतियाँ मुझे खाली नहीं छोड़तीं। मुझे हिंदी साहित्य की चिर मशाल आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी याद आ रहे हैं। उनसे एक बार किसी ने पूछा कि आपकी सर्वश्रेष्ठ कृति क्या है? आचार्य हजारी प्रसाद के मुँह से बस एक नाम निकला, ‘नामवर सिंह।’ ये वही नामवर थे, जिन्होंने हिंदी साहित्य का एक युग गढ़ा, उसे ध्वनि दी। भाषा के अद्भुत अलंकारों से सुशोभित किया। समय की दीवार पर उसकी अविस्मरणीय शिनाख्त मुकम्मल की। जिस बनारसी मिट्टी ने नामवर को बनाया, वह सृजन के अक्षुण्ण प्राणतत्त्व से भरी-पूरी थी। उसमें कबीर का साहस, तुलसी का लोकतत्त्व, प्रेमचंद का समाजशास्त्र और आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का पांडित्य था। जब ये सारे तत्त्व एक साथ मिलते हैं, तब एक नामवर सिंह बनते हैं। उनकी यही पहचान जीवनभर उनके साथ रही।

नामवर सिंह के व्यक्तित्व की सबसे बड़ी खूबी उसकी समग्रता और उसी समग्रता की जड़ों में घुली हुई अनोखी विशिष्टता रही। इसी खूबी ने उन्हें बड़ी-से-बड़ी परंपरा को खारिज करने, अपना झंडा गाड़ने और हिंदी आलोचना में सबसे ऊँचा, आला और अलहदा स्थान बनाने में मदद की। हर खूबी के कुछ फायदे होते हैं तो कुछ नुकसान भी। नामवरजी ने अपनी इसी खूबी के लिए नुकसान भी उठाया। नामवरजी को बनारस में काफी विरोध झेलना पड़ा, हालाँकि यह विरोध तुलसी और आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने भी झेला था। नामवरजी बनारस के जिस मोहल्ले लोलार्क कुंड में रहते थे, वह भदैनी इलाके में पड़ता है। यहाँ काशी के पुराण पंडितों ने तुलसीदास को भगा दिया था। उनकी ‘रामचरित मानस’ को गंगा में फेंक दिया था, क्योंकि तुलसी लोकभाषा में रघुनाथगाथा लिख रहे थे। पुराण पंडितों के केंद्र ‘भदैनी’ से भागकर ही तुलसी ने अस्सी के उस हिस्से का नाम ‘भयदायिनी’ रखा था, जो बाद में बिगड़कर ‘भदैनी’ बना। कवि केदारनाथ सिंह तो यहाँ तक कहते थे कि ‘‘भदैनी में ‘सरवाइव’ करना आसान नहीं है। नामवर सिंह सरवाइव कर गए, शायद इसलिए भी वे नामवर सिंह बन गए।’’

नामवर हिंदी आलोचना का अकेला ऐसा नाम थे, जो हिंदी साहित्य के आदिकाल से लेकर उत्तर-आधुनिक युग तक किसी भी कालखंड पर अधिकार से अपनी बात रखते थे। उनका न रहना हिंदी आलोचना की सबसे सजग, सतर्क, बहुपठित और संवादी परंपरा का अवसान है। पूरे तीस बरस से मैं नामवर के होने का मतलब ढूँढ़ रहा था और अब उनके न होने के मायने ढूँढ़ने बैठा हूँ। एक बड़ा शून्य है संस्कृत, पालि, प्राकृत, अपभ्रंश से लेकर अब तक के भाषायी साहित्य में। उद्भट और मुँहफट प्रतिभा के धनी नामवर सिंह की ‘नामवरियत’ बनारस में ही जन्म ले सकती थी। इसकी भी एक वजह है। बनारसीपन एक अति आधुनिक सांस्कृतिक दृष्टि है। उसमें जनमे, पगे, बढ़े नामवरजी पांडित्य से भरे विविध रंगोंवाले बिंदास बनारसी थे। जमाने को ठेंगे पर रख अपनी बात को पूरी ताकत के साथ रखने का अंदाज इसी दृष्टि की उपज थी, क्योंकि जाति, वर्ग, संप्रदाय और धर्म से आगे की चीज है बनारसीपन। समूची पांडित्य परंपरा से लैस नामवरजी अति आधुनिक औजारों से ‘दूसरी परंपरा’ यहीं ढूँढ़ सकते थे। नामवर सिंह का कर्मक्षेत्र भले ही दिल्ली रहा हो, पर उनका भावक्षेत्र हमेशा बनारस रहा।

सही है कि बनारस में नामवरजी का अनुभव अच्छा नहीं रहा, मगर यह भी उतना ही सच है कि वे दिल्ली में बनारस को ‘मिस’ करते रहे। वह दिल्ली में हमेशा बनारस ढूँढ़ते रहे। अपने आस-पास, मित्रों में, खान-पान में, पहनावे में और अपनी भाषा में। उन्होंने गुस्से में बनारस छोड़ा। लोकसभा का चुनाव लड़ा। नौकरी गई। बेरोजगारी देखी। समकालीन साहित्यकारों ने काम भी लगाया। मगर जब बनारस छोड़ा तो पलटकर नहीं देखा। उनके भीतर का जो बनारसी था, उसी ने उनके भीतर यह दृढ़ता और जिद पैदा की। आखिरी के दिनों में वे मुझसे कहा करते थे कि उन्होंने क्षेत्र संन्यास ले लिया है। अब वे इस क्षेत्र के बाहर नहीं जाना चाहते हैं, पर एक बार बनारस जाने का मन है। ‘देखल जाय कईसन हौअ बनारस, कईसन हऊअन बाबा विश्वनाथ’, पर जहाज से यात्रा की उन्हें इजाजत नहीं थी। सो अपने मूल पर लौटने की उनकी इच्छा धरी रह गई। गुरुदेव की बनारस जाने की इच्छा इतनी बलवती थी कि वे बार-बार कहते, एक बार फिर बनारस जाने का मन है, अब जीवन का क्या ठिकाना। बनारस जाने और बाबा विश्वनाथ के दर्शन की इच्छा अधूरी ही रह गई। वामपंथी होते हुए भी बार-बार बाबा विश्वनाथ के दर्शन का आग्रह उनके संस्कारों का असर था। बनारस के प्रति अपने मोह को वे बार-बार इन वाक्यों में परिलक्षित करते कि मैंने क्षेत्र संन्यास ले लिया है। उनका शरीर भर बनारस से दूर रहा, मगर आत्मा बनारस की मिट्टी में ही पगी-बसी रही।

नामवर सिंह पिछले तीन दशकों से हिंदी साहित्य के केंद्र में थे।  उन्होंने आलोचना की वाचिक परंपरा को जीवित किया। आलोचना को बंद गली से आगे ले गए। उसको गंभीरता से मुक्त कर आसान, सरस और ऐसा पठनीय बनाया कि वह रचना का आनंद देने लगी। लिखने से ज्यादा महत्त्व बोले जाने को दिया जाने लगा। किताबों की तुलना में संगोष्ठियों का महत्त्व बढ़ा और इस पूरी परंपरा के अलमबरदार बने नामवरजी। क्योंकि नामवर सिंह कलम के सिपाही नहीं हैं, बातों के जादूगर थे। बातूनी नामवर सिंह को दिल्ली में सब जानते हैं। लेकिन इस बातूनीपन के पीछे वे एक गंभीर अध्येता थे। इस लिहाज से नामवर सिंह शायद हिंदी में समकालीन विश्व साहित्य के सबसे बडे़ बौद्धिक पुरुष थे। नामवरजी बेहद अध्ययनशील थे। वे मिर्जा गालिब से लेकर मनोज मुंतजिर तक, कहीं से भी शुरू कर, कहीं भी खत्म कर सकते थे। जितना अधिकार उनका कालिदास और भवभूति पर था, उतनी ही सहजता से वे ब्रेख्त और लुशुन को भी समझाते थे।

नामवरजी अपनी आवाज, असाधारण स्मरणशक्ति, सहज प्रत्युत्पन्न मति आदि की बदौलत पिछले ३० वर्ष से न सिर्फ साहित्यिक संगोष्ठियों को लूटते आए थे, बल्कि अपने साहित्यिक रण-कौशल से अपनी विचारधारा के विरोध में खडे़ विद्वानों को भी गिराते, पछाड़ते और उखाड़ते आए थे। वे भाषा के बेजोड़ खिलाड़ी थे। उनकी भाषा मुहावरे गढ़ती थी और यही मुहावरे साहित्य की चौहद्दी बनाते थे। नामवरजी का व्यक्तित्व बहुआयामी था। आलोचना ही नहीं कविता की परंपरा से भी उनका उतना ही गहरा संबंध था। नामवर सिंह ‘पुनीत’ को बहुत कम लोग जानते हैं। अपने लेखक-जीवन की शुरुआत में वे इस नाम से कविताएँ लिखते थे। अध्यापक नामवर। चंदौली से चुनाव लड़नेवाले राजनेता नामवर। आलोचक नामवर और अब किंवदंती बन चुके नामवर।

रिश्ते-नाते उन्हें ज्यादा प्रभावित नहीं करते थे। घटना, मनुष्य और विचार इन तीनों में वे विचार को अधिक महत्त्व देते रहे। वे विद्यार्थियों को आलोचना पढ़ाते ही नहीं, आलोचना सिखाते भी रहे। वे सामनेवाले की बात को सिरे से खारिज करने का दम रखते थे, पर साथ ही सामनेवाले की बहस और असहमति के अधिकार की हिफाजत करने के लिए भी उतने ही दमखम से खडे़ होते थे। शायद यही वजह है कि नामवर सिंह जिन्हें खारिज करते थे, उन्हें ज्यादा पढ़ते थे। बिना पढे़ विरोध, केवल लोकतंत्र में विपक्ष की औपचारिक भूमिका भर है, मगर नामवर सिंह खाँटी विपक्ष की नहीं, बल्कि विद्वत् और संवेदनशील प्रतिपक्ष की भूमिका अदा करते थे।

नामवरजी का एक खास स्वभाव था कि अगर वे आपकी बात से असहमत हैं तो वे आपकी बाकी बातों को उड़ाते हुए कहेंगे, ‘‘आप तो बडे़ विद्वान् आदमी हैं।’’ एक संस्मरण याद आया। साल १९८२ की बात है। मैं पहली बार उनसे विधिवत् मिला। बी.एच.यू. से जे.एन.यू. में पढ़ने आया था। दाखिला कराने जब बनारस से दिल्ली आ रहा था, तब मेरे पिता मनु शर्मा ने कहा था कि नामवरजी से जरूर मिलना। मेरे भीतर भी बड़ी उत्सुकता थी नामवर सिंह से मिलने की। उनके घर पहुँचा, दस्तक दी। उन्होंने खुद ही दरवाजा खोला। बोले, ‘‘आइए, कैसे दिल्ली आए हैं?’’ मैंने जवाब दिया, ‘‘पढ़ने आया हूँ।’’ चश्मे के भीतर से झाँकती उनकी गंभीर आँखों ने पूछा, ‘‘रहते तो कबीरचौरा में ही हो।’’ मैंने कहा, ‘‘जी।’’ उनका अगला सवाल था, ‘‘कबीर को पढ़ा है?’’ ‘‘जी पढ़ा है।’’ ‘‘कबीर को समझने के लिए किसे पढ़ा है?’’ नामवरजी ने अगला सवाल दागा। उन्होंने सोचा होगा कि मैं आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का नाम लूँगा, क्योंकि हिंदी में कबीर पर उनकी सबसे प्रामाणिक किताब थी। लेकिन मैंने कहा, ‘‘जी, मैंने कबीर पर आचार्य रजनीश को पढ़ा है।’’ रजनीश उस वक्त तक ओशो नहीं थे। मेरे इस जवाब पर वे भेद भरी मुसकान के साथ अपने चिरपरिचित अंदाज में बोले, ‘‘आप तो बडे़ विद्वान् आदमी मालूम पड़ते हैं।’’ मैं इसे समझा नहीं। बाद में पता चला कि वे अपना यह जुमला तब ही उछालते हैं, जब आप निरर्थक बोल रहे हों या उनके सामने अपनी ‘ज्ञान-संपदा’ को बड़ी आतुरता के साथ प्रदर्शित कर रहे हों, तब भी वे यही कहेंगे, ‘‘आप तो बडे़ विद्वान् आदमी हैं।’’

इस घटना के कोई अट्ठाईस वर्ष बाद नामवरजी नोएडा में मेरे घर आए। सायंकालीन जमावड़ा। केदारनाथ सिंह, ओम थानवी, रामबहादुर राय, मेरे पत्रकार साथी अजय उपाध्याय के साथ ही राजनेता व संविधानविद् देवेंद्र द्विवेदी भी मौजूद थे। गुरुवर प्रभाष जोशी को भी आना था। पूछा तो पता चला, वे चल दिए हैं। नामवरजी बोले, ‘‘हेमंत, परेशान न हो, प्रभाषजी समझदार हैं, हम लोगों को मौका दे रहे हैं, ताकि हम अपना तरल कार्यक्रम समाप्त करें।’’ मैंने चुहल की, कहा कि जोशीजी इसका बुरा नहीं मानते। गोस्वामी तुलसीदास तक ने भी इस तरल की महत्ता बताई है। नामवरजी चौंके। ‘‘क्या कहा?’’ मैंने कहा, ‘‘जी, तुलसीदास ने लिखा है—तरल पदारथ हैं जग माही, कर्महीन नर पावत नाहीं।’’ वह तो प्रूफ की गलती से ‘तरल’ की जगह ‘सकल’ छप गया। मेरे उवाच पर बाकी लोग ठहाका लगाते, इससे पहले ही नामवर सिंह बोले, ‘‘वाह! वाह! बहुत विद्वान् आदमी हो!’’

नामवरजी की हँसी-ठिठोली का भी एक विशिष्ट अंदाज था। एक बार बनारस में आलोचक डॉ. बच्चन सिंह के यहाँ नामवर सिंह, विजयशंकर मल्ल, केदारनाथ सिंह आदि ‘संध्या-वंदन’ के  लिए बैठे थे। नामवरजी शाम के बैठने-बिठाने के कार्यक्रम को ‘संध्या-वंदन’ कहते थे। बच्चन सिंहजी के यहाँ संपन्न उस ‘संध्या-वंदन’ में विजयशंकर मल्ल कुछ इधर-उधर की बात ले आए। मल्लजी विद्वान् अध्यापक थे। उनकी विद्वत्ता का हम पर आतंक था। वे इतने संवेदनशील थे कि कोई बड़ी ट्रेन दुर्घटना और सड़क पर साइकिल से किसी का गिरना उन्हें समान कष्ट पहुँचाते थे। बात हिंदी अखबार और उसकी बदलती भाषा की हो रही थी। मल्लजी कहने लगे—भाई, पटना से एक अखबार निकलता था। नाम था—‘प्रदीप’। यह कहते हुए वे नामवरजी की ओर मुखातिब हुए और थोड़ा टेढ़े होकर वायु मुक्त की। नामवरजी ने तुरंत कहा—हाँ, हाँ निकलता था, अभी-अभी निकला है और फिर निकलेगा। बाकी लोग आनंद की मुद्रा में थे। नामवरजी गंभीर। आशय कि वे गंभीर रहकर आनंद लेते थे।

कवि केदारनाथ सिंह और नामवरजी की खूब छनती थी। केदारजी कहते थे, ‘यह कोई साधारण बात नहीं है कि पिछले तीन दशक के इतने बडे़ कालखंड में समकालीन हिंदी साहित्य के केंद्र में एक आलोचक हैं। कोई रचना नहीं।’ इस गुत्थी को सुलझाना होगा, तभी हमें नामवर सिंह होने के सही मायने पता चल सकेंगे। नामवरजी आलोचना के कालजयी हस्ताक्षर थे। एक पूरी-की-पूरी पीढ़ी है, जिसके लिए वे एक संस्था की तरह थे। यह संस्था सिर्फ साहित्य तक सीमित नहीं थी। नामवरजी अपने आपमें जीवन की प्रयोगशाला थे। वे इनसानियत के सूर्य थे। मानवीय भावनाओं के संवेदनशील चितेरे थे। साहित्य के कैनवास पर उनका जितना बड़ा कद था, उससे भी लंबी लकीर वे मानवता के कैनवास पर खींचते थे। गुरु एक शानदार यात्रा पूरी कर अनंत की ओर निकल पड़े हैं। अब भी हर इतवार सुबह फोन उठाकर देखता हूँ। हाथ काँपने लगते हैं। कहीं गुरुदेव का फोन तो नहीं आया। क्या लिख रहे हो, ये पूछने के लिए। उनकी स्मृति को प्रणाम। शत-शत प्रणाम।

आसावरी,
जी-१८०, सेक्टर-४४
नोएडा-२०१०३०१
—हेमंत शर्मा

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