वैश्विक नाट्य, नृत्य और लीला में राम

वैश्विक नाट्य, नृत्य और लीला में राम

वैश्विक नाट्य, नृत्य और लीला में राम’ यानी प्रस्तुतिपरक कलाओं में रामकथा की परंपरा—रामायण की दृश्यात्मक प्रस्तुति। यह अपने आप में बहुत महत्त्वपूर्ण और रोचक विषय है। इसमें तीन  शब्द हैं नाटक, नृत्य और लीला। ये तीनों शब्द अलग-अलग दिखाई देते हुए भी अभिन्न हैं। नाट्य अथवा नाटक की प्रस्तुति अभिनय के माध्यम से होती है और अभिनय को पूर्णता नृत्य के द्वारा मिलती है। भरतमुनि के  ‘नाट्यशास्त्र’ में अभिनय मुद्राओं ‘करण’, ‘अंगहार’ ‘रेचक’ की विस्तृत चर्चा है, जो आंगिक और सात्त्विक अभिनय का माध्यम बनती हैं। प्राचीन काल से ही नाटक के साथ नृत्य योजना की परंपरा रही है। नाट्यशास्त्र में ‘अमृतमंथन’ और ‘त्रिपुरदाह’ नाटकों की प्रस्तुति के साथ शिव के तांडव नृत्य का उल्लेख है। नाट्य और नृत्य के अलावा यहाँ तीसरा शब्द है लीला, जो अपने आप में अभिनय अथवा प्रस्तुति का पर्याय है। ‘रामचरितमानस’ में तुलसीदास बार-बार याद दिलाते कि राम भगवान् हैं और नर के रूप में लीला कर रहे हैं। सुपरिचित शब्द है रामलीला, जिसके मायने हैं रामकथा की सजीव नाट्य-प्रस्तुति, जिसकी भारतीय समाज में सुदीर्घ परंपरा है।

नृत्य का समावेश नाट्य-प्रस्तुति में दो तरह से होता है—एक तो है नाटक की गद्यात्मक प्रस्तुति के साथ नृत्य की योजना और दूसरा है नाट्य की नृत्यमय प्रस्तुति यानी नृत्य-नाट्य। नृत्य-नाट्य अपेक्षाकृत अधिक कलात्मक, संप्रेषणीय और आह्लादकारी होता है। नृत्य-नाट्य के रूप में भी रामकथा लंबे समय से प्रस्तुत होती चली आ रही है।

देखने की बात यह है कि रामायण जो एक पाठ है, दृश्य रूप में उपस्थित होकर उसमें क्या विशेष जुड़ जाता है, जो पाठ्य रूप में नहीं था। नाटक के स्वरूप के विषय में ‘नाट्यशास्त्र’ में कहा गया है कि न ऐसा कोई ज्ञान है न विद्या न कला न योग न कर्म, जिसे हम नाटक में नहीं देखते—

न तज्ञानं न तच्छिल्पम न सा विद्या न सा कला

न सा योगो न तत्कर्म नाट्य अस्मिन यन्नदृश्यते।

अतः नाट्य के संदर्भ में राम और रामकथा पर चर्चा करने का अर्थ है समग्र जीवन और समग्र संस्कृति के संदर्भ में इस पर चर्चा करना। ‘रामायण’ अथवा रामकथा भारतीय संस्कृति की ऐसी प्रतिनिधि गाथा है, जो हजारों सालों से भारतीय जनमानस में रची-बसी है और जहाँ-जहाँ भारतीय गए वहाँ-वहाँ उनके साथ पहुँची है, वहाँ की संस्कृति का अंग ही नहीं बनी उस संस्कृति के निर्माण में इसने प्रबल भूमिका अदा की है। वहाँ की भाषाओं में पुनः सृजित हुई है, वहाँ का प्रमुख नाट्य रूप बनकर इसने वहाँ की कलाओं को गढ़ा है और स्थानीय विशेषताओं को आत्मसात् कर अपनी अलग पहचान बनाई है।

रामायण अथवा रामकथा भारतीय संवेदना का, सामूहिक अवचेतन का, जातीय स्मृति का अभिन्न अंग है। नाटक चूँकि विविध ज्ञान और कलाओं का समावेश करनेवाली सामूहिक कला है, अतः नाटक का माध्यम पाकर रामकथा युगों-युगों से लोक-चित्त का रंजन करती आ रही है। गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर रामायण-महाभारत को भारत का चिरंतन इतिहास मानते हैं। ‘रामायण’ नामक अपने निबंध में उनका कहना है कि ये दोनों कालबद्ध इतिहास नहीं, ये भारतीय चित्त का इतिहास हैं, जिसमें भारतीय जन अपनी छवि देखता रहा है—‘यह घटनावली का इतिहास नहीं, भारतवर्ष की जो साधना है, संकल्प हैं, उन्हीं का इतिहास इन दो काव्य-सौंधों में चिरंतन सिंहासन पर विराजमान है।’

प्रश्न है कि यह चित्त का इतिहास क्या है? रवींद्रनाथ का कहना है कि रामायण में राम-रावण युद्ध है अवश्य, किंतु रामकथा का केंद्रीय भाव युद्ध न होकर प्रेम है, पारिवारिक प्रेम, भरत और राम का प्रेम, राम-लक्ष्मण का प्रेम, राम-सीता का प्रेम और हनुमान, निषाद, शबरी, विभीषण की भक्ति है; गृहस्थ आश्रम की, दांपत्य की महनीयता की स्थापना है, जहाँ स्वयं अपने से अधिक ‘अन्य’ की परवाह है। ऐसे प्रसंग और स्थितियाँ हैं, जो भारतीय चित्त को लगातार आह्लादित करती रही है। लोकचित्त को रमाने में रामायण के पाठ्य रूप से भी ज्यादा भूमिका दृश्य रूप की रही है। और यह दृश्य रूप यानी नाट्य रूप बहुत पुराने जमाने से चला आ रहा है।

रामकथा की नाट्य-प्रस्तुतियों के अनेक रूप आज भारत में मौजूद हैं। उत्तरी भारत में हिंदी भाषी क्षेत्र में रामलीला की परंपरा है, जिसकी प्रस्तुति हर वर्ष आश्विन मास में विभिन्न शहरों-कस्बों में पंद्रह दिन से लेकर इकतीस दिन तक होती है। हर रोज राम की नर लीला का एक अंश प्रस्तुत किया जाता है। स्थानीय समाज की सामूहिक भागीदारी से प्रस्तुत इस लीला में कथावाचक लोग ‘रामचरितमानस’ का पाठ करते हैं और पात्रों का स्वरूप बने अभिनेता संवाद बोलते हुए प्रस्तुति करते हैं। शास्त्रीय नृत्य परंपरा में कथकली, कुडियाट्टम, यक्षगान, भरतनाट्यम, कथक आदि में रामायण कथाओं की प्रस्तुति लंबे समय से होती चली आ रही है। उड़ीसा और केरल के मालाबार इलाके में रामकथा मंचन छाया पुतली नाटक के माध्यम से करने का प्रचलन रहा है। इसके अलावा विभिन्न भारतीय भाषाओं और बोलियों की अपनी-अपनी रामायणों पर आधारित रामलीलाएँ अलग-अलग क्षेत्रों में प्रस्तुत की जाती हैं। तुलसीदास ‘रामायण सतकोटि अपारा’ की बात कहते हैं। फादर कामिल बुल्के ने देश-विदेश की सैकड़ों रामायणें खोजी हैं, ए.के. रामानुजन ३०० रामायणों की चर्चा करते हैं। रामायणों की तरह रामकथा की नाट्य-प्रस्तुतियों के अनेक-अनेक रूप भारतीय विविधता के बीच एकता का उदाहरण तो हैं ही, रामायण की रचना से पहले उसके नाट्य रूप की मौजूदगी की के भी परिचायक हैं।

आज रामलीला का जो रूप मौजूद है, माना जाता है कि उसका  आरंभ काशी में तुलसीदास ने कराया। यद्यपि रामकथा की दृश्य प्रस्तुति की परंपरा बहुत पुराने समय से चली आ रही थी, यह बात विद्वानों ने ठोस प्रमाणों के आधार पर सिद्ध की है। ‘हरिवंश पुराण’ (जो कि वेदव्यास द्वारा रचित है) में रामलीला नाटक की प्रस्तुति की बात कही गई है, ‘रामायण’, ‘महाभारत’ में कुशीलव का उल्लेख है। यह कुशीलव शब्द गायक और अभिनेता के लिए प्रयुक्त हुआ है। इस आधार पर विद्वानों का मानना है कि रामायण की पाठ्य काव्य के रूप में रचना से पहले वह गायकों और अभिनेता मंडलियों के बीच मौजूद चली आ रही थी। महाकवि जयशंकर प्रसाद जितने बड़े लेखक उतने ही बड़े साहित्य और संस्कृति के शोधकर्ता भी। उन्होंने ‘नाटकों का आरंभ’ नामक अपने निबंध में लिखा है—‘संभवतः ‘रामायण’ काल के नाटक-संघ बहुत प्राचीन काल से प्रचलित भारतीय वस्तु थे। ‘महाभारत’ में भी रंभाभिसार के अभिनय का विशद वर्णन मिलता है। तब इन पाठ्य काव्यों से नाटक प्राचीन थे ऐसा मानने में कोई आपत्ति नहीं हो सकती। संभव है कि अन्य प्राचीन साहित्य की तरह ये सब नाटक नटों को कंठस्थ रहे होंगे।’ (काव्य और कला तथा अन्य निबंध)

संस्कृत साहित्य विशेषज्ञ और दक्षिण एशिया अध्ययन केंद्र, एडिनबरा में प्रोफेसर जान ब्रोकिंग्टन का मानना है कि मौखिक परंपरा संपन्न इस विशाल भारतीय भू-भाग में कथा गायकों और नाट्य मंडलियों द्वारा रामकथा की दृश्य प्रस्तुति रामायण-महाभारत की रचना से पहले से चली आती रही होगी और बाद में भी कायम रही होगी। अन्यथा इतने बड़े देश में ये महाकाव्य लोक स्मृति में संचित न रह पाते। इन कथाओं की लोक-व्याप्ति और विभिन्न कलाओं के बीच इनके विस्तार की पुष्टि में वे एलोरा की गुफाओं और इंडोनेशिया में जावा के प्रांबनान मंदिर (नवीं-दसवीं ईसवी) में उकेरे गए मूर्ति-शिल्प में अंकित रामलीला का उदाहरण देते हैं।

बनारस की सुविख्यात रामनगर की रामलीला के अध्येता और विश्लेषक रिचर्ड शेखनर भी रामलीला प्रस्तुति की प्राचीन परंपरा देखते हैं। दूसरी ओर दक्षिण भारत के शास्त्रीय नाट्य-रूपों कुडियाट्टम और कथककलि में रामायण के प्रसंगों के मंचन की परंपरा रामकथा की दृश्य प्रस्तुति की निरंतरता को सिद्ध करती है। लोक साहित्य विशेषज्ञ डॉ. श्याम परमार भी भक्ति के प्रसार से पहले से रामलीला की मौजूदगी अनेक प्रमाणों के आधार पर उद्घाटित करते हैं।

तुलसीदास का महत्त्व इस बात में है कि उन्होंने रामलीला को इतना जनप्रिय रूप दिया कि समूचा उत्तरी भारत सियाराममय हो गया और रामलीला की प्रस्तुति ‘रामचरितमानस’ के पाठ के साथ होने लगी। शंबूक वध और वैदेही वनवास जैसे लोक चित्त को वेदना पहुँचानेवाले प्रसंगों को तुलसीदास ने बहुत सहजता से ‘रामचरितमानस’ से बाहर रखा। राम का लोकनायक और लोकरंजक रूप ही इसमें समाहित किया। फलतः इसकी लोकव्याप्ति का विस्तार हुआ। रामलीला से प्रेरणा पाकर मध्यकाल में हिंदी में नाटक लेखन के प्रयास हुए। प्राणचंद ने ‘रामायण महानाटक’, हृदयराम ने ‘हनुमन्नाटक और महाराज विश्वनाथ सिंह ने ‘आनंद रघुनंदन’ नाटकों की रचना की।

रामलीला का महत्त्व इस दृष्टि से भी रहा है कि हिंदी क्षेत्र में लंबे समय तक, कहना चाहिए सदियों तक विद्यमान रही रंगमंचीय निष्क्रियता के दौर में जनरुचि का संस्कार-परिष्कार करने में रामलीला- रासलीला की व्यापक भूमिका रही। विभिन्न राजनीतिक-सामाजिक कारणों से मध्यकाल में हिंदी क्षेत्र सिलसिलेवार रंगमंचीय गतिविधि से शून्य रहा। किंतु रामलीला अपने लोकनाट्य रूप में जन-मन में रस का संचार करती रही। विभिन्न शहरों, कस्बों और गाँवों में अपनी-अपनी सुविधाओं और साधनों के अनुरूप रामकथा को दृश्य बनाने की सामूहिक सांस्कृतिक गतिविधि जारी रही। उसी विरासत में अयोध्या, काशी, वृंदावन, अल्मोड़ा, सतना, मधुबनी आदि की रामलीलाएँ विशेष आकर्षण बन प्रसिद्धि पा सकीं। व्यावसायिकता से दूर इस नाट्य ने स्थानीय समाज की सांस्कृतिक एवं कलात्मक अभिरुचियों के निर्माण में, सामूहिकता को सुदृढ़ बनाने में, नई-पुरानी पीढि़यों को जोड़ने में बड़ी भूमिका निबाही। बनारस में रामनगर की ३१ दिन तक चलनेवाली रामलीला इस जनभागीदारी की दृष्टि से विशेष उल्लेखनीय है, जो लगभग पिछली दो शताब्दियों से अपने परंपरागत स्वरूप को कायम रखे हैं।

आजादी के बाद हिंदी रंगमंच के विकास और तकनीकी सुविधाओं के चलते रामलीला प्रस्तुतियों में कलात्मक आकर्षण बढ़ा। यह व्यावसायिक रंगमंच से भी जुड़ी है। दिल्ली में श्रीराम भारतीय कला केंद्र द्वारा प्रस्तुत रामलीला इस दृष्टि से विशेष रूप से उल्लेखनीय है। मूलतः ‘रामचरितमानस’ को आधार बनाते हुए लगभग एक माह तक हर रोज पूरी रामकथा इसमें प्रस्तुत की जाती है। विभिन्न शास्त्रीय और लोक शैलियों को समाहित करता यह नृत्य-नाट्य लगातार दर्शकों को आह्लादित करता रहा है। पिछले करीब छह दशकों से निरंतर प्रस्तुत होती आ रही इस नृत्य नाटिका में शास्त्रीय नृत्य-संगीत का समावेश उत्तर-दक्षिण की परंपरा का संगम स्थापित करता है। इस नृत्य नाटिका की परिकल्पना और स्वरूप निर्माण केरल कलामंडलम के शीर्ष कथकली कलाकारों-कलामंडलम गोपीनाथ और तंकमणि द्वारा किया गया था। समय के साथ थोड़े-बहुत संशोधन-परिष्कार के बावजूद यह अपने मूल स्वरूप को कायम रखे हुए है।

वस्तुतः रामायणी कथा में मानव हृदय की, गहन मानवीय मनोभावों की इतनी संप्रेषणीय, सशक्त और मर्मस्पर्शी संवेदनात्मक प्रस्तुति है कि जब यह भारत के बाहर एशिया के देशों में गई तो जहाँ पहुँची, वहाँ के लोगों की चेतना में बस गई। इसका विस्तार इंडोनेशिया, कंबोडिया, म्याँमार, थाईलैंड, मलेशिया, लाओस, फिलिपींस तक हुआ। कहीं यह कथा बौद्ध धर्म के माध्यम से पहुँची तो कहीं शैव और वैष्णव माध्यमों से। कथावाचकों, पंडितों, दार्शनिकों, कलाकारों, शिल्पकारों, अभिनेताओं, नृत्यकारों आदि अनेक स्रोतों से यह कथा उन समाजों-संस्कृतियों की मूल धारा में समाविष्ट हो गई और सदियों से उनकी कलात्मक संवेदना की, उनके सौंदर्यबोध की पहचान बनी हुई है। उन देशों की भाषाओं में रामायण के अनुवाद हुए हैं। एशियाई देशों की अपनी-अपनी रामायणें हैं, जिनका मूल आधार संस्कृत रामायण और कंब रामायण हैं, हर समाज ने उसे अपनी स्थानीय संवेदना और सुरुचि के अनुरूप ढाला है, लेकिन रामकथा का बुनियादी ढाँचा और प्रधान-पात्रों से जुड़ी घटनाएँ सबमें मौजूद हैं। इंडोनेशिया की ‘काकाबीन रामायण’, कंबोडिया की ‘रिएमकर’, थाईलैंड की ‘रामकिएन’, म्याँमार की ‘यामायन’ अथवा ‘याम जात्दव’ (‘याम जातक’), मलेशिया की ‘हिकायत सेरी राम’, फिलिपींस की ‘महारादिया लावना’, लाओस (जिसे राम के पुत्र लव का नगर माना जाता है) की रामायण ‘फ्रा लाक फ्रा लाम’ को ये देश अपनी-अपनी सांस्कृतिक परंपरा की पहचान मानते हैं। उनकी रंगमंच परंपरा रामकथा से प्रेरणा पाती है, जो उनकी राष्ट्रीय सांस्कृतिक पहचान बनी हुई है। दक्षिण-पूर्व एशिया के इन देशों से भारत का संपर्क दक्षिण के समुद्री मार्ग से हुआ, अतः दक्षिण की सुसंपन्न कलाएँ भी इन देशों में पहुचीं। वहाँ का शास्त्रीय संगीत-नृत्य, अभिनय, रूप-सज्जा, ललित कलाएँ, चित्र एवं मूर्तिशिल्प, सभी कुछ इन देशों में पहुँचा और इन देशों की संस्कृति में घुल-मिल गया। उनके मंदिरों की दीवारों पर, उनके प्रस्तर शिल्प में, काष्ठशिल्प में अंकित हो रामायण उनकी स्थायी पहचान बन गई।

इंडोनेशिया के जावा और बाली द्वीपों से भारत का दो हजार साल पुराना संपर्क रहा है, जो उनकी भाषा और संस्कृति में आज भी देखा जा सकता है। रामायण के इंडोनेशियाई पाठ पर आधारित नृत्य-नाट्य ‘वायांग’ की प्रस्तुतियाँ जावा के प्रांबनान मंदिर तथा बाली के विभिन्न मंदिरों में नियमित रूप से होती हैं। नर्तकियों की गति, यति, लय और मुद्राओं पर भारतीय प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है।

थाई नृत्य-नाट्य ‘लाखोन खोई’ और ‘खोंन’ वस्तुतः थाई रामलीला है, जो ‘रामकिएन’ पर आधारित होती है। खोन  में मुखौटा पहनकर अभिनय किया जाता है। स्थानीय कला और सौंदर्यबोध से जुड़कर नृत्य मुद्राएँ चित्रात्मक भव्यता पा लेती हैं।

कंबोडियाई नृत्य-नाट्य रोएउंग कहलाता है। ‘रिएमकर’ (रामकीर्ति अथवा रामायण) पर आधारित होता है। अंकोरवाट के अप्रतिम मूर्तिशिल्प का सौंदर्य इसमें सजीव हो उठता है। लाओस की रामायण पर आधारित नृत्य-नाट्य फ्रालाक कहलाता है।

वस्तुतः राम, सीता लक्षमण, हनुमान, रावण आदि पात्र दक्षिण एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया का एक बड़े भाग की सांस्कृतिक चेतना में गहरे बसे हुए हैं। बुद्ध के संदेश के साथ-साथ भारतीय जीवन की आतंरिक लय भी इन देशों में गई और यह लय राम की लीला में बसती थी। परिणाम यह हुआ कि बौद्धानुयायी हों या इसलाम या किसी अन्य मत के अनुयायी यहाँ के लोगों ने अपनी सर्जनात्मक अभिव्यक्ति के लिए रामकथा को अपनाया और इसे साहित्य-संगीत-नृत्य में ढाला और इस तरह अपने समस्त कला और शिल्प में समाविष्ट कराया।

रामकथा की नाट्य प्रस्तुति का एक और रूप है, जो तटवर्ती भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया में प्रचलित है, वह है छाया पुतली नाट्य, आंध्र में थोलु बोमालाटा, कर्नाटक में गोम्बेयाटा, महाराष्ट्र में चर्म बाहुली नाट्य, केरल में थोलापावा कुथू, तमिलनाडु में तोल थोल बोम्मालाटा, उड़ीसा में रावण छाया नाम से प्रसिद्ध छाया पुतली नाटक में सफेद परदे के पीछे से रोशनी करके पुतलियों को संचालित किया जाता है। चमड़े की बनी पुतलियाँ गति पाकर सजीव हो उठती हैं। रामायण-महाभारत की कथाओं के छायापुतली मंचन की कला ने इंडोनेशिया, कंबोडिया, थाईलैंड, मलेशिया के रंगमंच को विश्व प्रसिद्धि प्रदान कराई है। इंडोनेशिया का वायांग और वायांग कुलित, थाईलैंड का नांग याई। कंबोडिया का नांग स्बैक थोम, मलेशिया का वायांग कुलित रात-रात भर चलनेवाली छाया नाट्य प्रस्तुतियाँ होती हैं। पुतलियाँ सुंदर-सुडौल होती हैं और अपने पूरे परिवेश के साथ तराशी गई होती हैं। कथा गायन के साथ उनका संचालक उन्हें जीवंत गति प्रदान करता है।

रामकथा के वैश्विक प्रसार का आधुनिक संदर्भ भारतीय डायस्पोरा और प्रवासी भारतीयों से जुड़ा है। इनमें एक ओर तो ब्रिटिश उपनिवेशों में गिरमिटिया मजदूरों के रूप में गए भारतीय थे, जिन्होंने औपनिवेशिक तंत्र के अत्याचारों के त्रास को झेलते हुए अपनी पीड़ा को कुछ देर के लिए भुलाने का, अपने बिछुड़े घर से, अपने लोगों से जुड़े रहने का सूत्र रामायण  में पाया। वक्त के साथ उनके वंशजों की स्थिति जब सुधरी तो उन्होंने अपनी सांस्कृतिक विरासत की ओर लौटना चाहा तो वे रामायण और रामलीला की ओर आकृष्ट हुए। त्रिनिदाद, टैबगो, मॉरीशस, सूरीनाम आदि देशों में भारतवंशियों ने रामायण केंद्र स्थापित किए हैं, जो रामलीला प्रस्तुति भी करते हैं।

प्रवासी भारतीयों का दूसरा वर्ग है, जो बेहतर रोजगार की तलाश में स्वेच्छा से विदेशों में विशेष रूप से पश्चिम के देशों में जाकर बसा है। यह वर्ग भी अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ा रहना चाहता है, अपनी नई पीढि़यों को उनसे जोड़े रखना चाहता है तो फिर रामकथा उसे आश्रय प्रतीत होती है। आज नई पीढ़ी का रामकथा से संपर्क रामलीला की बजाय तकनीकी दृश्य माध्यमों से अधिक है। तकनीकी माध्यमों की अपनी सीमाएँ हैं। उन्हें देखने से कथा से जुड़ने का आनंद तो पाया जा सकता है, लेकिन अकेले में भोगा जानेवाला आनंद है। तकनीकी माध्यमों पर प्रस्तुत रामलीला में स्थानीयता, सामाजिकता, सामूहिकता, दर्शकों की साझेदारी का वैसा विस्तार नहीं होता, जैसा मंचीय प्रस्तुति और उसकी तैयारी की प्रक्रिया में होता है।

कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि नृत्य, नाट्य और लीला में युगों-युगों से होती चली आ रही रामकथा की सजीव प्रस्तुति ने न केवल जन-मन का रंजन किया है, बल्कि उसकी अनुभूति को, कलात्मक संवेदना को गढ़ा है।

मानविकी विद्यापीठ
इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय,
मैदानगढ़ी, नई दिल्ली-११००६८
—रीतारानी पालीवाल

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