नानी पालखीवाला और उनका अवदान

नानी पालखीवाला का जन्मशती वर्ष चल रहा है। बहुत कम लोग होंगे, जिनको पालखीवाला के विषय में जानकारी होगी। कुछ विधिवेत्ता और संविधान के विद्यार्थी ही उनके संबंध में कुछ जानते होंगे और वह भी इस कारण कि कई अत्यंत महत्त्वपूर्ण शीर्ष संवैधानिक निर्णयों से उनका नाम जुड़ गया है। पूर्व प्र.म. अटलबिहारी वाजपेयी ने उनके निधन पर इन शब्दों में अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि दी थी, ‘‘वे एक महान् भारतीय थे तथा विचारों और आदर्श में विशाल व्यक्तित्व।’’ सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश, जो स्वयं भारतीय संविधान के इतिहास में अमर हो गए हैं और जिनके जीने के अधिकार विषयक फैसले के समय असहमति के निर्णय के कारण मुख्य न्यायाधीश नहीं बनाया गया और उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से इस्तीफा दे दिया था। ऐसे स्व. जस्टिस खन्ना ने उनके संबंध में कहा, ‘‘वकालत के जिस स्तर पर वे पहुँचे, उसकी सुप्रीम कोर्ट में संभवतः ही कभी बराबरी हुई हो। उससे अच्छा स्तर कभी नहीं पहुँचा।’’ जीने के अधिकार (right to Life) के जस्टिस खन्ना के निर्णय को मान्यता देते हुए गत वर्ष शीर्ष न्यायालय की संवैधानिक पीठ ने पुराने फैसले को पूरी तरह निरस्त करते हुए अनेक तर्कों के साथ जस्टिस खन्ना के निर्णय को सही ठहराया। नानी अर्देशिर पालखीवाला का जन्म एक साधारण पारसी परिवार में १६ जनवरी, १९२० को हुआ और निधन ११ दिसंबर, २००२ में। नानी पालखीवाला केवल मात्र विश्वविख्यात विधिवेत्ता ही नहीं थे, वे एक असाधारण और बहुपक्षीय व्यक्तित्व के धनी थे। पालखीवाला अत्यंत मेधावी छात्र के रूप में प्रतिष्ठित हुए, अतएव उस समय उनके शुभचिंतकों ने उनको आई.सी.एस. की परीक्षा में बैठने की राय दी। पालखीवाला ने अपने निश्चय के अनुसार अपने लिए कानून का रास्ता चुना और शीघ्र ही देश के प्रमुख विधिवेत्ताओं की श्रेणी में गिने जाने लगे। अपनी वकालत के साथ बंबई के लॉ कॉलेज में कुछ समय के लिए उन्होंने कानून का अल्पकालिक अध्यापन किया। आज के बहुत से सुप्रसिद्ध कानूनवेत्ता, जैसे फाली नारीमन, सोली सोराबजी, अशोक देसाई आदि लॉ कॉलेज में उनके विद्यार्थी रहे। उनका वार्षिक बजट पर किसी प्रकार के नोट्स के बगैर विश्लेषणात्मक व्याख्यान तो एक कहानी, एक लीजेंड बन गया। किंतु नानी पालखीवाला का व्यक्तित्व और कार्यक्षेत्र न्यायालयों की परिधियों तक सीमित नहीं रहा।

नानी पालखीवाला एक संवेदनशील और समाजोन्मुखी व्यक्ति थे। उन्होंने वकालत में बहुत धनोपार्जन किया। उनके जीवन में लक्ष्मी और सरस्वती का सौहार्द दिखता है, साथ ही पार्वती की परदुखकातरता और कल्याणकारी प्रवृत्ति। पालखीवाला सदैव सोचते रहते थे कि गरीबों का जीवन स्तर कैसे उन्नति करे, किस भाँति उनमें आत्मसम्मान और आत्मनिर्भरता को विकसित किया जाए, कैसे वे अपने पैरों पर स्वयं खडे़ हो सकें और अच्छे नागरिक बन सकें। पालखीवाला मानव गरिमा और मानव श्रेष्ठता के प्रबल समर्थक थे। वे विचार अभिव्यक्ति और वैयक्तिक स्वतंत्रता तथा मानव अधिकारों की रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहते थे। बहुपाठी, अत्यंत पुस्तक-प्रेमी उनका स्नेह युवावर्ग पर था, क्योंकि वही भविष्य निर्माता होता है। अधिकाधिक शिक्षा का प्रसार हो, यह वह चाहते थे, ताकि देश में प्रबुद्ध नागरिकता का उदय हो, उसे प्रोत्साहन मिले और संपूर्ण समाज में उत्तरदायित्व की भावना पैदा हो। पालखीवाला का जीवन आध्यात्मिकता से ओतप्रोत था। उनमें न किसी प्रकार की संकीर्णता थी और न रूढि़वादिता। उनका विश्वास था, पारस्परिक मेल-मिलाप और भाईचारे में सर्वधर्म समभाव एवं सहअस्तित्व के वे अपने जीवन में संवाहक थे। अपने जीवन में नानी पालखीवाला ने अनेक भूमिकाओं का निर्वाह किया। वे अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त विधिवेत्ता, एडवोकेट, उद्योग समूहों के मार्गदर्शक तथा संचालक, प्रभावी एवं आकर्षक वक्ता तथा अमेरिका में भारत के राजदूत के रूप में जाने जाते हैं। हर भूमिका में उन्होंने अपनी श्रेष्ठता, आदर्शवाद, संवेदनशीलता तथा मानवता का परिचय दिया। सक्रिय राजनीति से अपने को अलग रखा। अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी के अनुरोध पर उन्होंने मोरारजी के प्रधानमंत्री काल में भारत का अमेरिका में राजदूत बनना कुछ समय के लिए स्वीकार किया और देश का गौरव बढ़ाया। सिद्धांतवादी ऐसे थे कि इंदिरा गांधी के चुनावी मुकदमे में उनका शीर्ष न्यायालय तक बचाव किया, किंतु उनके द्वारा आपातकाल की घोषणा के बाद बहुत अनुरोध पर भी पैरवी करने से इनकार कर दिया। अटार्नी जनरल, शीर्ष न्यायालय के न्यायाधीश, विधि मंत्री आदि पदों पर जाने में दृढ़ता से अनिच्छा व्यक्त की और इनकार कर दिया।

पालखीवाला शुचिता, सिद्धांतवादिता, न्यायप्रियता तथा विनम्रता और सभ्य व्यवहार की प्रतिमूर्ति थे। आज हर क्षेत्र में मूल्यों, मान्यताओं का पतन होता दिखाई देता है। आज जब नैतिकता की बात नारेबाजी में बदल गई है, प्रश्न उठता है कि एक प्रेरक, एक रोल मॉडल या आदर्श रूप में नई पीढ़ी के लिए किसे इंगित किया जाए, तब ध्यान जाता है नानी पालखीवाला के जीवन और अवदान की ओर। आज के इस भ्रमित और आपाधापी के समय में नानी पालखीवाला का व्यक्तित्व, कार्यशैली, कृतित्व और वैचारिक संपदा एक प्रभावी नैतिक मार्गसूचक, दिशा-निर्देशक की भूमिका संपादित करती है।

कुछ प्रतिष्ठित बुद्धिवादियों, न्यायवेत्ताओं, निवृतमान जजों आदि के सहयोग से पूर्व सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस वेंकटचलैया की अध्यक्षता में एक नानी पालखीवाला की शती भालिभाँति और सार्थक रूप में आयोजित करने के लिए समिति बनी है। दो अच्छे कार्यक्रम हो चुके हैं, एक क्विज (Quiz) का आयोजन, जिसमें देश के ४०-४५ लॉ कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के विद्यार्थियों ने भाग लिया। विषय मुख्यतया संविधान से संबंधित था। विजयी टीम को एक लाख का पुरस्कार प्राप्त हुआ। लोकसभा टी.वी. ने उसका प्रसारण भी किया। एक कार्यक्रम इंडियन लॉ इंस्टीट्यूट, दिल्ली में हुआ। जिसमें शीर्ष न्यायालय के निवर्तमान न्यायाधीश जस्टिस लाकूर ने अपने विचार व्यक्त किए। अध्यक्षता की पूर्व अटार्नी जनरल देसाई ने। सर्वोच्च न्यायालय के सीनियर एडवोकेट और एक्टिविस्ट प्रशांत भूषण ने भी अपने विचार व्यक्त किए। श्रोताओं की अच्छी भागीदारी थी। जनता में पालखीवाला के विषय में देश में अधिक-से-अधिक जानकारी हो सके एक सुंदर सार्थक पुस्तक ‘बेमिसाल पालखीवाला—एक प्रेरणास्रोत’ मेजर जनरल नीलेंद्र कुमार ने लिखी है। वे आर्मी के पूर्व एडवोकेट जनरल हैं। उन्होंने पहले भी पालखीवाला के संबंध में विद्वानों के आलेखों का संपादन किया है। प्रयास होगा कि छोटी सी पुस्तक का अनुवाद देश की कुछ अन्य भाषाओं में भी किया जाए। २९ मार्च के अगले कार्यक्रम के मुख्य अतिथि सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश जस्टिस चंद्रचूड़ का भाषण होगा। डॉ. सिंघवी (सांसद राज्य) सभा और वरिष्ठ अधिवक्ता भी अपने विचार प्रकट करेंगे। माननीय राष्ट्रपति को पालखीवाला के संबंध में और उनके द्वारा रचित साहित्य को भेंट किया जाएगा। अन्य स्थानों पर भी पालखीवाला मेमोरियल भाषण होंगे। सबको संपादित कर एक ग्रंथ का प्रकाशन होगा। समापन समारोह माननीय उपराष्ट्रपति के निवास पर करने का अनुरोध किया गया है, एक स्मरणांजलि का विमोचन भी उसी समय होगा। पालखीवाला के निधन पर डाक टिकट जारी हुआ था, आशा है एक और डाक टिकट शती समारोह के उपलक्ष्य में भी जारी हो जाएगा। सीमित साधनों के होते हुए भी समिति पालखीवाला शती समारोह अच्छे स्तर पर आयोजित करने के लिए कटिबद्ध है। काश, केंद्र सरकार और राज्य सरकारों का समुचित सहयोग भी मिलता!

प्रधानमंत्री मोदी की ‘मन की बात’

फ्रैंकलिन रूजवेल्ट जब अमेरिका के राष्ट्रपति चुने गए, उस समय अमेरिका में तथा बहुत से अन्य देशों में भी निराशा व हताशा का वातावरण फैला हुआ था। यह प्रारंभ था उस आर्थिक अवस्था का, जिसको बाद में The Great Depression का नाम अर्थशास्त्रियों ने दिया। कीमतें गिर रही थीं, खेतीबाड़ी में केवल नुकसान था, उद्योग-धंधे बंद हो रहे थे, अतएव बेरोजगारी बढ़ रही थी, बैंक और व्यापारिक संस्थाएँ फेल हो रही थीं, लोगों के पास पैसा व खाने-पीने की दैनिक आवश्यकताओं का अभाव था। २००८ में लेहमेन ब्रदर्स के इनवेस्टर बैंक भी फेल हो जाने के बाद उसी प्रकार का वातावरण बन रहा था, पर बहुत से कदम उठाए गए, जिसके कारण उसको Recession अथवा कहा गया कि अब वैश्विक आर्थिक व्यवस्था की अवनति की गति थम गई। १९२८-२९ के ग्रेट डिप्रेशन के समय तरह-तरह के विरोधात्मक आंदोलन प्रारंभ हुए, जैसा २००८ में भी हुआ, पर अमेरिकी सरकार के उठाए गए कदमों से पिछली तरह का गिराव नहीं हुआ। १९२८-२९ में भारत भी उस बडे़ गिराव की चपेट में आया था। खेतीबाड़ी और कमजोर आर्थिक तबके के परिवारों को बहुत कष्ट उठाने पडे़। यह बहुत लंबी कहानी है और इस पर बहुत कुछ लिख भी गया है। कीन्सियन इकोनॉमिक्स का एक नया अध्याय ही अर्थशास्त्र के पठन-पाठन में शुरू हुआ। प्रसिद्ध अमेरिकन अर्थशास्त्री जे.के. गैलवेथ की इस विषय पर प्रसिद्ध पुस्तक है। वे जे.एफ.के. केनेडी के राष्ट्रपतित्व काल में भारत में अमेरिकी राजदूत रहे। उन्होंने उसकेअनुभव भी लिखे हैं। इस पूरे इतिहास में जाना न संभव है और न आवश्यक।

फैले हुए नकारात्मक और हतोत्साह के वातावरण में नए चुए गए अमेरिकी राष्ट्रपति रूजवेल्ट ने नैराश्य के वातावरण के निराकरण के लिए अनेक प्रयत्न किए। उन्होंने एक नारा दिया—The greatest fear is the fear itself. जनता में निराशा की मानसिकता और भविष्य के प्रति जो तरह-तरह की आशंकाएँ उठ रही थीं, उनके प्रति आश्वस्त करने की कोशिश की। रेडियो के माध्यम से उन्होंने जनता में भविष्य के बारे में विश्वास निर्मित करने की कोशिश की। जनता को बताया कि राहत के लिए सरकार क्या कर रही है और धीरे-धीरे परिदृश्य बदलेगा। उसको उन्होंने Fireside chats कहा था, मानो घर बैठे हुए अँगीठी में हाथ सेंकते हुए वे परिवार से बातचीत कर रहे हैं।

नरेंद्र मोदी ने २०१४ में प्रधानमंत्री का दायित्व सँभालने के बाद उसी प्रकार रेडिया पर प्रसारित ‘मन की बात’ द्वारा जनता जनार्दन से सीधा संवाद स्थापित करने का प्रयास किया। उनका भी उद्देश्य सर्ववसाधारण में नकारात्मक सोच को छोड़कर सकारात्मक मानसिकता का निर्माण हो और जनता जनार्दन में भविष्य के प्रति आस्था और विश्वास जाग्रत् हो। कैसे इस प्रकार का विचार अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा से वार्त्तालाप के बाद आया, इसकी चर्चा पुस्तक में है। २०१९ के आम चुनाव चूँकि मई तक संपन्न हो जाएँगे, उन्होंने अपने मार्च २०१९ की ‘मन की बात’ में कहा कि अगली बातचीत अब मई के चुनाव के बाद ही होगी। ‘मन की बात’ कार्यक्रम का आरंभ विजयादशमी, अक्तूबर २०१४ से प्रारंभ हुआ। आज रेडियो टेक्नोलॉजी पहले के मुकाबले बहुत अधिक विकसित हो गई है। वे स्वयं टेक्नोलॉजी के अधिक-से-अधिक प्रयोग के प्रबल पक्षधर हैं। ‘मन की बातः एक सामाजिक क्रांति रेडियो पर’ ५० एपीसोड संकलित हैं। इसके पहले संस्करण का विमोचन २६ मई, २०१७ को राष्ट्रपति भवन में हुआ। तत्कालीन राष्ट्रपति श्री प्रणव मुकर्जी को प्रथम पुस्तक भेंट की गई। यह दूसरा संस्करण यूथ केयर डिजिटल फाउंडेशन के सहयोग से प्रसिद्ध प्रकाशक रूपा, दिल्ली ने अभी हाल में प्रकाशित किया है। पुस्तक के दो भाग हैं। प्रारंभ में जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे का संदेश है, जिसमें वे कहते हैं, ‘‘अंतरराष्ट्रीय जगत् के बहुत से नेताओं से मिलने के बाद मैंने पाया कि प्रधानमंत्री मोदी किसी से पीछे नहीं हैं, अपनी सोच में अपने देश के विकास के लिए एक स्ट्रेटेजिक एवं दीर्घकालीन परिप्रेक्ष्य में।’’ प्रथम भाग में किस प्रकार ‘मन की बात’ की कल्पना ने जन्म लिया और उसके पीछे किन विशेष मुद्दों का संबल है, इसकी विवेचना है। हर ‘मन की बात’ की प्रतिक्रिया किस प्रकार की है, इसकी प्रधानमंत्री मोदी के ऑफिस में काफी जाँच-पड़ताल होती है, और उसके आधार पर प्र.म. निश्चित करते हैं कि किन-किन मुद्दों को उठाएँ, किन नीतियों और विचारों व मूलभूत समस्याओं पर अपने विचार प्रकट करें। युवकों को प्रेरणा प्रदान करना एक विशेष मंतव्य है। मन की बात में राजनीति को अलग रखने की चेष्टा है। मन की बात शृंखला का क्या प्रभाव हुआ है, इस पर भी टिप्पणी की गई है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संकलन ५० ‘मन की बात’ में सामयिक समस्याओं और देश की मूलभूत समस्याओं पर अपने विचार प्रकट किए हैं। इन ५० एपिसोड की विविधता आश्चर्यजनक है। कोई भी समाज की समस्या या प्रशासन का पक्ष हो, अपने मन की बात में किसी को भी उन्होंने छोड़ा नहीं है। शिक्षा, विज्ञान, स्वास्थ्य, कृषि की समस्याएँ, त्योहारों का महत्त्व, खेलकूद, वातावरण, खादी स्वच्छता, तिलक का गणेश उत्सव, महापुरुषों का स्मरण, शहीद दिवस, सामाजिक एकता, देश की शक्ति आदि-आदि पर नरेंद्र मोदी ने दिल खोलकर अपने विचार जनता के सम्मुख रखे हैं। नवंबर २०१८ की मन की बात में वे बताते हैं कि क्यों उन्होंने जनसंपर्क के लिए रेडियो का माध्यम चुना, संविधान का सत्तरवाँ वर्ष, गुरु नानक देवजी का ५५०वाँ जन्मदिवस आयोजन आदि में उनके विचार हैं। सुनने से अधिक इनको एक साथ पढ़ने से पता चलता है कि उनके सोचने और उसको प्रकट करने में उनका दिल और दिमाग किस प्रकार क्रियाशील है। जगह-जगह मोदीजी की विचारसरणी से कुछ उदाहरण भी दिए गए हैं। संकलन प्रधानमंत्री के व्यक्तित्व और उनकी एक नए भारत की कैसी अवधारणा है इसका एक जीवंत चित्र रेखांकित करता है। हमारा प्रयास तो सुधी पाठक के संज्ञान में ‘मन की बात’ के इस संकलन को लाना है। भारत के Contemporary अथवा समसामायिक इतिहास के अध्येताओं के लिए यह पुस्तक अत्यावश्यक है। आने वाले वर्षों में भी शोध के लिए इसका उतना ही महत्त्व है। यह संकलन अंगे्रजी में है। हमें आशा है, अन्य भारतीय भाषाओं में भी इसका अनुवाद शीघ्र उपलब्ध हो सकेगा। ऐसे ग्रंथ की उपादेयता को चुनावी माहौल से जोड़ना दूरदृष्टि के अभाव का ही परिचायक होगा। देश की समस्याओं पर समग्रता के साथ चर्चा करना कोई आसान बात नहीं है। प्रकाशक और उनके सहयोगी इस प्रयास के लिए साधुवाद के पात्र हैं। इसको सार्वजनिक पुस्तकालयों और कॉलेजों तथा विश्वविद्यालयों में पहुँचाने की व्यवस्था होनी चाहिए।

क्रांतिकारी शहीदों की अवमानना

डॉ. टी.आर. सरीन, जो भारतीय इतिहास शोध परिषद् (ICHR) के निदेशक रह चुके हैं और उन्होंने भारतीय क्रांतिकारियों की विभिन्न देशों में क्रांतिकारी गतिविधियों पर बहुत सी पुस्तकें लिखी हैं। डॉ. सरीन की पिछले दिनों प्रकाशित एक पुस्तक ‘Studies on Indian Patriotic Exiles and the Nation Movement’ के एक अध्याय में कुछ जानकारी प्राप्त हुई कि पिछली शताब्दी के छठे दशक तक, आजादी प्राप्त होने के बाद भी क्रांतिकारियों के प्रति कैसा उदासीनता और अवमानना का रुख रहा। शायद सरकार जिन शहीदों और स्वतंत्रता संग्राम के भागीदारों को १५ अगस्त, २६ जनवरी को प्रतिवर्ष आदरपूर्वक स्मरण करने का दम भरती है, उसके लिए स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में उन क्रांतिकारियों के लिए, जिन्होंने अपना जीवन स्वराज संग्राम में कुर्बान कर दिया अथवा अंडमान में देश निकाले की यातनाएँ सहीं, कोई स्थान था ही नहीं। यही कारण रहा है कि स्वराज संग्राम संबंधी पुस्तकों में, जो सरकार की ओर से प्रकाशित हुईं, उनकी भूमिका की बहुत कम चर्चा हुई। एक प्रकार से उसको नकारा गया अथवा बहुत गौण माना गया। अपने निजी अनुभव के आधार पर डॉ. सरीन  लिखते हैं, जिसे हम उन्हीं के शब्दों में उद्धृत करना चाहेंगे—In the early sixties, during initial of any research when I submitted extracts from records performing to Indian revolutionaries in London and especially concerning events leading to the assassination of Sir Curzon Wylie ADC of  the India office by Madan Lal Dhingra in 1909, I was dissuaded by the Director of Archives on she basis of instmetars received from the ministry the ministry from  ‘Writing about terrorist activities’ primarily because I am a government servant and “the policy of the Govt. of India is to discouerage unnecessary publicity of terrorist activities.’ It is a result of teis my research in the subject was delayed by a few years. But the justification given in my support by ozc Director defending my interest in the subject is as relevant to today for historical research as it was during the sixties. He wrote to the concerned authorities that “a research scholar who undertakes to work on  a revolutionary incident does not do so with the intention of prompting revolutionary objectives or publicising revolutionary methods. He does so with the legitimate objective of presenting an accurate history of that incident. Mr. sarinis aim is plainly for present an objective account of an historical even which is still insufficiently known and not to publicise terrorist activities. The task , I think, it will be readily admitted was worth under taking particularly, in used of the possible miscancertion on the subject. I think it is not the present Govt’s policy to discourage such research activities as may aim at a correct reconstruction of such phases in our history on which because of the lack of documentary materials we still have hazy or incorrect notions”.

उपरोक्त का संक्षेप में तात्पर्य यह है कि डायरेक्टर ने डॉ. सरीन को कहा कि सरकार की नीति व्यर्थ में आतंकवादियों की गतिविधियों को अधिक प्रचार करने की नहीं है, खासकर जब वे सरकारी नौकर हैं। हम नहीं जानते कि वह कौन निदेशक था, जिसने एक सुविचारित उत्तर मंत्रालय को दिया। पर भला हो उसका कि उसने तर्कपूर्ण शोध का पक्ष सरकार के सामने रखने का साहस दिखाया। मंत्रालय या तो उस समय का शिक्षा और संस्कृति मंत्रालय अथवा गृह मंत्रालय रहा होगा। जो भी हो, यह क्रांतिकारियों के प्रति एक अवमानना की सोच अथवा प्रवृत्ति का ही परिचायक है। डॉ. सरीन को शोधकार्य पूरा करने में कुछ वर्षों का विलंब हो गया। निदेशक ने मंत्रालय को लिखा कि शोधकर्ता की मंशा न क्रांतिकारी उद्देश्यों और न उनकेद्वारा अपनाए साधनों के प्रचार करने की होती है। उसका मंतव्य तो केवल यही होता है कि किसी महत्त्वपूर्ण घटना, जिसके विषय में जानकारी की कमी है अथवा गलत भावनाएँ हैं, उसके बारे में दस्तावेजों और तथ्यों को खोजकर एक सही तथ्यात्मक तसवीर प्रस्तुत करे। ध्यान देने की बात है कि स्वतंत्र भारत में सरफरोशी की तमन्ना रखनेवाले क्रांतिकारियों की गतिविधियों को आतंकी कहा जाए, यह कितना बड़ा अन्याय है। इस विषय में संसद् और उसेबाहर बहुत विरोध हुआ तथा उस समय से क्रांतिकारियों को टेरेरिस्ट कहना बंद हुआ। केवल पुराने विदेशी शासन के समय में सरकारी रिपोर्टों या दस्तावेजों में ही यह शब्द मिलता है। लेकिन पता चलता है कि स्वतंत्रता प्राप्ति का सब श्रेय सरकार अहिंसक आंदोलनों के अनुयायियों को देना चाहती थी। क्या श्रीअरविंद को आतंकवादी कहेंगे? धींगरा प्रकरण में वीर सावरकर की उल्लेखनीय भूमिका थी और उनसे तो कांग्रेस के कुछ कर्णधारों को विशेष चिढ़ थी। भाई परमानंद, लाला हरदयाल, सोहन सिंह माखना आदि गदर आंदोलन के संस्थापकों में से थे। उनका मंतव्य और प्रयास केवल ब्रिटेन की गुलामी से भातर को मुक्त कराना था। जैसा पं. बनारसीदास चतुर्वेदी ने शहीदों का श्राद्ध करने का दायित्व सँभाला। स्वयं खोज की, दूसरों को उनके विषय में लिखने को प्रोत्साहित किया। राम प्रसाद बिस्मिल, चंद्रशेखर आजाद की माताओं को मामूली पेंशन का प्रबंध करवाया। अपने समय में पं. गणेशशंकर विद्यार्थी बहुत कुछ करते रहे। बनारसीदासजी ने स्कूलों और कॉलेजों को भूले-बिसरे क्रांतिकारियों के संबंध में विशेषांक अथवा संस्मरण ग्रंथ प्रकाशित करने के लिए प्रोत्साहित किया। सुधीर विद्यार्थी ने भी कुछ प्रशंसनीय कार्य इस दिशा में करने का प्रयास किया है। हमारा कर्तव्य है कि हम उनको विस्मृत न कर दें, जिनके बलिदान के फलस्वरूप स्वतंत्र भारत के नागरिक कहलाने में गर्व महसूस करते हैं।

२०१९ के आम चुनाव की रणभेरी

वैसे तो पिछले दो-तीन महीनों से भारतीय राजनीति आम चुनाव के दृष्टिकोण से ही प्रेरित है। संसद् और संसद् के बाहर जो गतिविधियाँ हुई हैं, और जो कुछ कहा-सुना गया है, उसके पीछे २०१९ के चुनाव में क्या होगा, यह प्रश्न प्रमुख हो गया था। लेकिन जैसे ही चुनाव आयोग ने तारीखों की घोषणा कर दी, ११ अप्रैल से चुनाव का प्रारंभ है और १९ मई तक समापन हो जाएगा। २३ मई को नतीजे घोषित होंगे और पता चलेगा कि कौन सरकार बनाएगा। चुनाव आयोग ने १० मार्च को लोकसभा की ५४३ सीटों पर सात चरणों में चुनाव होगा। चुनाव की घोषणा के साथ ही चुनाव आचार संहिता तुरंत लागू हो गई है। उसका प्रभाव दिखाई भी पड़ रहा है। अतएव सरकार कोई नीतिगत फैसला नहीं कर सकेगी। मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा ने स्पष्ट किया कि देश के हरेक मतदान केंद्र पर वीवीपेटी युक्त ई.वी.एम. का इस्तेमाल होगा। वैसे ई.वी.एम. द्वारा चुनाव पूर्णतया सुरक्षित है, फिर भी कुछ विरोधी दलों की शिकायतों के कारण और सर्वोच्च न्यायालय के आदेश को देखते हुए यह निर्णय लिया गया है। मुख्य आयुक्त अरोड़ा ने सबसे निवेदन किया कि राष्ट्र की लोकतांत्रिक परंपराओं के अनुसार चुनाव अभियान में राजनैतिक विचारों और बातचीत में उच्च मानकों को बनाए रखना आवश्यक है। आयोग पूरी चेष्टा करेगा कि चुनाव निष्पक्ष हों। तिथियों की घोषणा के साथ ही प्रथम बार कुछ नए कदमों की घोषणा की, जैसे १९५० पर डायल कर मतदाता हर तरह की जानकारी प्राप्त कर सकता है, ई.वी.एम. में हर प्रत्याशी की तसवीर होगी, सोशल मीडिया पर विशेष निगरानी रहेगी, सभी दलों और उम्मीदवारों को सोशल मीडिया के प्रचार की मंजूरी लेनी होगी, ई.वी.एम. की जी.पी.एस. सिस्टम से ट्रैकिंग की जाएगी, पर्यावरण को हानि पहुँचानेवाली सामग्री पर रोक लगाई गई है। चुनाव आयोग ने यह भी बाद को स्पष्ट किया कि दलों और प्रत्याशियों के मैनिफेस्टो पहले आ जाने चाहिए, चुनाव प्रचार स्थगित होने के बाद नहीं।

भारतीय आम चुनाव विश्व का सबसे बड़ा चुनाव होता है। सभी देशों की आँखें इस चुनाव प्रणाली और नतीजों पर लगी हैं। मतदाताओं की संख्या अमेरिका की पूरी जनसंख्या से तिगुनी है। लोकसभा का चुनाव कराना कितना महान् और जटिल कार्य है, उसकी सामग्री एकत्र करना, इतने बड़े देश में भेजना और मतपेटियों और मतदान अधिकारियों की सुरक्षा आदि का, इसका एहसास आसान नहीं है। १७वीं लोकसभा गठन के लिए यह चुनाव है। चुनावी तैयारी की कठिनाइयों के विषय में अभी और कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है।

देश के सामने चुनावी मुद्दे और मसले अनेक हैं। समय-समय पर उनपर चर्चा होती रही। अभी भी दलों के नेता अपने भाषणों में तरह-तरह की बातें कह रहे हैं, आश्वासन दे रहे हैं। उनके मैनिफेस्टो आने के बाद ही हम चर्चा करना चाहेंगे, किंतु सभी राजनैतिक दल फँसे हैं एक दलदल में, जिसको प्रत्याशी नहीं बनाया जाए, वह दूसरे दल का उम्मीदवार बनता है। यह है राजनीति में पार्टी के प्रति वफादारी और प्रतिबद्यता। एक और तसवीर उभर रही है कि हर दल में भाई, बेटा, बेटी को लाने की। अब डाइनेस्टी एक विशद रूप ले रही है। राजनीति एक व्यापार बनती जा रही है, जहाँ बाप के बाद बेटा, बेटी या भाई इत्यादि हकदार होगा, चाहे किसी प्रकार का अनुभव हो या नहीं। राजनीति स्वयं पेशे का रूप धारण कर चुकी है। यह कहाँ तक लोकतंत्र के लिए उचित है, यदि प्रजातंत्रात्मक परंपराओं की बात करते हैं। इसी प्रकार मुद्दों का सवाल है। वे अधिक नकारात्मक प्रक्रियाएँ हैं। राहुल गांधी, कांग्रेस अध्यक्ष तरह-तरह के झुनझुने बजाने के आदी हो गए हैं। जो झुनझुना उनकी टीम ने दिया, वही बजाएँगे। फिलहाल राफेल वाला झुनझुना उनका मनभाया हो गया है, वही हर समय बजा रहे हैं। उसी तरह सत्ता दल में भी बकवास करनेवाले कम नहीं हैं। उस सबके विवेचन में हम नहीं जाना चाहेंगे। जिन बिंदुओं का ऊपर जिक्र किया है, उसके विषय में अगले अंक में अवश्य चर्चा करेंगे।

चुनावी माहौल में कुछ पुस्तकों का हम जिक्र करना चाहेंगे। एक है रुचिर शर्मा की ‘डेमोक्रेसी ऑन द रोड’, जिसमें चुनावी वातावरण, जनता की प्रतिक्रिया समझने के प्रयास में वह २५ साल अलग-अलग राज्यों में जाते हैं, नेताओं के भाषण सुनते हैं, कभी उनसे बात करते हैं, कभी मतदाताओं से। इस दौर में उनके साथ काफी प्रतिष्ठित पत्रकार भी शामिल होते हैं। पुस्तक काफी दिलचस्प है। वाजपेयी से लेकर मोदी तक के अनुभव का निचोड़ है। २०१९ का चुनाव मोदी बनाम राहुल गांधी तथा अन्य हो गया। आलेखों का एक संकलन ‘नए भारत की ओर’, जिसके संपादक हैं हर्षवर्धन त्रिपाठी और शिवानंद द्विवेदी। दूसरी पुस्तक है डॉ. कुलदीप चंद अग्निहोत्री की ‘नरेंद्र मोदी होने का अर्थ’। दोनों पुस्तकें (प्रकाशक प्रभात प्रकाशन) नरेंद्र मोदी के कार्यों और कार्य पद्धति के आकलन में उपयोगी हैं। एक और पुस्तक, जिसे मैं सुधी पाठकों के संज्ञान में लाना चाहूँगा, रूपा दिल्ली से अभी प्रकाशित हुई है। पुस्तक का नाम है ‘व्हेन इंडिया वोट्स’ ‘द डाइनेमिक्स ऑफ सक्सेसफुल इलेक्शन कैंपेनिंग’ यह दो विशेषज्ञों जैश्री जेठवानी और समीर कपूर ने लिखी है। चुनावी कैंपेनिंग के विविध पहलुओं के विषय में अत्यंत सार्थक विश्लेषण है। यह पुस्तक चुनावी कैंपेनिंग के संबंध में एक विशेष उपलब्धि है। यह जनसाधारण और राजनैतिक नेताओं, दोनों के लिए उपयोगी है।

हमारे जागरूक पाठकों ने देखा होगा कि हमारे कार्यालय ने हमारे साथ होली खेली है। चतुर्वेदी से त्रिपाठी बना दिया। नुकसान एक चौथाई ही हुआ। होली में लोग अनेक जीव-जंतुओं की यात्रा निकालते हैं, लोगों को तरह-तरह के नामों से महिमा-मंडित करते हैं। और इस वर्ष तो होली और अप्रैल का पहला दिन नजदीक हैं। यह भूल दोनों का मिला-जुला प्रतिसाद है, जो हमें कार्यालय से मिला है। उसके लिए अनेकानेक धन्यवाद!

(त्रिलोकीनाथ चतुर्वेदी)

हमारे संकलन