सामाजिक मूल्यों के पोषण में लोकगीतों की भूमिका

समाज का साहित्य से अन्योन्याश्रित संबंध है। समाज के उन्नयन व परिपुष्टन में साहित्य सदैव ही अपनी अविस्मरणीय भूमिका निभाता रहा है।

साहित्य के विविध रूपों में ‘लोक साहित्य’ एक प्रमुख व विशिष्ट स्वरूप है। यह जन-मन के हृदय से उद्वेलित उद्गार है। ‘लोक साहित्य’, ‘लोक’ और ‘साहित्य’ के सम्मिलन का स्वरूप है। ‘लोक’ शब्द का अर्थ सामाजिक परिपे्रक्ष्य में अत्यंत व्यापक है। ‘लोक’ शब्द सामाजिक मूल्यों व परंपराओं का संवाहक व संरक्षक होने के साथ-साथ लोक की अनुभूतियों व संवेदनाओं को सहेजनेवाला माना जाता है। हमारी भारतीय संस्कृति व सामाजिक परिवेश ‘लोक’ से जुड़ी है। उसका उद्गम लोक से हुआ है। लोक मन से उद्वेलित उद्गार जब साहित्य का रूप धारण करते हैं, तो वह ‘लोक-साहित्य’ बन जाता है। लोककथाएँ, लोकोक्तियाँ व लोकगीत लोक साहित्य की अमूल्य संपदा हैं।

लोकसाहित्य का सामाजिक मूल्यों के पोषण में सदैव ही अविस्मरणीय योगदान रहा है। लोकसाहित्य के प्राणतत्त्व ‘लोकगीत’ का इस क्षेत्र में विशिष्ट योगदान रहा है।

‘लोकगीत’ मन की भावनाओं को उकेरनेवाली सूक्ष्म, सरल व सहज अभिव्यक्ति है। लोकगीतों की मधुरता मिट्टी के सौंधेपन को जन-मन से जोड़ती है। यह जीवन की मधुर भावना को सरलतम शब्दों में सँजोकर रखनेवाली मधुर झंकार है। इससे हमारा तन-मन भाव-विभोर होकर आप्लावित हो उठता है। लोकगीत साहित्य की वह विधा है, जो हमें हमारे भारतीय पर्व-त्योहारों, लोक-पर्वों, रीति-रिवाजों, परंपराओं, जीवन के विभिन्न संस्कारों व आदर्श जीवन-मूल्यों से परिचित कराते हैं।

छायावाद की आधार-स्तंभ महादेवी वर्मा ने ‘सांध्यगीत’ की भूमिका में लोकगीत को परिभाषित करते हुए लिखा है—

‘‘सुख-दुःख की भावेशमयी अवस्था विशेष को गिने-चुने शब्दों में स्वर साधना के उपयुक्त चित्रण कर देना ही गीत है और इस गीत में जब सहज चेतना जुड़ जाती है, तो वह लोकगीत बन जाता है।’’

हिंदी साहित्य कोश में लोक गीत शब्द को तीन अर्थों में व्यक्त किया गया है—एक, लोक में प्रचलित गीत के रूप में, दूसरा, लोक में निर्मित गीत के रूप में और तीसरा, लोक विषयक गीत। सामान्य तौर पर लोकगीत का तात्पर्य लोक में प्रचलित गीत ही है।

इस प्रकार सामान्य अर्थों में हम कह सकते हैं कि ‘‘लोक के लिए, लोक में प्रचलित, लोक मन के द्वारा सृजित गीत ‘लोकगीत’ कहलाते हैं।’’

लोकगीत में जन-मानस प्रतिबिंबित होता है। इसमें जो स्वर निकलता है, वह गानेवाले के हृदय की आवाज होती है। लोकगीत की एक प्रमुख विशेषता यह है कि गीत लोक द्वारा निर्मित होने पर भी इसे किसी व्यक्ति विशेष से जोड़ा नहीं जाता है और इसके रचयिता का नाम प्रायः अज्ञात रहता है। लोकगीतों में वसुधैव कुटुम्बकम् की धारणा समाहित रहती है—

कुअना खनाये कवन फल हेतु मोरे साहब?

जो पानी भर पनिहारि तवै फल हारै है।

पोखरा खनाये कवन फल हेतु मोरे साहब?

गोवा पिवाइ जुड़ पानी, तबै फल होई है।

अंचल के लोकगीतों में ‘आल्हा’ सम्माननीय, आदर्श व लोक नायक के रूप में माने जाते हैं। लोकगीत में आल्हा सामाजिक मूल्यों के पोषण में एवं राष्ट्रीय चेतना के विकास के संदेशक हैं—

शीष नवाऊँ गुरु अपने कू,

दुर्गाजी में ध्यान लगाय।

आल्हा गाऊँगा आजादी की,

भैया सुन ले कान लगाय।

लोकगीत सामाजिक मूल्यों के पोषण में विशिष्ट भूमिका निभाते हैं। सामाजिक प्रतिष्ठा दिलाने व सामाजिक रिश्तों के सफल निर्वहन में लोकगीत सदैव ही सहायक रहे हैं।

ग्वालियर चंबल अंचल में विभिन्न पर्वों पर समय-समय पर लोक गीत गायन का प्रचलन है। यहाँ अलग-अलग ऋतुओं में अलग-अलग गीत गाए जाते हैं। नव दुर्गा के अवसर पर नौरता, सांझी व थापों को सुना जा सकता है। दीपावली के बाद झिंझिया लेकर महिलाएँ व लड़कियाँ यह गीत गाती हैं—

नाच-नाच रे झेंझरिया, तेरी शादी होनेवाली है।

टेसू मटरूआ आएगा, तेरे गले का हरवा लाएगा

नाच-नाच रे झेंझरिया, तेरी शादी होनेवाली है।

इनके साथ-साथ ही कुछ लड़के-लड़कियाँ टेसू लेकर चलती हैं।  वे टेसू के गीत गाती हैं—

टेसु आया टेसन से, रोटी खाई बेसन से;

पानी पिया कींच का, धर देओ नोट बीस का।

लोकगीत संस्कृति का यथार्थ दस्तावेज हैं। लोकगीतों में राजा और प्रजा के संबंधों का, पिता और पुत्र के कर्तव्यों का, भाई-बहन के प्यार और स्नेह का, विभिन्न देवी-देवताओं के गीत, विभिन्न पर्वों—दशहरा, करवा चौथ, अहोई-आठें, दीपावली, गोवर्धन पूजा, भाई-दौज, देऊठान, कार्तिक मास स्नान, बसंत गीत, होली की टाँगें व मल्हार इत्यादि यहाँ समय-समय पर गाए जाते हैं। इन गीतों में परस्पर प्रेम, स्नेह व सौमनस्यता के भावों का सहज प्रवाह गतिमान रहता है।

विवाह के अवसर पर लोकगीतों की निराली ही छटा सर्वत्र व्याप्त रहती है। विवाह का प्रारंभ लगुन से हो जाता है और वही से शुरू हो जाती है लोकगीतों की निर्झरिणी। तेल व मंडप के समय विवाह के अवसर पर भले ही सभी महिलाएँ आपस में परिचित न हों, परंतु लोकगीत गाते समय उनका आपसी प्रेम व सौहार्द चरम सीमा पर होता है। लोकगीत के माध्यम से हर रिश्ते को खुशी-खुशी निभाने की शिक्षा मिलती है।

लड़कियों को प्रसन्नचित्त रहने की शिक्षा बचपन से ही दी जाती है। विवाह के अवसर पर उसे यह सीख विशेष रूप से दी जाती है कि वह हँसी खुशी से ससुराल में रहे—

हँस-हँस के बोलो प्यारी बन्नी,

हँसी हिरदये में समानी।

हमने बेंदो मँगायो बड़ी दूर से,

हँस-हँस के पहरो प्यारी बन्नी,

हँसी हृदय में समानी।

लोकगीत की पंक्तियों को मौसा, फूफा, मामा, चाचा, जीजू, पापा आदि रिश्तों से जोड़कर पारिवारिक सौमनस्यता के भावों को जाग्रत् किया जाता है। विवाह के अवसर पर घर का पूरा वातावरण हँसी-खुशी का रहता है। हर तरफ लोकमंगलकारी लोकगीत गूँजते हैं। इसी प्रकार बच्चे का जन्म होने पर विभिन्न नेगों को लोकगीत में शामिल कर सामाजिक मूल्यों व परंपराओं का पोषण किया जाता है। चौक पूजन के अवसर पर गाया जानेवाला यह गीत इसी का प्रतीक है—

उतार दइयो गगरी लाला,

देहों नेग तिहारो।

अंचल के लोकगीत सामाजिक जीवन को अपने में समेटे हुए हैं। देश की सांस्कृतिक परंपराओं को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ा रहे हैं। शिक्षा के प्रचार-प्रसार में सहयोगी की भूमिका अदा कर रहे हैं। शिक्षाप्रद लोकगीत बालकों के चरित्र का निर्माण करते हैं। आदर्श लोकगीत सामाजिक नियंत्रण व समाजसुधारक का भी कार्य करते हैं।

इस प्रकार लोकगीत, लोकजीवन की परंपराएँ, प्रथाएँ, रीति-रिवाज, संस्कृति, इतिहास, दर्शन और अध्यात्म को समाहित कर, सामाजिक मूल्यों के पोषण में अपनी अहम भूमिका निभा रहे हैं। लोकगीत का मौखिक व लिखित दोनों रूप सामाजिक संवर्धन व नैतिक मूल्यों की प्रतिष्ठा में प्राणपण संलग्न है। लोकगीत आज हमारे जीवन के अभिन्न अंग हैं। मनुष्य का जन्म के समय गाए जानेवाले सोहर के गीत से उसके जीवन की क्रियाएँ प्रारंभ हो जाती हैं और मृत्युपर्यंत तक वह गीतों के इर्दगिर्द गीतों में ही जीता है। सारे संस्कार लोकगीतों के साथ-साथ चलते हैं। मनुष्य के संपूर्ण जीवन को लोकगीत ही तो आच्छादित किए हुए हैं।

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—मंजु लता आर्य

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