कन्हैया शैली के चितेरे : पं. रामदयाल शर्मा

माँ शारदे के आशीर्वाद से जब किसी लेखक या कवि की प्रज्ञा प्रवाहित होती है तो उसे किसी विशेष योग्यता ग्रहण करने की आवश्यकता नहीं होती है। वह अल्पशिक्षित रहते हुए भी अपनी शैली पर इतनी मजबूत पकड़ बना लेते हैं कि अच्छे-अच्छे साहित्यकारों को सोचने पर मजबूर कर देते हैं।

ऐसे ही लोक-शैली में ‘कन्हैया’ एवं ‘कवित्त’ विधा के रचनाकार पं. रामदयाल शर्मा का जन्म मुरैना जिले की जौरा तहसील के स्यारु गाँव में लगभग ९० वर्ष पहले हुआ था। उस समय उन्होंने पाँचवीं तक ही शिक्षा प्राप्त की थी और खेती-बाड़ी करने में लग गए थे, लेकिन जीवन में हम जीविकोपार्जन का कोई भी कार्य करें, पर अगर हमारे अंदर सृजन एवं चित्रकारिता का बीजारोपण है तो वह बंजरभूमि पर भी लहलहाएगा। यही बीजारोपण पंडितजी के अंदर था। न कहीं शिक्षा, न कहीं प्रशिक्षण, पर आध्यात्मिक देवी-देवताओं से लेकर सामाजिक परिवेश की अद्भुत चित्रकारी में सिद्धहस्त चित्रकार थे। आज भी तमाम ग्रामीण अंचल के मंदिरों में उनके चित्रकला के नमूने देखे जा सकते हैं, तो कहीं-कहीं कवित्त के रूप में उनके लेखन की कला भी प्रदर्शित होती है। भगवान् श्रीकृष्ण की लीलाओं का वर्णन करते हुए उन्होंने गाया—

गिर कूँ उठाय बृज बूढ़त ही बचाय लयो,

अनल ते उबारियो पुनि बालक मझारी को।

गज की अरज सुनि ग्राह से बजाय लयो,

राख्यो नेम धर्म वृत्त पांडव की नारी को।

टूट्यो गज घंटा जल भारई विहंग पर,

राख्यो प्रण भारत में भीष्म ब्रह्मचारी को।

गर्व के अमारी नाथ संत सुखकारी हैं,

मोय तो भरोषो ऐसे बाँके बिहारी को॥

मानव जीवन में राम नाम की महत्ता को प्रदर्शित करते हुए पंडितजी ने वन्यपशु जीवों से नश्वर शरीर की किस प्रकार छंद में तुलना की है—

हाथीनि के दाँतनि के खिलौना बनत भाँति-भाँति,

बाघनि के खाल तपसीनि मन भाइये।

मृगनि की खाल कूँ ओढ़ते जोगी जती,

छेरी की खाल की ढोलक बजाइये।

सांभर की खाल कूँ बाँधते सिपाही लोग,

गेंड़ा की खाल राजा रंक ने सुहाइये।

सु कहत कविदयाल राम नाम के भजन बिना,

जो मानस की खाल कछु काम हूँ ना आइये।

वहीं दूसरी तरफ उन्होंने कन्हैया विधा का लोक-शैली में बखूबी वर्णन करते हुए अंचल के परमहंस संत श्री श्री रविदास महाराज के बारे में एक जगह लिखा—‘‘नीव की जड़ में बनो बैठका, किसी बात को जाय नाय खटका, जाड़ो-सर्दी, वर्षा-गरमी, ये सब हारि-मानि के चली गईं, तब झुकि डंडोति करी ऐ कीरति पारब्रम्ह की हिरदे में रमि गई ऐसे पंचो अंजनी के लाला के घट भीतर सीतारामजी की मूर्ति छिपी ऐ...।’’

ऐसी ही रामायण एवं महाभारत की अनेक लीलाओं का वर्णन उन्होंने अपनी लोकविधा कन्हैया की शैली में किया, जो सामाजिक रूप से चर्चित एवं सराहनीय रहा तथा स्थानीय मेलों में सामूहिक टोली में गाया जाता था।

अंचल में लोक भाषाशैली के ऐसे ही अनेक प्रतिभावान लेखक-कवियों ने जन्म लिया है; लेकिन उनका साहित्य प्रचार-प्रसार एवं प्रकाशन के अभाव में पाठकों तक नहीं पहुँच पाया। इस अनूठे कार्य को अखिल भारतीय साहित्य परिषद् से संबद्ध मध्यभारतीय हिंदी साहित्य सभा, ग्वालियर द्वारा साहित्यकार सम्मेलनों एवं प्रकाशन के माध्यम से पाठकों तक पहुँचाने का अद्वितीय एवं सराहनीय कार्य किया जा रहा है।

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अखिलेश शर्मा ‘अखिल’—

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