अतीत के भूत

अतीत के भूत

वह अपने बँगले के लॉन में बैठे चाय सुड़क रहे हैं। उन्हें याद आ रहा है कि कुछ दिनों पूर्व तक यहाँ भीड़ का ऐसा अंबार रहता कि लॉन के तहस-नहस होने की स्थिति आ जाती। माली अपनी मेहनत के व्यर्थ जाने पर शिकायत करता। सुरक्षाकर्मियों को स्थिति पर नियंत्रण के लिए डंडा फटकारना पड़ता। दफ्तर में बैठे तब के मंत्री अपनी लोकप्रियता पर मन-ही-मन मुसकराते, ‘‘जब जनता की सेवा का व्रत लिया है, तो उसका आना कैसे रुके?’’ वहीं पास खड़े उनके निजी सहायक टिप्पणी करते, ‘‘सर! जनता वहीं जाती है, जहाँ सुनवाई हो। आप सबसे मिलते ही नहीं, उनकी समस्याओं के निदान को प्रयासरत भी हैं, तो लोग क्यों न आए?’’ मंत्री की नजरों में उसने नंबर बढ़वाए, अपनी जुबानी दुम हिलाकर। यह रोज का किस्सा है। सत्ताधारी बहुधा इसी भ्रामक स्थिति में रहने के आदी हो चुके हैं। वह न अपनी आँखों से देख पाते हैं वास्तविकता को, न अपने कानों से सुन पाते हैं सच्चाई को। उनके पास सब सत्ता के सूप से छनकर आता है और अकसर चाटुकारिता के चश्मे के माध्यम से।

तभी तो वाबजूद इस महान् ‘लोकप्रियता’ के उनकी विधायकी चली गई, जमानत जब्त करवा के और वह अपनी जनसेवी छवि के मुगालते में ही गुम रहे। उनकी ख्याति थी कि अपने हर निगम के जरिए उन्होंने चहेतों को नौकरियाँ भी बाँटी हैं। पर रोजगार-विकास भी उनके काम न आया। कहने को वह सबको बताते हैं कि रात-दिन की जनसेवा के बाद उन्हें विश्राम के ये पल रास आए, ‘‘कुछ समय मिल जाता है अपने परिवार के साथ बिताने को, वरना अब तक ऐसी भागदौड़ थी कि अपने बेटे-बिटिया की शक्ल तक भूलने की नौबत दूर न थी।’’ कई पत्रकार साक्षात्कार लेने आए तो उनका हृदय और द्वार दोनों ही खुले हैं। पर पत्रकार भी सत्ता के साथी हैं। उनके पास कभी-कभार कोई समसामयिक घटना पर झाँक लेता है प्रतिक्रिया के लिए। उसी के सदर्भ में छुटभइये उनका इंटरव्यू भी ले लेते हैं। वह अपने सत्ताकाल का ऐसे विश्लेषण करते हैं कि जैसे वह देश के प्रजातांत्रिक इतिहास का स्वर्णयुग रहा हो।

यों वर्तमान सत्ताधारी उनके रामराज्य के भ्रष्टाचार की पोल खोलने में इतने सफल रहे हैं कि सी.बी.आई. ने उनके विरुद्ध एक प्राथमिकी दर्ज कर ली है। जो पहले व्यक्तिगत दोस्ती निभाते थे, सियासी विरोध के बावजूद आज वह जैसे निजी दुश्मनी निकालने पर उतारू हैं। प्रजातंत्र है तो सत्ता का आना-जाना भी लगा रहता है। पर कुछ का मत है कि राजनीति के कई परिवार इस सामंती विचारधारा के हैं कि कुरसी उनके लिए ही बनी है। यदि कोई दूसरा गद्दी पा ले, प्रजातांत्रिक प्रक्रिया के अंतर्गत, तो वह घुसपैठिया है। उसने ऐसी अनधिकृत हरकत कैसे की? वह सजा का पात्र है, इसे भारतीय न्याय व्यवस्था की असफलता ही कहेंगे कि ऐसे बचकर निकल जाते हैं। नहीं तो उनका उचित दंड राजनीति से निष्कासन है। यही उसके साथ उचित न्याय है, वरना सियासी प्रदूषण कैसे कम होगा।

जनता को भरमाने को उनका सार्वजानक इकलौता पावन उद्देश्य भारतीय लोकतंत्र की सुरक्षा है, ऐसे सत्ता की कुरसी से उनका लगाव नहीं है। वह किसी को भी मिले, पर पात्र उचित हो, कोई ऐसा-वैसा चपरकनाती तो न हो। चाय पीते-पीते उन्हें यही खयाल आता है कि उनके बेटे का क्या होगा अपने पिताजी की विरासत उन्होंने ही सँभाली है, वह भी इस कुशलता से कि परिवार का नाम बढ़े। वह तो उनकी भावी योजना पर चुनावी संकट से पानी फिर गया, वरना इस बार बेटे की पारी भी शुरू हो जाती। हर सियासी खानदान की यही आकांक्षा है कि या तो वह सत्ता पाकर प्रजातंत्र को पुख्ता करें, नहीं तो कोई दूसरा राजनैतिक परिवार। वह केवल योग्य बाहरी उम्मीदवारों के विरुद्ध है। वह सत्ता में घुस लिये तो न जाने क्या-क्या अनर्थ न कर बैठे? कहीं विकास-योजनाएँ फलीभूत होकर जन-मानस को आकृष्ट कर बैठीं तो क्या होगा। इसी विपक्ष को टालने के लिए देश के प्रजातांत्रिक परिवारवादी एक हो गए हैं। उन्होंने निश्चय किया है कि कुछ भी हो, इस घुसपैठिए को हटाना ही हटाना है। उन्होंने हमेशा अपने निजी स्वार्थ को देश से बड़ा माना है। उनकी आदत है, देश का नाम लेने की, अपने निजी हित साधन के लिए। सबकी आजकल समान गुहार है। ‘हमको लाओ, देश बचाओ।’ युवा, किसान, अल्पसंख्यक, दलित, पिछडों, वह किन-किन का नाम नहीं ले रहे हैं, अपना अस्तित्व बचाने को?

ये बड़े लोग हैं, इनकी अपनी अखबारों और पत्रकारों की ‘लॉबी’ है। इन्होंने वषों से उन्हें उपकृत किया है, कभी जमीन देकर, कभी मकान। उन्हें आशा है कि सत्ता में परिवारवादी लौटे तो देश का हो न हो, उनका कल्याण निश्चित है। लिहाजा, ऐसे असुविधाजनक प्रश्न कि ‘दशकों तक सत्ता में रहकर आपने क्या किया इन वर्गों के लिए’ पूछे नहीं जाते हैं। अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने की हिमाकत कौन करेगा?

नेता को आर.बी.आई. के अलावा अतीत के अन्य भूत भी सता रहे हैं। जब पास में पैसा और संपर्क हों तथा नामी वकीलों की टोल तो सी.बी.आई. या कोर्ट-कचहरी क्या बिगाड़ लेंगे। वह आश्वस्त हैं कि इनके रहते सी.बी.आई. उनका बाल भी बाँका नहीं कर सकती है। किंतु वह पार्टी के विभीषणों का क्या करें। उनके विरुद्ध सभी ऐसे सक्रिय हैं, जैसे उन्होंने इनका खेत खाया हो। खानदानी पर्टियों में परिवार का मुखिया सर्वेसर्वा होता है। नियमों की खानापूरी और दिखाने को चुनाव प्रक्रिया होती है, पर पारिवारिक प्रमुख ही दल का अध्यक्ष चुना जाता है। वह सिलबिल्ला है तो हो, मानसिक रूप से पिछड़ा है तो हो, इतने सलाहकार हैं तो सँभाल लेंगे, पर खानदानी तो होना ही होना, वरना प्रजातंत्र से परंपरा कैसे जीतेगी? बाबा नाना, बड़नाना सबका योगदान है, इस शानदार परंपरा को बनाने में। उसे कायम रखना हर निष्ठावान खानदान का कर्तव्य है। नमक का हक और कहीं निभे, न निभे, राजनीति में जरूर निभता है। जनता में भी खानदान का सम्मान है, इज्जत है। इन्होंने आजादी दिलाई है। देश के लिए त्याग किया है। बस इस पूँजी का सूद पीढ़ी-दर-पीढ़ी खाती जाती है। कभी परिवर्तन की बयार बहे तो अलग बात है, वरना जनता अपना कर्तव्य जानकर ‘खानदानी’ को जिताती है या उसके प्रत्याशी को। देश की कितनी सेवा की है इस खानदान ने। ‘हम भी वोट देकर आभार व्यक्त कर लें’ की भावना से।

कठिनाई यह है कि हर खानदानी सत्ता कान की कच्ची होती है। शर्मा और उसके समर्थकों ने इसी का लाभ उठाया है। तभी तो आज हारा हुआ नेता परेशान है। पीड़ा व्यक्त करे तो किससे, सभी उसे घेरे हुए हैं, जैसे साँप-बिच्छू चंदन के पेड़ को। इन भुजंगों को उसने ही पाला-पोसा है, कभी ठेके देकर। दूध पिलाया है, कभी उनकी सिफारिश पर नौकरी देकर। अब सब उसकी जड़ खोदने में लगे हैं शर्मा के नेतृत्व में। शर्मा दिल्ली जाकर पारिवारिक आका के कान भरता रहता है। अरे सर! उसका मत पूछिए। सूबे में आपका सबसे बड़ा मौन विरोधी वही है। सार्वजनिक रूप से आपकी प्रशंसा करता है और कानाफूसी कर पार्टी में आपका मजाक उड़ाता है, कभी बुद्धू तो कभी सियासत का बबुआ कहकर। उसकी कही बातें दोहराने में हमें मानसिक ग्लानि होती है। कैसे आपको बताएँ, उसने बबुआ की ऐसी चाबी भरी कि वह हारे नेता के चुनाव क्षेत्र में प्रचार के वास्ते तक नहीं गए। हार के बाद पूरी पार्टी में उसके भविष्य को लेकर संशय हो गया है। प्रजातंत्र के सामंती युग में राजा की नाराजगी दरबारी को भारी पड़नी ही पड़नी है।

जिस समय चुनाव में वह हारा, उसी वर्ष उसके विभाग का मुख्य सचिव भी सेवानिवृत्त हुआ था। सरकारी सिविल सेवाओं में भयंकर पद-काटू प्रतियोगिता है, सेवाकाल के दौरान पर उसके बाद रिश्ते-नाते सामान्य हो जाने की परंपरा भी है। हारी-बीमारी के दौरान अस्पताल में देखने जाना, किसी दैनिक वेतन कर्मचारी या विभागीय कार को घर पर तैनात करना, ऐसी रुटीन बाते हैं, जिन्हें कोई गलत नहीं मानता है। यों सेवानिवृत्त होकर खन्ना साहब की जीवन-शैली में कोई अतर नहीं पड़ा है। सुबह गोल्फ खेलते हैं, शाम को क्लब में नियमित रूप से व्हिस्की पीते-पिलाते हैं। अपने शासकीय जीवन के मनोरंजक किस्से सुनाकर सबके मनोरंजन में उनका सानी नहीं है। उनके खास कृपापात्र हारे हुए मंत्री हैं। ‘‘फाइल पढ़े, न पढ़े पर पैसे कमाने में उसकी बेमिसाल क्षमता है। पाँच वर्षों में पाँच-छह हजार नौकरियाँ दीं। पद सृजित हम करवाते थे, वित्त से पाँच-छह लाख हर नियुक्ति पर वह खाता था अपने जात भाई सेक्शन अफसर से मिलकर। उसूल का पक्का ऐसा भ्रष्ट कम ही होगा। पैसा-वसूली में उसने अपने रिश्तेदारों तक को नहीं बख्शा है। हमने भी धूप में बाल नहीं पकाए हैं। सूचना मिली तो सेक्शन अफसर को बुलाकर ऐसा झाड़ा कि वह हीला-हवाला करते-करते सब कुबूल गया। हमने उससे ही ‘एविडेंस’ लेकर एसी.बी.आई. में शिकायत कर दी है। अब देखें बच्चू कैसे बचते हैं?

वह अपनी बात कहते-कहते व्हिस्की का आधा पैग हलक के नीचे उतार चुके थे कि एक जूनियर ने सवाल उछाला—सर, आपने मंत्री को यह करने कैसे दिया? लिखित टैस्ट भी होता है और इंटरव्यू भी। विभागीय प्रतिनिधि तो आप ही भेजते होंगे साक्षात्कार के लिए। ‘‘यहीं तो सेक्शन ऑफिसर से मंत्री की साठ-गाँठ काम आई। वह न केवल प्रत्याशियों से पैसे वसूलता था, लिखित टैस्ट की कॉपी भी बदलवाता था। पूरी योजनाबद्ध सधी-सधाई साजिश। इतना दिमाग ये लोग देश के विकास में लगाते तो हम आज कहीं-से-कहीं पहुँच चुके होते।’’ उनके एक जूनियर ने सोचा कि विभागीय प्रमुख इन हालात में क्या बैठा मक्खियाँ मार रहा था। पर मुँहफट होने से अधिक लाभप्रद सीनियर द्वारा पिलाई मुफ्त की स्कॉच थी। वह चुप बैठा सिर हिलाता रहा, सीनियर की हर टिप्पणी पर।

सीनियर ने एक और पैग मँगाकर मंत्री-पुराण फिर प्रारंभ किया। ‘‘उसे लिखने-पढ़ने से चिढ़ ही नहीं, नफरत है। फाइल में चिडि़या बिठाना उसका सबसे प्रमुख योगदान है। क्या पता, वह पढ़ा-लिखा है भी कि नहीं, हमें तो लगता, उसने बी.ए. की बिकाऊ डिग्री खरीदी या ‘फोर्ज’ की है। अब आर.बी.आई. ही पता करेगी सच का। ऐसों के चलते ही भारत में प्रजातंत्र बदनाम है। यह प्रजा का ऐसा तंत्र है, जिसका शिक्षा के अभाव और धार्मिक द्वेष के कारण हर कल-पुर्जा ढीला है। काम कोई नहीं देखता है, बस जनता दिखाए सपनों-आश्वासनों पर रीझ जाती है। हर चुनाव में विजय का यही मंत्र है। झूठेश्वर के अनुयायी राजनीति में ऐसे छाए हैं, जैसे बरसात में बिना पानी के बादल। ऐसे धुंध और कुहासे में मूर्ख ही पनपते हैं, जैसे हमारे जातिवादी पैसाखाऊ मंत्री।’’

एक अफसर ने उनकी दुःखती राग पर जैसे हाथ रख दिया, ‘‘सर, आपको तो मुख्य सचिव होना था सूबे का। ग्रेड देकर आप की अनदेखी को सब ही अन्याय मानते हैं।’’

यह सुनकर अवकाश प्राप्त अफसर का नशा हिरन हो गया। उन्होंने सबके लिए फिर स्कॉच मँगवाई और अपनी व्यथा-कथा पर चालू हो लिये। उनके कहने का सार यह था कि हर सरकार लल्लो-चप्पोवाले अधिकारियों को प्रश्रय ही नहीं देती, उनको पद और सम्मान भी देती है। बस हम यही नहीं कर पाए। राज्य सरकार ने एक बार हमें कार्यकुशलता के कारण केंद्र की प्रतिनियुक्ति पर नहीं जाने दिया था। उसी सरकार ने हमें सुपरसीड कैसे कर दिया? हम तो आजतक चकित हैं। मुख्यमंत्री ने बुलाने की कृपा करके हमें निर्णय सुनाया कि ‘‘हम आपके काम से खुश हैं और इसलिए हमने आदेश दिया है कि आपको रेवेन्यू बोर्ड का चेयरमैन बनाया जाए। यह शुभ सूचना देकर उन्होंने हमें विदा कर दिया और हम दफ्तर पहुँचे तो हमारे निजी स्टाफ ने हमारे तबादले की खबर सुनाई। उसके साथ ही अन्य ‘कलीग’ के मुख्य सचिव के पद पर आसीन होने का आदेश भी था। हम कुछ उदास और अन्यमनस्क होकर घर लौट आए, यही होता है, अपना सबकुछ सरकार की सेवा में लुटाने से।’’

पर वास्तविकता में यह नहीं है। जब वह कमिश्नर थे तो एक डी.एम. के साथ उनका ‘मी दू’ का संबंध चर्चित था पूरे सूबे में। वह समझदार थी। शादीशुदा और एक बच्चे की माँ। दोनों योजना बनाकर दौरे के दौरान मिलते। शादी के इतर प्रेम का अलग मजा है, कम-से-कम उन दोनों को ऐसा ही लगता। यह चक्कर डी.एम. के पुत्र जन्म के पहले से चल रहा था। कई जानकारों का मत है कि बेटे की शक्ल कमिशनर साहब से मिलती है। यह सब खन्ना साहब को याद आया, जब मैडम का फोन आया, संवेदना व्यक्त करने को। तब खन्ना साहब ने दिखावा किया, ‘‘अरे यार, तुमसे क्या छिपाना। हमने ही प्रार्थना की थी कि हमें कोई तनाव-रहित काम दिया जाए। इधर हमारी ब्लड शुगर और ब्लड प्रैशर दोनों बढ़े रहते हैं। चलो, कल क्लब आओ खाना खाने। हिमांशु कैसा है?’’ हिमांशु वही पुत्र है, जिसका पिता अफसरों की राय में विवादित है। जबकि उस आकर्षक महिला के पति पहले ही एक दुर्घटना में चल बसे हैं। पर अब प्रेम की पींगे भी नहीं हैं, बस एक मधुर स्मृति है उस समय की।

कहने को भूतमंत्री और अफसर खन्ना शत्रु है, पर ऐसा है नहीं। जीवन नश्वर है। शत्रु-भाव भी सेवाकाल तक है। शायद उसके साथ ही खत्म हो जाता है। अब दोनों जब भी मिलते हैं तो दर्शकों को लगता है कि स्नेह का शहद टपकने ही वाला है। एक-दूसरे को देखते ही झप्पी भरते हैं। बस पप्पी की कसर है। खन्ना को खयाल आता है कि इसी ने उनके विरुद्ध मुख्यमंत्री से जहर उगला होगा, पर इस खन्ना-विरोधी उपक्रम में उनके साथी कश्यप और त्रिवेदी भी तो अवश्य शरीक रहे होंगे। उनमें से त्रिवेदी तो चीफ सेक्रेटरी बन ही गया। भूतपूर्व मंत्री को अपने महत्त्व के बारे में मुगालता रहा होगा। यों उसकी सुनता ही कौन था? सन्नाटा भंग करती जैसे झींगुर की आवाज। पर शहरों की व्यस्तता के शोर में चींटी की चीत्कार पर कोई ध्यान देता है क्या, कौन जाने इसी को अरण्यरुदन कहा जाता है, खन्ना जानते हैं कि मंत्री मूर्ख है और इसी से खुश है। दूसरों को खन्ना की असलियत पता है। उनकी फाइल लटकाने की कला से सब परिचित हैं। उनके डी.एम. प्रेम की भी राज्य-व्यापी ख्याति है। इस परिप्रेक्ष्य में जितना उनको मिल गया, क्या काफी नहीं है। बहुतों का मत है कि जो उन्हें मिला, वह इसके भी योग्य नहीं हैं, वरन् किस्मत के धनी हैं।

क्या यह सच नहीं है कि सबके जीवन मे अतीत के भूत हैं? कुछ का स्मरण सुखदाई है, कुछ का दुःखदाई? मानव जीवन में छोटे-बड़े की समानता है तो कदाचित् यहीं है। अमीर, गरीब, रोजगार, बेरोजगार, छोटा-उम्रदार सबके जीवन का सच क्या अतीत के भूत नहीं हैं? दीगर है कि हम उन्हें कभी-कभी ही याद करते हैं।

९/५, राणा प्रताप मार्ग
लखनऊ-२२६००१
दूरभाष : ९४१५३४८४३८
—गोपाल चतुर्वेदी

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