संत-पाहुने

सज्जन, दयालु एवं परहित स्वभाववाले पिताजी ने गाँव के सबसे पासवाले अपने खेत के एक हिस्से पर एक कुटिया बनवा दी। कभी-कभार साधु लोग वहाँ आकर ठहरने लगे। महात्मा चंचल पुरी काफी समय तक रहे। वे आते-जाते रहते थे, कभी कहीं तो कभी कहीं। कभी एक साल बाद आते, कभी छह माह बाद तो कभी एक माह बाद, परंतु यह निश्चित नहीं था कि वे कब आएँगे या कब जाएँगे।

मेरे उफनते यौवनकाल की सौंदर्यपिपासु आँखें उसके अप्रतिम सौंदर्य को तीन वर्ष की अवस्था में ही भाँप गईं और बडे़ होने की प्रतीक्षा करने लगीं। वह बड़ी क्या हुई कि सौंदर्य पद्मिनी जैसा निखर आया। फिर एक दिन मैंने अधीर होकर अपनी नटखट आदतों का इजहार किया तो उसने न प्रतिकार किया, न स्वीकार। सिलसिला चल निकला। छेड़छाड़ बढ़कर प्रेम-प्रस्ताव की सीमा तक आ पहुँची, जिसमें यौवनसुलभ स्वीकार्यता उस ओर से भी थी। एक दिन साधु की उस कुटिया में रात्रि के तीसरे पहर उससे मिलने की हाँ करा ली। स्वीकारोक्ति हमेशा शब्दों एवं सिर हिलाकर ही व्यक्त होती थी। मैं शाम होते ही रात्रि के तीसरे पहर की प्रतीक्षा अधीर होकर कर रहा था।

उसी शाम महात्मा पुरी ने गाँव आकर कुटिया में प्रवेश किया। योजना अधर में रह गई; पर यह ज्ञान पुष्ट हुआ कि ‘जा दिन संत-पाहुने आवत, ता दिन कोटिक जप-तीरथ ही अपने घर चलि आवत।’ शायद ईश्वर भी मुझसे अभी तक निराश नहीं हुआ था। ऐन वक्त पर एक संत को भेजकर मुझे पतन से बचा लिया। महात्मा पुरी को अगले प्रातः वहाँ देखकर मुझे लगा कि उनके सारे जीवन की तपस्या का पुण्यफल मुझे मिल गया था।

ई-१-५०१, हरिगंगा सोसाइटी
आर.टी.ओ. के पीछे, विश्रांत बाडी
पुणे-६ (महाराष्ट्र)
—कर्नल पी.सी. वशिष्ठ

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