होलिकोत्सव का प्राचीन स्वरूप

होली का त्योहार कितना पुराना है और कब से देश में प्रचलित हुआ है, इसकी खोज के लिए प्राचीन और मध्ययुगीन संस्कृत-साहित्य का अवगाहान जरूरी है। प्राचीन संस्कृत-साहित्य में कहीं भी होली अथवा होलिकोत्सव नाम नहीं मिलते हैं। हाँ, इनमें जो कुछ क्रीड़ाएँ होती हैं और मनोविनोद, राग-रंग आदि होते हैं, उनकी स्पष्ट झलक संस्कृत-साहित्य में मिलती है। इसकी ऐतिहासिकता और प्राचीन परंपरा को जोड़ने के लिए कई प्रकार की कथाएँ प्रचलित हैं।

एक कथा तो इसकी प्राचीनता को सत्ययुग तक ले जाती है। दैत्यराज हिरण्यकशिपु हरिद्रोही था, लेकिन उसका पुत्र प्रह्लाद भगवद्-भक्त था। अतः पिता का पुत्र-द्रोह यहाँ तक बढ़ा कि उसने प्रह्लाद को मारने के लिए हर संभव प्रयत्न किए; लेकिन भगवान् ने सदैव उसकी रक्षा की। अंततोगत्वा हिरण्यकशिपु की बहन होलिका, जो अग्नि से जलती नहीं थी, प्रह्लाद को दग्ध करने के लिए अग्नि में बैठ गई। लेकिन दैवगति से होलिका तो जल गई, पर प्रह्लाद जीवित रह गया। यह घटना संभवतः फाल्गुनी पूर्णिमा को हुई होगी। अतः तभी से होलिकोत्सव इस देश में मनाया जाता रहा है।

दूसरी कथा भी इसी प्रकार वैचित्र्यपूर्ण है। कहते हैं कि ढूँढा नाम की एक राक्षसी थी, जो शिशुओं को पकड़ती और मारकर खा जाती। सारी प्रजा में त्राहि-त्राहि मच गई। उसको पकड़ना और मारना असंभव था। अतः शिशु-त्राण हेतु कुछ उपायों का अवलंबन किया गया। यह कहा गया कि जब वह राक्षसी आए, तो सभी बालक मिलकर शोर करें और हाथों में लकड़ी व झाड़-झंखाड़ लिये रहें, आग जलाएँ, तो वह राक्षसी डर जाएगी और निकट नहीं आएगी। बालकों ने ऐसा ही किया। ढूँढा का भय सदा-सदा के लिए समाप्त हो गया। कहते हैं, तभी से होलिका-दाह की प्रथा चली। जो कुछ भी हो, पर इस प्रकार की कथाओं की शास्त्रीय प्रामाणिकता सिद्ध नहीं होती है।

ऐसा प्रतीत होता है कि मुख्यतः यह त्योहार ब्रजभूमि से शुरू हुआ और लगभग संपूर्ण उत्तर भारत में व्याप्त हो गया। बाद के ग्रंथों में भी होलिका, होलिका-दहन आदि नाम आने लगे और दहन-मुहूर्त का भी निर्णय होने लगा। होलिका संबंधी साहित्य अर्वाचीन ही प्रतीत होता है, क्योंकि प्राचीन और प्रामाणिक स्मृतियों आदि में कहीं भी इसका उल्लेख नहीं है; अतः इसकी प्राचीनता संदिग्ध है। लेकिन राग-रंग के रूप में जो सामूहिक उल्लास मनाया जाता है, उसकी प्राचीनता और प्रामाणिकता भली-भाँति सिद्ध हो जाती है।

प्राचीन भारत में आमोद-प्रमोद के साधनभूत तीन मुख्य त्योहार थे, जिनका उल्लेख ‘कामशास्त्र’ में हुआ है, वे हैं—यक्ष-रात्रि को द्यूत-क्रीड़ा होती थी और यह दीपावली को मनाया जाता था। कौमुदी-जागर आश्विन पूर्णिमा को मनाया जाता था, जिसे ‘शारदपूर्णिमोत्सव’ कह सकते हैं और अंतिम ‘सुवसंतक’ वसंत के आगमन पर संभवतः इसी फाल्गुन मास में मनाया जाता था। इसे ‘मदनोत्सव’ भी कहते हैं। इसमें नृत्य, गीत और वाद्य-यंत्रों का प्रयोग किया जाता था।

संस्कृत-नाटकों में यह मदन-महोत्सव अत्यंत सुंदर ढंग किया गया है। इस प्रसंग में श्रीहर्ष की सुप्रसिद्ध नाटिका ‘रत्नावली’ में मदन-पूजा-महोत्सव का उल्लेख स्पष्टतः किया जा सकता है। सम्राट् श्रीहर्ष के समय में यह मदन-महोत्सव किस प्रकार मनाया जाता था, का वर्णन स्वयं उन्होंने ‘रत्नावली’ नाटिका के दो श्लोकों में किया है। एक में उन्होंने विकीर्ण किए गए केसर के चूर्ण से मंडित कौशांबी का वर्णन किया है, जो सोने के पानी से पुती हुई सी प्रतीत होती है। दूसरे में पिचकारियों से छोडे़ गए जल से सुंदरियों के धुले हुए सिंदूर से सिंदूरवर्ण के किए गए फर्श का वर्णन है। इससे स्पष्ट हो जाता है कि प्राचीन काल में वसंतोत्सव अथवा मदन-महोत्सव में जन-समूह, जो उल्लास-मग्न होता था और तरह-तरह की क्रीड़ाएँ करता था, उसी का यथावत् स्वरूप होलिकोत्सव के रूप में दिखाई पड़ता है।

भवभूति ने अपने ‘मालती-माधव’ नामक नाटक में प्रसंगतः कामदेवायतन और मदन-पूजा का उल्लेख किया है। इससे भी स्पष्ट है कि मदनोत्सव अति प्राचीन काल से मनाया जाता रहा है और उसमें सभी लोग समवेत होकर खुशी मनाते होंगे। ‘धम्मपद की आत्मकथा’ नामक व्याख्या, जो बुद्धघोष द्वारा विरचित है, इसमें ‘बालनक्खत्त’ नामक एक त्योहार का वर्णन है। उसमें वही सबकुछ होता था, जो आजकल होली के दिन होता है। पूर्वोक्त त्योहार में निम्नवर्गीय अशिष्ट लोग आपस में कीचड़ आदि लगाकर अर्धनग्न स्थिति में अपशब्दों की बौछार करते हुए सड़कों पर घूमते थे। अतः इसे होली का पूर्ण रूप कहा जाए तो अत्युक्ति न होगी। ‘कामसूत्र’ के प्रथमाधीकरण के तृतीय अध्याय में काम की उपायभूत जिन चौंसठ कलाओं का उल्लेख है, उसमें एक है—उदकाधान। यह एक प्रकार से जलक्रीड़ा थी, जिसमें हाथ के आघात से अथवा पिचकारी आदि से जल डाला जाता था।

वसंत के आगमन से आबालवृद्ध सभी में नवजीवन का संचार होता है। आम्र-मंजरियों की सुगंध से युक्त पवन, भौंरों का गुंजन, कोकिल-कूजन आदि शृंगार के उद्दीपन विभाव हैं। अतएव कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं होता, जिसमें इस समय कामोद्रेक न हो, इसलिए शृंगार के अधिष्ठाता कामदेव की इस ऋतु में पूजा की जाती थी। काम की देवरूप में प्रतिष्ठा वैदिक काल से चली आई है। ‘अथर्ववेद’ में कामदेव का वही स्वरूप वर्णित है, जिसका दर्शन संस्कृत के काव्य-साहित्य में होता है। यह काम मनुष्यों की कौन कहे, सभी जंगम-जीवों में व्याप्त है। इसलिए इस ऋतु में इसके प्राबल्य के वशीभूत होकर लोग उल्लास मनाते हैं और नाना प्रकार की शृंगारिक चेष्टाएँ करते हैं। इन सब उल्लासपूर्ण क्रीड़ाओं का वर्णन हमारे शृंगार-रस प्रधान नाटकों में मदन-महोत्सव के प्रसंग में विधिवत् हुआ है। शृंगार के उद््दीपन विधाओं का महाकवि कालिदास ने अपने ग्रंथों में बड़ा सुंदर वर्णन किया है।

वस्तुतः प्राचीन काल में मदन-महोत्सव में लोग अपने आनंदोल्लास की विविध क्रीड़ाओं द्वारा व्यक्त करते थे और आज उसी के तत्स्थानीय होलिकोत्सव के द्वारा अपने उल्लसित हृदय को पुलकित करते हैं।

 

प्रस्तुति: नलिनी मिश्र
सरोजिनी निवास,
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—स्व. कमलापति मिश्र

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