पुलवामा के शहीदों को नमन

हम सी.ए.जी. की राफेल और कांग्रेस की प्रतिक्रिया, २०१९ के आम चुनाव में महागठबंधन की संभावनाओं, प्रियंका गांधी की राजनीति में भागीदारी, पाकिस्तान और भारत के संबंध, अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य और ममता आदि पर कुछ टिप्पणियाँ लिखने पर विचार कर रहे थे कि पुलवामा में सी.आर.पी.एफ. के काफिले पर आतंकी हमले में हमारे बयालीस जवान शहीद हो गए। देश की आत्मा आहत है। भारत में सर्वत्र आक्रोश व्याप्त है। जगह-जगह रात्रि में भी संवेदना एवं श्रद्धांजलि स्वरूप मोमबत्तियों के साथ पाकिस्तान के कुकृत्य के विरुद्ध प्रदर्शन हो रहे हैं। जवानों को श्रद्धांजलि देने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री राजनाथ सिंह, रक्षामंत्री, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी उपस्थित थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जोरदार शब्दों में कहा है कि हमारे शहीदों का बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा। न केवल पीडि़त परिवारों को वरन् आम जनता में अत्यंत दुःख है, और माँग है कि पाकिस्तान को सबक सिखाना अब जरूरी हो गया है। प्रधानमंत्री ने कहा है कि सैन्यदलों को परिस्थिति अनुसार कार्य करने की छूट दे दी गई। व्यापार में पाकिस्तान को सबसे नजदीकी दर्जा देने के निर्णय को सरकार ने निरस्त कर दिया है। और क्या-क्या विकल्प हैं और क्या कदम सरकार उठा सकती है, इस पर कैबिनेट की सुरक्षा समिति ने विचार-विमर्श किया। बहुत से निर्णय सार्वजनिक तौर पर घोषित नहीं किए जा सकते हैं। आतंक के विरोध में देश एकजुट है।

प्रधानमंत्री ने जो सर्वदलीय बैठक बुलाई थी, उसने एक स्वर में भारत की अखंडता और एकता बनाए रखने हेतु सब मुख्य दलों ने सुरक्षाबलों के समर्थन में अपनी सहमति व्यक्त की। एक प्रस्ताव में सीमापार से आतंकवादियों को जो सहयोग मिल रहा है, उसकी निंदा की गई। पाकिस्तान ने पुलवामा कांड की जिम्मेदारी से अपना पल्ला झाड़ लिया। पाकिस्तान का विदेश मंत्री कुरैशी कहता है, सबूत दिखाओ। लेकिन आतंकवादी जैश-ए-मोहम्मद ने इस कारनामे का दायित्व लिया है। उसका मुखिया मसूद अजहर है, जो आई.एस.आई. (पाकिस्तानी सैन्य खुफिया) पुलिस के संरक्षण में भावलपुर में अपना मुख्यालय बना रखा है। वह पूरे पाकिस्तान में घूमता रहता है। दिसंबर के महीने में हमले की योजना बनाकर अफगानी मूल के अब्दुल रशीद गाजी को फिदायीन (यानी सुसाइड बॉम्ब) के माध्यम से हमला करवाने के लिए भेजा। वह इसका अनुभवी विशेषज्ञ है। इसी ने एक स्थानीय आतंकी को प्रशिक्षण दिया और वाहन तथा पाकिस्तान से लाई गई विस्फोटक सामग्री उपलब्ध कराई।

ताज्जुब है कि  ७०-७५ ईंटों के वजन का विस्फोटक पदार्थ जगह-जगह नाकाबंदी होने के बाद भी चेकिंग में नहीं पकड़ा गया। पहले जब सुरक्षाबलों का काफिला चलता था, सिविलियन टै्रफिक बंद कर दिया जाता था। मुफ्ती-कांग्रेस की जब सरकार बनी तो जनता की असुविधा की दुहाई देकर इस नियम में परिवर्तन करा दिया। एन.आई.ए. की एक टीम, जो दिल्ली से हादसे की जाँच के लिए भेजी गई, उसने पाया कि श्रीनगर के पास का २५ किलोमीटर का क्षेत्र आतंकवादियों का गढ़ बन गया है और वहाँ करीब दस हमले पहले हो चुके हैं। त्राल के जंगल में अपना केंद्र स्थापित कर गाजी ने न केवल आदिल अहमद दर बल्कि १८ से २३ साल के दूसरे स्थानीय युवकों को आतंकवादी आत्मघाती टे्रनिंग दी है। सरकार का कहना है कि चुन-चुनकर आतंकवादियों को दबोचा जाएगा, कोई छोड़ा नहीं जाएगा। स्थानीय आतंकी को इस विस्फोट के लिए इसलिए चुना, ताकि वह स्थानीय जनता को भड़का सके। विदेश सचिव द्वारा कॉमनवेल्थ के राजदूतों और उच्चायुक्तों को वस्तुस्थिति से अवगत कराने के लिए निमंत्रित किया गया। भारत का प्रयास है कि पाकिस्तान को आतंकवाद के मुद्दे पर डिप्लोमेटिक जगत् में अलग-थलग किया जाए। अमेरिका, इंग्लैंड, फ्रांस, कनाड़ा, ऑस्टे्रलिया, जर्मनी आदि पचास से अधिक देशों ने इस आतंकवादी दुर्घटना की भर्त्सना की है। आवश्यकता है कि आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई में सब देश एकमत हों। चीन ने हमले की निंदा की, पर मसूद अजहर को छोड़ दिया। यह दुमुही नीति है। तीन बार पहले भी चीन मसूद अजहर का बचाव इस प्रकार कर चुका है।

खेद का विषय है कि इस मुद्दे पर ट्वीटर पर कई जगह से लोगों ने भारत विरोधी टिप्पणियाँ की हैं। इस कुत्सित मानसिकता को बदलने की जरूरत है। पुलिस ने संज्ञान लिया है। नवजोत सिंह सिद्धू ने पुनः भारत विरोधी और अपने दोस्त इमरान के बचाव में कहा कि पाँच-सात लोगों के कुकृत्य के लिए पूरे पाकिस्तान को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। इसके विपरीत पंजाब के मुख्यमंत्री अमरेंद्र सिंह ने कहा है कि एक करारा जबाव पाकिस्तान को दिया जाना चाहिए। सिद्धू के बयान से उनके सहयोगी मंत्री भी नाराज हैं। कपिल शर्मा ने अपने शो से उन्हें हटा दिया। बहुतों की माँग है कि उनको पंजाब के मंत्रिमंडल से भी हटा दिया जाए। उधर जम्मू में इस घटना की विकट प्रतिक्रिया हुई है। कानून व्यवस्था को मद्देनजर रखते हुए फौज को मार्चपास्ट करना पड़ा। कई स्थानों में कश्मीरी विद्यार्थी तथा अन्य कश्मीरी रह रहे हैं। उनकी सुरक्षा का इंतजाम सरकारें कर रही हैं। हमें देश में स्थिरता और शांति बनाए रखनी है।

केंद्र सरकार अपने ढंग से पाकिस्तान को उसके कुकृत्य का मजा चखाने के लिए सोच-विचारकर कदम उठाएगी। देश में भारी आक्रोश के बाद भी हमें आंतरिक शांति बनाए रखनी जरूरी है, ताकि अंतरराष्ट्रीय जगत् हमारे स्टैंड का समर्थन करे। पाकिस्तान का विदेश मंत्री उसके आतंकवाद से संबंधित होने के विषय में भारत से सबूत माँगता है, जबकि जैश-ए-मोहम्मद पूरे हमले का उत्तरदायित्व स्वयं ले रहा है, किंतु उसके अनुसार जैश-ए-मोहम्मद का भी उसमें कोई हाथ नहीं है। अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप ने पाकिस्तान को कहा कि वह सब आतंकवादी केंद्रों को समाप्त करे। अमेरिकी नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजर (राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार) हमारे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार को दो बार फोन कर आश्वस्त करते हैं कि अमेरिका भारत के साथ है, और वे यह भी कहते हैं कि भारत को सेल्फ डिफेंस (आत्मसुरक्षा) का अधिकार है। पर कुछ पर्यवेक्षकों की टिप्पणी है कि अमेरिका की तालिबान और अलकायदा से सुलह की बातचीत ने पाकिस्तानी आतंकवादी गुटों का मनोबल बढ़ाने का काम किया है।

ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्डस के ऊपर जो हमला हुआ और १७ गार्डस मारे गए, उसके लिए उसने पाकिस्तान को जिम्मेदार ठहराया है। चेतावनी भी दी है कि ईरान भी उसका बदला लेगा। पाकिस्तान आतंकवाद के संरक्षण का केंद्र बना हुआ है। उसका समुचित संज्ञान अंतरराष्ट्रीय जगत् को लेना होगा। यह चिंता का विषय है कि पाकिस्तान की इमरान सरकार ने २६/११ के षड्यंत्री और लश्करे तैयबा के नंबर दो के सरगना अब्दुल रहमान मक्की को शिक्षा संस्थाओं और कॉलेजों में ‘मोटिवेशनल स्पीकर’ के तौर पर जाने की इजाजत दी है। वहाँ वह जाकर युवा और उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे छात्रों को रैडिकलाइज करने यानी चरमपंथी और अतिरूढि़वादी मानसिकता पैदा करने का भरसक प्रयत्न करेगा। यह भारत के सुरक्षा वातावरण के लिए अति हानिकारक होगा। आगे घटनाक्रम किस प्रकार सामने आता है, उस पर ध्यान रखना है। इस समय हमें सी.आर.पी.एफ. के दुःखी और पीडि़त परिवारों का दुःख बाँटना है, उन्हें सांत्वना देनी है, और विश्वास दिलाना है कि देश शहीदों के बलिदान को कभी विस्मृत नहीं करेगा। हर प्रकार से उनकी सहायता करेगा।

इस शब्दों के साथ हम पुलवामा के शहीदों को पूरी श्रद्धा के साथ स्मरण करते हैं, उनको विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए नमन करते हैं।

चलो महाकुंभ प्रयागराज

कुंभ मेला कब से प्रारंभ हुआ, यह कहना कठिन है। आश्चर्यजनक यह है कि हजारों वर्षों से कुंभ मेले में भक्त लोग ठीक तिथि पर एकत्र होते रहे हैं। उस समय, जब न समाचार-पत्र थे और न संप्रेषण के अन्य साधन, फिर भी देश के हर भाग से आस्थावान हिंदू कुंभ पर्व के पुण्य में भागीदार होने की आकांक्षा में इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में संगम पर पहुँचते ही थे। ऐसी किंवदंती है कि जब समुद्रमंथन में अमृत निकला और उस अमृत-घट को लेकर देवताओं व राक्षसों में विवाद हुआ तथा जहाँ-जहाँ अमृत-कलश से कुछ अमृत-बिंदु गिरे, उन स्थानों पर कुंभ प्रारंभ हुआ। वे चार स्थान हैं—प्रयागराज, उज्जैन, हरिद्वार और नासिक। पर प्रमुखता प्रयाग के कुंभ को मिलती रही है। पाठकों को स्मरण होगा, कुछ वर्ष पहले उज्जैन में महाकुंभ का आयोजन मध्य प्रदेश की तत्कालीन सरकार ने बड़ी शान-शौकत से किया था। आयोजनों का आधुनीकरण हो रहा है, उनमें विविधता आ रही है। वैसे प्राचीन काल से ही कुंभ का मेला भारतीय संस्कृति और एकता का परिचायक रहा है। हर क्षेत्र के, हर भाषा बोलनेवाले, विभिन्न भेषधारी भक्तों का वहाँ मिलन होता है।

जहाँ तक इतिहास का प्रश्न है, तो सबसे पुराना वर्णन चीनी यात्री ह्वेनसांग ने अपनी पुस्तक में अंकित किया है। वह सम्राट् हर्षवर्धन के समय में भारत आया था। उसकी भारत यात्रा के संस्मरणों का यह दिलचस्प अध्याय है। वैसे पुराणों में प्रयागराज के कुंभ के महत्त्व का वर्णन अलग-अलग ढंग से किया गया है। पुण्य का लाभ लेने के लिए लालायित लोग अनादिकाल से यहाँ आते रहे हैं और आज भी वही स्थिति है। कहना चाहिए कि हमारे देश की विविधता और उसमें निहित एकता का यह समर्थ प्रतीक है।

जहाँ अमृत की बूँदें गिरीं, वहाँ बारी-बारी से छह साल के बाद अर्धकुंभ का और बारह साल के बाद पूर्णकुंभ का आयोजन होता है। उत्तर प्रदेश की सरकार ने २०१९ के प्रयागराज के अर्धकुंभ को पूर्णकुंभ के रूप में मनाने का निश्चय किया और उसकी घोषणा की तो इसके लिए विशाल स्तर पर सरकार द्वारा व्यवस्था भी की गई। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इसके लिए साधुवाद के पात्र हैं।

‘चलो कुंभ’ के विज्ञापन विगत महीनों से पूरे देश में देखने को मिल रहे थे। करीब २५०० हेक्टेयर का क्षेत्र मेले के लिए आवंटित किया गया है। सरकारी अनुमान के अनुसार १२ करोड़ तीर्थयात्रियों के आने की संभावना आँकी गई। रेलवे ने भी बहुत सी सुविधाएँ यात्रियों के लिए दीं। ८०० विशेष रेलगाडि़याँ चलाई जा रही हैं। विशाल स्तर पर यात्री-निवास, शौचालयों आदि का प्रबंध किया गया है। लगभग ३२० करोड़ रुपए इस कुंभ पर खर्च हो रहे हैं। माघ मेले में वैसे कल्पवास की परंपरा है। इस समय वहाँ तंबुओं का नया शहर ही खड़ा हो जाता है। इस वर्ष का कुंभ अपने आपमें विशेष है। कुछ तंबुओं में पाँच सितारा होटल की सुविधाएँ दी जा रही हैं। देश-विदेश से आए यात्री इसका उपयोग अपनी इच्छानुसार कर सकते हैं।

प्रायः पूरे विश्व के देशों से पर्यटक इस महत्त्वपूर्ण अवसर को देखने के लिए आए। उनमें कुछ आध्यात्मिक रुचि के तो कुछ केवल पर्यटक रहे। बिजली, सड़कों, पन्टून पुलों का समुचित प्रबंध किया गया है। खानपान की वस्तुओं की विविधता देखी जा सकती है। सफाई, स्वास्थ्य सुविधाओं और सुरक्षा का व्यापक प्रबंध रहा। मेले की धक्कामुक्की में बच्चे और महिलाएँ अपने परिवार या साथियों से बिछुड़ जाते हैं। जब अपनों से संपर्क टूट जाता है तो दोनों ही परेशान और बेचैन होते हैं। भूले-बिसरों को अपनों से पुनः मिलाना कठिन काम होता है। स्वयंसेवी संस्थाएँ और सरकार की ओर से इस दिशा में प्रयत्न होते थे, किंतु इस वर्ष आगंतुकों की बड़ी संख्या में आने की संभावना के कारण और भी विशद व्यवस्था सरकार ने की। राज्य सरकार ने संगम पर एक अत्यंत आधुनिक कुंभ संग्रहालय की स्थापना की, जहाँ प्रयागराज की सांस्कृतिक, धार्मिक और ऐतिहासिक सूचनाएँ डिजिटल स्क्रीन पर दिखाई जा रही हैं। चूँकि यूनेस्को ने कुंभ को विश्व की सांस्कृतिक धरोहरों में शामिल किया, अतएव इसकी भव्यता का सुचारू रूप से प्रदर्शन करना अच्छा रहा। एक ‘कुंभ-गान’ भी तैयार किया गया तथा हिंदी के अतिरिक्त कई अन्य भाषाओं में इसका अनुवाद हुआ।

पता चला कि कुंभ के दौरान अखाड़ों से संबंधित बहुत से साधुओं ने देहदान की एक और परंपरा की शुरुआत की। अखाडे़ के साधु-संत जब स्नान के लिए जाते हैं, तब वह शानदार दृश्य देखने लायक होता है। नागा साधुओं को शाही स्नान में प्रमुखता मिलती है। इस वर्ष के किन्नर अखाडे़ की महामंडलेश्वर भी अपने अनुयायियों के साथ भाग ले रही हैं। राजनेता तथा भारत के वी.आई.पी. और वी.वी.आई.पी. भी संगम पर स्नान के लिए किसी-न-किसी दिन आते रहे। इस वर्ष आम चुनाव के कारण और अधिक भागीदारी की संभावना है। १४-१५ जनवरी, २०१९ मकर संक्रांति के लिए पहला शाही स्नान था। इस दिन करीब दो करोड़ श्रद्धालुओं ने स्नान किया। मौनी अमावस्या ४ फरवरी को दूसरा शाही स्नान था। स्नान का समय शुभ महूर्त के अनुसार निश्चित किया जाता है। १० फरवरी को वसंत पंचमी के दिन तीसरा शाही स्नान था। कुछ अन्य दिवसों की भी अपनी महत्ता है। ४ मार्च महाशिवरात्रि को महाकुंभ का समापन होगा। अनुमान है कि करीब सवा सौ देशों के यात्री महाकुंभ को देखने आए।

प्रयागराज के माघ मेले में काफी भक्त लोग धार्मिक साहित्य खरीदते हैं। कुंभ के समय तो इसमें बहुत बढ़ोतरी हो जाती है। २०१९ के कुंभ में भी पूरे देश के हर प्रकार के संत और साधु उपस्थित हुए। इनके अपने शिविरों में प्रवचन भी होते रहे। वे अपना साहित्य भी उपलब्ध कराते हैं। रामकृष्ण मिशन, चिन्मय मिशन और कुछ बड़ी संस्थाएँ हैं, जिनके शिविर अच्छे स्तर पर लगते हैं। यहाँ भाँति-भाँति के विषयों पर प्रवचन भी होते हैं। इनका साहित्य भी उपलब्ध रहता है और इनकी अच्छी बिक्री होती है। इसके अतिरिक्त यहाँ इसका भी इंतजाम रहता है कि उनके पुराने अनुयायी ठहर सकें। आगंतुकों को भी ये आवश्यकता अनुसार ठहरने की व्यवस्था कर देते हैं, यदि उनकी विश्वसनीयता में कोई संदेह न हो। यही नहीं, वे जनता की सुविधा के लिए आवश्यकता अनुसार सरकारी व्यवस्था में प्रशासन के भी हाथ मजबूत करते हैं, अच्छा सहयोग करते हैं। उनका इस विषय में लंबा व पुराना अनुभव है और वैज्ञानिक रूप से वे इसका उपयोग करते हैं।

पूरा आकलन बाद में ही हो सकेगा। सुरक्षा की कड़ी व्यवस्था है। पहले भीड़भाड़ में कुछ हादसे हो चुके हैं, अतएव यह सब ध्यान में रखा गया। आशा है कि प्रयागराज का महाकुंभ सकुशल समाप्त होगा और तीर्थयात्रियों को इस भव्य आयोजन का लंबे समय तक स्मरण रहेगा। पुराने इलाहाबाद (अब प्रयागराज) का तो जीर्णोद्धार, कायाकल्प हो गया, वहाँ के हवाई अड्डे समेत। हम निरंतर इस मुद्दे को उठाते रहे हैं कि प्रयागराज के हवाई अड्डे को महामना पं. मदनमोहन मालवीय का नाम दिया जाना चाहिए। अपने समय में महामना ने संगम और कुंभ की पवित्रता के संरक्षण के लिए अथक और विधिवत् प्रयास किए।

महाकुंभ के कुछ आलोचक भी हैं। उनका कहना है कि जो धन और शक्ति इसकी व्यवस्था में लगाई जा रही है, उसके उपयोग के लिए अन्य आवश्यक वैकल्पिक विषय भी हैं। यह एक उपयोगितावाद का दृष्टिकोण है। प्रश्न वही है—आस्था एवं परंपरा का, अपने-अपने विचार, अपनी-अपनी पसंद या चयन।

कृषि संकट और वरुण गांधी का मैनीफेस्टो

खेती की समस्या और कृषि का संकट एक महत्त्वपूर्ण विषय है, जिस पर पिछले वर्षों से निरंतर बहस-मुबाहसा चल रहा है। कर्जे से ग्रस्त किसान आत्महत्या करते हैं। कर्जमाफी की माँग कृषि के संकट का स्थायी हल नहीं है। इससे कृषक का सशक्तीकरण नहीं होता है। पिछले दिनों अलग-अलग राज्यों में किसान-आंदोलन हो रहे हैं। करीब १४० किसानों के संगठन एकजुट होकर संसद् भवन के सामने प्रदर्शन के लिए भी आए। यह सब समाचार-पत्रों में सुर्खियों में रहा और टी.वी. पर भी इस विषय को लेकर बराबर बहस होती रही है। कुछ वीभत्स दृश्य भी देखने में आए, जब तमिलनाडु के किसानों का एक दल मरे हुए किसानों की खोपडि़याँ लेकर नंगे बदन प्रदर्शन कर रहा था। कर्जा-माफी की माँग एक राजनैतिक स्टे्रटेजी बन गई है। इससे सरकारी या बैंक के कर्ज के प्रति किसान का रुख कमजोर होता है। वह समझता है कि आगे फिर आंदोलन करेंगे तो फिर कर्ज माफ हो जाएगा। बैंकों की कर्ज देने की व्यवस्था पर भी इसका खराब असर पड़ता है। कर्जामाफी एक राजनैतिक प्रतियोगिता का भाग बन गया है। यदा-कदा संसद् में भी जब इस विषय पर बहस हुई तो उसका राजनीतीकरण ही दिखाई पड़ा।

इस पृष्ठभूमि में फिरोज वरुण गांधी की, लोकसभा में भाजपा के सदस्य हैं, की एक बृहत् पुस्तक ‘अ रूरल मैनीफेस्टो’ देखने को मिली। वरुण गांधी समय-समय पर इस विषय पर पत्र-पत्रिकाओं में लिखते भी रहे हैं। ८२५ पन्ने की पुस्तक का सब-टाइटिल है—‘Realising India’s future through villages.’ पुस्तक दिल्ली के एक बडे़ प्रकाशक ‘रूपा’ द्वारा प्रकाशित है। हम नहीं जानते, कितने राजनेता इतनी बड़ी पुस्तक को धैर्य के साथ पढें़गे। पुस्तक में बहुत से जमीनी सत्य दिखाई पड़ते हैं। वरुण गांधी ने यह पुस्तक अपने सांसद होने के अनुभव के अनुसार लिखी है। उन्होंने बहराइच, बिजनौर, खीरी, प्रतापगढ़, अलीगढ़, सीतापुर आदि जिलों, जहाँ किसानों की आत्महत्या की घटनाएँ हुई हैं, में दौरे करने के बाद लोगों की भावनाओं को समझकर लिखी है। समग्रता के साथ कृषि संकट की समस्या पर वरुण गांधी ने अपने विचार प्रकट किए हैं, जो विचारणीय हैं। हो सकता है कि उनकी सोच और सुझावों से हर व्यक्ति पूरी तरह से सहमत न हो। किंतु यह मानना पडे़गा कि उन्होंने अपने तर्क दिए हैं। पुस्तक के अवलोकन से लेखक की कृषक संकट की समस्याओं के प्रति भावनात्मक सहानुभूति दिखाई देती है। यह एक सामयिक प्रकाशन है। कुछ ही महीनों में आम चुनाव होनेवाले हैं। उसमें भी यह मुद्दा प्रमुखता से उठेगा।

कृषिशास्त्र के विज्ञों द्वारा भी पुस्तक पर विचार-विमर्श होना चाहिए। गाँवों की पूरी आर्थिक व्यवस्था पर विचार-विमर्श होना चाहिए। पिछले बीस-पच्चीस वर्षों में जो कृषि संबंधी नीति बनी थी, वह उदारीकरण के युग में अशक्त हो गई है, वह आज की चुनौतियों का सामना करने में अक्षम है। उन्होंने कृषि और गन्ने की पूरी अर्थव्यवस्था के समुचित विकास के लिए बहुत से सुझाव दिए हैं, जिन पर गंभीरता से विचार होना चाहिए। इस हेतु यह उत्तम होगा कि जो बिंदु वरुण गांधी ने उठाए हैं और जो सुझाव दिए हैं, उनका Executive Summary की तरह चालीस-पचास पन्नों का एक मोनोग्राफ तैयार किया जाए, ताकि सब लोग उन पर विचार कर सकें और राय दे सकें। संक्षिप्त सारांश आसानी से सभी पढ़ सकते हैं। इसके अभाव में डर यही है कि कहीं इतनी बड़ी और महत्त्वपूर्ण पुस्तक केवल शोधकर्ताओं के इस्तेमाल के लिए ही पुस्तकालयों की शोभा बनकर ही न रह जाए। साधारण जनता में भी इस विषय पर वैचारिक आंदोलन की आवश्यकता है। गं्रथ का महत्त्व सामयिक है और दीर्घकालीन भी। अंतिम ग्यारहवाँ अध्याय—‘A way forward’ एक प्रकार से लेखक के अनुसार गाँवों के उन्नयन के लिए संक्षेप में विचारशील सामग्री प्रस्तुत करता है। लेखक फिरोज वरुण गांधी और प्रकाशक रूपा बधाई के पात्र हैं।

सी.बी.आई. व्यर्थ की छीछालेदर

सी.बी.आई. पिछले कई महीनों से एक अशोभनीय विवाद में फँसी है। एक प्रतिनिधि संस्था, जिसने गंभीर अपराधों के इन्वेस्टीगेशन के मामले में देश के लोगों की विश्वसनीयता अर्जित की थी, वह तार-तार होती दिखाई दी। सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन को ग्रहण लग गया है। यह तब से मालूम होने लगा, जब उसके एक पूर्व अध्यक्ष सिंह को यूनियन पब्लिक सर्विस कमीशन से इस्तीफा देना पड़ा। एक आरोपी व्यापारी कुरैशी के साथ उनके व्यापारिक संबंधों के कारण वह छानबीन चल रही है। दूसरे अध्यक्ष रंजीत सिन्हा पर अपने पद के कथित दुरुपयोग के कारण सर्वोच्च न्यायालय के आदेशानुसार प्राथमिकी दायर हो चुकी है और जाँच चल रही है। यह अपने आप में एक अलग दुःखदायी अध्याय है। इसके अतिरिक्त पिछले कुछ महीनों में सी.बी.आई. के अध्यक्ष आलोक वर्मा और उनके उच्चतम सहयोगी अस्थाना के बीच गृहयुद्ध की शुरुआत हो गई। वर्मा ने अस्थाना के विरुद्ध भ्रष्टाचार की जाँच शुरू कर दी, और अस्थाना ने कैबिनेट सेक्रेटरी के पास आलोक वर्मा के विरुद्ध भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचार के मामलों में हस्तक्षेप करने की शिकायत भेजी।

सब प्रकरणों के विस्तार में जाने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि टी.वी और मीडिया में बहुत कुछ आ चुका है और सब सार्वजनिक पटल पर है। सी.बी.आई. के इस पूरे विवाद में सी.बी.सी. भी विवाद में फँस गए। सर्वोच्च न्यायालय का सी.बी.सी. (केंद्रीय सतर्कता आयोग) को आदेश था कि आलोक वर्मा के विरुद्ध जो आरोप हैं, उनकी जाँच शीघ्र हो और उसे न्यायालय के सामने प्रस्तुत किया जाए। जाँच-प्रक्रिया ठीक चल रही है, इसकी देखभाल के लिए सर्वोच्च न्यायालय के एक निवर्तमान न्यायाधीश श्री पटनायक को नियुक्त किया है। जब सी.बी.सी. केंद्रीय सतर्कता आयोग की रिपोर्ट सार्वजनिक हुई तो यथार्थ पटनायक ने कहा कि प्रक्रिया उन्होंने देखी, पर रिपोर्ट उनको नहीं दिखाई गई। अपने में यह विवाद का मुद््दा बना। उच्च अधिकारियों के लिए यह आवश्यक है कि किसी मुद्दे के विषय में जो औपचारिकताएँ वांछित हैं, उनको संपूर्णतया पूरा किया जाए, यदि संस्था को विवाद से दूर रखना है।

सबसे पहले सवाल उठता है कि यह अधिकारियों का विवाद इतने लंबे समय तक सरकार ने चलने क्यों दिया? अच्छा होता, यदि इस विवाद का समाधान, जो भी नियम इस समय हैं, उनके आधार पर शीघ्रता से किया गया होता। यह इसलिए भी आवश्यक था, क्योंकि जैसा समाचार-पत्रों में आया कि आलोक वर्मा और अस्थाना के बीच खुन्नक पहले से थी। आलोक वर्मा को अस्थाना अपने एक वरिष्ठ सहयोगी के रूप में स्वीकार नहीं करना चाहते थे। इसके बावजूद जब अस्थाना को नियुक्त कर दिया गया तो वर्मा को एक भ्रम पैदा हो गया कि अस्थाना सरकार का चहेता है, और यह दोनों मेंविश्वास को और अधिक तीव्र करने में सहायक हो गया। एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप, जो टी.वी. और मीडिया में नित्यप्रति चर्चित होने लगे। जनता भी सोचने लगी कि दो उच्च अधिकारियों की इस वैयक्तिक लड़ाई में सरकार क्यों चुप है, क्यों असहाय है! तरह-तरह की अटकलबाजियाँ शुरू हो गईं। इससे हानि सरकार की हुई और सी.बी.आई. की भी। इतना ही नहीं, सी.बी.आई. के दफ्तर में दो खेमे बन गए—एक आलोक वर्मा का और दूसरा अस्थाना का। दोनों एक-दूसरे पर बंदूक ताने हुए। क्या कोई प्रशासनिक इकाई ऐसी तनातनी की स्थिति में प्रभावकारी हो सकती है?

इसके उपरांत यकायक रात को आलोक वर्मा को हटाकर एक अंतरिम व्यवस्था की, जिसे कांग्रेस और आलोक वर्मा ने सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी। आलोक वर्मा का कहना था कि सरकार की यह काररवाई अवैध है, क्योंकि सी.बी.आई. के डायरेक्टर का पद दो साल के लिए निश्चित कर दिया गया है, और वह दो साल के पहले नहीं हटाया जा सकता। कांग्रेस का तर्क था, यदि किन्हीं अनिवार्य कारणों से ऐसा करना आवश्यक भी है तो भी यह मामला प्रधानमंत्री, विरोधी दल के नेता और सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश या उनके द्वारा दूसरी नामित समिति में जाना चाहिए था। सर्वोच्च न्यायालय ने आलोक वर्मा का स्थानांतरण गैर-कानूनी करार दिया। आलोक वर्मा पुनः अपने पद पर आए। नीचे के अधिकारियों के रद्दो-बदल का सिलसिला शुरू हो गया, किंतु आलोक वर्मा का यह जश्न कुछ ही समय रहा। उपरोक्त समिति की बैठक में सतर्कता आयोग की रिपोर्ट के आधार पर वर्मा के स्थानांतरण की स्वीकृति दे दी। वर्मा को अपने काडर नियंत्रक अथॉरिटी गृह मंत्रालय ने उसी ओहदे के बराबर के एक अन्य पद पर स्थानांतरित कर दिया।

आलोक वर्मा ने गृह मंत्रालय के आदेश की अनदेखी कर दी। उनके सेवानिवृत्ति काल में कुछ समय ही बाकी था, पर उन्होंने सेवाकाल समाप्त होने के पहले इस्तीफे की पेशकश कर रखी थी। गृह मंत्रालय का मत था कि नियमानुसार वे एक दिन के लिए नए पद को सँभाल लें और उसके बाद प्रीमैच्योर रिटायरमेंट पर जा सकते हैं। वर्मा ने ऐसा करने से इनकार कर दिया। गृह मंत्रालय ने उनके विरुद्ध अखिल भारतीय सेवा के नियमों के उल्लंघन का आरोप लगाया है। अब अनुशासन भंग करने के आरोप का उन्हें सामना करना होगा। फिर गडे़ मुर्दे उखाडे़ जाएँगे, आरोपों-प्रत्यारोपों की झड़ी शुरू होगी। अब फिर अतिरिक्त शीर्ष न्यायालय में एक नया नाटक शुरू होगा। वर्मा सरकार के आदेश को चुनौती देंगे। फिर वही सवाल उठता है कि सी.बी.आई. जैसे संवेदनशील इकाई के डायरेक्टर में आत्म-संतुलन नहीं? अनुशासन पालन और शालीनता प्रदर्शन से वे सहानुभूति और प्रशंसा के ही पात्र होते। नुकसान फिर सी.बी.आई. का कि कैसे तुनकमिजाज उच्च पद पर बैठा दिए गए हैं। संस्था केवल हास्य का पात्र बनती है। इसीलिए ऐसी प्रशासनिक इकाई के लिए बहुत ठोक-पीटकर डायरेक्टर का चुनाव होना चाहिए। सी.बी.आई. के सुधार के संबंध में बहुत से सुझाव दिए जा रहे हैं। ऐसी संस्था की आवश्यकता है। जनता की माँग प्रायः उसके द्वारा जाँच की होती है। मजे की बात है, जब एक राजनैतिक दल विरोध पक्ष में होता है, सी.बी.आई. की निंदा करता है, और जब सत्ता में आ जाता है तो उसकी हर काररवाई के औचित्य का समर्थन करता है। इस समय कई राजनेताओं के अथवा उनसे संबंधित व्यक्तियों के संवेदनशील मामले सी.बी.आई. की जाँच में हैं, अतएव यह समय उसके लिए अग्निपरीक्षा का है।

अब इस नाटक का एक और अध्याय देखिए। स्थानापन्न डायरेक्टर ने बहुत अरसे से निलंबित सारदा घोटाले जाँच प्रारंभ करने का निर्णय लिया। कोलकाता के पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार पहले इस मामले की जाँच राज्य स्तर पर कर रहे थे। इस घोटाले का असर पश्चिम बंगाल में ही नहीं, ओडि़शा तथा असम तक है। वहाँ के लोग भी इस चिट फंड घोटाले से पीडि़त हैं। सी.पी.एम. जब सत्ता में थी, तब राजीव कुमार उसके नाक के बाल बन गए थे। सुश्री ममता बनर्जी ने धमकी दी थी कि सत्ता में आने के बाद वे उनको देख लेंगी। राजीव कुमार मेें चाहे जो भी गुण हो, कार्यक्षमता अथवा व्यक्तिगत चातुर्य, वे शीघ्र ही तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के कृपापात्र बन गए। सारदा घोटाला तथा अन्य पोंजी चिट फंड के घोटालों में तृणमूल कांग्रेस के बहुत से नेताओं के नाम आए। पूछताछ के बाद कुछ गिरफ्तारियाँ भी हुईं। कुछ दुःखी लोगों ने सर्वोच्च न्यायालय में गुहार लगाई कि यह मामला सी.बी.आई. को सौंप दिया जाए, ताकि निष्पक्षता से जाँच हो सके।

अपनी जाँच के दौरान सी.बी.आई. को संदेह हुआ कि कुछ महत्त्वपूर्ण दस्तावेज गायब हो गए हैं और जब राज्य सरकार का भ्रष्टाचार-निरोधक दस्ता जाँच कर रहा था, तब कुछ अन्य हेराफेरियाँ हुई हैं। अतएव राजीव कुमार को सी.बी.आई. अधिकारियों ने पूछताछ के लिए कई बार बुलाया, पर वे नहीं आए। सी.बी.आई. की जाँच भी कछुआ चाल से हो रही थी। अखबारों में दो बार समाचार आया कि कोलकाता के पुलिस आयुक्त लापता हैं। राज्य पुलिस ने इसका खंडन किया। समझ में नहीं आता कि सी.बी.आई. ने इस प्रकार की अफवाह क्यों प्रचारित की। राजीव कुमार को आभास हुआ कि शायद सी.बी.आई. पूछताछ के उपरांत उन्हें तुरंत गिरफ्तार कर ले। उन्होंने भी अपने अन्य पुलिस अधिकारियों और मुख्यमंत्री से बातचीत कर अपने बचाव का तानाबाना तैयार कर लिया।

यकायक जब कोलकाता में स्थानीय सी.बी.आई. अधिकारियों का एक दस्ता इतवार की शाम को पुलिस आयुक्त के घर पहुँचा तो पुलिस आयुक्त के सुरक्षा कर्मचारियों ने उनको गिरफ्तार कर जबरदस्ती गाड़ी में बैठाकर हवालात भेज दिया। जब सी.बी.आई. और गृह मंत्रालय ने सरकार और वहाँ के गवर्नर से बातचीत की तो उनको रिहा कर दिया। यह एक अत्यंत अशोभनीय दृश्य था। केंद्र की सी.बी.आई. सर्वोच्च न्यायालय के आदेशानुसार अपने दायित्व को निभाने की कोशिश कर रही थी और राज्य पुलिस उसमें बाधा डाल रही थी। यही नहीं, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इसे संवैधानिक कूप (coup) की संज्ञा दी। कूप से तात्पर्य है असंवैधानिक तरीकेसे सत्ताधारी (पश्चिम बंगाल की सरकार) शक्ति का दुरुपयोग कर अपदस्थ करना, सत्ता से हटाने का प्रयास। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र सरकार को इन्होंने हर तरह से कोसा। वे धरने पर बैठ गईं और उनके साथ उनके मंत्री भी। एक आपराधिक जाँच का भयंकर राजनीतीकरण हो गया। पुलिस आयुक्त डी.जी.पी. और उनके अन्य सहयोगी पुलिसवर्दी में ही उस धरने में शामिल हो गए। उनको पुलिस अनुशासन और अखिल भारतीय सेवाओं के जो नियम हैं, उनकी कोई परवाह नहीं। पुलिस प्रशासन की निष्पक्षता तथा तटस्थता के सिद्धांत की उस दिन धज्जियाँ उड़ गईं।

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्देशित जाँच में, एक दोषी को बचाने की कोशिश में उच्च पुलिस अधिकारियों और राज्य के मुख्यमंत्री तथा राजनीतिक दल के नेताओं के गठबंधन यानी मिलीभगत का अजीब हास्यास्पद नजारा देखने को मिला। जो मोदी सरकार के विरोधी दल हैं, उन्होंने और जहाँ उनकी सरकार है, उन्होंने भी पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी का समर्थन किया। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने तो इसे ‘संविधान बचाओ, लोकतंत्र बचाओ’ का अभियान घोषित कर दिया। उनके कथानुसार यह कॉआपरेटिव फेडेरिज्म पर हमला था। मामला सर्वोच्च न्यायालय में गया और उसने सुविचारित आदेश दिया कि कोलकाता के पुलिस आयुक्त सी.बी.आई. के सामने तुरंत पेश हों, पर उनकी गिरफ्तारी पर रोक लगा दी। अतएव उनकी पूछताछ सी.बी.आई. ने कोलकाता के बाहर शिलाँग में की। उसका क्या नतीजा रहा, यह बाद में पता चलेगा।

हम यह अवश्य कहेंगे कि ममता बनर्जी का यह नाटक और उनका अवांछित धरना अपने में ही संविधान की अवहेलना थी। यह एक विचित्र बात है कि हर दल के नेताओं को शिकायत है कि न्यायालय लक्ष्मण रेखा लाँघ रहा है। लोग अनावश्यक न्यायिक सक्रियता को कोसते हैं, पर अंत में स्वयं उत्तरदायी वे ही हैं, जो अपने अवांछनीय व्यवहार द्वारा ऐसी स्थितियाँ पैदा करते हैं और न्यायालय को हस्तक्षेप करना पड़ता है। यही नहीं, हर छोटे-बड़े मामले में वे स्वयं उससे प्रार्थना करते हैं निर्णय के लिए। आखिर इससे जगहँसाई तो राजनेताओं की ही होती है और होती उन राजनीतिज्ञों के विवेक की, जनता में भी इसका बुरा संदेश जाता है। एक बात और समझ में नहीं आती है कि इस मामले की काररवाई करने की सी.बी.आई. को इतनी जल्दी ही क्या थी कि पुलिस आयुक्त की पूछताछ के मामले में स्थानीय सी.बी.आई. अधिकारी इतवार को पहुँचे, जबकि पूरा मामला अरसे से निलंबित था। सी.बी.आई. के नए डायरेक्टर का चुनाव हो चुका था और यह पता था कि वे शीघ्र अपना दायित्व सँभालने वाले हैं। यह जानते हुए भी कि पश्चिम बंगाल की सरकार केंद्र और सी.बी.आई. की विरोधी है, यह जल्दबाजी उचित नहीं लगती। उच्च अधिकारियों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए धैर्य से संवेदनशील मामले में समझ से कोई कदम उठाएँगे, ताकि और पेचीदगियाँ पैदा न हों। इस प्रकरण में भी सी.बी.आई. की मान्यता और साख को ही धक्का लगा। जनता ने वे तसवीरें देखीं, जहाँ राज्य स्तर की पुलिस द्वारा केंद्र की सी.बी.आई. के अधिकारियों को गिरफ्तार कर धक्के देकर पुलिस वैन में बैठाया जा रहा था। सी.बी.आई. के संस्थागत अस्तित्व पर एक प्रश्नचिह्न खड़ा हो गया।

यह आम धारणा है कि उच्च अधिकारी कानून की परवाह नहीं करते हैं। वे अपने को कानून से ऊपर समझते हैं। इसलिए साधारण जन को प्रसन्नता होती है, जब किसी सत्ताधारी को कानून के उल्लंघन में किसी प्रकार की सजा मिलती है। इस समय सी.बी.आई. के लिए भी कहा जाए तो मुफलिसी में आटा गीला। सी.बी.आई. के एक के बाद एक ऐसे प्रकरण आए कि उसकी गरिमा को धक्का लगा है। अंतरिम निदेशक नागेश्वर राव को सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट रूप से आदेश दिया था कि मुजफ्फरपुर आश्रय गृह के कुकृत्यों की जाँच कर रहे संयुक्त निदेशक ए.के. शर्मा का तबादला सर्वोच्च न्यायालय की अनुमति के बिना नहीं किया जाएगा। किंतु इसकी अनदेखी कर राव ने उनका तबादला कर दिया। स्वाभाविक है कि जनसाधारण में फुसफुसी होने लगी कि बाहरी दबाव के कारण ही ऐसा हुआ है। सर्वोच्च न्यायालय ने इसका संज्ञान कड़ाई से लिया।

अंतरिम रहे सी.बी.आई के संदर्भ में नागेश्वर राव और सी.बी.आई. के विधि परामर्शदाता को सर्वोच्च न्यायालय ने अदालत की अवमानना का नोटिस दिया। अब स्थिति की गंभीरता को समझते हुए तुरंत दोनों ने अपनी गलती मानी और बिना किसी शर्त क्षमा माँग ली। न्यायालय ने इसे पर्याप्त नहीं माना। उसने न केवल दोनों के ऊपर न्यायालय की अवमानना करने के कारण एक-एक लाख का जुर्माना किया, वरन् अदालत के उठने तक एक दिन की कैद की सजा दी। दोनों को शाम तक, जब तक न्यायाधीश वहाँ रहे, अदालत में बैठे रहना पड़ा। बलिहारी सी.बी.आई. के ऐसे विधि परामर्शदाता को, जो शीर्ष न्यायालय के आदेश की अवहेलना की गंभीरता को भी न समझ सका। इस प्रसंग में भी सी.बी.आई. की गरिमा और क्षमता दोनों को एक और धक्का लगा। पर न्यायालय का यह संदेश सबके लिए भी है।

देश में लोकतंत्र की नींव विधि पर आधारित है, इसको व्यावहारिक ढंग से समझने के लिए यह आदेश देना पड़ा। यह पूरे प्रशासन के लिए एक संदेश है। मनमानी नहीं चलेगी, कानून के अनुसार कार्य करना होगा। कानूनी आदेश की अवहेलना नहीं होनी चाहिए। लोकतंत्र विधि का शासन है, व्यक्ति का नहीं। यह शिक्षा सबको शीर्ष न्यायालय ने दी है। अन्य लोकतांत्रिक देशों में सत्ताधारी यह समझते हैं, किंतु भारत में विधि न्याय की महत्ता की समझदारी सबको हो जाए, शीर्ष न्यायालय को यह कदम उठाना पड़ा। किंतु इस फजीहत से सी.बी.आई. की गरिमा और कद को एक और धक्का ही लगा है। सी.बी.आई. के लिए यह पाठ बहुत महँगा रहा। अब चाहे नौकरशाह हो और चाहे राजनेता, शीर्ष न्यायालय के आदेशों की ही नहीं, उसकी टिप्पणियों के पीछे के मंतव्य का भी ध्यान रखना होगा। दूसरे देशों के बहुत से उदाहरण हैं। हम केवल एक की चर्चा करना चाहेंगे, इंग्लैंड में पिछले दिनों क्या हुआ। महारानी एलीजाबेथ के पति ने स्कॉटलैंड में गाड़ी चलाते समय किसी को टक्कर मार दी। स्वयं को भी कुछ चोट लगी। मजिस्टे्रट की अदालत में जाना पड़ा। जुर्माना अदा करना पड़ा। मजिस्टे्रट ने उन्हें सावधानी बरतने की सलाह दी। प्रिंस फिलिप ने अब अपना ड्राइविंग लाइसेंस भी वापस कर दिया। यहाँ एक अदना अधिकारी या राजनेता का बेटा पुलिस के रोकने पर कहता है, ‘जानते नहीं हो, मैं कौन हूँ?’

(त्रिलोकीनाथ त्रिपाठी)

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