गुजरात-दर्शन

गुजरात-दर्शन

बात वर्ष २०१२ की है, हमारे पुत्र प्रभात का स्थानांतरण देश की राजधानी दिल्ली के लिए हो गया। इससे पूर्व दो सप्ताह के प्रशिक्षण पर पुणे (महाराष्ट्र) भी जाना था। जब वहाँ से वापस आया तो बताया कि मैं जामनगर (गुजरात) भी गया था। वहाँ खीजड़ा मंदिर में ठहराया गया। जामनगर का वह मंदिर हम सबेलिए आस्था का केंद्र है, क्योंकि वह स्थल प्रणामी धर्म के संस्थापक श्री देवचंद्रजी का लीलाधाम है। यह बात अलग है कि उस समय मंदिर का स्वरूप वर्तमान जैसा न था। मैं भी गत कई वर्षों से वहाँ नहीं गई थी, इसलिए मैंने भी जामनगर जाने की अपनी इच्छा व्यक्त की तो बेटेजी ने हमारा (मेरा और अपने पापा) का आरक्षण करवा दिया।

आरक्षण प्रतीक्षा सूची में हुआ, लेकिन जाने की तिथि तक कॉन्फर्म हो जाने से यात्रा का उत्साह दोगुना हो गया। नियत तिथि पर हम अंबाला पहुँच गए, क्योंकि ट्रेन वहीं से मिलनी थी। निश्चित समय पर टे्रन अंबाला प्लेटफॉर्म पर आ गई; हम भी अपने आरक्षित डब्बे में चढ़ गए। पहले से पसरे हुए यात्रियों से अपनी बर्थ खाली करने का विनम्र निवेदन किया। जैसे ही उन लोगों ने स्थान रिक्त किया, हम दोनों भी अपनी-अपनी बर्थ पर टिक गए। इधर गाड़ी ने भी खिसकना आरंभ किया।

दिन भर की भाग-दौड़ की थकान मिटाने के प्रयास में हम भी लेट गए। धीरे-धीरे रात्रि भोजन का समय हो चला। हमने वह भी संपन्न किया, पुनः विश्राम व शयन। अचानक आँख खुली तो गाड़ी दिल्ली जंक्शन पर विश्राम कर रही थी, उस समय रात्रि के साढ़े ग्यारह बजे थे। थोडे़ ठहराव के बाद गाड़ी पुनः अपने पथ पर अग्रसर हो गई, हमने भी पुनः सो जाना ही उचित समझा, क्योंकि रात्रि के अंधकार ने बाह्य दृश्यों को अदृश्य कर दिया था। अगली प्रातः जब जगे तो गाड़ी नागदा व रतलाम स्टेशनों को पार करती हुई मेघनगर पहुँची, जो किन्हीं धर्मावलंबियों का आस्थ-केंद्र जान पड़ता था। समय था प्रातः साढे़ नौ बजे का।

भैरवगढ़ व गोधरा जैसे गुजरात के स्टेशनों को पार करते हुए गाड़ी मध्याह्न साढे़ बारह बजे तक वडोदरा पहुँच गई, यहीं से गाड़ी ने यू-टर्न लिया, साथ ही अनेक यात्रियों को विदाई दी और बढ़ चली अपने अगले पड़ाव की ओर। कई छोटे-बडे़ स्टेशनों को पार करने के बाद साबरमती नदी के दर्शन हुए, जिसके तट पर बसा है साबरमती शहर, जहाँ पहुँचते ही ‘साबरमती के संत’ बापू की याद ताजा हो गई।

इसके बाद सुरेंद्रनगर, बाँकानेर जैसे स्टेशनों से होती हुई सायंकाल ७:१५ पर राजकोट पहुँच गई, जिसने फिर राष्ट्रपिता गांधी की याद दिला दी। सच तो यह है कि बापू की याद विस्मृत ही कहाँ हुई थी। हमने स्वयं को धन्य माना कि ‘बापू’ जैसे दिव्यात्मा से जुडे़ स्थलों के दर्शनों का सौभाग्य अनायास ही मिल गया।

अन्य कई बडे़ स्टेशन ‘जामवणथली’ व ‘हापा’ आए-गए, अब यहाँ से १४-१५ किलोमीटर आगे बढे़ कि गाड़ी का अंतिम पड़ाव व हमारा गंतव्य—जामनगर आ पहुँचे। समय था रात्रि के सवा नौ बजे का। हम भी शीघ्रता से उतरे और एक ऑटो लेकर ‘खीजड़ा मंदिर’ की ओर चल दिए। यहाँ यह मंदिर इतना परिचित है कि ऑटोवाले ने दुबारा नहीं पूछा और बीस मिनट में हमें मंदिर के मुख्य द्वार पर पहुँचा दिया। हम भी उसका भाड़ा देकर मंदिर में प्रवेश कर गए। कार्यालय में अपना पंजीकरण करा बत्तीस नंबर कक्ष की चाबी लेकर ऊपर जाने लगे तो भंडारीजी ने पहले भोजन करने का आग्रह किया। थोड़ा सा भोजन लेकर हम अपने कक्ष में पहुँचे।

अगली प्रातः समय से जागकर, नित्य-क्रियाओं से निवृत्ति लेकर प्रातःकालीन मंगला आरती में जाकर श्रीराजश्यामाजी के दर्शन-प्रणाम किया। मंदिर की एक परिक्रमा की, खीजड़ा वृक्षों के दर्शन किए। प्रसाद ग्रहण किया। असल में इस मंदिर का नाम इन्हीं दो वृक्षों के नाम से विख्यात है, क्योंकि यह वृक्ष सर्वत्र नहीं पाया जाता। इसकी पावनता का प्रमाण यह भी है कि इसे दूध से सींचा जाता है।

आज जामनगर के अन्य मंदिर देखने की चाह से चल पडे़। थोड़ी ही देर में हम चाकला मंदिर पहुँच गए, किंतु अभी इसके दर्शन का समय नहीं हुआ था, इधर इन्हें एक मिनट का भी समय व्यर्थ गँवाना अंगीकार न था। वहाँ से बैरंग वापस आते हुए द्वारकाजी जानेवाली बस पर आ गए। मैंने कहा कि मेरे पास तो पर्स के अतिरिक्त कुछ नहीं है। मेरी बात पर ध्यान न देते हुए हम दोनों बस में सवार हो गए। बस तुरंत ही चल पड़ी, हमने भी खिड़की से बाह्य के दृश्यों का आनंद उठाना शुरू किया। सड़कें साफ-सुथरी, चौड़ी-चौड़ी, लगभग ८-९ इंच की पट्टी से विभाजित, जिस पर खिले हुए तरह-तरह के सुमन अपना सौरभ व सौंदर्य बिखेर रहे थे। हमारा मन-मयूर तो प्रसन्नता से नर्तन करने लगा। कब खंभालिया आ गया, पता ही नहीं चला। एक छोटा किंतु सुंदर सा नगर, जहाँ नित्य की सवारी, सरकारी कर्मचारी व निजी संस्थानों में कार्यरत लोग आते-जाते हैं। यहाँ भी पथ पर पुष्पित पुष्पों ने पथिकों को लुभाने में किसी तरह की कोताही नहीं की। ऐसे ही बाह्य-दृश्यों के सौंदर्य में खोए कुछ विशिष्ट यात्रियों को देखते-सुनते हम साढे़ ग्यारह बजे द्वारकाजी पहुँच गए।

बस ने भी हमें द्वारकाधीश मंदिर के पास ही उतारा, जिससे शीघ्र ही हम आगे बढ़कर दर्शनार्थियों की पंक्ति में जा खडे़ हुए। थोड़ी देर की प्रतीक्षा के बाद ही हमें द्वारकाधीश के दर्शन हो गए। गर्भगृह के मध्य में सिंहासन पर तीन फीट ऊँची प्रतिमा विराजमान थी, इसके दर्शन होने से आने की सार्थकता लगने लगी। जीवन धन्य हुआ। मंदिर भव्य, आलीशान, लकड़ी व लौहधातु के प्रयोग से सर्वथा विरत है। स्थापत्य कला की दृष्टि से विभिन्न शिल्प-शैलियों का अद्भुत संगम यह समग्र निज मंदिर ७२ स्तंभों पर खड़ा समय व प्रकृति की हर आपदा का सामना करता, सीना ताने अरब सागर के गोमती घाट पर विराज रहा है। एक ओर पथ है तो दूसरी ओर सागर लहरा रहा है। दोनों के मध्य स्थापित इस द्वारकाधीश भवन को देखते व उसके वैभव व उदारता में खोए हम अचानक मार्तंड के प्रचंड प्रताप की अनुभूति करने लगे, इसलिए वापसी की ओर कदम बढ़ाए और आ गए ‘स्वामिनारायण’ मंदिर। यह भी विशाल व भव्य, विस्तृत परिसर का स्वामी। कुछ देर यहीं विश्राम किया। अंदर की दीवारों की शिल्प देखते ही बनती थी। यों तो यहाँ एक नहीं, अनेक मंदिर हैं, और भी बहुत कुछ, क्योंकि यह उस लीलाधर की लीलाधरा है, जहाँ का कण-कण उसकी अनुभूति कराता है। एक बार जो वहाँ पहुँच गया, उसका वहाँ से आने का मन नहीं करता, लेकिन हाय री विवशता! बहुत कुछ को समेट लेने पर भी आना तो है ही और चल पडे़ सोमनाथ जाने का विचार बनाकर।

सोमनाथ जाने की ‘बस’ के लिए ‘द्वारका’ की अनेक गलियाँ व बाजार घूमे। तीन बत्ती चौक से सोमनाथ जाने के लिए हमारा टिकट बुक हो गया। बस के प्रस्थान का समय था अपराह्न साढे़ तीन बजे। हम बस में बैठ गए और तत्काल बस ने चलना आरंभ कर दिया। थोड़ी ही दूरी पर जाकर बस रुकी, यहाँ था—गोमती बीच, जहाँ गंगा का ‘गोमती’ नाम से अलंकरण हुआ। दस मिनट गंगा-बनाम गोमती की दिव्यधारा के दर्शन किए, लगा जैसे तन-मन गोमती के जल की भाँति पावन हो गए और माँ गंगा अपने भक्तों को अपने दर्शन से धन्य कर रही हैं, जैसा कि मैंने पहले भी उल्लेख किया है कि यों तो द्वारकाधीश मंदिर भी गोमती घाट पर ही स्थित है। पुनः बस ने गति पकड़ी और पहुँच गई—‘मूल द्वारका’, यहाँ बस को पंद्रह मिनट का ठहराव दिया गया।

यहाँ एक प्राचीन व विशाल मंदिर है, लेकिन शिल्प की दृष्टि से सामान्य ही कहा जाएगा। बस पुनः गतिमान हुई और हरसत एक सामान्य सा नगर, तत्पश्चात् पोरबंदर पूज्य बापू की जन्मस्थली के दर्शन हुए। शहर बड़ा व सुंदर था। काफी दूर तक बस ने शहर के विहंगम दृश्य के दर्शन कराए। अंत में कुछ अन्य छोटे-छोटे स्थानों को पार करते हुए बस रात्रि में साढे़ नौ बजे अपने लक्ष्य पर पहुँच गई। सभी यात्री उतरे व सोमनाथ ट्रस्ट के यात्री-निवास में सामान्य मूल्य पर बसेरा किया।

अगली प्रातः नित्य-क्रियाओं से निवृत्ति ले हम कक्ष की चाबी कार्यालय में जमाकर ‘सोमनाथ’ दर्शन के लिए चल पडे़। चूँकि हमारे पास सामान के नाम पर पर्स भर था, इसलिए कहीं भी जाने में कोई बाधा न थी। पहले एक चाय की दुकान पर थोड़ा दूध व चाय लेकर चल पडे़ संगम देखने, जहाँ कपिला, हिरण्मयी व सरस्वती—तीनों का मिलन होता है। इसके बाद गीता मंदिर के दर्शन किए। मंदिर सचमुच दर्शनीय, भव्य, प्राचीन व आकर्षक था। अंदर से दीवारों को अठारह स्तंभों में विभाजित कर प्रत्येक पर गीता का एक-एक अध्याय लिखा गया था, जिससे वह और भी प्रभावी व मनमोहक हो गया था, साथ ही शिवजी, गणेशजी, रामजी एवं अन्य देवों के देवालय थोड़ी-थोड़ी दूरी पर स्थित थे। श्रद्धाभाव से देखे जाने पर सभी राममय करने में सक्षम जान पड़ते थे।

अब सोमनाथ मंदिर जाने का समय हो गया था, सो चल पडे़ उसे देखने, जिसके विषय में कहा जाता है कि महमूद गजनवी जैसे लुटेरों ने उसे १७ बार लूटा। यह इस बात का भी प्रमाण है कि हमारा देश न केवल धर्म-परायण था, अपितु अन्न-धन के क्षेत्र में भी वैभवशाली था। तभी कहा जाता था कि यहाँ दूध-दही की नदियाँ बहती थीं। हमारी संस्कृति भी महान् है। इसीलिए यहाँ लुटेरे, आक्रांता आए और श्रद्धालु पर्यटक भी। सोमनाथजी आज भी स्वर्ण-पत्तर से मंडित है। मंदिर का परिसर अत्यंत विशाल है।

आगे का मंडप रजत-पत्तर से राजित है। मंदिर के चारों ओर उद्यान, परिसर में द्वादश लिंगों के कलेवर शोभित, कृष्ण के विभिन्न रूपों के विग्रह, रामेश्वरम् व केदारनाथ आदि मूर्तिमान हैं। इन विग्रहों के सामने के द्वार से लहराता सागर दृश्यमान है। इसलिए इस ओर अनेक पाषाणखंड डालकर जलोर्मियों को मंदिर की दीवारों को स्पर्श न करने का शाही फरमान सुनाया जान पड़ता है, लेकिन वे अपने प्रयास में सतत संलग्न हैं, जिससे उन्हें देव-दर्शन का लाभ तो मिल ही जाता है।

मंदिर के अंदर के स्तंभ उच्च कोटि की शिल्प व नक्काशी से शोभित हैं। कुल मिलाकर मंदिर की भव्यता व दिव्यता आज भी देखते ही बनती है। इसलिए यहाँ से आने का जरा भी मन नहीं करता, लगता है कि देवों के दिव्य रूप-दर्शन को उन मूर्तिकारों-शिल्पकारों के कला-कौशल ने ही अधिक दर्शनीय बना दिया है, अतः देवों के साथ-साथ उन्हें भी नमन करते हुए हम वापसी के लिए चले तो ज्ञात हुआ कि जामनगर जाने के लिए बेरावल जाना पडे़गा, क्योंकि वहीं से बस या ट्रेन मिलेगी।

बेरावल सोमनाथ से लगभग दस किलोमीटर दूर है। हम बेरावल के लिए चल पडे़। पूरे रास्ते नौका-निर्माण-कार्य चल रहा था, जो यहाँ का मुख्य धंधा है। दरअसल तटरक्षक बेड़ा है यह बेरावल। समुद्री तट होने से सोमनाथ से बेरावल तक अजीब सी सीलन भरी गंध चहुँओर व्याप्त थी। बातों-ही-बातों में हम बेरावल पहुँच गए। सामने ही कई मंदिर दीख रहे थे, जो बाह्याकार-प्रकार से अपने-अपने दर्शनीय स्वरूप की पुष्टि कर रहे थे, किंतु समयाभाव हमें उनके परिसर व गर्भगृह जाने की अनुमति नहीं दे रहा था। हम इसी बात से प्रसन्न थे कि नौका-निर्माण की प्रक्रिया में लगे लोगों व तटरक्षक बेडे़ के दर्शन अनायास ही मिल गए। तभी ऊना से आती हुई बस मिल गई, जो जामनगर जा रही थी। इस बस ने भी हमें अनेक छोटे-बडे़ नगरों के दर्शन कराए, जिनमें जूनागढ़ हर दृष्टि से विशिष्ट था। यहाँ ऊँची-ऊँची अट्टालिकाएँ, गगनचुंबी, विश्वविद्यालय, महाविद्यालय भी देखे, जो यहाँ के शैक्षिक विस्तार की कहानी कह रहे थे, साथ ही कृष्ण की अनन्य भक्त मीरा की भी याद दिला गया। उनके भजन ‘मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोय’, ‘हे री मैं तो प्रेम दीवानी, मेरा दरद न जाने कोय’ आदि भावों में खोए जामनगर लौट आए।

बस से उतर अपने आश्रयस्थल पहुँचे। रात्रि की आरती हो रही थी, मन-तन सब पहले ही भक्ति-रस से सराबोर था, अतः आरती में सम्मिलित हो गए। प्रसाद पाया, रात्रि-भोजन भी और खो गए निद्रा देवी के आगोश में।

अगली प्रातः जागे तो तरोताजा अनुभव कर रहे थे। नित्य-क्रियाओं से निवृत्ति ले, योग-ध्यान कर मंदिर-दर्शन को पहुँच गए। वहीं से बाहर निकल लिये, क्योंकि आज तो अन्य मंदिरों के दर्शन करने ही हैं। हवाई चौक तक पहुँचने पर ही ज्ञात हुआ कि सामने एक झील है। डेढ़-दो फर्लांग चलने पर ही गंतव्य पर पहुँच गए। झील एक बडे़ क्षेत्र में फैली है, उसे पार करने के लिए मध्य में पुलनुमा मार्ग बनाया गया है, जिस पर खडे़ होकर दोनों ओर दूर तक फैली जलराशि के दर्शन हुए, जो उस समय के राजाओं का गुप्त मार्ग था। आशा है, यह भी शीघ्र ही अपनी दैन्य दशा से मुक्ति पा लेगा।

अब हम पहुँचे चाकला मंदिर। दरअसल यह मंदिर उस समय का गांगजी भाई का आवास था, जहाँ उन्होंने अपने सद्गुरु श्री देवचंद्रजी को साक्षात् उस सर्वशक्तिमान का रूप मानकर उन्हें गोलाकार झूले पर बैठाया तथा उनकी सेवा व पूजा की और हमेशा के लिए वहीं रहने का आग्रह किया, जिसे सद्गुरु ने स्वीकार लिया। इसमें ऊपर तल पर उनका शयन-कक्ष होने से वह सामान आज भी दर्शनीय है। इसी के पास है राजमंदिर, जिसमें सद्गुरु के माता-पिता भी रहे, लेकिन उन्हें पुत्र रूप में नहीं, अपितु उनको सर्वशाक्तिमान सर्वेश्वर मानकर ही उनकी आराधना करते रहे।

इसके बाद श्यामजी का मंदिर, जहाँ अनेक उद्भट विद्वानों द्वारा श्रीमद्भागवत-कथा का पारायण होता रहा, जिनमें कान्हजी भट्ट से सद्गुरु देवचंद्रजी ने चौदह वर्ष लगातार कथा श्रवण कर उनकी सेवा की। अब हम पहुँचे मेडी मंदिर, जहाँ पुजारीजी ध्यानावस्थित थे, साथ ही थी रतनबाई की मसजिद या यों कहूँ कि यह मंदिर मसजिद के साथ है। इस मंदिर से वापसी में दो जैन मंदिर भी देखने को मिले, दोनों ही श्वेत संगमरमर पत्थर से बने भव्य, विशाल व आकर्षक। २४ तीर्थंकरों की प्रतिमाओं से शोभित महावीर व आदिनाथ की प्रतिमाएँ अधिक बड़ी थीं।

इस सबके बाद हम बढ़ चले अपने आश्रय स्थल खीजड़ा मंदिर, जो यहाँ का विख्यात, विशाल व संपन्न मंदिर है। अंदर की दीवारों पर कृष्णलीला व वाणी की चौपाइयाँ उकेरी गई हैं। दोनों समय यहाँ लंगर का आयोजन होता है। मंदिर के अंदर हो जाते हैं। दूसरी ओर एक छोटा सा म्यूजियम भी है, जिसमें शाही घराने की वस्तुओं व चित्रों को प्रदर्शित किया गया है।

पुल से जब झील को दाएँ-बाएँ से देख रहे थे। वहाँ के कुछ स्थानीय दर्शक भी थे, जिनसे बातचीत कर ज्ञात हुआ कि अभी तक नगर निगम इसकी उपेक्षा करता आया है, जबकि यह झील काफी विशाल व गहरी है, जिसमें मछली व कछुए जैसे अनेक जलचर बसेरा करते हैं। अब राज्य सरकार इसके रख-रखाव व विकास की ओर ध्यान दे रही है, इसलिए आशा है कि निकट भविष्य में यह अधिक आकर्षक व विकसित होगी।

पुल के एक किनारे पर महाराजा जामसिंह की घोडे़ पर प्रतिष्ठित प्रतिमा विराजित है, जिनके नाम पर यह नगर बसा है। इन्हीं के वंशज लखोटाजी के नाम पर झील का नाम ‘लखोटा झील’ है। झील के बाहर मार्ग पर वृक्ष भी लगाए गए हैं, इसके नीचे पाषाण की बेंचें पर्यटकों व दर्शकों के बैठने हेतु लगाई गई हैं। दूर-दराज से आनेवाले भाँति-भाँति के पक्षी भी यहाँ जल-क्रीड़ा करते देखे जा सकते हैं।

इसी झील के सामने सड़क के दूसरी ओर एक किला है, जिसे ‘भुजिया किला’ कहते हैं। यह अत्यंत जीर्ण-शीर्ण अपने संरक्षकों व सरकार की उपेक्षा का शिकार होकर अपनी दयनीय दशा पर अश्रुपात करता जान पड़ता है। इस किले में दो सौ कि.मी. लंबी सुरंग बनाई गई है, जो भुजनगर जाने का मार्ग है, उसपर चरण रखते ही उस सर्वशक्तिमान की दिव्य अनुभूति होने लगती है। लेकिन हमारा यहाँ से विदा होने का समय हो चला था। फलतः श्रद्धानुसार परची कटाकर, प्रसाद-रूमाला ले वापसी के लिए चल पडे़। अगले दिन आ पहुँचे पटियाला।

रुक्मणी संगल
२८-बी, प्रेम नगर
पटियाला-१४७००१ (पंजाब)
दूरभाष : ०९४१७०८८४६६

हमारे संकलन