लोकसाहित्य एवं मिथक कथाएँ

लोकसाहित्य एवं मिथक कथाएँ

मिथ शब्द से बना है मिथक। ‘मिथ’ शब्द संस्कृत और आंग्ल भाषा दोनों में पाया जाता है। संस्कृत में मिथ शब्द का आशय दो तत्त्वों के मिलन तथा प्रत्यक्ष ज्ञान से है। मिथक में ये दोनों ही अर्थ समाहित हैं। आंग्ल भाषा में मिथ का अर्थ है—कोरी कल्पना। साहित्यकार हजारी प्रसाद द्विवेदी ने आंग्ल भाषा के मिथ शब्द में क प्रत्यय जोड़कर मिथक शब्द का सृजन किया है। श्री द्विवेदी ने मिथक के संबंध में लिखा है—‘‘मिथक शब्द वास्तव में भाषा का पूरक है। सारी भाषा इसके बल पर खड़ी है। आदि-मानव के चित्त में संचित अनेक अनुभूतियाँ मिथक के रूप में प्रकट होने के लिए व्याकुल रहती हैं। मिथक वस्तुतः उस सामूहिक मानव की भाव-निर्मात्री शक्ति की अभव्यक्ति है, जिसे कुछ मनोविज्ञानी ‘आर्किटाइपल इमेज’ कहकर संतोष कर लेते हैं।’’

वास्तव में मिथक केवल कपोल कल्पना नहीं है। इसमें इतिहास का तत्त्व भी है और आदि-मानव की गहन अनुभूतियों की अभिव्यक्ति भी। मिथक साहित्य कपोल कल्पना से हटकर प्रतीक रूप में हमें एक संदेश भी देता है। इस साहित्य में मानव की कमजोरियाँ भी अभिव्यक्त होती हैं तो चिंतन की गहराइयाँ भी। मिथक पुरातन अवश्य है, किंतु इसका चिंतन आधुनिक अनुभूतियों से मेल भी खाता है। आश्चर्य होता है कि पुरातन मानव के मन में तत्कालीन परिस्थितियों में कैसे इतने प्रगतिशील और आधुनिक विचारों का प्रवाह स्थान पाया होगा। मिथक साहित्य में प्रतीकात्मक रूप से यह सब है, जो आधुनिक विचारधारा में पाया जाता है।

साहित्यकार श्री हजारी प्रसाद द्विवेदी ‘साहित्य सहचर’ में लिखते हैं—‘‘नए युग को अत्यंत संक्षेप में बताना हो तो कहेंगे कि यह युग मानवता का युग है।’’ मिथक कथाओं में मानवता का संदेश कूट-कूटकर भरा गया है। इन प्रतीकात्मक कथाओं में मानव कल्याण के वे सब संदेश हैं, जिन्हें आज हम ‘आधुनिक’ के नाम से पुकारते हैं। वास्तव में अतीत वर्तमान की आधार भूमि है। अतीत हमें हमारी जड़ों तक ले जाता है। अतीत को विस्मृत कर हम वर्तमान में नहीं जी सकते। अमेरिकन कवि और दार्शनिक जॉर्ज सांतायनाने ‘दि लाइफ ऑफ रियजन’ में लिखते हैं—‘‘जो अतीत का स्मरण नहीं करते, उन्हें अतीत में ही रहने का दंड मिलता है।’’ इसलिए मिथक कथाओं में जो आधुनिक चिंतन के स्वर पाए जाते हैं, उनका अध्ययन-मनन समय की आवश्यकता है।

आधुनिक चिंतन में अपराधों के लिए दंड, प्रतिशोध के लिए स्वीकार नहीं किया जाता। अपराधी को दंड देने के लिए सुधारात्मक मार्ग अपनाने पर विशेष बल दिया जाता है। इसलिए महान् विचारक अरस्तु का कथन है—‘‘दंड एक प्रकार की ओषधि है।’’ इसाई धर्माचार्य और चिंतक सेंट आगस्टीन का कथन है—‘‘दंड अन्यायी के प्रति न्याय है।’’

यदि दंड एक प्रकार की ओषधि है तो अपराध एक प्रकार का रोग। इसी आधार पर आधुनिक विचारकों द्वारा विश्व भर में मृत्युदंड के विरोध में स्वर उठते रहते हैं। जो जीवन हम दे नहीं सकते, उसे ले कैसे सकते हैं! इसलिए आधुनिक विचारकों का एक वर्ग मृत्युदंड के विरोध में समय-समय पर जनमत तैयार करता है।

क्या यह आधुनिक विचार है? महाभारत के शांति पर्व में राजा द्युमत्सेन का वर्णन आया है, जिसने अनेक अपराधियों को मृत्युदंड देने की घोषणा की थी। राज द्युमत्सेन के बेटे सत्यवान ने तब इसका इसी आधार पर विरोध किया था। सत्यवान का विचार था कि मृत्युदंड के बिना भी काम चलाया जा सकता है। मृत्युदंड अत्यंत कठोर दंड है और उसका प्रभाव अपराधी के परिवार पर भी पड़ता है। अतः सत्यवान ने यह सुझाव दिया कि प्रथम अपराध पर क्षमा और बाद के अपराधों पर प्राणदंड छोड़कर कोई और दंड दिया जाना चाहिए। सुधारात्मक रूप से यह भी कहा गया कि क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रों को ब्राह्मणों के अनुशासन में रखा जाए तो अपराधों पर नियंत्रण होगा एवं धर्म की वृद्धि होगी।

आधुनिक मानवतावादी विचारकों का मत है कि परोपकार के लिए हमें अपने शरीर के विभिन्न अंगों का मृत्यु उपरांत दान करना चाहिए, ताकि जिन्हें उन अंगों की आवश्यकता है, वे उन्हें प्राप्त कर सुखी जीवनयापन कर सकें। इसी आधार पर आज देहदान और नेत्रदान जैसे महादान प्रचलित हैं। नेत्रदान की यह परंपरा भारत में रामायणकाल के पूर्व से प्रचलित है। महाभारत और मार्कंडेय पुराण में राजा अलर्क का उल्लेख है। वाल्मीकि रामायण, अयोध्याकांड के सर्ग १४ श्लोक ५-७ में यह स्पष्ट उल्लेख है कि राजा अलर्क ने एक ब्राह्मण के माँगने पर अपने नेत्र दान कर दिए थे। इससे स्पष्ट है कि नेत्रदान का विचार उस समय भी प्रचलित था।

अलर्क नाम एक राजा के पुत्र का है। रानी मदालसा ने अपने पुत्र का अलर्क नाम रखा। राजा को यह नाम कुछ अजीब लगा। राजा ने रानी मदालसा से पूछा, ‘‘यह कैसा नाम है? राजपुत्र का नाम तो वीरता सूचक होना चाहिए!’’ रानी मदालसा ने उत्तर में कहा, ‘‘नाम में क्या रखा है, नाम तो केवल पहचान के लिए है।’’ भारतीय दर्शन में नाम का बड़ा महत्त्व है। लेकिन यह नाम भगवान् का है। यह नाम महत्त्वपूर्ण है, अन्य नाम नहीं।

आज भी नाम की सार्थकता का कोई विचार नहीं है। महान् नाटककार शेक्सपीयर रोमियो ऐंड जूलियट में कहते हैं, ‘‘नाम में क्या रखा है? गुलाब के पुष्प को किसी और नाम से पुकारने पर भी उसकी गंध तो उतनी ही होगी।’’ रानी मदालसा के विचार से यह कथन विचार के स्तर पर शत-प्रतिशत मिलता है। यह अलर्क नाम इसके अर्थ के कारण भी हमें आश्चर्य में डाल देता है। अलर्क शब्द का अर्थ है—‘पागल कुत्ता’। क्या कोई ऐसा नाम अपने पुत्र का रखना चाहेगा? लेकिन माता मदालसा ने यह नाम रखकर इस घोषणा को सत्य कर दिया कि नाम में क्या रखा है। नाटककार शेक्ससपीयर की सूक्ति के हजारों वर्ष पूर्व यह विचार भारतीय मिथक-कथा में विद्यमान था।

मृत्यु उपरांत देहदान की अवधारणा आधुनिक कही जाती है किंतु भारतीय मिथक-कथा के रूप में इसकी घोषणा महात्मा दधीच हजारों वर्ष पूर्व कर चुके थे। उन्होंने तो परोपकार के लिए जीते जी ही देहदान कर एक अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत किया था। भारतीय दर्शन के अनुसार देह का कभी भी बहुत अधिक महत्त्व नहीं रहा है। ‘देह मिट्टी है और इसे मिट्टी में मिल जाना है।’ यह विचार सदा से विद्यमान रहा है। अतः यदि इस देह से कोई लोक कल्याणकारी कार्य होता है तो गीता के अर्थों में यह यज्ञ है। इसलिए देहदान की अवधारणा मिथक साहित्य में होना आश्चर्य का विषय नहीं है।

आधुनिक अवधारणा में मानवीय मूल्यों को सार्थक करने के लिए विकलांग व्यक्तियों को सहारा देना और उन्हें प्रगति के मार्ग पर चलाना, एक अच्छा कार्य समझा जाता है तथा समाज कल्याण के कार्यों में इसका बड़ा उल्लेखनीय महत्त्व है। यह अवधारणा भारतीय मिथक-कथाओं में कूट-कूटकर भरी है। तेजस्वी बालक के रूप में अष्टावक्र ऋषि, बालखिल्य ऋषियों की कथाओं का उल्लेख किया जा सकता है। बालक अष्टावक्र ने तो राजा जनक के दरबार में यह स्पष्ट घोषणा की थी कि उन पर हँसनेवाले भगवान् पर हँसते हैं, जिसने उन्हें बनाया है। बालखिल्य ऋषि अँगूठे के बराबर के थे। देवताओं के राजा इंद्र ने उनका अपमान कर अपने बल का अहंकार दिखाया था तो बालखिल्य ऋषि ने एक और इंद्र को तैयार करने की योजना साकार करने के लिए तप करना प्ररंभ कर दिया, परिणामस्वरूप देवताओं के राजा इंद्र घबराकर बालखिल्य ऋषि के सम्मुख खेद प्रकट करने को मजबूर हुए। महाप्रतापी राजा रावण एक समय सरपत वन में गया। वहाँ भगवान् शिव का वाहन नंदी त्रिशूल लिये खड़ा था, जिसका मुख वानर-सा था। रावण नंदी पर हँसा था, तब नंदी ने शाप दिया था, ‘‘हे दशग्रीव, हमारे वीर्य से उत्पन्न वानर ही तेरा नाश करेंगे।’’ किसी की कमजोरी को मजाक बनाने का फल राजा रावण को भी भोगना पड़ा था।

मिथक साहित्य में जो विचार हैं, वे आधुनिक युग के विचारों से कितना मेल खाते हैं, यह देखकर सचमुच आश्चर्य होता है। मिथक साहित्य इतिहास तो नहीं है, लेकिन उसमें निहित विचार तत्त्व इतिहास से अधिक गहराई तक जाकर उस युग के चिंतन तत्त्व को प्रकट करना है। इसीलिए मिथक साहित्य केवल कपोल कल्पित गाथा नहीं है, बल्कि यह प्रतीक रूप में इतिहास के तत्त्व को सिद्ध करता है। हमारी लोककथाएँ, शास्त्रीय गं्रथ, धार्मिक ग्रंथ मिथ साहित्य के भंडार हैं और उनका आधुनिक विचारधारा से अद्भुत साम्य है। पश्चिम का अंधानुकरण भी हमें गर्त में ही डालेगा। इसलिए आधुनिकता की दौड़ में भी मिथक-कथाओं के महत्त्व को विस्मृत नहीं किया जा सकता।

सत्यनारायण भटनागर
२ एम.आई.जी. देवरादेव नारायण नगर
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