पिता

जिस व्यक्ति की कहानी यहाँ सुनाई जा रही है, वह गाँव का बहुत ही धनवान् और अत्यंत प्रभावशाली व्यक्ति था। उसका नाम था—थोर्ड ओवरास। लंबा और उत्सुक वह एक पुजारी के कमरे में आया।

‘‘मेरे यहाँ लड़का पैदा हुआ है,’’ उसने कहा, ‘‘मैं उसे बपतिस्मा के लिए पेश करना चाहता हूँ।’’

‘‘उसका क्या नाम होना चाहिए?’’

‘‘फिन—मेरे पिता के नाम पर।’’

‘‘और जामिन?’’

उनके नाम बताए गए और वे गाँव में थोर्ड परिवार के श्रेष्ठ पुरुष और स्त्रियाँ साबित हुए।

‘‘इसके अतिरिक्त कुछ और?’’ पुजारी ने पूछा और ऊपर देखा।

आदमी थोड़ा हिचकिचाया।

‘‘मैं उसे स्वयं बपतिस्मा करते देखना चाहता हूँ।’’ उसने अंत में कहा।

‘‘इसका मतलब है, सप्ताह में किसी दिन?’’

‘‘आनेवाले शनिवार को दोपहर बारह बजे।’’

‘‘इसके अतिरिक्त कुछ और?’’ पुजारी ने पूछा।

‘‘और कुछ नहीं।’’ व्यक्ति ने कहा और अपनी टोपी को वेग से घुमाया जैसे वह जाने को तैयार हो।

फिर पुजारी उठा, ‘‘फिर भी कुछ है,’’ उसने कहा और थोर्ड की ओर बढ़ा; उसने थोर्ड का हाथ थामा और उसकी आँखों में गंभीरता से देखा, ‘‘ईश्वर करे कि बच्चा तुम्हारे लिए आशीर्वाद बने!’’

सोलह वर्षों के बाद एक दिन शाम को फिर थोर्ड पुजारी के कमरे में खड़ा था।

‘‘वास्तव में तुमने अपनी अवस्था को आश्चर्यपूर्वक रखा है, थोर्ड।’’ पुजारी ने कहा; क्योंकि उसने इस व्यक्ति में कोई परिवर्तन नहीं देखा था।

‘‘यह इसलिए कि मुझे कोई कठिनाई नहीं है।’’ थोर्ड ने उत्तर दिया।

इसपर पुजारी कुछ नहीं बोला, परंतु कुछ देर के बाद पूछने लगा, ‘‘तुम्हारा अभी आने का उद्देश्य?’’

‘‘मैं अभी अपने बेटे के बारे में आया हूँ; वह कल प्रमाणित किया जाएगा।’’

‘‘वह निर्मल लड़का है।’’

‘‘मैं पुजारी को कुछ नहीं देना चाहता, जब तक मैं यह न जान लूँ कि कल चर्च में उसे किस स्थान पर बैठाया जाएगा।’’

‘‘वह प्रथम स्थान ग्रहण करेगा।’’

‘‘यह मैंने जान लिया, और यह धनराशि पुजारी के लिए है।’’

‘‘इसके अतिरिक्त कुछ और भी है जो मैं तुम्हारे लिए कर सकता हूँ?’’ थोर्ड पर अपनी आँखें जमाते हुए पुजारी ने पूछा।

‘‘और कुछ नहीं।’’

थोर्ड बाहर चला गया।

आठ वर्ष और बीत गए। फिर एक दिन पुजारी के कमरे के बाहर शोर सुनाई दिया, क्योंकि बहुत से लोग आ गए थे और थोर्ड सबसे आगे था जो पहले अंदर गया।

पुजारी ने उसे देखा और पहचान लिया।

‘‘आज सायंकाल तुम्हारी उपस्थिति अच्छी है, थोर्ड।’’ उसने कहा।

‘‘मैं आपसे प्रार्थना करने आया हूँ कि मेरे बेटे के विवाह की घोषणा कर दें; वह गडमुंड जो मेरे साथ खड़ा है, उसकी बेटी है।’’

‘‘क्यों, वह गाँव में सबसे अधिक धनवान् लड़की है।’’

‘‘ऐसा ही कहते हैं।’’ अपने बालों को हाथ से थपथपाते हुए किसान ने कहा।

पुजारी थोड़ी देर के लिए बैठ गया जैसे गहरी सोच में डूब गया हो, फिर बिना कोई टिप्पणी किए उसने अपनी पुस्तक में नाम दर्ज किए और लोगों ने उनके नीचे अपने-अपने हस्ताक्षर कर दिए। थोर्ड ने तीन नोट मेज पर रखे।

‘‘मुझे एक ही चाहिए।’’ पुजारी ने कहा।

‘‘मैं यह अच्छी तरह जानता हूँ, परंतु वह मेरा बेटा है; मैं इसे सुंदर ढंग से करना चाहता हूँ।’’

पुजारी ने राशि ले ली।

‘‘यह तीसरी बार है, थोर्ड कि तुम यहाँ बेटे की खातिर आए हो।’’

‘‘परंतु अब मैं उससे संतुष्ट हूँ।’’ थोर्ड ने कहा और अपनी छोटी पुस्तक बंद करके विदा लेकर चला गया।

आदमियों ने धीरे-धीरे उसका पीछा किया।

आधे महीने बाद बाप-बेटा झील में नाव की सैर कर रहे थे; दिन निश्चल और शांत था। उन्हें विवाह का प्रबंध करने एर्टोलीडन जाना था।

‘‘उस पार सुरक्षित नहीं है।’’ बेटे ने कहा और अपनी सीट, जिसपर वह बैठा था, ठीक करने के लिए खड़ा हो गया।

जिस तख्ते पर वह खड़ा था, उसी क्षण उसके नीचे से खिसक गया; उसने अपने हाथ फेंके, चीख मारी और तख्ते से गिर गया।

‘‘चप्पू को थाम लो।’’ चप्पू को थामे अपने पाँव पर उछलकर पिता बोला।

परंतु जब उसके बेटे ने थोड़ी कोशिश की तो वह कठोर हो गया।

‘‘थोड़ी प्रतीक्षा करो।’’ पिता चिल्लाया और बेटे की ओर देखने लगा।

फिर बेटा पीठ के बल घूमा; पिता को लंबी नजर से देखा और डूब गया।

थोर्ड मुश्किल से विश्वास कर सका; उसने नाव को रोक दिया और उस स्थान को ताकने लगा जहाँ उसका बेटा नीचे गया था तथा सोचने लगा कि वह अवश्य ऊपर आएगा। कुछ बुलबुले उठे, फिर और उठे और अंत में एक बड़ा बुलबुला उठा जो फट गया और झील पूर्ववत् शीशे की तरह साफ और चमकीली हो गई।

बिना खाए-पीए तीन दिन और तीन रात उस स्थान के आसपास नाव खेकर चक्कर लगाते हुए पिता को लोगों ने देखा। अपने बेटे के शव के लिए वह झील का सर्वेक्षण कर रहा था। तीसरे दिन प्रातःकाल उसने ढूँढ़ लिया और अपने हाथों में उठाए पहाड़ी से होता हुआ उसे अपने फार्म में लाया।

उसके एक वर्ष बाद शरद् ऋतु की एक शाम को दरवाजे के बाहर रास्ते में किसी को ध्यान से चिटखनी ढूँढ़ते हुए पुजारी ने सुना। पुजारी ने दरवाजा खोला और सफेद बालोंवाला, झुका-झुका पतला आदमी अंदर आया। पुजारी ने पहचानने से पहले देर तक उसे देखा। वह थोर्ड था।

‘‘क्यों, तुम बाहर इतनी देर से घूम रहे हो?’’ पुजारी ने कहा और उसके सामने निश्चल खड़ा रहा।

‘‘ओह, हाँ, देर हो गई।’’ थोर्ड ने कहा और बैठ गया।

पुजारी भी बैठ गया जैसे प्रतीक्षा में हो। एक लंबे मौन के बाद अंत में थोर्ड बोला, ‘‘मेरे पास कुछ है जो मैं निर्धन को देना चाहता हूँ; मैं उसे अपने बेटे के नाम पर उत्तरदान के रूप में लगाना चाहता हूँ।’’

वह उठा और कुछ धनराशि मेज पर रख दी और फिर बैठ गया।

पुजारी ने उसे गिना।

‘‘यह तो बहुत बड़ी रकम है।’’ उसने कहा।

‘‘यह मेरे फार्म की आधी कीमत है। मैंने उसे आज बेच दिया।’’

पुजारी देर तक चुप बैठा रहा। अंत में उसने नम्रता से पूछा, ‘‘तुम अब क्या करना चाहते हो, थोर्ड?’’

‘‘कुछ अच्छा काम!’’

वे दोनों कुछ देर बैठे रहे—थोर्ड आँखें झुकाए हुए और पुजारी थोर्ड पर आँखें जमाए हुए। उस समय पुजारी ने नम्रतापूर्वक धीरे से कहा, ‘‘मेरे विचार में तुम्हारा बेटा तुम्हारे लिए अंत में सच्चा आशीर्वाद लाया।’’

‘‘हाँ, मैं भी ऐसा ही सोचता हूँ।’’ थोर्ड ने ऊपर देखते हुए कहा, जबकि दो बूँद आँसू धीरे से उसके गालों पर आ गिरे!

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