साहस खो चुकी आँखें

पहनावा

पहनावे से अंदाजा मत लगाओ

मेरे दिल का,

पहनावे की ओट में

दिल में पक रहा है घाव

सबके अनदेखे,

फिर भी

मैं कविता पढ़ती हूँ मंच पर।

कविता और है ही क्या

एक चित्र या एक पहनावा

जिसे सुंदर तरीके से सजाना पड़ता है

मन को भाने सा,

जैसे सिनेमा देखने जाते समय

या बाजार घूमने निकलते समय

सजती है हमारी गाँववाली छोटी भाभी

स्नो-पावडर लगाकर।

कविता में भी डालनी होती है महक

घुमा-फिराकर कहनी पड़ती हैं सारी बातें,

मेरा मृदंग बज-बजकर फट-फूट जाने पर

कविता बखानती रहती है नीरवता के दोहे

फिर उपलब्धि से उठकर

बनता चला जाता है उत्सव

सबकी उत्कंठा के समक्ष।

उत्सव में मदमस्त होता समय

आँसुओं से जर्जर आँखें

क्या आती हैं, नजर किसी को?

मंदिर के गर्भगृह में

मत्था टेककर आते समय

कविता की आँखों की कोर में समा जाता है

बूँदभर आँसू, सबके अनजाने

जामुन पकने लगता है यद्यपि पेड़ पर

नीचे गिरकर फट जाने का भय भी

उसे अधीर और उदास करता है।

कुछ भी नहीं होता सीधी रेखा में

न जीवन, न मृत्यु, न कविता

एक-दूसरे के समानांतर होते हैं सभी

यह नहीं दिखता किसी की आँखों को।

मैं भी नदी बनती हूँ,

नक्षत्र बनती हूँ,

माँ बनती हूँ, बेटी बनती हूँ,

कवि बनती हूँ, कारीगर बनती हूँ,

मेरे पहनावे पर

संदेह नहीं होता किसी को।

खोती चली जाती आँखें

आँखों को चाहने

और खोने का कष्ट

साये सा रहता है हमेश मेरे साथ

न जाने क्यों

आँखों के प्रेम में

पड़ जाती हूँ मैं बड़ी आसानी से।

बार-बार कुछ कहने-कहने को हो

कभी कुछ कह न सकनेवाली आँखें कहो

या बीतचीत के बीच से अचानक

राह बदलकर दूसरे रास्ते चली जानेवाली आँखें

स्थिर दृष्टि से आकाश की ओर ताकती आँखें

या जमीन देखकर

उदास अैर अन्यमनस्क होती आँखें

चीखों को दबाकर

स्वाभाविक होती आँखें

या आँख से आँख मिलाने का

साहस खो चुकी आँखें

साँय-साँय लंबी साँसें गुटककर

मुँदती चली जा रही आँखें

या झर-झर आँसू बहाती

अस्थिर-असहाय आँखें

किसी-न-किसी के सामने

खड़ी रही हूँ मैं कभी-न-कभी।

ऐसा नहीं है कि मैंने कभी सामना नहीं किया

जलते लावे सी बाघ की आँखों का

या बार-बार नहीं टकराई

उस किशोर की आँखों के सामने आद्य कैशोर्य में

जो आज भी मुझे सालती हैं

करती हैं अस्थिर और अनमना

मैं हड़बड़ा जाती हूँ समय के सामने।

किसी-किसी की आँखों की पुतलियों

का दरवाजा खोल

अंदर घुसते समय मैं चीख उठी हूँ

अँधेरे ने किया है मुझे जड़ और खामोश

किसी-किसी की पुतलियों के दरवाजों के बाहर

मैं खड़ी रही तमाम जिंदगी

‘यहाँ प्रवेश वर्जित है’ की पट्टी

बार-बार पढ़ती हूँ, पढ़ती रहती हूँ।

किसी-किसी की आँखें लेकर

मैं घूमती रहती हूँ

एक देश से दूसरे देश,

एक शहर से दूसरे शहर,

अरण्य से अरण्य, समुद्र से समुद्र

मुझे लगा है, इन आँखों के सिवाय शयद

कोई और मायने नहीं इस जीने का।

और किसी-किसी की आँखें

मैंने खो दी हैं लापरवाह-सी

पीड़ा नहीं, पछतावा नहीं,

दुःख नहीं, अफसोस नहीं,

ढूँढ़ पाने की लालसा भी नहीं

किसी-किसी की आँखें क्या

मैं अपनी भी आँखें खो चुकी हूँ

कहीं किसी का प्रतिबिंब

मेरी आँखों की पुतलियों में दिख न जाए!

दुनिया की आँखों में कहीं

एक प्रश्नचिह्न न बन जाऊँ!

गायत्रीबाला पंडा
पो. रायरंगपुर, जिला-मयूरभंज
ओडिशा-७५७०४३
दूरभाष : ९६५०९९०२४५

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