जानलेवा शुभचिंतक

जानलेवा शुभचिंतक

जिस तरह अच्छे दिन लाख मनौवल के बाद भी नहीं आते, उसी तरह मुसीबतें बिन बुलाए, बेवक्त, कभी भी आ जाती हैं। वे ‘और क्या हो रहा है भाई?’ कहते हुए आ गए। कहते हैं कि शुभचिंतक हैं, लेकिन किधर से, पता नहीं! उनके अनुसार मात्र पड़ोसी होना शुभचिंतक होना है। पहले वे किसी और मोहल्ले में थे तो अकसर पड़ोसियों से झगड़ा चलता रहता था। एक आदत सी पड़  गई थी। उनका मानना है कि दो-तीन दिनों पर पड़ोसियों से झगड़ा होता रहे तो कोलेस्टरॉल की समस्या नहीं होती है। हृदय के लिए झगड़े बड़े मुफीद होते हैं। खून की नलियाँ साफ हो जाती हैं। इनके डॉक्टर ने पर्ची पर लिखकर दिया है कि रोज सुबह-शाम किसी से झगड़ लिया करो। इससे एक तो जीवन में रस पैदा होगा, दूसरे आपको लगेगा कि जीवन में कुछ किया है। समझदार कहते हैं कि आदमी के पास कुछ करने को नहीं हो तो निराशा में चला जाता है। खाना-सोना तो पशु भी कर लेते हैं और वे पशु मात्र नहीं हैं। अच्छे स्वास्थ्य के लिए लोग बिना वजह हँसा भी करते हैं। लेकिन उनका झगड़ना रचनात्मक है। एक बार किसी की गरदन पकड़ लें तो पूरा व्यायाम कर लेते हैं। कभी दूधवाला, कभी सब्जीवाला, किरानेवाला, आटा चक्कीवाला, रिक्शावाला आदि, अजी एक खोजिए तो हजार मिलते हैं, बस इरादा पक्का होना चाहिए।

आज वे ठीक उस वक्त तशरीफ लाए हैं, जिस वक्त मैं अपनी दवाएँ लेने की तैयारी में था। बोले, ‘‘अरे, ये क्या? आप दवाएँ ले रहे हैं!’’ मासूम सवाल।

‘‘क्या करें भाई, लेनी पड़ती है।’’

‘‘क्यों? तबीयत ठीक नहीं है क्या?’’ फिर उनका मासूम-सा सवाल।

‘‘तबीयत तो ठीक है, लेकिन आप तो जानते हैं डॉक्टरों-दवाईवालों की रोजीरोटी का मसला भी सामने है। उसे कौन देखेगा? हर बात प्रधानमंत्री पर तो नहीं छोड़ी जा सकती है न!’’

‘‘आप मजाक तो नहीं कर रहे हैं! वो क्या है कि सुबह-सुबह मजाक मुझे पसंद नहीं है।’’ उन्होंने वैधानिक चेतावनी के अंदाज में कहा।

‘‘देखिए, यह एक गोली बी.पी. की है, एक शुगर की और एक कोलेस्टरॉल की, ये फिक्स हैं, रोज लेनी पड़ती हैं। अभी सर्दी-खाँसी सी है, सो दो गोली और हैं।’’ तुरंत तफसील देने से थोड़ी सुरक्षा महसूस हुई।

दो मिनिट चिंतन टाइप चुप्पी लगाकर वे बोले, ‘‘लेकिन आप तो हमेशा कहते रहे हैं कि यह दुनिया रहने के काबिल नहीं है!’’

‘‘हाँ, कहता तो रहा हूँ, आप कहें तो ये दवाएँ न लूँ?’’

वे बोले, ‘‘यह मैंने कब कहा! लेकिन विचार आया कि आप विद्वान् हैं, आप कम-से-कम अपने विचारों की कद्र तो करेंगे। जब आप संसार को रहने के काबिल नहीं मानते हैं तो दुनिया में टिके रहने की इच्छा क्यों? वह भी दवाएँ खा-खाकर?’’

‘‘क्या मतलब!’’ मुझे गुस्सा आया।

‘‘मतलब, अनिच्छा से दुनिया में रहने के लिए अनिच्छा से दवाएँ खाइए, अनिच्छा से रिश्ते निभाइए, अनिच्छा से मतदान कीजिए, अनिच्छा से सरकार बनवाइए, सुबह से शाम तक सब अनिच्छा से कीजिए। सवाल यह है कि आखिर क्यों?’’

लगा जैसे उन्होंने मेरे खिलाफ जनहित याचिका लगा दी है। मैंने कहा, ‘‘आपकी बात सही है। सुना है, आपके पास बंदूक है! ऐसा कीजिए, गोली मार दीजिए मुझे, सारी अनिच्छाओं से मुक्त हो जाऊँ।’’

‘‘देखिए, मैं रचनात्मक हूँ, यह आप जानते हैं। लेकिन आप यह नहीं जानते होंगे कि मैं गांधीवादी भी हूँ। डायरेक्ट इतनी बड़ी हिंसा कैसे कर सकता हूँ? आपने गांधी को पढ़ा ही है, ‘वे कहते थे कि आदमी को अपना काम खुद करना चाहिए।’ स्वावलंबन, यू नो?’’

दवाएँ लेने का समय हो चुका था, लेकिन इतना सब सुन लेने के बाद उनके सामने दवा लेने की हिम्मत नहीं हुई। गोलियाँ और पानी का गिलास वैसे ही पड़े रहे। लग रहा था कि बी.पी. बढ़ गया है; लेकिन सोचा कि अब मरना भी पड़े तो इनके जाने के बाद ही...।

वे शायद जमकर बैठने के लिए आए थे। जैसे कई बार सरकारें होती हैं न, आप सोचते हैं कि ये नाकारा हैं, चली जाएँ। लेकिन वे अपने और आपके पाँच साल पूरे करके ही हटती हैं। पता नहीं क्यों ऐसा लग रहा था कि आसपास जान का खतरा मँडरा रहा है। लोग खुद परेशान हैं और आपकी किस बात को माइंड कर लेंगे, पता नहीं! हर कोई महँगाई से खीझा हुआ है। दुर्घटनाएँ और अपराध तो ऐसे-ऐसे कि सुनकर रोंगटे खड़े हो जाएँ। सीनियर सिटीजन कोफ्त में हैं कि रिश्ते-नाते मतलब के हो गए हैं। शहरों में भीड़ इतनी कि लगता है, जैसे कीड़े बिलबिला रहे हैं। क्या बाजार, क्या दुकानें और क्या बैंक, सब शिकारी नजर आते हैं। अव्वल तो कहीं शिकायत कर नहीं सकते; अब लगता है कि किसी से बात करके मन हलका करना भी गुनाह है।

‘‘लगता है आप बुरा मान गए।’’ हमारी खामोशी को नोट करते हुए वे बोले।

‘‘नहीं-नहीं, बुरा मनाने की क्या बात है भला!’’

‘‘आप हमेशा कहा करते हैं, महँगाई बहुत बढ़ गई है।’’ उन्होंने चार्जशीट बनानी चाही।

‘‘हाँ, लेकिन लोगों की कमाई भी तो बढ़ी है।’’ हमने सुरक्षित चलने में ही भलाई समझी।

‘‘दुर्घटनाएँ और अपराध भी तो बढ़े हैं।’’

‘‘ये तो पहले भी बहुत होते थे, लेकिन लोगों तक खबर नहीं पहुँचती थी। मीडिया और अपराधियों के अलावा अब कोई सक्रिय नजर नहीं आता है।’’

‘‘वही तो, देश में भ्रष्टाचार भी तो बहुत है और सरकारें कुछ करती नहीं हैं।’’

‘‘हम ही लोगों ने आदत बिगाड़ी है जी! देनेवाले नहीं होंगे तो लेनेवाले कहाँ से आएँगे?’’ हमने न उलझने की नीति अपनाई।

‘‘राजनीति भी तो कितनी गंदी हो गई है आजकल। लोग गंगा साफ करने की बात कहते हैं और हो रही है कीचड़ राजनीति में। सरकारें अच्छी नहीं हैं।’’

‘‘सरकार क्या करेगी? हर काम सरकार के भरोसे छोड़ना ठीक है क्या? जनता को भी सुधरना पड़ेगा।’’

अब वे असहज हो रहे थे, बोले, ‘‘चलिए, यह तो आपको मानना ही पड़ेगा कि बेरोजगारी बहुत है।’’

‘‘देखिए, देश में सवा करोड़ लोग हर साल बढ़ रहे हैं। सबको रोजगार और कुरसियाँ देना तो संभव नहीं है किसी भी सरकार के लिए।’’

‘‘फिर भी यह दुनिया रहने के काबिल तो नहीं है!’’

‘‘छोड़ो न यार, दुनिया तो हमेशा से ऐसी ही रही है। हमें ही दुनिया को रहने के काबिल बनाना पड़ेगा।’’

उन्होंने फिर एक मौन साधा, कुछ निराश से हुए और बोले, ‘‘अरे, आपने दवा नहीं ली! लीजिए न, समय हो रहा होगा!’’ अपने हाथ से उठाकर उन्होंने पानी का गिलास मुझे थमा दिया।

जवाहर चौधरी
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