बसंत में चुनाव की आहट

बसंत में चुनाव की आहट

इनसान के टूटे सपनों से पीले सूखे पत्ते हवा में उड़ते जा रहे हैं। पर इनमें आशा की किरण भी छिपी है। नन्हीं-नन्हीं कोपलें वृक्षों में आ चुकी हैं, अब नए पत्ते बनने को। आदमी के टूटे सपनों का अंत नहीं है, न इन पत्तों का। शहर में स्वच्छता अभियान की धूम है, सड़कों पर सूखे पत्तों की। लगता है कि उड़ते पत्ते उस अभियान की पोल खोलने को आमादा हैं। ऐसा नहीं है कि नगर निगम में सफाई कर्मचारियों की कमी है। नई-नई झाड़ू भी ली गई हैं। बस जिसका अभाव है, वह काम करने का इरादा है। उनकी अपनी यूनियन है, कामचोरी को बढ़ावा देने के लिए। बात-बात पर स्ट्राइक की धमकी है, कभी इस यूनियन के अध्यक्ष एक ब्राह्मण सज्जन रह चुके हैं। छुआ-छूत को मिटाने का एक सशक्त तरीका बढ़ती बेरोजगारी है। हमारी सरकारों ने इसका प्रभावी उपयोग किया है। भूखा ब्रह्मण या सवर्ण क्या करे? पापी पेट के सामने सब जाति-भेद व्यर्थ हैं। इसलिए कई सवर्ण सफाई कर्मचारी बन चुके हैं। उनका काम न करने का निश्चय स्वाभाविक है। यह क्षुद्र कर्म उनके लिए तो है नहीं, किसी को बताने से भी हिचकते हैं कि वह सरकार के किस विभाग से जुड़े हैं। कोई जानना चाहे तो वह केवल सरकारी कर्मचारी हैं, सफाई-कर्मी नहीं। सरकारी कर्मी एक ऐसा विशाल छाता है, जिसके नीचे सब समाता है।

आरक्षित वर्ग की संख्या दिनोदिन मच्छर-मक्खियों की तरह तरक्की पर है और भूखे-बेकारों की भी। आरक्षण से बढ़कर सामाजिक समरसता का शत्रु कोई नहीं है, पर तथाकथित विद्वान् इसे उनका ही आधार मानते हैं। कौन कहे, उनके तर्क का कारण क्या है, वह बेरोजगारों की रोजगार की तलाश के समान मिशन की प्रतियोगिता को बंधुत्व की भावना का जनक स्वीकार क्यों करते हैं? विद्वानों के तर्क अकसर बेतुके होते हैं, पर यह उन्हें बताने का दुस्साहस कोई दूसरा विद्वान् ही कर सकता है। किंतु दलितविराधी बनने का साहस कितनों में है? ऐसे नामाकूल विद्वान् का सरकार की हर कमेटी-कमीशन से निष्कासित होना तय है।

आरक्षण-आरक्षण की गुहार लगानेवाले अकसर नेता हैं। उन्हें अपने जातीय वोट की टोल इकट्ठी करनी है। ऐसी टोल, जो उनके निर्देश पर आचरण करे। उनके इशारे पर वोट दे या विरोध करे। यह लेन-देन की पारस्परिक मिली-भगत है। ‘हम आरक्षण देंगे, तुम वोट दो’ का सौदा है। मौकापरस्तों का आपसी खेल है। जो इस धंधे में सफल है, उसका नेता बनना एक ध्रुव सत्य है। अब जीवनपर्यंत उसे जनता की खुली लूट की छूट है। जातिगत आरक्षण इसीलिए हर दल में लोकप्रिय है। आर्थिक आधार पर आरक्षण की माँग करनेवाले नगण्य हैं। इससे अपनों के अलावा किस जाति विशेष पर उनकी पकड़ बनने की संभावना है। सवर्ण इसे अपना अधिकार मानेंगे और दूसरे अपने हक का छिनना। ‘आ बैल मुझे मार’ जैसी हरकत कौन नेता करेगा? उनमें से ज्यादातर फूँक-फूँककर कदम रखने के पक्षधर हैं। ऐसे भी उन्होंने जीवन में छोटी-छोटी चालाकियों और चालबाजियों के अलावा किया ही क्या है?

अधिकतर लोगों को बसंत के आगमन की खबर तक नहीं है। यों ही बसंत दबे पाँव आता है। हल्ला-गुल्ला उसके स्वभाव में नहीं है। न उसे किसी जाति विशेष से लगाव है। बाजारवाद का युग सिर्फ शोरगुल का जमाना है। किस वस्तु का कितना शोर है? कितना विज्ञापन है? उपभोक्ता पर प्रभाव डालने की उसकी क्या खासियत है? कोई नमकीन सिर्फ नमकीन नहीं है, उसमें सेहतमंद गुण क्या-क्या हैं? उसे खाने से कितनी ‘प्रोटीन’ उपलब्ध है, कहीं उसमें ‘क्लोरोस्टेरॉल’ तो अधिक नहीं है? डॉक्टर उसे ‘रिकमेंड’ करते हैं कि नहीं? भारत में सस्ती वस्तुओं का बहुत महत्त्व है। इसकी कीमत कहीं जेब पर अधिक भार तो नहीं डालेगी? बसंत का दुर्भाग्य है कि वह मन का उत्सव है, कुदरत का नव-सृजन, कोई ‘प्रॉडक्ट’ नहीं है। न उसमें जाति-भेद है, न किसी संप्रदाय के प्रति अतिशय लगाव। वह न किसी का जाति या संप्रदाय का त्योहार है, न किसी वर्ग विशेष का उत्सव।

जो जानते हैं, वे बसंत पंचमी भले मना लें, अधिकतर को इसकी सूचना तक नहीं है। न इसमें कुछ खरीदना है न बेचना। बाजारकाल में इसका आकर्षण भला क्या होगा? इधर तो ऐसी दुर्दशा है कि अधिकतर लेखक-कवि भी इस बारे मे खामोश हैं। क्या पता, उनका ध्यान अन्य सामयिक विषयों पर हो। ऐसे भी वे कहते हैं कि बसंत तो मन का मौसम है। जब ‘मन चंगा तो कठोती में गंगा।’ जब चाहे तब बसंत मना लो। न भी मनाओ तो क्या फर्क पड़ता है? न इसमें भ्रष्टाचार है, न रोजगार की संभावना, न खान-पान का अवसर।

बस यह पूरी तरह सेक्युलर है। सब इसे मनाने को स्वतंत्र हैं। दिक्कत यही है कि सेक्युलर दल भी इसके अस्तित्व से बेखबर हैं। बसंत-पंचमी मनाकर कितने वोट वे पटा पाएँगे। वे सिर्फ वही काम करते हैं, जिनसे वोट की गुंजाइश बढ़े। मसजिद की मरम्मत हो या गिरजाघर, गुरुद्वारे की, वे सब करवाने को प्रस्तुत हैं, क्योंकि इससे अल्पसंख्यक वोट हथियाए जा सकते हैं। मंदिर मत्था टेकने के लिए है। हिंदू बहुसंख्यक है। उसको दिलासे के लिए यही काफी है। ऐसे भी बहुसंख्यक वोटर तो मूरख प्राणी है। प्रत्याशी की जाति के कारण कुछ वोट वह दे ही जाएगा। इनको क्या पटाना, ये एकमुश्त वोट तो किसी दल को देते नहीं हैं। दें न दें, इसकी चिंता व्यर्थ है। उनकी झोली अल्पसंख्यक ही भर देंगे।

दिक्कत यही है कि बसंत का बाजार नहीं है। बाजार को भी यही शिकायत है कि उसे बेचें तो कैसे बेचें? बसंत बिस्कुट बनाएँ या बसंती बेसन पकौड़े खाने को। ज्यादा उपक्रम के अभाव में बसंत को मार्केट करें तो कैसे करें? एक सज्जन ने बसंतोत्सव के अवसर पर बसंती टी-शर्ट बनाने का निश्चय किया था। पर उसकी बिक्री न होने पर उसे फ्री गिफ्ट के बतौर वितरित करना पड़ा, विवशता में। उन्हें आज भी शिकायत है कि बसंत के कारण वे दीवालिया होते-होते बचे। बाजार ने हर उत्सव को सफलता से बेचा है, होली, दीवाली, ईद, नव वर्ष आदि सब को, पर उन्हें दुःख है कि वह बसंत को ब्रांड बनाने में नाकामयाब रहे हैं। नहीं तो बंसत की नमकीन मिठाई, परिधान वगैरह सब बाजार में उपलब्ध रहते। फिलहाल, बसंतोत्सव मनाया जाता है, पर वह बड़के बाजार का शृंगार न होकर घरों की चारदीवारी तक सीमित है। बसंतोत्सव मनानेवाले घर भी पारंपरिक हैं। वही घरवाले आपस में एकत्र होकर नियमित भोजन के साथ मीठे केसरिया चावल का सेवन करते हैं, सरस्वती-पूजन में उन्हें सफेद या पीली मिठाई चढ़ाते हैं। फिर भी यह जीवन का महत्त्वपूर्ण उत्सव होकर भी बाजार से अब तक मुक्त है। बाजार में न कोई खास मिष्टान्न उपलब्ध है बसंत के नाम पर, न कोई पोशाक-परिधान। अपनी मान्यता है कि बसंत इसीलिए एक शुद्ध उत्सव है—नए के जन्म और पुराने की विदाई का।

इसके विषय में लोग ज्यादा जानते भी नहीं हैं। हमारे एक मित्र का नाम ही बसंत कुमार है। हमने सोचा कि इन्हें बसंत का कुछ ज्ञान होगा। हमने उनसे जिज्ञासा भी व्यक्त की। पर वे बच निकले, ‘‘यार, माँ-बाप ने जाने किस झोंक में हमें यह नाम दे दिया। हम तो बदलना भी चाहते थे, पर आलस में रह गया। कौन झंझट में पडे़, इधर-उधर दौड़ने के।’’ फिर भी नामकरण के बाद आपने कुछ तो किया होगा बसंत के विषय में जानने को। हम भी अपने हठ पर कायम रहे। ‘जिंदगी’ में इतनी फुरसत किसके पास है कि नाम ऐसी बातों पर शोध करे। अब किसी का नाम श्रवण कुमार है तो जरूरी नहीं कि वह श्रवणकुमार के बारे में जाने। गंगाराम ने भले ही गंगा देखी है, पर उन्हें क्या पता कि गंगाजल आचमन के योग्य भी नहीं है। आप उनसे गंगा के प्रदूषण के कारण कैसे जान पाएँगे? हम उन्हें जिज्ञासाहीन समझकर विदा हो लिये, पर आज भी मन में उनकी छवि अंकित है।

उनको देखकर किसी को भी यकीन हो जाता कि वे बसंत का एकरूपीय निरूपण हैं, उनके सिर पर पतझर आ चुका था। बस गिनती के बाल बचे थे, अच्छे भले लीन के खर-पतवार के समान। नई कोपलें आने का प्रश्न ही नहीं उठता था। जैसा उन्होंने खुद स्वीकार किया है, वह केवल नाम के बसंतकुमार हैं। ऐसों में बसंत के गुण होने का भ्रम केवल उनके नाम के कारण भले हो, उसमें सत्य का लेशमात्र अंश भी नहीं है।

बसंत के मादक मौसमी मोड़ को देखकर लगता है कि यह टिक क्यों नहीं जाता है जीवन में? पर वह एक अन्य तथ्य की ओर भी इंगित करता है कि इनसान नश्वर है, जैसे ऋतुचक्र। कम-से-कम बसंत के बारे में इतना तो ज्ञात है कि वह हर वर्ष निश्चित आता है। आता रहा है और यदि कोई क्रांतिकारी परिवर्तन नहीं हुआ तो आता रहेगा।

आदमी के बारे में तो यह भी कहना कठिन है कि वह मरघट-यात्रा के बाद किस सफर पर निकलता है? इस अज्ञान के बावजूद वह हर भले-बुरे तरीके से जिंदगी भर पैसे कमाने की जुगत में जुटा रहता है। कुछ का तो जी मचलने लगता है जमीन के खाली प्लॉट देखकर। उन्होंने जीवन भर जमीन हड़पी है, रहने को आलीशान घर है, इससे मन कहाँ मानता है। ऐसों के जीवन का अंत है, लालच का नहीं। कभी-कभी हमें शक होता है कि दादी-नानी की कहानी के पीपल के पेड़ पर टिके भूत इसी प्रकार के व्यक्ति होते हैं। यदि कोई सीखने को प्रस्तुत हो तो बसंत आ-जाकर बहुत कुछ सिखा भी सकता है। पर इनसानी अहम का मुकाबला नहीं है। वह स्वयं को दुनिया की सर्वश्रेष्ठ रचना होने का मुगालता पालता है। तब भी वह प्रकृति से क्या सीखेगा, जब वह उसे सिखाने का भ्रम पाले है।

यह वक्त की बात है कि एक दुर्घटना है कि इस बार का बंसत चुनाव की आहट भी साथ लेकर आया है। चुनाव के पश्चात् गुमशुदा नेता भी अब अपने क्षेत्र में पाए जाने लगे हैं। इतना ही नहीं, वे दर्शनार्थियों को दर्शन देने को भी उपलब्ध हैं। छोटे से छोटा पत्रकार भी उनका साक्षात्कार ले सकता है। जिन व्यक्तियों को देखकर वे नाक-भौं सिकोड़ते थे, प्रजातंत्र की चुनावी मजबूरी है कि वे उन्हें भी सिर-माथे बिठाने को प्रस्तुत हैं। एक पत्रकार ने इसी चक्कर में उनसे एक बसंती इंटरव्यू भी ले डाला। किसी प्रसिद्ध सियासी हस्ती का बसंत के बारे में यह शायद पहला बयान है, जो हमें चाचा चिप्स के पैकेट में लिपटा हुआ मिला है। इसका लक्ष्य किसी नेता के सामान्य ज्ञान या पोल-खोल के अभियान का अंश न होकर सिर्फ उनसे एक पत्रकार का संवाद है। पूरी-की-पूरी इंटरव्यू की यह परची पाठकों की सेवा में वैसी-की-वैसी प्रस्तुत है। जहाँ तक चाचा चिप्स का प्रश्न है, वे जाने कब के पेट में समा चुके हैं।

पत्रकार और सियासी हस्ती के प्रश्नोत्तर नीचे प्रस्तुत हैं, ‘‘सब आपसे चुनाव की बात करते हैं। हमारा इरादा कुछ विषयांतर का है।’’

वर्माजी—क्या आपने बसंत का नाम सुना है?

नेताजी—नाम ही नहीं सुना है, हम बसंत से भली-भाँति परिचित भी हैं।

प्रश्न : आप बसंत को कब से जानते हैं?

उत्तर : यह कहना तो कठिन है। बसंत हमारी पार्टी का पुराना वर्कर है। उसने हर चुनाव में हमारी मदद की है। पिछली बार एक बूथ का इनचार्ज भी था। बाद में हमें बताया गया कि वहीं हमें सबसे अधिक वोट मिले थे। हम भी हर वर्कर के प्रति समर्पित हैं। इस बार नगर-निगम के चुनाव में हमने उसे पार्षद का टिकट दिलवाया है। हमें खुशी है कि वह चुनाव में सफल भी रहा है।

प्रश्न : बसंत में आपको क्या अच्छाई महसूस होती है?

उत्तर : हमें ही क्यों, हर दल की यही इच्छा है कि उसका वर्कर निष्ठावान हो। बसंत का यह गुण एक उदाहरण है दूसरों के लिए। समय अच्छा हो या बुरा, वह हमेशा पार्टी के साथ रहा है। वह किसी भी प्रलोभन से परे है। वह सिद्धांत का पक्का है। उसे पार्टी के उसूलों पर अडिग विश्वास है। इसी कारण वह हार-जीत सब में हमसे जुड़ा रहा है।

प्रश्न : देखिए, हम किसी इनसान की नहीं, मौसम की बात कर रहे हैं। लगता है कि आपको अपने इसी नाम के वर्कर का ध्यान आ गया।

उत्तर : हम आपको कैसे बताएँ कि हमारे जीवन में सिर्फ एक है, एक मौसम है, इसे जनसेवा कहते हैं। हमने जाड़ा, गरमी, बरसात हर समय जनता की सेवा की है, अथवा उसके कल्याण का सोचा है, इसीलिए अब हमें कैसे बसंत की याद रहे? यों भी बसंत उनके लिए है, जो भरे पेट हैं, उन्हें भोजन के नए-नए व्यंजन सूझते हैं, जरूर उन्होंने इस बसंत में भी कुछ नवीन मिष्टान्न का अन्वेषण किया होगा। हमें भूखे, अभावग्रस्त और वंचित ही नजर आते हैं। हम उनके उद्धार का सोचें कि मौसम के मोड़ का।

प्र्रश्न : पर क्षेत्र के लोगों को शिकायत है कि मौसम तो अपने वक्त के अनुसार आते-जाते हैं, बस आप ही चुनाव के बाद कभी-कभार पधारते हैं।’’

उत्तर : आएँ, न आएँ किंतु हमारे हृदय में क्षेत्र और देश बसा है। जब हम कार्याधिक्य से नहीं आ पाते तो दिल्ली में बैठकर या किसी कमेटी के साथ दौरे पर रहकर क्षेत्र के विकास और निर्धन कल्याण का ही ध्यान करते हैं।

हमें नेताजी का साक्षात्कार वास्तविकता के बहुत करीब लगा। जाने चिप्स को लपेटे यह साक्षात्कार की परची किस चुनाव की है? परंतु सच्चाई यही है कि नेता चुनाव के बाद सिर्फ क्षेत्र की हर समस्या का सोचता है, पर करता कुछ नहीं है। हर जागरूक नागरिक के समान वह भी जानता है कि निर्धनता और बेरोजगारी से जनता कितनी त्रस्त है, पर वह क्या कर सकता है, इसे कम करने को उसका कहना है कि वह इस दिशा में सतत प्रयासरत है। यह दीगर है कि सरकार में बहरे बसते हैं। वह चीख-चीखकर अपनी बात कहता है, पर उसकी कोई सुनवाई नहीं है। वह समझने में असमर्थ है कि सत्ता में उसी का दल विराजमान है कि विरोधी पार्टी का। उसे पता है कि सरकार के पास भी सीमित साधन हैं और समस्याएँ सुरसा सा मुँह बाए खड़ी हैं। सरकार की भी वरीयता है क्षेत्रों की। वह उसी के अनुसार कार्यरत है। फिर उसे खयाल आता है कि चुनाव जीतना है तो समस्याओं को भी रहना ही रहना है, वरना कौन उसे पूछेगा? वह प्रतीक के बतौर दो-तीन गाडि़यों का क्षेत्र के स्टेशन पर रुकने का प्रबंध करवा देता है। ‘‘इससे नए उद्योग आएँगे, रोजगार के अवसर बढ़ेंगे, सफर में सुविधा होगी’’, वह जन-समारोह में घोषणा करता है। रेल मंत्री के साथ उसकी खीसें निपोरे तसवीरें अखबारों में छपती हैं।

देश के हर चुनाव की असलियत यही है। किसी भी दल का घोषणा-पत्र झूठे आश्वासनों का पुलिंदा है। लोग भी जानते हैं। पाँच साल के सीमित समय में एक दल सत्ता सुख झेलता है। कइयों का घर भरता है। क्षेत्रीय दल का आका पार्टी-फंड के नाम पर हर संभव क्षेत्र से पैसे लूटता है, वरना दल कैसे चलेगा? उसके दूर-पास के रिश्तेदार भी इस लूट में उसके साथ हैं। वह बूथ-लूट या वोटर को आतंकित करने में कामयाब है। यही उसकी सत्ता में बने रहने की शर्त है। बसंत का कोई अर्थ नहीं है उनके लिए। इनका वश चले तो जनता के पास केवल सपनों का पतझर रहे, आशा की नई कोपलें फूटने तक की संभावना न हो और हर दल आश्वासनों तथा वादों के नए-नए सब्जबाग दिखाता रहे, वोटर को उल्लू बनाने को।

गोपाल चतुर्वेदी
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लखनऊ-२२६००१
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