चाहे सभी सुमन बिक जाएँ, पर गंध नहीं बेचूँगा

चाहे सभी सुमन बिक जाएँ, पर गंध नहीं बेचूँगा

उक्त पंक्तियाँ देश के प्रख्यात साहित्यकार कवि, सांसद बालकवि बैरागी की कविता ‘अपनी गंध नहीं बेचूँगा’ उस समय के दौर की है, जब राजनीति में पार्टियाँ खरीद-फरोख्त करती हुई अधिक नजर आती थीं। स्वार्थवश नेता दल-बदल कर लेते थे, लेकिन बालकवि बैरागी उन राजनीतिज्ञों में से एक थे, जिन्होंने अंत तक अपनी शुचिता को अक्षुण्ण बनाए रखा। कभी मौकापरस्ती का साथ नहीं देते हुए जीवनभर संघर्षशील रहे। सन् १९६८ के समय की बात है, जब बालकवि बैरागी म.प्र. विधानसभा में कांग्रेस के विधायक थे, संसदीय सचिव भी थे। अचानक दल-बदल की आँधी चली, कांग्रेस की सरकार गिर गई। ग्वालियर घराने की राजमाता सिंधिया की उठापटक से श्री गोविंद नारायणसिंह के नेतृत्व में संविद सरकार बनी, तब राजमाता विजियाराजे सिंधिया ने बालकवि बैरागी के पास एक संदेश भेजा कि दल बदलकर हमारी पार्टी में आ जाओ, तुम्हारा मंत्री पद बना रहेगा। ऐसी स्थिति में प्रायः राजनेता स्वार्थवश लुढ़क ही जाते हैं, अनेक नेता कांग्रेस से लुढ़ककर राजमाता के पक्ष में चले गए। लेकिन बालकवि बैरागी ने एक अनूठा उत्तर उस समय की सर्वाधिक ताकतवर और प्रभावशाली नेता राजमाता सिंधिया को दिया, ‘राजमाता जी, मैं आपको प्रणाम करता हूँ , पूरी विनम्रता के साथ आपका आदर करता हँू, लेकिन मैं आपकी बात नहीं मान सकता। मैंने आज सुबह ही अपने हाथ-पैरों के नाखून काँटे हैं, आपकी सारी शक्ति और संपदा भी इन्हें नहीं खरीद सकती। अतः मुझे भी खरीदने की मत सोचिएगा। यह चरित्र था साहित्यकार, राजनीतिज्ञ बालकवि बैरागी का। जिंदगी भर स्वच्छ राजनीति की, लेकिन राजनीति की ‘काजल की कोठरी’ में अपने दामन पर कभी दाग नहीं लगने दिया।

वे राजनीति को अपना धर्म एवं साहित्य को कर्मक्षेत्र मानते थे। कभी एक-दूसरे को इसमें समावेश नहीं होने दिया। छल, प्रपंच, आडंबर से कोसों दूर। सबके चहेते, चाहे वे विरोधी पार्टियों के सदस्य हो, उन सबसे घुल-मिलकर रहते थे। उन्हें अपनी रचनाधर्मिता पर माँ सरस्वती का वरदहस्त प्राप्त था। दोनों क्षेत्रों में वे अति विनम्र थे और दृढ़ भी। इंदिरा गांधी ने जब आपातकाल लगाया, तब उन्होंने इसका पुरजोर विरोध स्वयं इंदिरा गांधी के सम्मुख दर्ज करवाया और कहा, आपात काल लगाना जनता को परेशानियों में डालने जैसा कार्य कांग्रेस ने किया है, इसका परिणाम भी शीघ्र सामने आएगा और हुआ भी ऐसा ही। दिल्ली से कांग्रेस की सत्ता हाथ से निकल गई। इनकी दृढ़ता उन्हें कभी भी विचलित नहीं कर सकती थी। बड़ों को आदर देना, छोटों को आशीष, उनका सबसे बड़ा गुण था। दो बार म.प्र. शासन में कांग्रेस की सत्ता में मंत्री, राज्य सभा सदस्य एवं सांसद रहे। इंदिरा गांधी से लगाकर सोनिया गांधी तक उनके भाषणों के वे भाषण-लेखक थे। प्रधानमंत्री से लेकर एक पानवाला तक उनका प्रशंसक था।

बालकवि बैरागी एक राजनेता ही नहीं श्रेष्ठ संचालक, एक कुशल वक्ता के साथ-साथ श्रेष्ठ गद्य लेखक भी थे। उनकी कालजयी रचनाएँ इतिहास के पन्नों पर अजर-अमर रहेंगी। उन्होंने २६ फिल्मों के सुमधुर गीत लिखने के साथ-साथ कई फिल्मों में पटकथाएँ लिखीं। भादवामाता, रानी लालपरी फिल्म के गीत व पटकथा लिखी। वे राष्ट्र के ऐसे मंगल कवि थे और रहेंगे, जिनकी रचनाओं ने देश-विदेश में बड़ी धूम मचाई। मालवी भाषा को देशभर में अपनी शृंगार रचना ‘पनिहारिन’ से शीर्ष पर पहुँचानेवाले राष्ट्रकवि बालकवि बैरागी हिंदी भाषा के सशक्त हस्ताक्षर थे। उनका वर्षा गीत ‘बादरवा अईग्या’ लखारा लोकगीत ग्रामीण महिलाओं के कंठों का मधुर लोकगीत बना। संगीतकार जयदेव ने ‘रेशमा और शेरा’ फिल्म के लिए ‘तू चंदा मैं चाँदनी’ गीत बैरागीजी से लिखवाया, जो सुनील दत्त और वहीदा रहमान पर फिल्माया गया, उसे स्वर-सम्राज्ञी लता मंगेश्कर ने दिया था, उस समय बहुत प्रसिद्ध हुआ और आज भी है। सन् १९६५ में भारत-पाकिस्तान युद्ध में जब पाकिस्तान को करारी हार मिली, तब इसकी खुशी में लाल किले की प्राचीर पर हुए कवि-सम्मेलन में तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के सम्मुख जब यह कविता

जबकि नगाड़ा बज ही गया सरहद पर शैतान का

तो नक्शे पर से नाम मिटा दो पापी पाकिस्तान का

सुनाई, तब प्रधानमंत्री शास्त्रीजी बड़े प्रभावित हुए और उन्होंने कवि वैरागीजी को गले लगा लिया। महावीर स्वामी का उनके जीवन पर गहरा प्रभाव था। यही कारण था कि वे २०-२५ देशों में घूमने के दौरान भी महावीर स्वामी की आहार संहिता का परिपालन करते थे। अभावों में रहकर जीवन भर संघर्ष कर उन्होंने अपने को अनमोल रत्न बना लिया था। उनका जीवन एक कल्प ऋषि-मुनि की तरह था। उनका सान्निध्य पाकर पत्थर दिल भी पारस हो जाया करते थे। वे डॉ. शिवमंगलसिंह सुमन और रामधारीसिंह दिनकर के प्रिय शिष्य रहे। जब कवि दिनकरजी विदा हुए तब बैरागीजी की कलम ने श्रद्धांजलि लिखी, २३ अप्रैल की रात दिनकर ने तिरुपति मंदिर में जाकर भगवान् विष्णु के दर्शन किए और मंदिर प्रांगण में कविता सुनाने लगे। अश्रुधार निकली तो पूरा प्रांगण रोया, फिर रामेश्वरम् में कविता पाठ किया, फिर सोये तो न उठे—अखबार ने अगले दिन लिखा ‘हिंदी का सूरज दिनकर डूब गया, उन्हें प्रातः प्रणम्य दिनकर को शत-शत नमन।’

क्या कहा। क्या कहा कि दिनकर डूब गया

दक्षिण के दूर दिशांचल में, क्या कहा कि गंगा समा गई।

रामेश्वर के तीरथजल में। क्या कहा। क्या कहा

कि नगपति नमित हुआ? तिरुपति के घनी पहाड़ों पर

क्या कहा। क्या कहा कि उत्तर ठिठक गया?

दक्षिण के ढोल नगाड़ो पर। कल ही तो उसका काव्य पाठ

सुनता था सागर शांत पड़ा, तिरुपति का नाद सुना मैंने,

हो गया मुग्ध रह गया खड़ा, वह मृत्यु याचना तिरुपति में।

अपने श्रोता से कर बैठा, वो वहीं कहीं वह समाधिस्थ

क्या कहते हो कि मर बैठा? यदि यही मिलेगा देवों से

उत्कृष्ट काव्य का पुरस्कार, तो कौन करेगा धरती पर

ऐसे देवों को नमस्कार!

इतिहास अपने आप को दोहराता है, उपरोक्त पंक्तियाँ फिर से सजीव हो उठीं। हिंदी माँ के सरस्वती पुत्र बालकवि बैरागी अपने गुरु दिनकर की तरह मौनव्रत धारे चुपचाप इंद्रसभा में दिनकर और सुमन के संग होनेवाले कवि-सम्मेलन में शरीक हो गए।

१३ मई, २०१८ की सुबह वे पारिवारिक मित्र के पेट्रोल पंप के उद्घाटन समारोह में पहुँचे। लगभग ४० मिनट तक सबको हँसाया और गुदगुदाया। तीन बजे मनासा स्थित कवि नगर के आवास पर मित्रों के साथ गपशप की, फिर अपने शयनकक्ष में विश्राम के लिए चले गए। अपराह्न ४ बजे उनका सेवक जब चाय लेकर पहुँचा तो वे एक हाथ सिर पर रख सो रहे थे। उन्हें जगाया, वे नहीं उठे। ऐसा लग रहा था, शांत मुद्रा में वे कोई कविता रच रहे हों। जब हिलाने पर कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई तब तक यह खबर आग की तरह देशभर में फैल गई। साहित्य मनीषी बालकवि बैरागी मौन धारण कर चुपचाप अलविदा कह गए। देश-विदेश में जिसने भी यह समाचार सुना, अश्रुधारा बह निकली। कवि-सम्मेलन के सहपाठी नीरज ने उनके निधन पर कहा, मेरे शरीर का आधा हिस्सा अनायास चला गया और कुमार विश्वास ने श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए कहा, ‘एक और दिनकर प्रकृति की गोद में हम सबको अपनी ओजस्वी रचनाओं का रसपान कराकर चुपचाप चल दिया।’

बालकवि बैरागी का सूत्र वाक्य था—‘साहित्य मेरा धर्म है, राजनीति मेरा कर्म, अपने धर्म और कर्म की शुचिता का मुझे पूरा ध्यान है। बाएँ हाथ से लिखता हूँ, ईश्वर ने मुझे बाएँ हाथ में कलम और पंडित जवाहरलाल नेहरू ने मेरे दाहिने हाथ में शहीदों के खून से रँगा तिरंगा थमाया, मैं दोनों की गरिमा को दाग नहीं लगने दूँगा।’ उन्हीं की ये पंक्तियाँ जिसका जीवनभर अनुसरण किया, ‘मैं मरूँगा नहीं, काम ऐसा करूँगा नहीं’ पंक्तियों को सार्थक कर दिखाया। बालकवि बैरागी एक राष्ट्रकवि के रूप में कृतित्व और व्यक्तित्व को लेकर सदैव हम सबके दिलों में जिंदा रहेंगे। माँ सरस्वती पुत्र को शब्द-श्रद्धा-सुमन अर्पित उन्हीं के इस छंद से—

आज मैंने सूर्य से बस जरा सा यों कहा—

‘आपके साम्राज्य में इतना अँधेरा क्यों रहा?’

तमतमाकर वह दहाड़ा, ‘मैं अकेला क्या करूँ?

तुम निकम्मों के लिए मैं ही भला कब तक मरूँ?

आकाश की आराधना के चक्करों में मत पड़ो

संग्राम यह घनघोर है, कुछ मैं लड़ूँ कुछ तुम लड़ो।’

 —लालबहादुर श्रीवास्तव
शब्द शिल्प, एल.आई.जी. ए-१५
जनता कॉलोनी, मंदसौर-४५८००१ (म.प्र.)
दूरभाष : ९४२५०३३९६०

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