मन उचट गया

मन उचट गया

मन उचट गया तो उचट गया

अब लौट गाँव को क्या जाना।

 

हर ओर उदासी फैली है

हर ओर अजनबी वीराना

विश्वासों के पीपल सारे

धोखों की आँधी में उखडे़

संबंधों की कोयल भी गुम

हर ओर बाग उजडे़-उजडे़

अब किसको सही कहा जाए

क्या गलत किसी को ठहराना!

 

जब थकेमुसाफिर पनघट पर

आए फिर प्यासे लौट गए

अब सीख लिए हैं अपनों ने

भी खूब बहाने नए-नए।

 

सबने गढ़ लिया बहाने से

हर रोज नया इक अफसाना

मन से मन तो मिल सकता है

आखिर कैसी मजबूरी है

शहरों में खुद को बसा लिया

पर मन की चाह अधूरी है

 

माना तुम दूर गए लेकिन

रख सकते थे आना-जाना

 

—अनुराधा शर्मा
बी.एस.एम. इंटर कॉलेज के पीछे
मकान सं.-४, नेहरू नगर
रुड़की (उत्तराखंड)
दूरभाष : ०९०२७०८३२३०

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