कैंसर से पहली मुलाकात और उसके बाद

कैंसर से पहली मुलाकात और उसके बाद

कैंसर का नाम सुनते ही हमारी आँखों के सामने एक भयावह चित्र खिंच जाता है। रूह काँप उठती है। मन एक अज्ञात आशंका से सिहर उठता है। लगता है, भुक्तभोगी के मृत्युदंड की घोषणा कर दी गई हो। आज के २०-२५ वर्ष पहले यह बात कुछ हद तक सही थी, परंतु आज जब उसके शीघ्र और सम्यक् निदान की सुविकसित व्यवस्था है, चिकित्सा के लिए विकिरण चिकित्सा की अत्यंत आधुनिक मशीनें हैं और बड़ी सशक्त कैंसर मारक रासायनिक औषधियाँ हैं, उस समय यह कहना कि कैंसर मारक रोग है, सच के परे है।

मेरा कैंसर से सबसे पहला वास्ता आज से साठ साल पहले सन् उन्नीस सौ अट्ठावन में हुआ था। मैं आठवीं कक्षा में था। होली के दिन थे। उन दिनों हर गली-मोहल्ले में लोग अलग-अलग होली जलाते थे। इसमें किशोर-युवा बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते थे। होली की लकड़ी जुटाने की तैयारी भी गली के किशोर करते थे। पंद्रहियों पहले लकड़ी चुराई जाती थी। पेड़ों की सूखी-अधसूखी डालियाँ तोड़कर इकट्ठा की जाती थीं। किसी के घर का टूटा दरवाजा, टूटी-फूटी कुरसी, चारपाई का पाया किशोर दल चुपके से उठा लेता था, फिर किसी गुप्त जगह छिपाकर रख देता था। होली की रात होलिका दहन के स्थान पर सारी लकडि़याँ रख दी जाती थीं। उन्नीस सौ अट्ठावन की उस रात भी यही हुआ। होलिका जलने लगी। अचानक युवा दल में कानाफूसी होने लगी। सर्गा भैया अब नहीं रहे। क्या हुआ सर्गा भैया को? सर्गा भैया पूरे मोहल्ले के नवयुवकों के हृदय-सम्राट् थे। प्रतिष्ठा मूर्ति थे। गोरा-चिट्टा चेहरा, अच्छी लंबाईवाला बलिष्ठ शरीर, घुँघराले बाल, हमेशा मुसकराती आँखें, चमकते दाँत, मस्तानी चाल और हर मुसीबत में खड़े रहनेवाले सर्गा भैया पर कौन न फिदा होता? इंटर-बी.एस.सी. के तुरंत बाद उन्नीस की उम्र में ही उन्हें नेशनल डिफेंस एकेडेमी में चुन लिया गया। अभी ट्रेनिंग काल में ही थे कि उन्हें अकसर ज्वर होने लगा। जाँच करने पर पता चला कि उन्हें खून का कैंसर है। हर संभव कोशिश के बावजूद सर्गा भैया अपने जीवन का इक्कीसवाँ वसंत नहीं देख पाए। होली जलने के समय जब यह खबर गली में मिली तो सारे किशोर दल को मानो साँप सूँघ गया। किसी को काँटो तो खून नहीं। रंग में भंग हो गया। अभी तक हम लोगों ने चेचक सुना था। प्लेग की भयंकरता के बारे में बड़े-बूढ़ों से सुन रखा था। यह कैसी बीमारी है, जो हँसते-खेलते नौजवान को लील गई? उस समय सबने यही कहा, भैया सब बीमारी हो, पर कैंसर किसी को भी न हो। दुश्मन को भी नहीं।

सर्गा भैया का हादसा हुए अभी कुछ महीने ही बीते थे कि मेरे पिताजी ने बताया उनके गुरु वैद्य सरयू प्रसाद त्रिपाठी, जो उन दिनों (१९५६-१९५८) लखनऊ के प्रसिद्ध वैद्यों में गिने जाते थे, पेट के दर्द से पीडि़त रहने लगे। उन्हें स्थानीय मेडिकल कॉलेज के चिकित्सकों ने बंबई जाकर इलाज की सलाह दी है। वैद्यजी का पुत्र बहुत छोटा था, इसलिए मेरे पिताश्री उन्हें लेकर बंबई गए। वहाँ पता लगा कि वैद्यजी को पेट का कैंसर है। ऑपरेशन हुआ, सफल रहा। वे स्वास्थ्य लाभ करने लगे। बंबई प्रवास में खर्चा चलाने के लिए उन्होंने बैंक में चेक भेजा। बैंक ने हस्ताक्षर न मिलने के कारण चेक लौटा दिया। वैद्यजी घबरा गए, अब क्या होगा? उनके हाथ-पाँव फूल गए। इस सदमे में उन्हें तीव्र हृदयाघात हुआ और उनके प्राण-पखेरू उड़ गए। यह दूसरा दृष्टांत था, जिसने मेरे किशोर मानसपटल पर कैंसर और हृदयाघात की भयंकरता के विषय में अमिट धारणा बना दी।

तीसरा प्रकरण भी अपने में अनूठा अनुभव लेकर आया। उन्नीस सौ बासठ में मैं जब एम.एम.बी.बी.एस. पढ़ाई के लिए काशी हिंदू विश्वविद्यालय के चिकित्सा विज्ञान महाविद्यालय के लिए चयनित हुआ और पहली गरमी की छुट्टियों में लखनऊ अपने घर आया तो पता चला, मेरे हाई स्कूल के दिनों के पूर्व प्रिंसिपल श्री गंगा नारायण टंडनजी मेडिकल कॉलेज के सर्जरी वार्ड में प्रोफेसर एस.सी. मिश्रा की देखरेख में भरती हैं। गंभीर रूप से बीमार हैं। मेरे पिताश्री मुझे वहाँ ले गए। मैंने देखा, प्रिंसिपल साहब काफी अशक्त हो चले थे। उनका चेहरा बिल्कुल सफेद पड़ गया था। पेट की झिल्ली में पानी इकट्ठा होने के कारण पेट फूलकर कुप्पा हो गया था। पेट के ऊपर नीली-नीली नसें फैली हुई थीं, मानो नीले विषधर किसी श्वेत चादर पर फैले हुए हों। पता चला कि उन्हें गुरदे का कैंसर है। कैंसर की जड़ें संपूर्ण पेट में फैल चुकी थीं। उदरावरण के अंदर भी कैंसर की कोशिकाएँ यत्र-तत्र-सर्वत्र विराजमान थीं। स्वयं प्रोफेसर मिश्रा भी प्रिंसिपल साहब के भविष्य को लेकर अत्यंत चिंतित दिखाई पड़े। यह वह समय था, जब एम.एम.बी.बी.एस. प्रथम वर्ष में ही मेरा कैंसर से सीधे-सीधे साक्षात्कार हो गया। कितनी कू्रर होती हैं कैंसर कोशिकाएँ, यह मैंने निज नयनों से प्रिंसिपल साहब को देखकर अंदाज लगा लिया। कहना न होगा कि तीन महीने के अंदर ही प्रिंसिपल साहब इस दुनिया से चल बसे। वे ऐसे प्रिंसिपल थे, जिनके प्राचार्य कक्ष से बाहर आते ही पूरे स्कूल में सन्नाटा छा जाता था, पर अब कैंसर ने उनका ही दम तोड़ दिया था।

एम.एम.बी.बी.एस. तृतीय वर्ष में आते-आते कैंसर से मेरा अच्छा-खासा परिचय हो गया। मेडिसिन के आचार्य अकसर कहते सर्जरी क्या है—लंप (गाँठ /सूजन), बंप (गुमड़ा) और अल्सर (घाव) और यही लंप, बंप या अल्सर जब ढीठ हो जाए तो कैंसर की आशंका करनी चाहिए। उन्हीं दिनों स्तन-कैंसर (महिला-पुरुष), लिंग-कैंसर, अस्थि-कैंसर और चक्षु कैंसर से साक्षात्कार हुआ। अस्पताल में दृश्यमान ये घटनाएँ हमारे अंतर्मन पर उतना स्थायी प्रभाव नहीं डालतीं, जितना किसी आत्मीय के साथ हुई ऐसी दुर्घटना। एक दिन मैंने सुना, स्कूल के दिनों का मेरा इक्कीस वर्षीय पड़ोसी साथी, जिसे मैनपुरी तंबाकू खाने का बहुत शौक था, स्थानीय किंग जार्ज मेडिकल कॉलेज अस्पताल में यकृत कैंसर से पीडि़त होकर भरती है। भरती के दौरान उसे अचानक खून की उलटी हुई और उसका प्राणांत हो गया। यह पहला अवसर था, जब मुझे सुरती-तंबाकू और कैंसर, वह भी यकृत-कैंसर के बीच परस्पर संबंध की पुख्ता जानकारी हुई। मुझे वह दिन भी याद आ गया, जब उस मित्र ने स्कूल जाते समय अपनी जेब से अखबार के कागज में लिपटी एक पुडि़या से बदबूदार मैनपुरी तंबाकू निकाली और बोला, श्रीधर! इसे लो, बड़ा मजा आएगा। उस समय मुझे अपने पिता के दिए संस्कार याद आ गए। मैंने कहा, उन्हें पता लगेगा तो बड़ी पिटाई होगी, मैं नहीं लेता। उस दिन के बाद से उसने फिर मुझे वह विष देने की हिम्मत-हिमाकत नहीं उठाई। मैनपुरी तंबाकू के अभिशाप से मैं तो बच गया, पर मेरा मित्र उसकी बलि चढ़ गया। वह कच्ची उम्र थी, न उसे मालूम था, न ही मुझे कि तथाकथित आनंद देनेवाली वस्तु आगे चलकर प्राणलेवा सिद्ध होगी।

अपने पड़ोसी सहपाठी की कैंसर से कारुणिक मृत्यु के समाचार से उबर ही पाया था कि घर से सूचना मिली कि पंडित रामआसरे शुक्ल, जो मेरे प्राइमरी के अध्यापक और मेरे पिता के घनिष्ठ मित्रों में थे, देखने में अत्यंत बलिष्ठ और अच्छे खासे पेट (तोंद) वाले व्यक्ति थे, अस्पताल में भरती हैं। उन्हें अग्नाशय का कैंसर बताया गया है। उस समय (१९६६) यह कल्पना भी नहीं थी कि अत्यंत मोटापा या भीषण तोंदवाले व्यक्तियों को पेट के कैंसर का प्रबल खतरा होता है। यह बात २००० के बाद छनकर आ रही है—मोटापा अनेक रोगों का जनक है—ऐसे लोगों में पेट के कैंसर की प्रबल संभावना रहती है।

एम.एम.बी.बी.एस. पास करने के बाद से स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के बीच कैंसर के नाना स्वरूप देखने को मिले। इससे आक्रांत मेरे स्वजन-परिजन, मित्र, शुभैषी, गुरुजन, ज्ञात-अज्ञात सभी लोग रहे हैं। कैंसर अब उतना भयानक नहीं रहा। उसका पहले जैसा वीभत्स, कुरूप और रोमांच करनेवाला स्वरूप भी बदल गया है। इस शुभ समाचार के पीछे आजकल की अति आधुनिक नैदानिक सुविधाएँ हैं, विकसित चिकित्सा पद्धतियाँ हैं। आइए, इस सुखद पक्ष के भी एक-दो उदाहरण देख लें। बात दो हजार दस के आस-पास की है। मेरे एक अत्यंत निकट, प्रतिष्ठित, संभ्रांत और सम्मानित शुभेक्षु, जो सत्तर पार कर चुके थे, उन्हें गला बैठने की शिकायत हुई। कहना न होगा, वे धूम्रपान और तंबाकू से कोसों दूर थे। विशुद्ध शाकाहारी और सात्त्विक व्यक्ति थे। शुरू-शुरू में गला बैठने की शिकायत को वाणी थका नया स्वर यंत्र प्रदाह समझकर ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया। लेकिन जब तीन हफ्ते बीत जाने के बाद भी उनका गला ठीक नहीं हुआ तो सबका माथा ठनक गया। साधारण स्वरयंत्र परीक्षण (लैरिंगोस्कोपी) से कोई बात नहीं बनी तो वीडियो द्वारा स्वरयंत्र परीक्षण का निर्णय लिया गया। मालूम पड़ा, स्वरयंत्र की ऊपरी सतह में मटर सरीखी छोटी गाँठ है। उसकी तुरंत लेजर सर्जरी की गई। अब वे पूर्णतः ट्यूमर मुक्त हैं। उनकी आवाज पहले की अपेक्षा काफी अच्छी है।

इसी से मिलता-जुलता एक और आशाजनक, प्रेरक और उत्साहवर्धक प्रसंग है। ये महानुभाव पेशे से कैंसर-सर्जन हैं। उम्र यही बासठ के करीब होगी। कुछ दिनों से उन्हें पेशाब में शिकायत हुई। पेशाब रुक-रुककर आने लगा। उसकी धार कम होने लगी, फिर उसमें जलन होने लगी। जाँच करने पर अल्ट्रासाउंड द्वारा पता चला कि प्रोस्टेट (गदूद ग्रंथि) बढ़ गई है और मूत्रपथ में बाधा उत्पन्न कर रही है। गदूद की वृद्धि को रोकने के लिए अल्फा ब्लॉकर समूह की औषधि दी गई। कोई विशेष लाभ नहीं हुआ। एक बार उन्हें अत्यंत तेज मूत्र संक्रमण हो गया। पेशाब में तीव्र जलन के साथ-साथ जाड़ा देकर कँपकँपी के साथ तेज बुखार आया। नस के द्वारा एंटी बायोटिक औषधियाँ देनी पड़ीं, तब कहीं जाकर इन्फेक्शन पर काबू पाया जा सका। इसी बहाने एक सिरे से फिर पूरी जाँच हुई। खून, पेशाब, पी.एस.ए., पेट-मूत्रपथ का अल्ट्रासाउंड, सीटी स्कैन और एम.आर.आई. आदि-आदि। पता लगा, यह प्रोस्टेट की सामान्य अभिवृद्धि न होकर कैंसर सरीखी बीमारी है। अल्ट्रासाउंड की मदद से गदूद की बायप्सी की गई। उसकी सूक्ष्मदर्शी और जैव रासायनिक जाँच से पुष्टि हुई कि उन्हें प्रोस्टेट कैंसर है।

अभी कैंसर अपनी आरंभिक अवस्था में था। इसके बावजूद उनका पेट-स्कैन भी कराया गया, कहीं कैंसर ने चुपचाप अन्य अंगों को, विशेषतः कमर की हड्डियों को प्रभावित न किया हो। सौभाग्य से कहीं और कैंसर का कोई अवशेष नहीं मिला। अब यक्षप्रश्न यह था कि किया क्या जाए? आखिर वे स्वयं कैंसर-सर्जन जो ठहरे। रोबोटिक सर्जरी द्वारा ट्यूमर का समूलोच्चाटन किया जाए या विकिरण द्वारा उसका संपूर्ण दहन। बहुत तर्क-वितर्क के बाद विकिरण द्वारा उनका इलाज हुआ। वे भले-चंगे हो गए। विकिरण के दौरान वे अपना चिकित्सा कार्य करते रहे। सीमित, छोटी-मोटी सर्जरी भी करते रहे। अब वे पूर्णतः ठीक हैं। अपने काम में व्यस्त हैं। सतत लोकोपकार कर रहे हैं।

अब ऐसा समय आ गया है, जब एक ही व्यक्ति को कभी-कभी एक नहीं, दो-दो या तीन-तीन स्थानों पर विभिन्न प्रकार के कैंसर का प्रहार झेलना पड़ता है। कैंसर के अतिरिक्त उसी व्यक्ति को हृदय रोग अथवा डायबिटीज की भी बीमारी हो सकती है। इन सब विभीषिकाओं के बाद भी अब कैंसर मृत्यु का पर्याय नहीं है। अब कैंसर के निदान, उसकी सही पहचान, उचित इलाज की इतनी अच्छी व्यवस्था सुलभ हो गई है, जिसके कारण अधिकांश कैंसर पूर्णतः ठीक हो जाते हैं, बशर्ते उसे आरंभिक अवस्था में पकड़ लिया जाए और जल्दी उचित इलाज शुरू कर दिया जाए। हाथ कंगन को आरसी क्या? देखिए न हमारे वरिष्ठतम राजनीतिज्ञ शरद पवारजी, प्रसिद्ध क्रिकेट खिलाड़ी युवराज सिंह और अभिनेत्री मनीषा कोइराला उपर्युक्त कथन के ज्वलंत उदाहरण हैं। हम आशा करते हैं कि हमारे लोकप्रिय कलाकार इरफान, प्रसिद्ध अभिनेत्री सोनाली बेंद्रे तथा गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर परिकर भी शीघ्र ही इसके चंगुल से मुक्त होकर हमारे समक्ष स्वस्थ सानंद प्रस्तुत होंगे।

श्रीधर द्विवेदी
हमदर्द इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस ऐंड रिसर्च
एसोसिएटेड हकीम अब्दुल हमीद सेंटेनरी हॉस्पीटल
जामिया हमदर्द (हमदर्द यूनिवर्सिटी)
नई दिल्ली-११००६२
दूरभाष: ९८१८९२९६५९

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