हाँ, वह राष्ट्रपति से नाराज थी

हाँ, वह राष्ट्रपति से नाराज थी

‘‘बुढि़या अम्माँ, चलो उठो! मुन्नाच्चा का कार्यक्रम आवै जात है टी.वी. मा।’’ चौदह वर्षीय अतुल जाकर दादी के सिरहाने खड़ा हो गया था। इसी वर्ष वह कक्षा नौ में गया था और गाँव के पास ही एक इंटर कॉलेज में पढ़ रहा था। पिछले सप्ताह जब से उसके मुन्नाच्चा को राष्ट्रीय शिक्षक सम्मान मिला है, तब से उसका पढ़ने का उत्साह दुगुना हो उठा है। आखिर मुन्नाच्चा भी तो इसी गाँव से निकले हैं। यहाँ से पढ़ाई की, बनारस जाकर ऊँची डिग्री ली और वहीं के एक कॉलेज में लैक्चरर हो गए। पापा बता रहे थे कि वे इतने अच्छे लैक्चरर हुए हैं कि राष्ट्रपति ने उन्हें पुरस्कृत करने के लिए चुन लिया। अतुल की आँखों में एक सपना डोल उठा था कि वह भी अपने मुन्नाच्चा की तरह बनेगा।

‘‘कउन है?’’ आहट पाकर अपनी चारपाई पर सीधी लेटी बुढि़या अम्माँ बोल उठीं। कहीं कुत्ता तो नहीं आ गया। उनका हाथ चारपाई से टिकी अपनी लाठी पर चला गया था। कई बार उनके कच्चे कमरे का किवाड़ खुला रह जाता है और चारपाई के नीचे रखे लोटे के पानी को कुत्ता आकर सूँघने लगता है। कई बार अनुमान से ही वे लेटे-लेटे लाठी को जमीन पर पटक देती हैं, ताकि यदि आ गया हो तो भाग जाए।

‘‘हम हैं बुढि़या अम्माँ, तुल्लू।’’ अतुल ने ऊँचे स्वर में कहा। वह जानता था कि बुढि़या अम्माँ ऊँचा सुनती हैं।

‘‘हाँ, बोलउ। का है? बहिर थोड़े हइ, जो चिल्लात हौ।’’ लगभग नब्बे वर्षीया राम प्यारी देवी किंचित् नाराज हो उठीं पोते पर।

‘‘पापा बोले हैं कि मुन्नाच्चा का प्रोग्राम टी.वी. मा आवे जात है। जाओ, बुढि़या अम्माँ को लिवाय लाओ।’’ अतुल ने अपना मुँह दादी के कान के पास सटा दिया।

‘‘अबहिं?’’ रामप्यारी देवी पूछीं।

‘‘नाही, आधा घंटा मा।’’ अतुल ने उत्तर दिया।

‘‘एतना देर ना बैठ पइबै। कुछ देर में आओ लै चलौ।’’ रामप्यारी देवी ने पैताने रखे बिस्तर पर अपना पैर फैला लिया। आँखें खोल लीं। झुर्रियों भरे चेहरे पर बड़ी-बड़ी आँखों में चमक के साथ नमी तैर उठी। उन्होंने आँचल से नमी को रगड़कर सुखा लिया और धीरे से अपने ही ऊपर नाराज हो उठीं—‘‘दहीजरी, शुभ में भी रोवै लागत हैं।’’ उन्होंने अपनी आँखों को कोसा था। उस दिन भी तो आँखें भावुकता में बरसने लगी थीं, जब बड़ेवाले बेटे ने बाजार से अखबार में छपी मुन्ना की फोटो लाकर उनके सामने फैला दिया था—

‘‘अम्माँ, ई देखो, मुन्ना की फोटो छपी है अखबार मा।’’

‘‘काहे रे?’’ वे घबरा उठी थीं।

‘‘अरे घबराओ नहीं, उनको सम्मान मिला है राष्ट्रपति के हाथों।’’ बड़े बेटे ने उन्हें आश्वस्त किया।

‘‘फुरै? लाओ, देखीं।’’ बेटे के हाथ से लेते हुए उन्होंने अपने सामने अखबार उलटा ही फैला लिया था।

‘‘ऐसे नहीं, ऐसे देखो।’’ बड़े बेटे ने अखबार सीधा करते हुए उनके सामने फैला दिया और मुन्ना की फोटो पर उँगली रख दी थी। सामने मुन्ना की तसवीर थी। नीचे कुछ लिखा था। उन्होंने अपनी उँगलियों से तसवीर को मुट्ठी में भरने की कल्पना करते हुए होंठों से लगा लिया और बुदबुदाईं—‘‘जुग जुग जिओ हमार बच्चा!’’ उनकी आँखें भर आई थीं।

‘‘फिर रोने लगीं अम्माँ? अपनी आँख फोड़ लोगी, तभी मानोगी?’’ बडे़ बेटे ने डाँटा था।

‘‘फोटोइया तनी मद्धिम छापे हैं मुन्ना का?’’ बड़े बेटे की डाँट की परवाह न करते हुए उन्होंने पूछा था।

‘‘नाहीं, अखबार में ऐसे ही छपता है, तनी मद्धिम। वैसे भी तुम्हारी आँख का ऑपरेशन हुआ है न अम्माँ! अभी नया-नया लेंस पड़ा है और डॉक्टर परहेज करने के लिए कहा है, लेकिन तुम मानती ही नहीं।’’

‘‘अब केतना परहेज करी? चौबीसों घंटा करिया चश्मा कैसे लगाईं, सूतत-बइठत?’’

वे डॉक्टर की सलाह पर भुनभुनाई थीं। एक बार फिर मुन्ना की तसवीर को उँगलियों से छूकर अपने होंठों से लगाकर चूमा था और रो पड़ी थीं।

‘‘ऊतो हमरे मुन्ना और उनकी दुलहिन अस रहा कि बनारस ले जाके हमार आँख बचा लीहिन, नाही त तू सबन मिलके त फोरी डारे रहे।’’ उन्होंने बड़े बेटे को मीठी झिड़की दी।

‘‘हाँ भाई, हम सब तो नालायक ही हैं। एक मुन्ना और उनकी दुलहिन तुम्हरे लिए लायक हैं। हम लोग तो इहाँ फरेन कूटत हैं।’’ बड़ा बेटा नाराज हो उठा।

‘‘ऊदूनों अस त केहू लायक नाही भवा हमरे सगरे खानदान मा। तुहूँ पढ़ा होता त पढ़ाइत।’’ उन्होंने बड़े बेटे की दुखती रग पर हाथ रख दिया।

‘‘हाँ-हाँ, इहाँ खेत में खून-पसीना हम बहाएँ, तुम्हारा सेवा-सभाखन हम करें और तारीफ चौबीस घंटा उन दोनों लोग का।’’

‘‘काहे कुढ़ा जात है। उहौ दूनों अइहैं त हमार सेवा करिहैं। अबहीं नौकरी-चाकरी में फँसा हयन।’’

‘‘हाँ, कुछ अभी कर दे रहे हैं, कुछ रिटायरी के बाद करके दिखा देंगे।’’ बड़ा बेटा व्यंग्य से हँसा था।

‘‘काहे ऐसे कहत हौ परभू? का ना करत हैं ऊ दोनों? हमार आँख फूटि गई रहे त लेंस लगवाए, जब-जब बीमार होइत है, तब-तब धउरा आवत हैं। उनकर दुलहिन त एतना तक कहि दिहिस कि...।’’

‘‘तोहका नोट से तौल दीहें पर मरै ना दीहें, यही न? पचास बार गाँव-पुर से सुन चुके तुम्हारी यह बात। कथनी और करनी में बड़ा फर्क है अम्माँ। फिर ऊ लोग कर ही देंगे तो कौन बड़ी बात है? खँचिया भर नोट कमाते हैं दोनों परानी। रिटायरी के बाद एतना पिंशिन मिलेगी।’’

परभू ने अपनी दोनों हथेलियों को आपस में जोड़कर गोलाकर आकृति बनाई थी।

‘‘जाओ, मुराही ना करो। ओहका हिस्सा भी लिहे बैठ हौ और आँखियो फूटत है!’’ उन्होंने बड़े बेटे को डाँट दिया था।

नब्बे से ऊपर उम्र हो चली थी उनकी, पर घर में बेटे, बहू, पोते और उनकी भी बहुओं पर रामप्यारी देवी का अनुशासन अभी बरकरार था। स्थूल-लंबी देह पर हलकी ललाई लिये गोरा रंग आज भी उनकी पुरानी सुंदरता की कहानी कहता। चेहरे पर झुर्रियाँ पड़ गई थीं, पर अच्छे खान-पान और निर्द्वंद्व जीवनचर्या के कारण वृद्धावस्था उन्हें जर्जर नहीं कर पाई थी। लाठी लेकर वे धीरे-धीरे पूरे गाँव का चक्कर लगा लेती थीं। लगभग सभी लोग उनसे उम्र में छोटे थे। जिस घर में वे पहुँच जातीं, बहुएँ आँचल से उनके पाँव छूतीं और पीढ़ा-पानी पूछतीं। वे भी सबका हालचाल पूछतीं, चलते समय मन भर आशीष देतीं और आकर भग्गू बाबा के चबूतरे पर बैठ जातीं। कुछ देर पीपल के उस पुराने पेड़ की जड़ों में रखे दो-तीन गोल-अनगढ़ पत्थरों की ओर देखकर हाथ जोड़े कुछ बुदबुदातीं और फिर आँचल से भर आई आँखों को पोंछतीं। गाँव भर की औरतों को पता था कि रामप्यारी काकी के पति जब तक जीवित थे, प्रतिदिन नहा-धोकर भग्गू बाबा के थान पर जल-अक्षत अवश्य चढ़ाते थे। बीस वर्षों से ज्यादा ही हो गए थे उनको संसार से विदा हुए, पर प्रतिदिन रामप्यारी देवी को वे याद आते थे। एक दिन पड़ोसवाली चौबाइन को वे बता रही थीं—

‘‘बहुत गरीबी मा दिन काटे दुलहिन। तुहरे चच्चा बंबई कमात रहेन। मोटा काम करत रहेन। हम इहाँ पाँच-पाँच बच्चन का लेके अकेले रहत रहिन। कब्बो माड़-भात त कब्बो जोन्हरी से काम चल जात रहा, बाकी केहू जाना नाही कि मिसराइन कइसे काम चलावत हैं। भाई लोगन के भी कब्बउ ना बतायेन हम। लडि़कन खेते में काम करिके त पढ़ै जाँय। बुढ़ऊ साल में दुइ बेर घरे आवैं। थोड़ा-बहुत जौन जुटा रहे रकम, उही से खेत खरीद लें। एक हमका बदे करधनी लाए रहेन चानी क। उके गिरो रखके खेते क कर्जा चुकावें। बड़ी सुभ रहै करधनी।’’

‘‘काकी, करधनिया रखे हइन कि नाय?’’ दुलहिन ने मजाक में पूछ लिया।

‘‘बुढ़ऊ मरै से पहले कहे रहिन कि ई करधनी तू मुन्ना के दुलहिन के दे दीहा। ऊ बहुत सरियारिक हैं, हमार बच्चा।’’

‘‘तो देइ दिहिन का?’’ दुलहिन ने मउनी बीनते हुए पूछा। अपने हाथ में थामी टेकुरी से वे मूजवाले किनारे में छेद कर रही थीं और पास ही खटिया पर बैठी रामप्यारी काकी से बतिया भी रही थीं।

‘‘तिलरी काटत हौ का दुलहिन?’’ रामप्यारी देवी का ध्यान मउनी में बन रही डिजाइन की ओर चला गया।

‘‘हाँ चाची, होली नजदीकै है न! सोचत हई कि जल्दी तिलरी काटके पूरा कर देईं, नाही त खर दिन आय जइहैं।’’

‘‘नीक लागत हय। एकरे बाद एक लाइन गुलाबी लगा दीहो त खिल जाई।’’

रामप्यारी देवी ने दुलहिन को मउनी के रंग के बारे में समझाया।

‘‘त दै दिहो ऊ करधनी काकी?’’

‘‘हाँ, लेकिन परभू के पता नाहीं। सबका हिस्सा चहिहैं। अरे! छोटइयैं से हमार मुन्ना घरे से दूर-दूर होइ गएन। आखिर वोहू का हिस्सा त इहै लोग जोतत-बोअत हयन। लेकिन संतोष नाय है। अबही इमली का पेड़ बिका रहा त हम कहेन कि मुन्ना का हिस्सा हमैं दइ दो। ऊ जब अइहैं त हम देइ देब। त परभू कहै लागन कि ऊ साल-दू साल बाद कब्बौ आवत हैं। खेती-बारी में खर्चा-पानी लागत है त ऊ देत है का? अब तुमही बताव दुलहिन, जब ऊ सरकार का नौकरी करत हैं त कइसे रोज धौरा अइहन? रिटायरी के बाद अइहैं त ऊहो आपन देखिहैं। कौनो गलत कहे दुलहिन?’’

रामप्यारी देवी ने हुँकारी की उम्मीद में दुलहिन की ओर देखा।

‘‘हाँ, काकी। ठीकै कहिन आप।’’

‘‘करेजवा भड़छत है मुन्ना खातिर। छोटइयैं से दूर। अब उनकर रिटायरी चार-पाँच बरिस में हो जाई त घरे आके रहै लगिहैं। ऊ दूनों परानी हमार बहुत धियान रखत हैं। बुढ़ऊ कभी बहुत किरेन दून्नो जनी। हमरो पार लगा दिहैं।’’

रामप्यारी देवी की आँखों में उम्मीद की गंगा लहरा उठी थी।

इस समय अपनी चारपाई पर लेटे-लेटे भी वे मुन्ना को ही याद कर रही थीं। उन्हें वह घटना याद आई थी, जब मुन्ना गाँव के ही मिडिल स्कूल में कक्षा सात में गया था। यही तुल्लू की उम्र रही होगी। स्कूल में मास्टर ने ४ किताब न होने से मुन्ना की छड़ी से पिटाई की थी और कक्षा से बाहर कर दिया था और कहा था कि कल से बिना किताब-कॉपी के दिखाई मत पड़ना। मुन्ना उनके सामने आकर जिद पर अड़ गया था। बुढ़ऊ उस समय बंबई थे। पैसा भी नहीं भेजे थे। बक्से में कपड़ों के नीचे कुछ मुड़े-तुड़े नोट और सिक्के उन्होंने सँभालकर रख छोड़े थे कि हारे-गाढ़े काम आएँगे। मुन्ना की जिद पर वे पैसों को अपने आँचल के खूँटे में बाँधकर उसे लिवाकर बाजार गई थीं। मुन्ना बिना सोचे-समझे दुकानदार से गणित, हिंदी, अंग्रेजी और भी न जाने कौन-कौन सी किताब-कॉपी माँगने लगा था। उनकी तो जान ही सूख गई। इतनी किताबें एक साथ खरीदने भर के पैसे तो नहीं थे। फिर सारा पैसा किताबों में लग जाएगा तो साबुन-तेल किस पैसे से आएगा? अनाज-पानी तो माना घर में है, पर माचिस, नमक, हींग, मसाला तो खरीदना पड़ेगा न। उन्होंने मुन्ना को समझाया था—

‘‘पहिले एक किताब पढ़ के खतम कै लो फिर दूसर खरीदो। बारी-बारी से पढ़ा जात है किताब, एक साथै नाई।’’

पर मुन्ना तो जिद पर आ गया था—‘‘नहीं अम्माँ, मास्टर साहब फिर मारेंगे। हर घंटा में अलग-अलग विषय की किताब पढ़ावा जात है।’’ मुन्ना ने उन्हें समझाने का प्रयास किया था।

उन्होंने डाँटते हुए कहा, ‘‘मुराही न बतिआओ। पहिले एक किताब पढि़ के खतम करि लो फिर दूसर-तीसर बाद मा खरिदिहौ। ई कौन पढ़ाई करत हौ कि सौ ठे किताब एक्कै साथे पढि़हौ। पागल समझे हो का हम्मै।’’

‘‘नहीं अम्माँ, तुम समझती नाही हो।’’

‘‘त ल्यौ, हम नाही समझित है त तोहैं समझा देईं।’’ उन्होंने दुकान के पास पड़े अरहर का रहठा उठाया था और मुन्ना की पीठ पर सट-सट कई बार मारा था। मुन्ना बिलबिला उठा था।

‘‘बोलौ, जिद्द करिहौ? एक साथे एतनी किताब कोहू पढ़ा है कि तोही पढि़हौ?’’ वे मुन्ना को लगातार गुस्से में पीट रही थीं और बड़बड़ाती जा रही थीं। एक तो पैसे-रुपए की तंगी, दूसरे मुन्ना की जिद।

उस घटना को याद कर रामप्यारी देवी को बेचैनी होने लगी थी। वही मुन्ना पढ़-लिखकर अब मास्टर बन गया है। उनसे कितनी दूर चला गया है। जब भी आता है तो हँसकर याद करता है—‘‘अम्मा, तू किताब एक साथे खरीदे खातिर केतना पिटे रहू हम्मै!’’

‘‘हाँ बच्चा, तब्बै न आज सबसे बड़ी नौकरी पाए हौ। का पता रहा रे वो समय। पढ़ी-लिखी तो रही नाही हम कि पता रहै कि केतना किताब-कॉपी लागत है। अब सबका बाल-बच्चन का बैग मा भरा-भरा किताब कॉपी देखीके समझ में आवत है कि हम अपन मुन्ना कै कस पीटे रहेन!’’ उनकी आँखें पश्चात्ताप से भर आतीं।

मुन्ना उन्हें भावुक हो अँकवार में भर लेते। वे मुन्ना के गाल-माथे पर अपने चुंबन की झड़ी लगा देतीं, मानो उस गलती के दाग धो रही हों।

रामप्यारी देवी बेचैनी में उठकर बैठ गई थीं चारपाई पर। दोनों पैर नीचे लटक रहे थे और एक हाथ अपने डंडे पर था। उन्हें प्यास सी महसूस हो रही थी। उन्होंने तुल्लू को आवाज दी—

‘‘तुल्लू, हे तुल्लूऽऽऽ।’’

तुल्लू दूर था शायद। कहीं से कोई जवाब नहीं आया था। उनका यह कमरा घर से थोड़ी दूर पड़ता है। घर में रातभर सब हल्ला-गुल्ला मचाए रखते थे। टी.वी. तो चौबीस घंटे खुली रखती थीं बहुएँ। खाना बनाने के बीच में आते-जाते ठमककर देख लेती थीं। दोपहर और रात में तो घर जैसे मछली बाजार बन जाता है। टी.वी. में एक ओर गाना-बजाना चलता है तो दूसरी ओर छोटे छोटे बच्चों को लेकर उसके सामने बैठी बहुएँ, बेटे उनके सास-ससुर सब एक साथ वही ठट्ठा-हँसी देखते हैं। कोई लाज-लिहाज नहीं। वही नंगापन सास भी देखे, बहू भी, बेटा भी, बाप भी। नंगी-नंगी औरतें नाचती हैं टी.वी. में। रामप्यारी देवी अपनी चारपाई पर लेटे-लेटे कुढ़ती रहतीं। कभी-कभी गुस्से में आकर अपना डंडा चला देतीं टी.वी. की ओर।

‘‘फूटि जाई तब्बै मनिहौ तू सबन।’’

‘‘अरे बुढि़या अम्माँ, बनावे में पइसा घर ही के लागी ना! अस करो, तोहार खटिया हम दुआरे वाले बइठका में डाल देइथ। तू आराम से वहीं पड़ी रहू और राम-राम भजू।’’

बड़ेवाले पोते ने एक दिन रास्ता ढूँढ़ लिया था और उनकी चारपाई बैठक के छोटेवाले कमरे में डाल दिया था। अब दिन-दिन भर इधर कोई आवाज ही नहीं सुनाई पड़ती। सब लोग घर में बंद हो जाते हैं। वे अकेली इस कोठरी में अपनी चारपाई पर लेटी या बैठी रहती हैं। कभी-कभी लेटे-लेटे गुनगुना उठती हैं—तुलसी महरानी नमो-नमो! खाना के लिए कोई बुलाने आता है दोपहर और रात में। सुबह-शाम पोते चाय-पानी यहीं रख जाते हैं। चारपाई के नीचे लोटे में पानी और एक डिब्बे में गुड़ बंद करके सिरहाने रख दिया है, ताकि प्यास लगे तो वे पानी पी सकें; किसी को बुलाना न पड़े। कुत्ते, चिडि़यों की आवाज के अलावा कभी-कभी आपस में झगड़ा करते पोते-पोतियों की आवाज सुनाई पड़ जाती है। वैसे भी कान से अब ऊँचा सुनाई पड़ने लगा है।

रामप्यारी ने झुककर अंदाज से चारपाई के नीचे से पानीवाला लोटा उठाया था। एक घूँट पानी बचा था उसमें। उन्होंने उससे अपना गला तर किया, पर एक घूँट पानी की ठंडक से प्यास और बढ़ गई थी। उन्होंने पुनः पोते को आवाज दी—

‘‘तुल्लूऽऽऽ।’’

तुल्लू नहीं आया था। शायद सुनाई नहीं पड़ी होगी।

‘‘बहिर होई गवा हैं सब।’’ वे बड़बड़ाईं। एकाएक याद आया कि अभी कुछ देर में मुन्ना का प्रोग्राम टी.वी. में आएगा। उन्होंने अपनी चारपाई पर बैठे-बैठे बाहर सूरज की रोशनी से समय का अनुमान किया। सूरज नीम के ऊपर चढ़ आया था। ग्यारह-बारह तो बज ही गया होगा! भला है कि आज बादल नहीं है, नहीं तो कोई चित्र ही साफ नहीं आता! कई बार वे रामायण देखने बैठतीं तो ऐसा ही होता। परभू ने बताया था कि बादल है न, इसलिए।

रामप्यारी देवी दो-तीन बार चारपाई पर से उठने के लिए उचकी थीं, पर उठ नहीं पाई थीं। भारी शरीर चारपाई में धँस जा रही थी। अंत में डंडे का सहारा लेकर वे किसी तरह लड़खड़ाते हुए उठ खड़ी हुईं। हाथ में पानीवाला लोटा उठाया था और भारी कदमों से डंडे के सहारे घर की ओर बढ़ चली थीं।

‘‘अरे बुढि़या अम्माँ, हम तो आवत रहेन। काहें उठि आयो!’’ तुल्लू रामप्यारी देवी को घर की ओर आता देख लपककर उनकी ओर बढ़ा था।

‘‘मुरहंट कहूँ क, कब से गला फाड़ी डालत हई, पर काने में त बाँस पड़ा हौ तू सबन कै!’’

रामप्यारी देवी ने गुस्से में लोटा तिल्लू को पकड़ाया और लाठी के सहारे चलने लगीं।

बुढि़या अम्माँ का क्रोध शांत करने के लिए तुल्लू ने उनका ध्यान बँटाया, ‘‘कुछै देर मा मुन्नाच्चा वाला प्रोग्राम आई, बुढि़या अम्माँ। आऔ, इहाँ बइठो।’’ उसने उन्हें टी.वी. वाले बरामदे में ले जाकर एक कुरसी पर बैठा दिया। जमीन पर बहुएँ, बेटे, पोते, पोतियाँ सब बैठे थे। तुल्लू बुढि़या अम्माँ के बगल में खड़ा हो गया। तुल्लू का पापा अपनी मोबाइल ताने खड़ा था।

‘‘ई का रे?’’ रामप्यारी देवी ने पूछा।

‘‘जैसे ही मुन्नाच्चा का कार्यक्रम आएगा, फोटो खींच लेंगे।’’ उसने बुढि़या अम्माँ को समझाया।

‘‘एतनी छोट मोबाइल मा फोटो केतनी बड़ी आई?’’ रामप्यारी देवी चिंतित हुईं।

‘‘सब आ जाई बुढि़या अम्माँ। बस तू चुप्पै देखत रहो। हल्ला मत करिहौ।’’ उनकी भाषा में समझाया था पोता।

‘‘तू सबन चुप रहि सको तब न? हमका का है?’’

‘‘आवै लगी त सबका चुप्प कराई देब ना?’’

‘‘कब ले आई?’’

‘‘बस दस मिनट मा।’’

‘‘के बताइस ह कि आज मुन्ना का परोगराम आई?’’

‘‘मुन्नाच्चा कल खुदै फोन किहे रहेन।’’ तुल्लू के पापा ने समझाया। रामप्यारी की अगली तीनों पीढि़याँ वहाँ थीं। बस मुन्ना का परिवार नहीं था।

‘‘अच्छा।’’ उन्होंने एक ठंडी साँस लेते हुए कहा। उनके होंठों से निकलते-निकलते रुक गया कि मुन्ना तो पिछली छब्बीस जनवरी को भी आने के लिए फोन किए थे, पर नहीं आए। वे बार-बार घर में सबसे पूछतीं कि अभी छब्बीस जनवरी कब है? सब बोल देते कि अभी पंद्रह दिन बाद। कभी कोई कहता बीस दिन बाद। एक दिन वे अपनी लाठी टेकते भग्गू बाबा के चबूतरे पर जाकर बैठ गईं। चौबाइन और तिवारी की नतोह उनके पास आकर खड़ी हो गईं। हालचाल पूछ बैठीं—

‘‘का हाल है काकी? खाना-पीना होइ गवा?’’

‘‘हाँ बच्चा! बड़ी जने टेम-टेम पर बना के दे देत हैं।’’

‘‘ठीकै है, काकी। जइसे कटि जाय।’’

‘‘हाँ, मोर बच्चा। जवन कटि जाय, मानौ कटि गवा।’’

‘‘आउर काकी, मुन्ना अउर मुन्ना क दुलहिन कब ले अइहैं?’’

‘‘अँउजिया जात हैं हमार मुन्ना—काम-काम-काम। ओनही के चलते उनकर दुलहिनों नाही निकल पावत हैं। फोन पर बहुतै माख करत रहिन। कहत रहिन कि आपके मुन्ना के छुट्टिए नाइ मिलत है। वैसे ए बेरी छब्बीस जनवरी के अइहैं। मुन्नो कहेन फोने पर।’’

बताते हुए रामप्यारी देवी के चेहरे पर एक संतुष्टि का भाव पसरा था। उन्होंने आँचल से अपना चेहरा पोंछा और भग्गू बाबा की ओर देखा। चौबाइन और तिवारी की नतोह एक-दूसरे का मुँह देखने लगीं।

‘‘पर काकी?’’

‘‘हाँय, का?’’ उन्होंने उत्सुकता से उनके चेहरे को देखा।

‘‘पर काकी छब्बीस जनवरी तो बीते एक महिन्ना होइ गवा।’’ तिवारी की नतोह ने बताया तो जैसे उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ। कब से वे छब्बीस जनवरी का इंतजार कर रही थीं कि मुन्ना अपने परिवार संग आनेवाला था। उन्होंने हताश होकर एक बार पुनः पूछा, ‘‘फुरै चौबाइन! छब्बीस जनवरी बीत गवा?’’

‘‘हाँ काकी। हमरे नन्हका के इस्कूले म झंडा फहरा रहा, वोही दिने छब्बीस जनवरी रहै ना!’’

वे भग्गू बाबा के चबूतरे से उतरीं और सीधे बड़ेवाले बेटे के कमरे में गईं। बड़ा पोता पप्पू चारपाई पर पेट के बल लेटा मोबाइल से खेल रहा था। पहुँचते ही उन्होंने अपनी लाठी से उसके पिछवाड़े पर धीरे से दो बार मारा था और गुस्से में बिफर पड़ीं—‘‘हमसे झूठ बोले रहे कि अबहीं छब्बीस जनवरी बीस दिन बाद पडि़हैं, जबकि बीते बीस दिन होइ गवा।’’

वह हँस पड़ा। बुढि़या अम्माँ के क्रोध से सभी लोग परिचित थे। नाराज होकर वे धीरे से अपनी लाठी चला देती हैं। कौन है, यह नहीं देखतीं। सबसे बड़ी हैं। उनके गुस्से को भी सभी लोग हँसी-मजाक में ले लेते हैं।

‘‘ऊ का भवा बुढि़या अम्माँऽऽऽ।’’

‘‘का भवा क चच्चाऽऽऽ।’’ नाराज रामप्यारी देवी ने अपनी लाठी मारने की मुद्रा में उठाई।

‘‘अरे रे रे बुढि़या अम्माँ, मारो ना। बताइत है। ऊ मुन्नाच्चा कहे रहेन कि अम्माँ का बतइहो ना कि हम ना आ पावत हैं छब्बीस को, नाहीं तो उनका दुःख होई। जइसहीं हमार स्कूल मा इम्तहान खतम होइहैं, हम धउरा चला आइब। एही से छिपयेन हम बुढि़या अम्माँ।’’

पप्पू ने मुन्ना चाचा के न आने की सूचना को छिपाने का कारण बता दिया। वे रुक गईं। और चुपचाप वहीं पप्पू के बगल में चारपाई पर बैठ गईं। बाहर की ओर आकाश देखते हुए बोलीं, ‘‘हमरे मुन्ना का बहुत फसान है। अब रिटायरी बादे घरे चैन से रह पइहैं। अबहीं कबले रिटायरी होई रे?’’ उन्होंने पोते से पूछा।

‘‘जब बासठ साल के हो जाएँगे, तब।’’ उसने उत्तर दिया।

‘‘साठ दू बासठ रे?’’

‘‘हाँ, बुढि़या अम्माँ।’’

‘‘जउने साल सूखा पड़ा रहा, वोही साल पैदा भए रहे मुन्ना। अरे, तोहार बप्पा ओ समय दस साल का होइ गवा रहा।’’

उन्होंने मुन्ना की उम्र की गिनती की।

‘‘अरे बुढि़या अम्माँ, ऐसे नहीं गिना जाता।’’

‘‘तब कैसे रे?’’

‘‘जो मुन्नाच्चा की स्कूल में उम्र लिखी होगी, उसके हिसाब से गिना जाएगा।’’

‘‘बौड़म नाहीं त। जब पैदा भयेन तब से न उमिर गिना जात हौ।’’ वे पोते की नासमझी पर हँसी।

‘‘नाहीं, बुढि़या अम्माँ। जवन उमिर स्कूल में लिखावा गइल होई ओसे नौकरी मा गिनात है।’’ पोते ने उनकी भाषा में समझाने का प्रयास किया।

‘‘आपन खरभन हरवाह गवा रहा नाम लिखावै। पता नहीं मुरदार का लिखाय के चला आइस।’’

‘‘अबहीं मुन्नाच्चा के रिटायरमेंट में पाँच-छह साल बाकी है। पिछली बार आए तो बतावत रहे।’’

‘‘तब त एक साल आउर घटा देव। साल भर त होइ गवा उनके आए।’’ वे अपना चेहरा हाथ से पोंछ रही थीं।

‘‘बुढि़या अम्माँ, तू मुन्नाच्चा के बहुत मोहात हौ न?’’ पप्पू ने अपना सिर उनकी गोद में रखते हुए पूछा।

‘‘हाँ रे, करेजवा फाटत है मुन्ना बिना। हमार पेट पोंछना है न। सबका इहाँ आँखी से देखीत हय। एक ऊहै दूरे रहत हैं। जल्दी आ जातेन त सब एक साथे रहतन।’’ उनकी आँखों में आशा की एक लौ टिमटिमा उठी थी।

‘‘अरे बुढि़या अम्माँ, नौकरी में तो दूर रहना ही है। दादा नहीं गए थे बंबई?’’ पोते ने उनकी दुखती रग पर हाथ रख दिया।

‘‘ये ही खातिर तो कहित है कि सब आँखी के सामने रहे। जिनगी बीत गई सबका रस्ता जोहत—कभी बाप की तो कभी बेटा की। आँख पिराय जात है रे।’’ उन्होंने अपनी आँखें हथेली से रगड़ीं। आँसुओं की नमी हथेली में उतर आई।

वे मौन हो सामने बँसवार की ओर देख रही थीं। उसके बगल की थोड़ी सी जमीन बाँस के खंभों में तार बाँधकर चौतरफा घेरी गई थी, इसे जिद करके उन्होंने ही बड़ेवाले बेटे से मुन्ना का घर बनाने के लिए घेरवा दिया था। बड़ा बेटा उनकी सनक भरी जिद के आगे झुक गया था। माँ को बहुत समझाया कि मुन्ना आएँगे तो जहाँ चाहेंगे वहाँ घर बनवा लेंगे, पर अम्माँ नहीं मानी थीं। बोली थीं, ‘‘भाई-भाई में अलगा तो होना ही है, संसार की रीत है। मुन्ना को घर बनाने के लिए जमीन मेरे जीते-जी अलग कर दो।’’

हारकर बड़े बेटे ने बँसवार के बगलवाले खेत में दो बिस्वा जमीन कँटीले तार से बाउंड्री जैसा घेरते हुए अलग कर दिया था। अम्माँ सुबह-शाम लाठी लेकर टहलते हुए उधर जातीं। हाथ से कँटीले तारों को छूतीं, मानो मुन्ना को सहला रही हों। कुछ देर उसके भीतर जाकर घूमतीं और फिर संतुष्ट भाव से आकर अपनी चारपाई पर लेट जातीं।

‘‘बुढि़या अम्माँ, अब कार्यक्रम आने जा रहा है।’’

पोते ने सावधान किया तो रामप्यारी देवी का अतीत आँखों से ओझल हो गया। उन्होंने आँखों पर से चश्मा उतारकर आँचल से पोंछा और पुनः उसे आँखों पर चढ़ा लिया तथा सावधान होकर कुरसी पर बैठ गईं।

‘‘अम्माँ दिखाई देत हौ ना?’’ बड़े बेटे परभू ने पूछा। उसके चेहरे पर भी एक खुशी छाई थी। छोटे भाई को राष्ट्रपति के हाथों सम्मान मिलने जा रहा था। पूरे गाँव-जवार में किसी को ऐसा सम्मान नहीं मिला था। बहुत लोगों ने नौकरी की, पैसा भी खूब कमाया, पर ऐसा सम्मान तो इस क्षेत्र में किसी का न हुआ। कई दिन पहले से ही वह नाते-रिश्तेदारों और पास की बाजार में दुकान करनेवाले अपने मित्रों को बता चुका था कि पाँच सितंबर को टी.वी. जरूर खोल लेना। मुन्ना को राष्ट्रपति सम्मानित करेंगे।

‘‘अम्माँ देखो, अब शुरू होइ गवा।’’ परभू के चेहरे पर खुशी की एक लाली लगातार बनी हुई थी।

‘‘कहाँ रे?’’ रामप्यारी देवी को घबड़ाहट में टी.वी. स्क्रीन पर कुछ दिखाई नहीं पड़ा था।

‘‘अरे, टी.वी. मा देखो ना?’’

‘‘मुन्ना कहाँ है हमार?’’ वे आकुल थीं।

‘‘अब्बै अइहैं।’’

‘‘ई नाटा सा कउन आदमी ठड़ा है?’’ रामप्यारी देवी ने स्क्रीन पर नजरें गड़ाए हुए पूछा।

बुढि़या अम्माँ के प्रश्न पर सभी एक साथ हँस पड़े।

‘‘बुढि़या अम्माँ, इहै राष्ट्रपति हैं। इन्ही मुन्नाच्चा के सम्मान दइहैं।’’ नन्हें तुल्लू ने बुढि़या अम्माँ को समझाया।

‘‘हमार मुन्ना त इनसे दुइ हाथ ऊँच होइहैं।’’

वे गर्व से हँसीं।

‘‘कद नाहीं, पद देखो अम्माँ, केतना बड़ा है।’’ परभू ने समझाया।

‘‘नहीं, राष्ट्रपति अब से उसको बनाएँगी बुढि़या अम्माँ, जो भारत का सबसे लंबा आदमी हो।’’ पप्पू ने मजाक किया।

‘‘तनी चुपो रहो, देखै दो।’’ रामप्यारी देवी को बीच में यह हँसी-मजाक अच्छा नहीं लग रहा था। कहीं हँसने के चक्कर में कार्यक्रम ही न निकल जाए।

‘‘शांत भाई, शांत।’’ तुल्लू ने जोर से हाँक लगाई।

‘‘कउनो आवा त।’’ रामप्यारी देवी ने एक व्यक्ति को पुरस्कार लेते हुए ध्यान से देखा।

‘‘अभी दूसरे प्रांत के शिक्षकों का सम्मान हो रहा है। उत्तर प्रदेश की बारी बाद में आएगी।’’ पोते ने सबको समझाया।

‘‘बहुत देर लागी का?’’ रामप्यारी देवी ने पूछा।

‘‘नहीं, हर स्टेट से दो-चार लोग ही रहते हैं।’’

‘‘अरे नहीं, कभी-कभी और ज्यादा भी रहते हैं।’’

पप्पू और परभू आपस में बहस कर रहे थे।

‘‘हई मेहररुआ कौन है?’’ रामप्यारी देवी ने राष्ट्रपति की बगल में खड़ी एक महिला की ओर देखते हुए कहा।

‘‘ई शिक्षा मंत्री होइहैं। चाचा क बॉस।’’

‘‘कइसन सुग्घर है। एक ठो हमरे घर मा उतरी हैं लोग। लच्छन एक, कुलच्छन चार।’’ रामप्यारी देवी हमेशा की तरह अपनी थोड़ी सी बदसूरत बहू के ऊपर झल्ला उठीं। बहू उनका स्वभाव जानती थीं। बिना बुरा माने कह देती कि हमारे सिवा कोई मिला ही नाहीं तो हमें उठा लाए आप लोग। अब का पछतात; और हँस पड़ती।

शिक्षा मंत्री का चेहरा टी.वी. पर क्लोज शॉट में आ रहा था।

‘‘देखो, कइसन भटर-भटर ताकति हौ। केतनी बड़ी-बड़ी आँख हौ।’’ रामप्यारी देवी को इस समय टी.वी. में आ रहा सबकुछ बहुत प्यारा लग रहा था, क्योंकि इसी में तो अभी कुछ देर में उनके मुन्ना को भी सम्मान दिया जाएगा।

‘‘अब उत्तर प्रदेश के शिक्षकों को हमारे माननीय महामहिम राष्ट्रपति महोदय द्वारा सम्मानित किया जाएगा।’’

टी.वी. में उद्घोषणा होते ही सब सावधान होकर चुप हो गए।

पप्पू की उँगलियाँ मोबाइल के कैमरे पर सतर्क हो उठीं।

मुन्नाच्चा का नाम पुकारा गया था। मुन्नाच्चा क्रीम कलर के सफारी सूट में मंच की सीढि़यों से चढ़ रहे थे। मंच पर पहुँचते-पहुँचते पप्पू ने कम-से-कम बीसों बार कैमरे पर क्लिक कर दिया, ताकि फोटो सही आ जाए।

‘‘अरे, हमार मुन्ना आइ गएन।’’ रामप्यारी देवी का गला ममता के कारण रुँध गया। उन्होंने टी.वी. स्क्रीन के चारों ओर दाहिने हाथ से गोलाकार घेरते हुए अपनी उँगलियों को होंठों से लगाकर चूम लिया था, मानो अपने मुन्ना का चेहरा चूम रही हों। वे अपलक टी.वी. स्क्रीन पर निहार रही थीं। उनके मुन्ना राष्ट्रपति को प्रणाम कर रहे थे। अब मुन्ना उनके हाथ से गोल सा लिपटा हुआ कोई कागज ले रहे थे, राष्ट्रपति उनके गले में कुछ पहना रहे थे, अब हाथ मिला रहे थे।

रामप्यारी देवी ने हवा में हथेली घुमाते हुए मुन्ना की नजर उतारी थीं और उसे बाहर की ओर झटक दिया। बुदबुदा उठीं, ‘‘नजर-गुजर सब दूर रहै। हींग बस्सात है, लवंग बस्सात है।’’

यह उनका अपना टोटका था बच्चों को बुरी नजर से बचाने का।

उनकी नजर पुनः टी.वी. स्क्रीन की ओर गई तो मुन्ना जा चुके थे। भर आँख देख भी नहीं पाईं कि मंच से उतर गए मुन्ना। रामप्यारी देवी की आँखें भर आईं। उन्होंने बड़े बेटे से पूछा, ‘‘ऊ का देत रहेन मुन्ना का?’’

‘‘वही तो सम्मान है, अम्माँ। सर्टिफिकेट और मेडल पहिनाए।’’ परभू ने समझाया।

‘‘अच्छा, ऊहै, जवन गरवा में डालेन?’’

‘‘हाँ, वही मेडल कहा जात है।’’

‘‘का होई ओसे?’’ रामप्यारी देवी जानने के लिए उत्सुक हो उठीं।

‘‘अरे मान-सम्मान बढ़ा...और नौकरी तीन साल और बढ़ गई मुन्ना की।’’

‘‘काऽऽऽ।’’ रामप्यारी देवी का प्रश्न लंबा खिंच गया था।

‘‘हाँ अम्माँ? इस सम्मान से मुन्ना की नौकरी तीन साल और बढ़ गई एवं पचास हजार रुपया नगद अलग से।’’

रामप्यारी देवी की आँखों की चमक बुझ गई थी। चेहरे पर हताशा के बादल छा गए थे। झुर्रियों के बीच होंठ कँपकँपा उठे थे। टी.वी. की ओर देखते हुए दुःखी स्वर में राष्ट्रपति के ऊपर झल्ला पड़ीं, ‘‘हमरे मुन्ना के तीन साल बदे आउर फँसाय दिहेन। अब तीन साल अउर न घरे आय पइहैं।’’

गुस्से में बड़बड़ाती हुई वे अपनी लाठी पकड़कर खड़ी हो गई थीं और डबडबाई आँखों से कँटीले तारवाली बाउंड्री की ओर बढ़ चली थीं। वह बाउंड्री जो उनके मुन्ना के आने का इंतजार कर रही थी।

मधुवन,
सारनाथ, वाराणसी
—नीरजा माधव

हमारे संकलन