२०१९ का विश्व पुस्तक मेला


२०१९ का विश्व पुस्तक मेला १३ जनवरी को समाप्त हो गया। इस वर्ष पुस्तक मेले का मुख्य विषय था कि दिव्यांगों के लिए किस प्रकार का साहित्य उपलब्ध है, और अब क्या-क्या तकनीकी सुविधाएँ आ गई हैं, जिनके सहारे वे साहित्य का उपयोग आसानी से कर सकते हैं। हमारा तो वहाँ जाना मुमकिन न हो सका, किंतु पूरी जानकारी हम अपने पुत्र के द्वारा तथा अन्य लोगों से प्राप्त करते रहे। कुछ प्रकाशकों से भी बातचीत हुई। सर्दी के कोप के चलते भी दर्शकों और पुस्तक-प्रेमियों की अच्छी भीड़ रही। पुस्तकों की भी अच्छी बिक्री रही। एक पुस्तक संस्थान सस्ता साहित्य मंडल, जो गांधीजी ने स्थापित किया था, ताकि जनता को कम मूल्य में सुरुचिपूर्ण पुस्तकें उपलब्ध हो सकें। उनकी कहना था कि हिंदी की पुस्तकों की अच्छी खरीदारी रही। वास्तव में पाठक-लेखक पुस्तक मेले की प्रतीक्षा करते हैं, क्योंकि एक स्थान पर वे अनेक प्रकाशकों की नाना पुस्तकों को देख सकते हैं और रुचि अनुसार खरीद सकते हैं। स्कूली बच्चे इसमें आगे रहते हैं। उन्हें वहाँ पुस्तकें तो दिखती ही हैं, स्टेशनरी के विभिन्न प्रकार के सामान भी। समाचार-पत्रों से कुछ नई पुस्तकों के लोकार्पण की भी जानकारी मिली। इससे यह तो पता चलता है कि हिंदी के पाठकों की बढ़ोतरी हो रही है, टी.वी. आदि के व्यवधान के बाद भी एक और बात का पता चला कि अब अंग्रेजी के अनेक पुराने प्रकाशक हिंदी में भी पुस्तकें छापने की व्यवस्था कर रहे हैं। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी, पेंगुइन, नियोगी, हार्परकॉलिंस, सेज आदि। वाणी प्रकाशन ने हार्परकॉलिंस तथा हैवट से अनुबंध किया है कि वे इनकी कुछ किताबें हिंदी में अनुवादित करेंगे और हार्परकॉलिंस केवल पाठ्यपुस्तकें ही नहीं, बल्कि साधारण रुचि की अन्य पुस्तकें प्रकाशित करने की योजना बना रहे हैं। यह सब हिंदी की पुस्तकों के बाजार देखकर ही हो रहा है। कुछ हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं की ख्यातिप्राप्त पुस्तकों का अंग्रेजी में अनुवाद और उसी प्रकार अंग्रेजी पुस्तकों का हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में अनुवाद। लेकिन यह ध्यान रखने की आवश्यकता है कि जो मूल भारतीय प्रकाशन है, उसको ठेस न लगे। आज भारत दुनिया में प्रकाशन के क्षेत्र में तीसरा स्थान रखता है। भारतीय मूल के अन्य देशों के नागरिक और भारतीय नॉन रेजीडेंट नागरिक चिंतित हैं कि उनकी संतानें अपनी जड़ों को न भूलें और अपनी संस्कृति तथा सभ्यता की जानकारी भारत से दूर रहते हुए भी रखें। इस प्रकृति को बढ़ावा मिलना चाहिए।

विश्व पुस्तक मेला कहलाने के हकदार हम तभी हो सकते हैं, जब भारतीय भाषाओं का अच्छा प्रतिनिधित्व हो। उसकी कमी होती जा रही है। दूसरी कठिनाई यह है कि इन भाषाओं के प्रकाशकों और पुस्तक विक्रेताओं के जो संगठन हैं, उनसे तालमेल रखा जाए। हर राज्य के बहुत से विभाग और संस्थान हैं, जो अच्छी पुस्तकें प्रकाशित करते हैं, उसी प्रकार जैसे केंद्र के कई मंत्रालय और संस्थान, उनसे भी अच्छा मेल-जोल रहना चाहिए। यह केवल नौकरशाही के भरोसे नहीं हो सकता। दूसरे देशों का प्रतिनिधित्व भी अच्छा नहीं रहा है, नाम मात्र का ही रहा। पड़ोसी देशों में श्रीलंका था, पर पुस्तकें बहुत कम थीं। नेपाल और बांग्लादेश नदारद थे। इस सबके लिए नेशनल बुक ट्रस्ट को देश के राजदूतों और उच्चायुक्तों से संपर्क बनाना होगा। इसी प्रकार अन्य देशों के राजदूत और हाई कमिश्नर, जो भारत में हैं, उनके पास भी पहुँचना चाहिए। जो कैटलॉग बना है, उसको देखने से पता चलता है कि पुस्तक मेले के आयोजक थे, नेशनल बुक ट्रस्ट, आई.टी.पी.जी., डी.एम.आई.जी., दूरदर्शन, आकाशवाणी और साहित्य अकादमी। एसोसिएशन ऑफ इंडियन पब्लिशर्स एंड बुकसेलर्स का सक्रिय योगदान क्यों नहीं? यह नया सवाल है, पर इसके बारे में विचार होना चाहिए।

अंग्रेजों के बड़े प्रकाशकों की भी भागीदारी बहुत कम रही। यह क्यों हो रहा है? कुछ ने स्टॉल लिये भी तो छोटे-छोटे। दो मुद्दे ध्यान देने योग्य हैं, जिन पर नेशनल बुक ट्रस्ट, मानव संसाधन मंत्रालय छोटे और बड़े प्रकाशकों की शिकायत रही है कि स्टॉल की जमीन का किराया बहुत अधिक है। उसके बाद पुस्तकों को लगाने और देखभाल पर बहुत खर्चा होता है। बाहर से आनेवाले प्रकाशकों या पुस्तक विक्रेताओं के सामने, जो किताबें नहीं बिकीं, उनको वापस ले जाने में बहुत खर्चा होता है। छोटे-छोटे प्रकाशक, जो दीवार के सहारे स्टॉल लगा लेते थे, उस किराए को वे असहनीय पाते हैं। उनके पास कभी-कभी अच्छी पुस्तकें रहती हैं और वे छोटे कस्बों का प्रतिनिधित्व करते हैं। इस विषय पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है। दूसरा मुद्दा है प्रतिवर्ष पुस्तक मेला आयोजित करने का वैसे तो अच्छा है, किंतु व्यावहारिकता की दृष्टि से कठिनाइयाँ आती हैं। पहले एक वर्ष छोड़कर मेला लगता था। कुछ वर्ष पहले जब कपिल सिब्बल मानव संसाधन मंत्री थे, उन्होंने यकायक आदेश दे दिया कि पुस्तक मेला हर वर्ष लगना चाहिए। उचित होता कि सब भागीदारों को पहले इस पर विचार-विमर्श करना चाहिए था। आज की परिस्थितियों में यह आवश्यक मालूम होता है। यदि प्रतिवर्ष पुस्तक मेला आयोजित करना ही है तो राष्ट्रीय पुस्तक न्यास को इस कार्य को देखने के लिए अपने यहाँ एक अलग विभाग बनाना होगा। तभी यह संभव होगा कि एक वर्ष के मेले की समाप्ति के बाद अगले मेले के विषय में सब संभावित भागीदारों, राज्य सरकारों, विदेश से आनेवालों आदि से सम्यक् संपर्क स्थापित हो सकता है। अगर कोई समस्या आड़े आ रही है, तो उसका निदान खोजा जा सकता है। विश्व पुस्तक मेला आयोजित करने के लिए कल्पनाशक्ति और क्षमता दोनों की आवश्यकता है। यह केवल सरकारी आदेश से संभव नहीं है। विश्व पुस्तक मेला, उसकी कहलाने की सार्थकता, उद्देश्यों का निर्णय और पूरी व्यवस्था को भागीदारी के साथ कार्यान्वयन करना एक गंभीर विषय है।

शीर्ष न्यायपालिका में नया विवाद

हम समझते थे कि शीर्ष न्यायालय में १२ जनवरी, २०१८ को चार जजों की अप्रत्याशित प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद आंतरिक विवाद के मुद्दों का हल निकलेगा, पर विवाद थमते हुए दिखाई नहीं दे रहा है। उन चार न्यायाधीशों में तीन सेवानिवृत्त हो चुके हैं और एक जस्टिस गेगोई आज प्रधान न्यायाधीश हैं। जनवरी के अंक में भी इस स्तंभ में एक विवादास्पद बयान के विषय में कुछ लिखा गया था। अब एक और विवाद प्रारंभ हो गया है, जिसकी चर्चा पूरे मीडिया में पिछले दिनों से है। इस विवाद का कुप्रभाव आगे होना अनिवार्य है। प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता में राजस्थान और दिल्ली उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीशों के नाम कॉलेजियम ने १२ दिसंबर को चुने। किंतु कहा जाता है कि उनके नाम ‘लीक’ हो गए, इससे प्रधान न्यायाधीश रुष्ट हो गए। पुनः जनवरी में प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता में कॉलेजियम की बैठक में उन दो नामों को निरस्त कर दो नए न्यायाधीशों, जस्टिस महेश्वरी, मुख्य न्यायाधीश कर्नाटक उच्च न्यायालय और जस्टिस संजीव खन्ना, दिल्ली उच्च न्यायालय का चुनाव शीर्ष न्यायालय के लिए किया। दिसंबर में जस्टिस एम.वी. लाकूर सुप्रीम कोर्ट से रिटायर हो गए और पाँच जजों के कॉलेजियम के जस्टिस अरुण मिश्रा पाँचवें सदस्य हो गए। कहा यह गया कि १२ दिसंबर की बैठक में पूरा ‘कंसल्टेशन’ नहीं हुआ था और चूँकि जस्टिस लोकुर रिटायर हो गए और सर्दी की छुट्टियों के कारण कॉलेजियम की बैठक नहीं हो सकी। नया कॉलेजियम बना और उसके सामने कुछ नया मेटीरियल भी आया और उसको भी ध्यान में रखते हुए कॉलेजियम ने जस्टिस महेश्वरी और जस्टिस संजीव खन्ना को चुना। १२ दिसंबर की बैठक में जस्टिस महेश्वरी को इस योग्य नहीं माना गया था। जस्टिस खन्ना को सब योग्य मानते हैं, किंतु अखिल भारतीय जजों की वरिष्ठता सूची में उनका नाम ३३ नंबर पर है, अतएव ३२ जज उनसे वरिष्ठ हैं। दिल्ली उच्च न्यायलय के एक निवर्तमान जज जस्टिस गंभीर ने एक लंबी चिट्ठी इसके विरोध में लिखी है, जो समाचार-पत्रों में प्रकाशित हुई है। उन्होंने मुख्यतया जस्टिस महेश्वरी को कुछ समय पहले योग्य न पाए जाने की बात की है। उन्होंने कहा कि जस्टिस खन्ना योग्य हैं, परंतु उन ३२ वरिष्ठ जजों की अनदेखी करना उचित नहीं है। समय आने पर उनको चयनित किया जा सकता है। जस्टिस खन्ना पूर्व शीर्ष न्यायालय के न्यायाधीश जस्टिस एच.आर. खन्ना के भतीजे हैं, जिन्हें एडीएम जबलपुर वाले मामले के फैसले के कारण आपातकाल में सुपरसीश किया गया, अतएव उन्होंने इस्तीफा दे दिया। उन्होंने अपने दायित्व का साहस के साथ पालन करने के कारण विश्वव्यापी ख्याति प्राप्त की। जस्टिस गंभीर ने अपने पत्र में लिखा कि जैसे जस्टिस खन्ना का सुपरमेशन एक ऐतिहासिक भूल थी, उसी प्रकार जस्टिस खन्ना की इस समय नियुक्ति सर्वोच्च न्यायालय में एक और ऐतिहासिक भूल होगी। दिल्ली उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस ए.पी. शाह तथा कुछ अन्य जजों ने भी इसकी कड़ी आलोचना की। मीडिया और समाचार-पत्रों में इस निर्णय के विरोध में बहुत कुछ लिखा गया। शीर्ष न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस बालकृष्णनन और जस्टिस केहर ने भी कहा कि जो हो रहा है, वह ठीक नहीं है। शीर्ष न्यायालय के पूर्व प्रधान न्यायाधीश जस्टिस लोढा ने दो महत्त्वपूर्ण तर्क दिए। पहला यह कि कॉलेजियम के फैसले संस्थागत अथवा इंस्टीट्यूशनल होते हैं, अतएव किसी एक सदस्य के बदलने से फैसला गलत नहीं माना जाना चाहिए। दूसरे, उन्होंने जस्टिस चेमलेश्वर की शिकायत का हवाला दिया कि जस्टिस महेश्वरी ने विधि मंत्रालय के कहने से, सर्वोच्च न्यायालय को बिना सूचित किए कर्नाटक के एक न्यायाधीश के खिलाफ जाँच-पड़ताल पुनः शुरू कर दी थी। इसके अलावा जस्टिस महेश्वरी को कॉलेजियम ने सर्वोच्च न्यायालय के लिए १२ दिसंबर की बैठक में योग्य नहीं समझा था। शीर्ष न्यायालय की पूर्व जज रही सुधा मिश्रा ने भी कहा कि इस प्रकार पूर्व चयनित जजों के नामों को निरस्त करना बिना कारण बताए अनुचित है। क्या नया मेटीरियल उनके विरुद्ध मिला, उसकी भी कोई जानकारी नहीं है।

जहाँ तक माननीय राष्ट्रपति की स्वीकृति का प्रश्न है, सर्वोच्च न्यायालय ने उनके अधिकार को सीमित कर दिया है, यद्यपि संविधान स्पष्ट शब्दों में कहता है कि शीर्ष न्यायालय के जज की नियुक्ति माननीय राष्ट्रपति करेंगे। इसकी व्याख्या सर्वोच्च न्यायालय ने दो मुकदमों में की है कि राष्ट्रपति नियुक्ति सर्वोच्च न्यायालय ‘कंसल्टेशन’ का मतलब है कि सर्वोच्च न्यायालय की राय ही अंतिम है। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि शीर्ष न्यायालय के पूर्व प्रधान न्यायाधीश जस्टिस वर्मा ने बाद में स्वयं कहा कि जिस प्रकार कॉलेजियम कार्य कर रहा है, वैसा उनका मंतव्य नहीं था। उन्होंने अपनी राय बदल ली थी; परंतु राष्ट्रपति ने जस्टिस महेश्वरी और जस्टिस संजीव खन्ना की जो सिफारिश सर्वोच्च न्यायालय ने की थी और जिसे विधि मंत्रालय ने उसको संसद् के लिए प्रस्तुत किया, उस पर अपनी मोहर लगा दी और स्वीकृति दे दी। विधि मंत्रालय ने भी जस्टिस खन्ना की वरिष्ठता के बारे में कोई प्रश्नचिह्न नहीं लगाया, जैसे पहले जस्टिस जोसेफ के बारे में किया था। उनके सम्मुख कोई और विकल्प नहीं था। यह दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि शीर्ष न्यायालय की सिफारिश या सुझाव शीर्घ न्यायालय के जजों की नियुक्ति के बारे में विवाद का विषय बने। इससे जुड़ा हुआ प्रश्न है कि उन दो उच्च न्यायालय के जजों की प्रतिष्ठा का जिनके नाम निरस्त किए गए। उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति जस्टिस कौल ने वरिष्ठता के मामले में अपनी राय दी है कि इसकी अवमानना करने का विपरीत असर होगा। दिल्ली बार एसोसिएशन ने भी इसकी निंदा की है। हम समझते हैं कि सर्वोच्च न्यायालय की साख को इस विवाद ने बहुत बड़ा धक्का पहुँचाया है, जिसके दूरगामी परिणाम हो सकते हैं। शीर्ष न्यायालय की अपनी संस्थानगत गरिमा का सवाल पैदा हो जाता है, जिसको संविधान ने ऐसा उच्च स्थान प्रदान किया है और जिसकी ओर जनता आदर के साथ देखती है।

प्रधानमंत्री की सेलूलर यात्रा

अपनी अंडमान निकोबार यूनियन टेरिटरी की यात्रा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सेलुलर जेल गए। वह स्थान तो भारतीयों के लिए तीर्थस्थल बन गया है। उन्होंने भीगी आँखों से वीर सावरकर की वह काल कोठरी भी देखी, जहाँ वीर सावरकर कैद में रखे गए थे और जहाँ उन्होंने अपने साहित्य की रचना की थी। दीवार पर लिखते और फिर याद करते थे। सेलुलर जेल स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान की अथक कहानी आज भी गुनगुनाती है। प्रधानमंत्री ने वहाँ के तीन द्वीपों का नामकरण भी किया, जैसा नेताजी सुभाष चंद्र बोस की इच्छा थी। हमें इस पर गर्व होना चाहिए। ऐसे कुछ व्यक्ति हैं, जो प्रधानमंत्री के इस सराहनीय कदम की भी आलोचना करते हैं। वे जिक्र करते हैं कि जापानियों ने वहाँ बहुत अत्याचार किए और नेताजी को वे एक गाइडेड टुअर पर ले गए। यह सही है कि जापानियों ने द्वितीय विश्वयुद्ध में अंडमान निकोबार समेत अन्य स्थानों पर अत्यंत क्रूर व्यवहार किया। नेताजी सुभाष चंद्र बोस को जहाँ-जहाँ पता लगता था, वे जापानी अधिकारियों को शर्मिंदा करते थे और रोकथाम का प्रयास करते थे। उनके लिए भारतीयों की गरिमा और सुरक्षा बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान रखती थी। इस प्रसंग से प्रधानमंत्री के द्वीपों के नामकरण का कोई संबंध नहीं है। उन्होंने रास द्वीप को ‘सुभाष चंद्र बोस’ द्वीप का नाम दिया। नील और हैवलाक, जो १८५७ के जनरल थे और उनके अत्याचार कम न थे, अतएव उन्होंने नील द्वीप को ‘शहीद द्वीप’ तथा हैवलाक आइलैंड को ‘स्वराज द्वीप’ का नाम दिया। यहाँ प्रश्न भावनाओं का है, जो भारतीय स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ी है और हमें आज भी प्रेरणा प्रदान करती है। यह नाम परिवर्तन बहुत पहले हो जाना चाहिए। प्रधानमंत्री का यह कदम स्तुत्य है।


(त्रिलोकीनाथ त्रिपाठी)

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