एक छोटा सा दीया

एक छोटा सा दीया

बिन्नू छोटा ही था, पर उसके जीवन में उथल-पुथल मच गई थी। एक बार पैर भटके, तो फिर वे रास्ते पर आते ही न थे। और खुद बिन्नू जैसे लाचार सा था। वह उस रास्ते पर चल पड़ा था, जो गहरे गड्ढों और अँधेरी खाइयों की ओर ले जाता है। कई बार वह खुद को समझाता, ‘‘नहीं-नहीं, यह गलत है। यह ठीक नहीं, लेकिन...!’’

उसके पैर बार-बार रपटते थे और उसे कहाँ-से-कहाँ ले जाते थे। घरवाले परेशान, बिन्नू को हुआ क्या है?

वे बिन्नू के लिए ही नहीं, पूरे घर के लिए बड़े दुःख भरे दिन थे। खासकर बिन्नू की माँ विमलाजी के लिए, जिनका सपना था कि बच्चे खूब पढ़ें-लिखें। पढ़-लिखकर आगे बढ़ें। इसके लिए वे कोई भी त्याग करने के लिए तैयार थीं। अपने गहने बेच-बेचकर बच्चों को पढ़ाने-लिखाने का उन्होंने निश्चय कर लिया था। एक-एक कर कई गहने बिक भी चुके थे। पर उन्हें इसका जरा भी मलाल न था।

कई बार रिश्तेदार ताना मारते। समझाते भी, ‘‘विमला, तू ये क्या कर रही है? ऐसे तो तेरे पास एक गहना भी नहीं बचेगा। तो आगे कैसे काम चलेगा तेरा?’’

इस पर वे हँसकर कहतीं, ‘‘गहने कहाँ बेच रही हूँ? असली गहने तो मेरे बच्चे हैं। जो बेच रही हूँ, वे तो झूठे गहने हैं। इनसे क्या मिलना है? बच्चे पढ़-लिखकर अपने पैरों पर खड़े हो जाएँ तो मैं समझूँगी, मुझे सबकुछ मिल गया।’’

उनकी बड़ी बेटी सुजाता और बेटे हैरानी से ये बातें सुनते। उन्हें गर्व होता था, ‘‘हमारी माँ का दिल कितना बड़ा है!’’

विमलाजी ज्यादा पढ़ी-लिखी न थीं, पर पढ़ाई का मोल जानती थीं। अकसर वे बच्चों से कहतीं, ‘‘मेरे बच्चो, सच मानो तो पढ़ाई ही रोशनी है। मैं तो ज्यादा पढ़-लिख न सकी, पर मैंने यह जान लिया है कि इससे कीमती चीज दुनिया में कुछ और नहीं है। संसार को देखने की सही आँखें तुम्हें पढ़ने-लिखने से ही मिलेंगी। तुम पढ़-लिखकर अपना रास्ता बना लोगे तो मुझे लगेगा, मेरी मेहनत बेकार नहीं गई। और वे गहने फिर वापस आ गए हैं!’’

कहते-कहते उनकी आँखों में आँसू की बूँदें झलमलाने लगतीं। बेटी-बेटे यह देखते तो मन-ही-मन संकल्प करते कि माँ के सपने को वे पूरा करेंगे। पिता का वेतन ज्यादा न था। और उनका रास्ता ईमानदारी का था। सरकारी दफ्तर। पर वे कड़क थे और काम में पक्के। उनके सहयोगी हँसकर कहते, ‘‘काशीनाथजी तो किसी और ही दुनिया के आदमी हैं।’’

उन्होंने जो रास्ता चुना, उस पर चले। मगर अपनी इस मामूली तनखा में पाँच बच्चों की पढ़ाई का बोझ उठाना उन्हें मुश्किल लग रहा था। तब माँ आगे आईं। बोलीं, ‘‘मुझे चाहे कितने ही कष्ट उठाने पडें़, पर मैं अपने बच्चों को हर हाल में पढ़ाऊँगी।’’

और वे अपने सारे सुख एक-एक कर छोड़ती गईं। मन में एक ही धुन, बच्चे पढ़ें, पढ़-लिखकर आगे बढ़ें!

विमलाजी बच्चों के दिप-दिप करते चेहरे देखतीं, तो कहीं-न-कहीं उन्हें भीतर तसल्ली होती कि उनकी मेहनत बेकार नहीं जा रही है। सब बच्चे ध्यान से पढ़ते थे, समझदार थे। पर अकेले बिन्नू के कारण वे परेशान थीं। और यह परेशानी दिनोदिन बढ़ती ही जा रही थी। बिन्नू का पढ़ाई से जैसे कोई रिश्ता ही न था। माँ उसे देखतीं और अंदर-अंदर रोतीं कि मेरा एक बेटा ऐसा कैसे निकल गया?

आज सुबह ही बिन्नू की क्लास टीचर ने उन्हें स्कूल में बुलवाया था। फिर सख्त लहजे में कहा था, ‘‘विमलाजी, आप अपने बेटे को समझाती क्यों नहीं हैं? वह कई-कई पीरिएड्स स्कूल से गायब रहता है। बस्ता क्लास में पड़ा रहता है और इसका कुछ पता-ठिकाना ही नहीं। आपसे मैंने पहले भी कहा है, इसे कसकर रखें, वरना लड़का फेल हो जाएगा। फिर आप मेरे पास शिकायत लेकर न आना कि लड़का क्यों फेल हो गया?’’

विमलाजी पहले भी दो बार स्कूल जाकर दुःखी मन से लौटी थीं, पर इस बार तो वे बिल्कुल टूट ही गईं। सोचने लगीं, ‘हे भगवान्, इतना कुछ मैं कर रही हूँ। क्या यह अकारथ चला जाएगा?’

सचमुच रात-दिन कड़ी मेहनत करके वे बच्चों को पढ़ा रही थीं। खुद भी आसपास के लोगों के कपड़े सीकर वे किसी तरह घर की गाड़ी चला रही थीं। बाकी बच्चे पढ़ने में बहुत अच्छे थे। सभी अपनी क्लास में फर्स्ट आते थे। फेल होने की नौबत आएगी, यह तो कोई सोच भी नहीं सकता था। तो फिर अकेला बिन्नू ही ऐसा कैसे निकल आया, जिसकी वजह से उन्हें इतना अपमानित होना पड़ा?

घर आकर उन्होंने बिन्नू को काफी समझाया। बोलीं, ‘‘बेटा, आज मुझे तेरी वजह से कितना कुछ सहना पड़ा। पूरी क्लास में मेरी बेइज्जती हुई कि इनका बेटा ऐसा है। सुनकर मुझे कितना दुःख हुआ होगा, तू सोच सकता है? तू अपनी बहन और भाइयों की ओर देख। वे लोग कैसे हैं और तू कैसा है? तू उनसे क्यों नहीं सीखता? वे अच्छे नंबर लेकर आते हैं तो माँ-बाप का मन कितना खुश होता है! तू भी तो इसी तरह पढ़-लिख सकता है न, क्या कमी है तुझमें? पढ़ेगा तो तेरे भी नंबर अच्छे आएँगे और सबको खुशी होगी। हमें भी लगेगा कि हम बच्चों के लिए इतना कर रहे हैं, तो बच्चों ने भी कुछ करके दिखाया।’’

पर बिन्नू चुप, एकदम चुप। जैसे किसी बात का असर ही नहीं।

कई बार विमलाजी गुस्से में डाँटती-फटकारती भी थीं। पर बिन्नू चिकना घड़ा बन गया था। वह चुपचाप डाँट-फटकार सुन लेता, पर अगले दिन से फिर वही हाल। बिन्नू की माँ अंदर-ही-अंदर रोतीं और आँसू पीती रहतीं।

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असल में बिन्नू की क्लास में काफी ऊधमी और बिगड़े हुए तीन-चार लड़के थे। मस्ती और आवारागर्दी में ही उनका सारा समय जाता था। इनमें से एक तो पिछले तीन साल से फेल होता आ रहा था। बाकी सारे दोस्त भी ऐसे ही थे। एकदम आवारा और लापरवाह। बिन्नू भी उन्हीं के साथ रहने लगा था। उन लड़कों ने बिन्नू को अपनी मंडली में शामिल किया और उसकी मासूमियत का नाजायज फायदा उठाने लगे।

‘‘बिन्नू, आज नई पिक्चर आई है, चलना है?’’

‘‘बिन्नू, चल आज केशोराम लाहौरवाले की मशहूर चाट खाने चलते हैं!’’

‘‘बिन्नू, आज तो देवानंद की पिक्चर आई है, खूब टनाटन ब्लैक में बिकेंगी टिकटें। चल, आज तो मौज है, यार!’’

उस आवारा मंडली की ऐसी ही कारगुजारियों के बीच कहीं गुम हो गया था बिन्नू। और अब उसे रास्ता नहीं सूझ रहा था।

स्कूल से भागकर नई से नई पिक्चरें देखना इस मंडली का पहला शौक था। कोई भी नई पिक्चर किसी सिनेमा हॉल में लगती, तो यह शरारती चौकड़ी सबसे पहले वहाँ मौजूद रहती। ये लोग सबसे पहले लाइन में लगकर इकट्ठी पंद्रह-बीस टिकटें खरीद लेते। फिर वहीं खड़े-खड़े उन्हें ब्लैक में बेचते। नई पिक्चर का पहला शो देखनेवाले शौकीनों की तो कोई कमी थी नहीं। इस तरह ड्योढ़े-दूने दामों में बेचकर उनकी अपनी टिकटों का भी इंतजाम हो जाता।

पैसा जेब में आते ही कभी वे कहीं मटरगश्ती करने निकल जाते, कभी किसी रेस्तराँ में बैठकर चाट-पकौड़ी उड़ाते। कभी-कभार भीड़ का फायदा उठाकर वे किसी का कोई छोटा-मोटा सामान भी उड़ा लेते। किशोर वय की बेफिक्री के पूरे मजे वे उड़ाना चाहते थे, जिसमें कहीं कोई रोक-टोक न हो। और आगे के जीवन या परिणाम पर तो वे शायद सोचते ही न थे।

बिन्नू जब इस चौकड़ी में शामिल हुआ तो वह आठवीं में था। तब तक वह पढ़ाई में ठीक ही चल रहा था, कभी फेल नहीं हुआ था। पर दसवीं तक आते-आते वह बिल्कुल चौपट हो चुका था। किताबों से मानो उसका कोई वास्ता न रह गया हो। हालत यह थी कि किताबें देखते ही उसे डर लगने लगता, जैसे किताबें न हों, कोई भूत हों। लिहाजा परिणाम वही हुआ, जो पहले से ही दिख रहा था। पाँचों भाई-बहनों में वह अकेला था, जो दसवीं में लुढ़क गया था, और वह भी बुरी तरह फेल। किसी भी विषय में उसके सौ में से पंद्रह-बीस से ज्यादा नंबर नहीं थे।

विमलाजी जब स्कूल से उसकी अंकतालिका लेकर आ रही थीं, तो दुःख और चिंता के मारे उनकी टाँगें काँप रही थीं। बिल्कुल रोने-रोने को हो रही थीं। उधर बिन्नू भी डरकर घर में ही बैठा हुआ था। विमलाजी ने बिन्नू की अंक-तालिका उसके आगे रखते हुए कहा, ‘‘ले बेटा, देख ले अपने नंबर। तूने अपनी माँ की मेहनत और तपस्या का अच्छा सिला दिया।’’

कहते-कहते उनका चेहरा आँसुओं से भर गया और वे रो पड़ीं। उनके साथ ही जाने कब बिन्नू भी फूट-फूटकर रो पड़ा।

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उस दिन बिन्नू ने अपने अंदर-ही-अंदर जैसे एक भूचाल सा महसूस किया। दुःख के मारे उसका कलेजा फटा जा रहा था। उसे अपने से ज्यादा माँ की चिंता थी। आह, उसने माँ को कितना कष्ट पहुँचाया है, किसलिए भला? माँ भी सोचती होंगी, उनके बच्चों में यह नालायक बेटा कहाँ से आ गया?

‘उफ, मैं तो ऐसी माँ का बेटा कहलाने लायक भी नहीं हूँ।’ सोचकर वह अपने आपको धिक्कार रहा था।

इस दुःख के अहसास के साथ ही बिन्नू ने महसूस किया कि जैसे भीतर-ही-भीतर उसे कहीं रोशनी नजर आ रही है। उसे अपना रास्ता दिखाई पड़ रहा है। उसने मन-ही-मन पक्का निश्चय कर लिया कि चाहे जो भी हो, अब वह रात-दिन दुष्टता के कामों में लगे रहनेवाले ऊधमी लड़कों की चौकड़ी छोड़ देगा और अपना अलग रास्ता बनाएगा।

और सचमुच उसने जो फैसला किया था, उस पर अटल रहा। स्कूल में उन बच्चों को देखकर वह पीठ फेर लेता। घर पर भी कई बार वे उसे बुलाने आए, कई तरह का लालच दिया, पर बिन्नू उनके साथ नहीं गया। वह जान गया था कि यह काली राह है, जिस पर चलकर कालिख के सिवा कुछ हासिल नहीं होगा। अगर कभी पुरानी चीजों की ओर उसका मन आकर्षित भी होता, तो माँ का आँसुओं से डबडबाया चेहरा एकाएक उसके सामने आ जाता, जो उसे खबरदार करता था, ‘‘नहीं बेटे, अब भटकना नहीं...नहीं मेरे लाल!’’

अब बिन्नू ज्यादातर समय या तो चुप रहता या फिर पढ़ाई में ही लगाता। माँ या पिता किसी काम के लिए कहते, तो वह दौड़कर जाता और झटपट कर लाता। मानो मन-ही-मन उसने तय कर लिया हो कि उसने माँ-बाप को बहुत कष्ट दिए और अब उन्हें सुख देने की पूरी कोशिश करेगा।

अब बिन्नू अपनी किताबें पढ़ता तो पहले की तरह उसका ध्यान उचटता नहीं था। वह जैसे अपने आप से ही कहता, ‘‘अरे, इतनी मुश्किल तो नहीं है पढ़ाई, जितनी मुझे तब लगती था।’’ बल्कि उसे लगता कि किताबें पढ़ने का सच्चा आनंद उसे अब मिल रहा है। ज्ञान की एक नई ही दुनिया मानो उसके आगे खुल रही थी। कोई मुश्किल आती तो बड़ी बहन सुजाता मदद कर देती या फिर भाई शचींद्र, जो रात-दिन पढ़ाई में ही लगा रहता था और खूब होशियार था।

सुजाता भी अब खयाल रखती थी कि बिन्नू पढ़ रहा है या नहीं। कभी-कभी पूछ लेती, ‘‘बिन्नू कोई मुश्किल तो नहीं आ रही न?’’

‘‘नहीं दीदी, अब तो अच्छा लग रहा है। सब समझ में आ जाता है।’’ बिन्नू जवाब देता।

‘‘तो पहले क्या बात थी? कोई भूत घुस गया था क्या दिमाग में?’’ सुजाता पूछती।

‘‘हाँ...!’’ बिन्नू धीरे से सिर हिलाते हुए हँसता।

‘‘ओहो, तो अब चला गया भूत कि अभी है थोड़ा-थोड़ा...?’’ सुजाता मुसकराते हुए पूछती।

‘‘नहीं, नहीं, अब तो गया, बिल्कुल ही चला गया!’’ बिन्नू सिर पर गोल-गोल चकरी की तरह हाथ घुमाते हुए जोर से हँस पड़ता।

साल बीतते न बीतते फिर से परीक्षाएँ आ गईं। इस बार बिन्नू ने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की। बहुत मेधावी तो वह नहीं था, फिर भी ठीक-ठाक नंबरों से पास हो गया। उसके पास होने की खुशी घर भर को हुई। माँ ने तुरंत गरमागरम हलवा बनाया और सबको खिलाया। बिन्नू की आँखों में उस दिन सच्ची तृप्ति थी।

यह बिन्नू की छोटी सी सफलता का एक छोटा सा दीया था, जिसके टिम-टिम प्रकाश में उसे आगे की राह नजर आ रही थी।

इसके बाद उसके पैर कभी अटके नहीं, भटके नहीं। दसवीं पास करने के बाद उसने कड़ी मेहनत करके बी.ए. किया। घर के जो हालात थे, उनमें उसको यहीं पढ़ाई रोककर नौकरी ढूँढ़नी थी। उसने नौकरी के लिए कई जगह आवेदन किया, परीक्षाएँ दीं। आखिर उसे एक अच्छी सरकारी नौकरी मिल गई, जहाँ उसे कैशियर का काम करना था।

लेकिन अब एक अजीब सी मुश्किल थी उसके सामने। बिन्नू ने पिछले तीन-चार बरसों में खुद को खासा बदला था, लेकिन बहुतों के मन में उसकी वही पहलेवाली दागदार छवि थी। लिहाजा जो भी बिन्नू की इस नौकरी लगने की बात सुनता, तो वह आश्चर्य प्रकट करता। फिर बड़े ही व्यंग्यात्मक लहजे में कह उठता, ‘‘नौकरी लग गई, यह तो अच्छा है। पर निभा ले, तब जानो।’’

एक-दो लोग तो साफ-साफ शब्दों में कहते, ‘‘देखना, इस नौकरी को यह ज्यादा दिन चला नहीं पाएगा। जरूर कोई-न-कोई ऐसा गुल खिलाएगा कि...!’’

बिन्नू लोगों की बातें सुनता। कुछ उसके मुँह पर भी कहते तो कुछ पीठ पीछे। वह सिर्फ मुसकराते हुए उन सबके कटु व्यंग्य झेलता। जवाब नहीं देता था। पर भीतर-ही-भीतर वह बदल चुका था। उसके भीतर एक छोटा सा दीया हमेशा टिमटिमाता रहता, जो उसे अँधेरे की काली राहों से बचाता।

उसने दृढ़ निश्चय कर लिया था कि अब उसे एक अच्छा और नेक इनसान बनना है, जो हर दुःखी और परेशान आदमी की मदद करे। और सचमुच बिन्नू का जीवन अब एक अलग ही राह पर चल पड़ा। उसकी सरलता और भलमनसाहत देखकर लोग चकित होते हैं।

उसके साथ काम करनेवाले लोगों का ध्यान पैसा जमा करने पर था। लेकिन बिन्नू की कमाई कुछ और थी। वह हँसकर कहा करता, ‘‘जब मैं किसी सच्चे जरूरतमंद की मदद करता हूँ और उसकी आँखों में मुझे खुशी की झलक मिलती है, तो लगता है, यही मेरी सच्ची कमाई है।’’ उसका यह व्यवहार घर पर भी था, घर के बाहर भी और दफ्तर में भी।

दफ्तर में अगर कोई अपनी कोई समस्या लेकर आता, तो बिन्नू सबसे पहले उसकी मदद के लिए आगे आ जाता, ताकि वह शख्स परेशान होकर इधर-उधर न भटके। एक भले मित्र की तरह वह उसकी सहायता करता। जाते समय लोग कृतज्ञ आँखों से उसे धन्यवाद देकर जाते। और बूढ़े-बुजुर्ग तो उसका हाथ पकड़कर कहते, ‘‘बेटा, तेरा यह प्यार हम हमेशा याद रखेंगे। हमें उम्मीद नहीं थी कि आज भी ऐसे नेक और भले लोग हैं।’’

इस पर बिन्नू हँसकर कहता, ‘‘नेक लोगों को तो सभी नेक ही लगते हैं। यह आपकी नेकी की खुशबू है कि मैं आपको इतना अच्छा लग रहा हूँ।’’

धीरे-धीरे उसकी मशहूरी सबकी मदद करनेवाले बिन्नू के रूप में हो गई। दफ्तर में हर कोई उसे ढूँढ़ता हुआ आता। हर किसी के होंठों पर उसका नाम। उसके अच्छे कामों की खुशबू दूर-दूर तक फैल रही है, तो भला बिन्नू की माँ...यानी विमलाजी तक क्यों न पहुँचेगी? उनके और बेटे बड़े अफसर हैं, पर उनका खुद का सहारा तो यही बेटा है, जिसके कारण बरसों पहले वे एक दिन दुःखी होकर फूट-फूटकर रो पड़ी थीं। रात हो या दिन, पुकारते ही सामने हाजिर। जैसे उसका ध्यान हर वक्त माँ और पिता की ओर ही लगा रहता हो।

कभी-कभी वे कहती भी हैं, ‘‘ऊँची पढ़ाई और डिग्रियाँ तो मेरे घर में सभी ने लीं, पर शिक्षा का सही अर्थ तो सिर्फ बिन्नू ने ही जाना है। यही मेरी आँखों का उजाला है।’’

इस पर बिन्नू आँखें झुकाए जवाब देता है, ‘‘माँ, अगर तूने मुझे राह पर लाने की इतनी कोशिश न की होती, तो मैं तो आज राह का कंकड़-पत्थर ही होता। तेरी सीख ने मुझे आदमी बना दिया। तूने मेरे अंदर एक छोटा सा दीया जलाया था माँ, और आज...!’’

‘‘चह-चह-चह...!’’ उसी समय आँगन में अमरूद के बड़े से पेड़ पर बैठी गौरैयों का झुंड जोर से चहचहा उठता है। मानो बिन्नू की आवाज में आवाज मिलाकर वे कह रही हों, ‘‘हाँ-हाँ, ठीक...यह बिल्कुल ठीक है!’’

सुनीता
५४५ सेक्टर-२९,
फरीदाबाद-१२१००८ (हरियाणा)
दूरभाष : ०९९१०८६२३८०

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