निराली है राजस्थान की संस्कृति

निराली है राजस्थान की संस्कृति

‘म्हा रो रंग-रंगीलो राजस्थान...,’ इन पंक्तियों को सुनते ही राजस्थान की सतरंगी संस्कृति की तसवीर हमारे मस्तिष्क में उभर आती है। हर संस्कृति की अपनी पहचान होती है, जिसमें समाहित होता है—पूरा परिवेश, आदर्श परंपरा एवं लोकभाव। राजस्थान की संस्कृति अपने आप में अनोखी है, जो दुनिया भर में अपनी विशेषताओं के लिए पहचानी जाती है। यहाँ के रहन-सहन, वेश-भूषा, स्वादिष्ट भोजन, अतिथि-सत्कार, मेले, नृत्य-संगीत आदि सभी अपने आप में बेमिशाल हैं। राजस्थान का व्यक्ति स्वदेश में रहे, चाहे विदेश में, वह अपनी राजस्थानी संस्कृति को कभी नहीं भूलता है। खान-पान, शादी-विवाह में राजस्थानी वेश-भूषा व रीति-रिवाजों को ही अपनाता है।

शक्ति और भक्ति की महान् संस्कृति

शौर्य और बलिदान की भूमि भक्तों और संतों का प्रदेश है राजस्थान। यहाँ महाराणा प्रताप, पृथ्वीराज चौहान, अमर सिंह राठौड़, राणा सांगा जैसे शूरवीर उत्पन्न हुए हैं, वहाँ अनेक सूफी संत, दादू, पीपा, चरणदास, भक्तिमति मीरा भी अवतरित हुई हैं। राजस्थान की रत्नगर्भा भूमि ने जिन वीरों को पैदा किया है, यदि उनके नामों की माला पिरोकर भारत माँ के गले में पहना दी जाए तो माँ का सिर गर्व से ऊँचा हो जाए। यहाँ के वीरों ने चीन व पाकिस्तान के सैनिकों को नाकों चने चबवा दिए थे। यहाँ की वीरांगनाओं का जौहर की ज्वाला में अपने आप को समर्पित करना इतिहास के पृष्ठों में स्वर्णाक्षरों में अंकित है।

अतिथि सत्कार की अद्वितीय परंपरा

भारतीय संस्कृति में ‘अतिथि देवो भव’ माना गया है। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण राजस्थान के प्रत्येक परिवार में देखने को मिलता है। जब यहाँ के ढाणी, गाँव या नगर में बस रहे लोगों के यहाँ जाने का अवसर मिलता है तो राजस्थानी परंपरा के अनुसार अतिथि को आदर सहित बैठक में बिठाया जाता है तथा पीने के लिए तत्काल शुद्ध पानी या छाछ का गिलास पेश किया जाता है। यह है यहाँ के स्वागत की परंपरा। फिर आने का कारण पूछा जाता है तथा घर आए मेहमान की पूरी तरह आवभगत की जाती है। भोजन के समय भोजन और नाश्ते के समय नाश्ते के लिए आग्रह किया जाता है, जो राजस्थानी संस्कृति का परिचायक है। यहाँ का भोजन भी अपने ढंग का निराला ही होता है। यहाँ के मुख्य भोजन में बाजरे की रोटी, मक्खन, दही, छाछ, रबड़ी, दाल-बाटी, चूरमा एवं बाजरे का खिचड़ा आदि रहता है। राजस्थान की मिठाइयाँ व नमकीन न केवल देश में, अपितु पूरे विश्व में मशहूर है। जैसे बीकानेर के रसगुल्ले व नमकीन (भुजिया) जयपुर का घेवर, सांभर की फीणी, ब्यावर की तिल-पपड़ी, अजमेर का सोहन हलवा, किशनगढ़ की बालूशाही, अलवर का मावा (मिल्क केक), जोधपुर की मावे की कचौड़ी तथा मिर्ची बड़ा इतने स्वादिष्ट होते हैं कि इन्हें बार-बार खाने की अभिलाषा मन में बनी रहती है।

धन कुबेरों की जन्मस्थली

यहाँ के पुरुषार्थी लोगों ने विदेश एवं देश के विभिन्न भागों में जाकर अपने तन-मन-धन से योगदान देकर उसे समृद्ध कर यहाँ का विकास किया है। निजी क्षेत्रों में कीर्तिमान स्थापित करनेवाले बिड़ला, बजाज, पोद्दार, धूत, बांगड़, खेतान, डालमिया आदि राजस्थान के ही हैं। चूरू के श्री लक्ष्मी निवास मित्तल ने तो विश्व के उद्योगपतियों में अपना प्रथम स्थान बना लिया है। देश के विभिन्न भागों में उद्योगों का महाजाल फैलानेवाले एवं राष्ट्र के विकास में अहम भूमिका निभानेवाले ९० प्रतिशत उद्योगपतियों की जन्मस्थली राजस्थान ही है। न केवल देश के प्रत्येक बड़े नगर में, अपितु विश्व के प्रमुख राष्ट्रों—अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, केन्या, दक्षिण अफ्रीका, यूरोप, सिंगापुर, दुबई इत्यादि सभी जगह राजस्थानियों ने अपनी श्रेष्ठता के झंडे गाड़े हैं।

खनिज संपदा में अग्रणी

राजस्थान की विस्तृत मरुभूमि बंजर होते हुए भी रत्नों से भरी पड़ी है। प्रदेश के आँचल में विपुल खनिज संपदा का भंडार समाहित है। राजस्थान का संगमरमर देश-विदेश में अपनी धाक जमाए हुए है। दुनिया भर में मशहूर ताजमहल राजस्थान के संगमरमर पत्थर से ही बना है। लाईम स्टोन, ताँबा, जस्ता, जिप्सम, फास्फेट, चाँदी, सीसा आदि खनिजों का भंडार है राजस्थान।

राजस्थान के कण-कण में बसी है कला व संस्कृति

जब कला और संस्कृति की बात हो तो रंग-रंगीले राजस्थान की पगड़ी, साफा, चूडि़याँ, कसीदे व जरी की जूतियाँ, बंधेज की चूनरी, ज्वेलरी, मीनाकारी आदि को सर्वप्रथम याद किया जाता है। जोधपुरी बंधेज के साफे, चूनरी की साड़ी, जूतियाँ, उदयपुर के खिलौने, जयपुर की रजाइयाँ, नाथद्वारा की चाँदी एवं मीनाकारी की वस्तुएँ आदि का पूरे विश्व में निर्यात होता है।

पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र

विदेशी सैलानियों के लिए राजस्थान आकर्षण का प्रमुख केंद्र है। यहाँ के किलों, महलों, झीलों, अभयारण्य, दुर्ग, हवेलियाँ, लोककला, चित्रकला को देखने विश्व के ७० देशों के पर्यटक यहाँ आते रहते हैं। राजस्थान में पुष्कर समारोह, जैसलमेर में मरु महोत्सव, आमेर में हाथी समारोह, मारवाड़ समारोह को देखने प्रतिवर्ष लाखों पर्यटकों का यहाँ आगमन होता है। अजमेर में ख्वाजा का उर्स, जयपुर में गणणौर व तीज के मेले, पुष्कर के पशु मेले में विविध मनोरंजक कार्यक्रमों को देखकर विदेशी पर्यटक अपने आपको धन्य समझते हैं। हाथी और ऊँट की सवारी का आकर्षण व आनंद विदेशियों को राजस्थान की ओर बरबस खींच लाता है।

सदाबहार लोकगीत एवं लोकनृत्य

लोकनृत्य, संगीत के क्षेत्र में यहाँ के कलाकारों ने विदेशों में भी अपनी कला का प्रदर्शन कर खूब ख्याति अर्जित की है। यहाँ के लोकगीतों में काग, सूविटया, घुड़ला, मेहँदी, विनायकजी आदि का मार्मिक वर्णन मिलता है। यहाँ के लोकगीतों की यह विशेषता होती है कि ये कभी भी पुराने अथवा मन को उबा देनेवाले नहीं होते हैं। यहाँ के लोकनृत्यों को देखकर तथा राजस्थानी मधुर गीतों को सुनकर विदेशी सैलानी स्वयं भी नर्तकों के साथ-साथ झूमने लगते हैं। युवतियाँ तीज व गणगौर त्योहार पर भाव-विभोर होकर नृत्य करती हैं। यहाँ के घूमर, भवाई, डांडियाँ, कालबेलियाँ, तेराताली, कच्छी घोड़ी, चरी व दीपक आदि नृत्य दर्शनीय हैं। होली के दिनों में डफ, नगारे की ध्वनि के साथ-साथ तथा घेरा बनाकर नाचना तथा छारंडी के दिन बादशाह का मेला राजस्थान के अलावा कहीं नहीं होता है। नृत्य-संगीत ही नहीं, चित्रकला एवं मूर्तिकला के क्षेत्र में भी यहाँ के कलाकारों ने अपनी गौरव-पताका पूरे विश्व में फहराई है।

अनोखे राजस्थानी आभूषण

राजस्थानी संस्कृति की पहचान है यहाँ के विविध आभूषण। जितने प्रकार के आभूषण पहनने की परंपरा राजस्थान में है, उतनी अन्य प्रांतों में नहीं है । यहाँ तक कि पुरुष लोग भी आभूषण पहनते हैं। पुरुषों के आभूषणों में लोग गले की कंठी, अँगूठी आदि प्रमुख हैं। राजस्थान को स्त्रियों के सुंदर-सुंदर आभूषणों का अजायबघर कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। सिर से लेकर पाँव तक स्त्रियाँ आभूषणों से अलंकृत रहना पसंद करती हैं। वैसे तो स्त्रियों के लिए सैकड़ों आभूषणों का प्रचलन यहाँ है, किंतु अँगूठी, बिछिया, बोरला, माँग-टीके, कड़ी-कांबा, कांकण, कटिमेखला बाजूबंद, पूँची, हार, पायल, पाजेब, बंगफूल, हथफूल, गोखरू, नाक की बाली, झुमका, हार, कंठी, चूड़ा, कड़ी, तगड़ी आदि प्रमुख हैं। किंतु पिछले एक दशक में राजस्थानी संस्कृति में भी समय के बदलाव दृष्टिगोचर हो रहे हैं। राजस्थान की सांस्कृतिक निधियाँ लुप्त न हों तथा उनका पुनरुद्धार हो यह अत्यंत आवश्यक है। राजस्थान लोकसाहित्य संस्कृति अकादमी, बीकानेर आदि कुछ ऐसी संस्थाएँ हैं, जो इस दिशा में महत्त्वपूर्ण कार्य कर रही हैं। आइए, हम भी संकल्प करें कि हम राजस्थानी संस्कृति, सभ्यता एवं भाषा को जीवित रखने हेतु यथासंभव प्रयत्न करेंगे।

कृष्णचंद्र टवाणी
ज्ञानमंदिर, सिटी रोड,
मदनगंज-किशनगढ़-३०५८०१
(राजस्थान)
दूरभाष : ०९२५२९८८२२१

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