प्रथम प्रवृत्ति

तूरीरी बगदाद का धनी नागरिक था। वह अपने भले कामों के कारण हर जगह प्रसिद्ध था। वह निर्धनों की केवल इस हद तक सहायता नहीं करता था कि उनके विलासितापूर्ण जीवन की संभावनाएँ कम हों और वे सादा जीवन व्यतीत करें, बल्कि जो भी दुखिया उसके पास आता था, उसकी शिकायतों को उत्कट और विनीत भाव से सुनता, अच्छे शब्दों में सांत्वना देता और हर संभव तरीके से सहायता करता था।

उसने एक हजार एक छोटे-बडे़ दुःखों को, जो मानव जीवन का बहुत बड़ा हिस्सा बनाते हैं, ईश्वरीय इच्छा से सहन किया। वह अति सहनशील था और यह जानकर कभी कु्रद्ध नहीं हुआ था कि सब लोग एकमत नहीं हैं। चूँकि वह स्वयं कठिन और अतुल्य सदाचारी था और चूँकि प्रत्येक व्यक्ति की हार्दिक इच्छा होती है कि बाकी मानव जाति उससे तुच्छ है, वह चाहता था कि सभी लोग उस जैसे हो जाएँ।

झगड़ालू स्त्री से विवाहित वह उसके प्रति विश्वसनीय रहा; उसके बुरे स्वभाव को क्षमा करता रहा और उसे कभी महसूस नहीं होने दिया कि वह न तो युवा थी और न ही सुंदर। लेखक और कवि होते हुए वह अपने विरोधियों की सफलता से प्रसन्न होता था और नम्र एवं ईमानदार भावों से उनके प्रति मंगलकामना और मित्रता दिखाता था।

एक वाक्य में कहा जाए तो उसका जीवन पूर्ण करुणा, मधुरता, अनुराग एवं निस्स्वार्थता से भरा था और वह एक ही समय में संत और भद्र पुरुष माना जाता था।

फिर भी उसके चेहरे पर वह स्थिरता नहीं थी, जो प्रायः संत लोगों की आकृति का गुण माना जाता है। वह उस आदमी के चेहरे की तरह पंक्तिबद्ध था, जिसे तीव्र उत्कंठा ने हिलाकर रख दिया हो अथवा किसी गुप्त मानसिक वेदना ने कष्ट दिया हो। वह प्रायः आँखें झुकाए खड़ा देखा जाता था, ताकि वह अपने आपको केंद्रीभूत कर सके अथवा लोगों को अपने विचार जानने से रोक सके, परंतु कोई भी इस ओर ध्यान नहीं देता था।

बगदाद के निकट ही मैत्रया नामक एक चमत्कारी फकीर रहता था, जिसके स्थान पर उपासना करने के लिए कई तीर्थयात्री आते थे। मैत्रया अपने आपको सामान्य मानव स्थितियों से ऊपर उठाकर इस अचलता से रहता था कि चिडि़यों ने उसके कंधों पर घोंसले बना लिये थे। पवित्र गायों की दुम की तरह उसकी दाढ़ी अपवित्र थी और उसकी कमर तक पहँुचती थी; उसका शरीर सूखे वृक्ष के तने की तरह था। अपने लक्ष्यानुसार वह नब्बे वर्ष तक जीवित रहा।

एक दिन उसने एक तीर्थयात्री को कहते सुना—

‘‘तूरीरी ओरमुज का अवतार मालूम पड़ता है, वह कितना अच्छा है। यदि ऐसा आदमी जो कुछ वह करना चाहता है, करे तो पृथ्वी से तमाम दुःख समाप्त हो जाएँ।’’

मैत्रया की अचलता और कठोर हो गई। यह प्रत्यक्ष था कि पवित्र आदमी ने अपना ध्यान सीधा ओरमुज से लगा लिया था। कुछ क्षणों तक सोचने के उपरांत उसने तीर्थयात्री से कहा—

‘‘मैं ओरमुज से यह नहीं माँग सकता कि वह तूरीरी को उसकी समस्त इच्छाएँ पूरी करने की शक्ति दे, क्योंकि तब वह स्वयं परमात्मा बन जाएगा, परंतु ओरमुज ने अपनी कृपा से आज्ञा दे दी है कि कल से उसके जीवन की समस्त परिस्थितियों में उसकी प्रथम प्रवृत्ति पूरी हो जाएगी।’’

‘‘यह तो एक ही बात है!’’ तीर्थयात्री ने कहा, ‘‘तूरीरी की अन्य इच्छाओं की तरह उसकी प्रथम प्रवृत्ति भी उदार और दयालु होगी। पूज्य मैत्रया, तुमने मुझे वह तथ्य बताया है, जो बहुत से मनुष्यों की प्रसन्नता का कारण बनेगा और मैं तुम्हें अपना धन्यवाद देता हँू।’’

यदि मैत्रया की दाढ़ी कम घनी होती तो तीर्थयात्री उसके पथरीले होंठों पर मुसकराहट की छाप देख सकता, परंतु फकीर शीघ्र ही अपनी अनंत पूजा के स्वप्न देखने लगा।

उन दयालुतापूर्ण कामों की बाबत, जिनको बुद्धिमान तूरीरी की शक्ति से कल से शुरू करेगा, सोचता हुआ तीर्थयात्री शहर को लौट आया।

अगली प्रातः तूरीरी अपनी पत्नी से पहले जागा और एक क्षण के लिए उसकी ओर देखा। किसी दुर्बोध शक्ति से गतिमान वह एकाएक उठी, खिड़की तक गई, देहली के ऊपर से कूद गई और पैदलपथ के पत्थरों से सिर फोड़ लिया।

घर से जाने के बाद, भिखारियों की भीड़ ने भीख के लिए उसे पुकारा। उसने उन्हें कुछ नहीं कहा और उसका हाथ स्वतः उसकी जेब में गया, परंतु इसके पूर्व कि वह जेब से हाथ निकाले, सारे भिखारी उसके सामने मर गए।

आगे चलकर वह सुंदर मंदानकी से मिला—बुद्धिमान् और नेक तूरीरी—उसके सामने झुका और उसके घर तक उसका पीछा किया। वहाँ जब वह अपने जीवन की कहानी सुना रही थी, वह इसके हाथों में ही मर गई। इसने उसे कोमलता से अपनी छाती से लगा लिया।

मंदानकी का घर छोड़ने के पश्चात् चौराहे पर उसको कई गाडि़यों ने रोक लिया, जो भीड़ में फँस गई थीं; यह अपना धैर्य खोने लगा। तत्पश्चात् तमाम कोचवान अपनी सीटों से गिर गए और घोड़ों की पेशियाँ कट गईं, जैसे कोई गुप्त दराँती चल गई हो!

सायंकाल वह थिएटर गया; वह विद्वान् सर्वीलाका से एक कविता पर झगड़ पड़ा। सर्वीलाका का मत था कि वह निसमी की लिखी हुई थी, जबकि तूरीरी को विश्वास था कि उसे गुलाबों के कवि सादी ने लिखा था। एकाएक विद्वान् सर्वीलाका अपनी सीट पर पीठ के बल गिर गया और काले रक्त का वमन किया। सुखांत नाटक, जो उस रात खेला गया, वह अत्यंत सफल रहा और अभिनेताओं को एकमत से सराहा गया। फिर भी जब तूरीरी नाटककार की श्रेष्ठता को सरहाने जा रहा था, नाटककार ने अप्रत्याशित ढंग से अपनी आत्मा को उसके बनानेवाले के पास भेज दिया।

इस संपूर्ण मनुष्य संहार से भयभीत हुआ तूरीरी घर लौटा और अपने आपको यह जानने में असमर्थ पाकर कि यह सब कैसे हुआ, उसने अपने हृदय में कटार घोंपकर आत्महत्या कर ली।

पवित्र फकीर मैत्रया भी उसी रात इसी प्रकार मर गया।

दोनों एक ही समय बुद्धिमान् ओरमुज के सम्मुख पेश हुए। फकीर सोच रहा था, ‘यदि इस झूठे संत को, जिसकी नेकियों की प्रशंसा ने फारस के लोगों को मूर्ख बनाया, दंड मिलता है तो मैं नाराज नहीं होऊँगा, परंतु एक दिन, जो इसे यह दिखाने के लिए दिया गया था कि वह कैसा था, ये अनगिनत पाप और अपराध कैसे कर पाया?’

परंतु बुद्धिमान् ओरमुज ने कहा, ‘‘भला तूरीरी, वास्तव में अच्छा और दयालु व्यक्ति, मेरा आज्ञाकारी और भक्त सेवक अनंत शांति को प्राप्त होता है।’’

‘‘यह वास्तव में अच्छा मजेदार मजाक है।’’ फकीर ने कहा।

‘‘मैं अपने जीवन में इतना गंभीर कभी नहीं हुआ हूँ।’’ ओरमुज ने उत्तर दिया—‘‘तूरीरी, तुमने अपनी पत्नी को इसलिए मिटाना चाहा कि वह दयालु नहीं थी और सुंदर भी नहीं रही थी; और भिखारियों की मृत्यु इसलिए चाही, क्योंकि वे दृढ़ाग्रही थे और तुम्हारे लिए कष्टकारी थे; तुम्हारी पे्रमिका मंदानकी मूर्ख थी—कोचवानों और घोड़ों की मृत्यु इसलिए हुई कि उन्होंने तुम्हारा रास्ता रोका, जब तुम जल्दी में थे। तुमने विद्वान् सर्वीलाका की मृत्यु इसलिए चाही, क्योंकि वह तुमसे सहमत नहीं था और सुखांत नाटककार की इसलिए कि उसे तुमसे अधिक सफलता मिली थी। ये समस्त इच्छाएँ पूर्णतया स्वाभाविक थीं। जितनी भी हत्याएँ तुमने कीं और जिनके लिए मैत्रया तुम्हें दोषी मान रहा है, बिना तुम्हारी जानकारी और प्रथम प्रवृत्ति के कारण थीं; प्रथम प्रवृत्ति जिसपर किसी का नियंत्रण नहीं है। व्यक्ति हर उस चीज से घृणा करता है, जो उसके लिए रुकावट बनती है और जो रुकावट बनती है, वह उसे मिटा देती है। प्रकृति स्वार्थी है और स्वार्थ का नाम है विनाश! अत्यंत भला आदमी दिल से दुरात्मा बनकर शुरू होता है और यदि उसे प्रथम प्रवृत्ति और अनचाही इच्छा का साक्षात्कार कराया जाए तो मानव जीवन के बिना संसार मरुस्थल बन जाए। तूरीरी यही था, जो तुम्हें उदाहरण देकर दिखाना चाहता था। आदमी को उसकी द्वितीय प्रवृत्ति से जाना जाता है, क्योंकि वह उसके संकल्प पर आधारित होती है। बिना दुर्बोध उपहार के, जिसने तुम्हारे श्रेष्ठ दिन को, तुम्हारे न चाहते हुए भी हत्यारा बनाया, तुम्हारा जीवन भलाई और उदारता में व्यतीत होता। यह प्रकृति नहीं बल्कि तुम्हारा संकल्प है, जिसको मैं तुम्हारे अंदर देखता हूँ, जो सदा अच्छाई के लिए था और तुमने जिसका प्रयोग प्रकृति को ठीक करने में किया तथा मेरे अधूरे काम को पूरा किया। इसलिए, प्यारे साथी! मैं तुम्हारे लिए आज अपने स्वर्ग के द्वार खोलता हूँ।’’

‘‘यह उत्तम है।’’ मैत्रया ने कहा, ‘‘इस मामले में तुम मेरे लिए क्या करना चाहते हो? मेरे लिए क्या प्रतिफल है?’’

‘‘वही कुछ,’’ ओरमुज ने उत्तर दिया—‘‘भले ही तुमने इसे अपूर्णता से कमाया है। तुम संत थे, परंतु यदि तुम्हें अहंकार न होता तो केवल मनुष्य से अधिक न होते। तुमने प्रथम प्रवृत्ति पर विजय प्राप्त कर ली है, परंतु यदि तमाम आदमी तुम्हारी तरह रहें तो पृथ्वी से मानव जाति का इससे भी जल्दी सफाया हो जाएगा, जितनी जल्दी दुर्बोध, परंतु सांघातिक शक्ति से एक दिन में हुआ, जिसकी जानकारी मैंने अपने सेवक को दी थी। मैं चाहता हूँ कि मानवजाति चलती रहे, क्योंकि इससे मुझे प्रसन्नता होती है और चूँकि जो दृश्य यह प्रस्तावित करती है, वह अत्यंत प्रभावशाली है। दुःखी संन्यासी, तुम्हारे प्रयास एक सुंदरता से बिल्कुल शून्य नहीं थे। इसलिए मैं तुम्हारी कठोर गलती को क्षमा करता हूँ। परिणामस्वरूप तूरीरी के लिए मैं स्वर्ग के द्वार खोलता हूँ और उसका अपने हृदय से स्वागत करता हूँ, क्योंकि मैं न्यायी हूँ और मैत्रया! मैं तुम्हें प्रवेश की आज्ञा देता हूँ, क्योंकि मैं कृपालु हूँ।’’

‘‘परंतु...’’ मैत्रया ने कहा।

ओरमुज ने अपना कठोर चेहरा उठाया—‘‘मैंने कह दिया, बस।’’

एहसान मुसलिफ बजुर्ग

हमारे संकलन