...किसी से अब क्या कहना

...किसी से अब क्या कहना

कुछ ही दिन तो शेष बचे हैं इस साल को बीतने में। कई महान् साहित्यकारों, कलाकारों का शताब्दी वर्ष, जो याद किए गए, वे भी धन्य थे, जो नहीं याद किए गए, वे भी। ‘तुम्हें याद न मेरी आई किसी से अब क्या कहना’ हिंदी फिल्म का यह चालू टाइप गीत आचार्य शिवनाथ के बारे में सोचते हुए आज बहुत याद आ रहा है। अपनी समझ की न्यूनता के कारण भी इस गीत को मैं क्लासिक नहीं समझ पा रहा, ऐसा भी हो सकता है। हिंदी के किसी सुविज्ञ या चालू टाइप रचनाकार को ही आचार्य शिवनाथ की याद क्यों नहीं आई? यह प्रश्न हृदय को मथ रहा है। मैं क्या कम चालू हूँ? मैं भी तो बैठा था त्रिलोचन पर लिखने, उसी उपक्रम में पत्र-पत्रिकाओं में छपे पत्र, साक्षात्कार, कुछ लेखों को उलट-पुलट रहा था कि अचानक मेरी नजर पड़ी सन् ’९५ में साक्षात्कार पत्रिका में छपे शिवनाथजी के एक साक्षात्कार पर, प्रश्नकर्ता थे डॉ. शैलेंद्र कुमार त्रिपाठी।

देख रहा हूँ विष्णुचंद्र शर्मा के बिखरे हुए कई पत्रों को, जो शैलेंद्र को लिखते हुए निर्देश देते हैं—‘‘शिवनाथजी पर सामग्री भेजो, शिवनाथजी के पास पड़े महत्त्वपूर्ण लोगों के पत्र भेजो, शिवनाथजी से साहित्य के उठते प्रश्नों पर बात करो और ‘सर्वनाम’ के लिए भेजो!’’ आखिर यह जिद शिवनाथजी के लिए क्यों और यह जिद शांतिनिकेतन में केवल शैलेंद्र से ही क्यों? शांतिनिकेतन, शिवनाथ, शैलेंद्र कुछ दिन गुत्थमगुत्था रहे साहित्य के निकेतन में, रतनपल्ली में, फिर लिया गया उनका आखिरी साक्षात्कार, जिसके बाद उनके बोलने-सुनने की शक्ति भी जाती रही और फरवरी ’९८ में वे हमसे विदा हो गए। काशी से ही आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के संपर्क में आए आचार्य शिवनाथ शांतिनिकेतन में भी आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के सहयोगी रहे। आचार्य शिवनाथ के सिवाय यह कौन बता सकता था कि उनको कक्षा में पढ़ानेवाले हिंदी आलोचना के मेरुदंड आचार्य शुक्ल ‘रामचंद्रिका’ में थोड़ा-बहुत खुलते थे और यहाँ खुलने की गुंजाइश भी तो थी। असल में बात यह है कि शुक्लजी ने अधिक न पढ़ा हो, यह कहा जा सकता है या हो सकता है, पर किसी वस्तु को सही रूप में पकड़ लेने की जो क्षमता उनके पास है—हिंदी में कम-से-कम मैं नहीं जानता कि किसी के पास है...किसी सामग्री को किस तरह संयोजित किया जाए कि उसका साहित्यिक मूल्य अक्षुण्ण रहे, उसका साहित्यिक मूल्यांकन बरकरार रहे, यह उनसे सीख ली जा सकती है।

कक्षा में पीतांबर दत्त बड़थ्वाल और आचार्य शुक्ल से पढ़ने के बारे में वे बताते थे कि कक्षा में ‘कामायनी’ मैंने शुक्लजी से ही पढ़ी है। एक विशेषता थी उनमें, कुछ लोग यह समझते थे कि वे आधुनिक काव्य के विरोधी हैं, किंतु ऐसी बात नहीं है। आधुनिक काव्य को समझने और समझाने का जो विवेक उनके पास था, उससे सीखा जा सकता है। वे और बड़थ्वालजी, दोनों ने मुझे पढ़ाया है। बड़थवालजी का क्लास बड़ा ही जिज्ञासा से भरा हुआ होता था। उनकी प्रत्येक क्लास में कोई-न-कोई नई बात मालूम होती रहती थी। असल में वे रिसर्चर थे, जिसे ‘शोधक’ कहा जाता है, इसलिए एक-एक शब्द पर नई-नई बातें उठा करती थीं। आचार्य शुक्ल का क्लास बहुत ही संक्षिप्त और सीमित हुआ करता था। वे जानते थे कि किस क्लास को कितना समय देना चाहिए। पात्रता पर उनकी दृष्टि रहती थी।

आचार्य शुक्ल की दृष्टि तो पात्रता पर रहती थी, पर क्या आचार्य शुक्ल और आचार्य द्विवेदी जैसे मनीषियों ने यह कल्पना की होगी कि रामचंद्र शुक्ल जैसे मनीषी पर पहला ग्रंथ लिखनेवाले साधक के शताब्दी वर्ष में एक आलेख तक नजर नहीं आएगा। यहाँ तो ‘विश्व का सर्वाधिक प्रसारवाला दैनिक’ और ‘तरक्की को चाहिए नया नजरिया’ जैसे वाक्यों को टैगलाइन बनाए हुए बड़े-बड़े समाचार-पत्र और उनके साहित्य संपादक को ‘किस पर लिखवाना है और किससे लिखवाना है’ की सूची अपने यहाँ टाँग चुके हैं। इस काकस में शिवनाथजी जैसे लोग नहीं घुस सकते। आचार्य त्रिलोचन, जिनके शताब्दी वर्ष पर उन्हें याद किया गया, वे शिवनाथजी को याद करते हुए कहते हैं कि शिवनाथजी चेतना के उदयकाल से ही लेखक जाने जाते थे और सामान्य पाठकों में भी उनकी मर्यादा बनती जा रही थी। लेखन का यह ढंग उन्होंने जीवन भर जारी रखा। बनारस में रहते हुए उन्होंने रामचंद्र शुक्ल पर एक पुस्तक लिखी और यह पुस्तक बहुत महत्त्व की है। यह बनारस में ही प्रकाशित हुई थी और बनारस के पाठकों में इस पुस्तक के प्रति बराबर सम्मान रहा। शांतिनिकेतन में रहते हुए उन्होंने अच्छी तरह से बँगला पढ़ी और रवींद्रनाथ के काव्य पर एक बढि़या पुस्तक तैयार की। यह पुस्तक अत्यंत उपयोगी है।

‘आलोचना’ पत्रिका के संपादक और मार्क्सवादी आलोचना के दिग्गज शिवदान सिंह चौहान शिवनाथजी को पत्र लिखकर कहते हैं कि ‘‘जिन व्यापक उद्देश्यों को सामने रखकर ‘आलोचना’ का जन्म हो रहा है, उनकी पूर्ति के लिए आप जैसे मेधावी और विचारशील आलोचक का सहयोग अवश्य मिलेगा, क्योंकि मेरा विश्वास है कि आज के दिन हम सब का यह सम्मिलित कर्तव्य है कि हिंदी में गंभीर ‘आलोचना’ साहित्य के निर्माण में अपना भरपूर योग दें। इसलिए ‘आलोचना’ पत्रिका के माध्यम को आप अपना ही जानकर अपनाएँ, मेरा यह आग्रह है!’’

यह एक समर्पित संपादक का आग्रह था एक मेधावी और विचारशील आलोचक के लिए, जिसका भरपूर निर्वहन शिवनाथजी द्वारा किया गया। और जीवन की सांध्य वेला में ‘आलोचना’ के करीब सैकड़ों अंक (अठारह जिल्द) अपने स्नेहभाजन डॉ. शैलेंद्र को पढ़ने को दे दिए। पर हाय रे विधि का विधान! शांतिनिकेतन के विश्वभारती के हिंदी विभाग का यह नवारूढ़ विभागाध्यक्ष असमय कालक्षेप के कारण हिंदी के द्रोणाचार्यों से अपने कमरे में रखी उस व्यक्तिगत निधि की रक्षा नहीं कर सका।

तीन पत्र, तीनों हिंदी के महारथी—शिवदान सिंह चौहान, नामवर सिंह, नंददुलारे वाजपेयी शिवनाथजी से क्रमशः ‘आलोचना’ में लिखने की बात, थीसिस देखे जाने की बात और उनकी पुस्तक ‘मीमांसिका’ एवं ‘हिंदी नाटक’ पढ़ने की बात सन् १९५१ में करते हैं तो यह लगता है कि जिस मेधावी और विचारशील समालोचक को ऐसे महारथी सम्मान देते थे, चालू और सत्ता के गलियारों वाले बड़े नाम इन्हें याद करने की भी जरूरत नहीं समझते।

शिवनाथजी चले गए, असमय शैलेंद्र भी। शांतिनिकेतन स्थित रतनपल्ली में दोनों की बातें गूँज रही होंगी, पर सुननेवाला कौन? मैं देख रहा हूँ—डॉ. शैलेंद्र द्वारा लिया गया उनका आखिरी साक्षात्कार और उन्हीं को लिखे करीब दर्जनों पत्र, जिनकी लिखावट मेरी समझ से परे ठीक उसी तरह, जैसे उन्हें याद न करना।

अपने शताब्दी वर्ष में एक अदद लेख के लिए तरसनेवाले इस आचार्य के लिए कौन पूरी करेगा? त्रिलोचनजी की यह साध—‘शिवनाथजी के विषय में शांतिनिकेतन में ही रहनेवाला कोई उनकी जीवनी लिखने के लिए आए तो यह अच्छी बात होगी और पाठक जानेगा कि उनके साहित्यकार कैसे थे और क्या कर गए!’

कुमार अनिल
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