नए साल के इंतजार में

नए साल के इंतजार में

जाने इस देश में कैसे लोग बसते हैं कि उन्हें नए साल की प्रतीक्षा रहती है? उन्हें आज तक यह समझ नहीं आया है कि इस जनवरी से उस जनवरी तक कलेंडर के सिवाय क्या बदलता है? कभी चुनाव का वर्ष हो तो जरूर नए नारे, वादे, आश्वासन सुनने को मिल जाते हैं। जनता जानती है कि जो जितना बड़ा नेता है, वे उतना ही बड़ा झूठा है। इस मामले में वह कतई अविश्वसनीय है। फिर भी वे उसके झूठ को माफ  करते हैं। ‘‘उसने गरीबी हटाने या काला धन मिटाने के लिए कहा तो कम-से-कम। जरूर उसकी मजबूरियाँ रही होंगी। ऐसा नहीं है कि उसने कोशिश नहीं की हो।’’ इस तर्क पर हर बड़े नेता को क्षमा मिल जाती है अगले चुनाव में फिर नया आकर्षक झूठ दोहराने को।

यों तो लोगों को कुछ बड़े परिवर्तन का इंतजार भी नहीं होता है। बस कुछ छोटी बातें हैं, जैसे भोला ने पूरा इंतजाम कर लिया नकल से हाई स्कूल करने का। अंतिम वक्त बेचारे का परीक्षा-केंद्र बदल दिया गया। उसे विश्वास है कि इस बार वह हर संभावना का ताल-मेल बिठाकर ऐसा प्रबंध करेगा कि कोई धोखा न हो। वहीं रामजी एम.कॉम. करके नियमित नौकरी के इंतजार में है। पिछली बार सब पक्का हो गया था, पर इंटरव्यू के समय रेट ही बढ़ गया। बस पचास हजार की वृद्धि से अफसरी धरी रह गई। सेल्स टैक्स अफसर बनने में कोई कसर न थी। ऐसी अनपेक्षित दुर्घटनाएँ अकसर हो जाती हैं। इस बार उसने पूरा इंतजाम कर लिया है। रेट बढ़े तो बढ़े, वह पूरी राशि चुकाने में सफल होगा। उसकी यही आशा है कि पोस्ट का विज्ञापन फिर निकलेगा और इस बार उसके साथ छल-कपट का कोई चांस न रहेगा। उसे भरोसा है कि पिछली बार के समान ‘ठेका’ लिखित और इंटरव्यू दोनों का होगा। एकमुश्त राशि चुकाने से दोनों से पार पाना संभव होगा। वह और उसके घरवाले सबको प्रतीक्षा है कि नया वर्ष उनकी कामना को पूरा करे।

वर्ष का अंत संभव है, उम्मीदों का नहीं। तभी तो चंटू और उसकी गैंग ने बैंक लूटने के निश्चय पर इस साल अमल करने का फैसला किया है। पिछले वर्ष दुर्भाग्य से उन्होंने जिस बैंक मैनेजर को पटाया था, उसका तबादला हो जाने से सब मेहनत निरर्थक हो गई। अब उन्होंने नए मैंनेजर पर डोरे डाले हैं। इतनी जल्दी उसके स्थानांतरण का तो प्रश्न ही नहीं उठता है। यह निश्चित हुआ है कि लूट के धन में उसका भी हिस्सा होगा। पिछले वर्ष भी तोड़ इसी बात पर हुई थी। लोगों को ताज्जुब होता है कि मैनेजर जैसी शख्सियत कैसे इस जाल-बट्टे में फँस जाती है? उन्हें कौन बताए कि हर विभाग या संस्था में निष्ठा अब लुप्त हो चुकी है। सबको अपनी जेब भरने की प्राथमिकता है, नहीं तो भ्रष्टाचार कैसे फलता-फूलता? छोटा तो छोटा, बड़े-से-बड़ा अफसर भी इसी चक्कर में है। सामाजिक श्रेष्ठता का आज एक ही मापदंड है कि किसने कितनी कमाई की है? ईमानदार और मूर्ख में आज कोई खास अंतर नहीं है। उसमें पैसे कमाने की जुगत होती तो क्यों ईमानदार रहता? या तो कायर था या बिना सूझ-बूझ का, वरना सी.बी.आई. भी भ्रष्ट की जेब में रहती है। भ्रष्ट जानता है कि कमाने का अर्थ मिल-बाँट के खाना है। इसमें सी.बी.आई. को भी शामिल करना समझदारी की निशानी है, नहीं तो पुलिस या किसी भी भ्रष्ट-तंत्र को रोकनेवाले की सिफत है कि वह बड़े-से-बड़े सदाचारी को करप्शन का कुंभकर्ण बना सकता है, वह भी इस अंदाज से कि किसी को शक तक न हो।

दरअसल सबका अपना प्रचार-तंत्र है। उसकी योग्यता का यही मानक है कि वह किसी भी सफेद झूठ को कैसे सच साबित कर सकता है। यदि नेता का प्रचार-तंत्र अकुशल है तो पोंगा पोंगा ही रहेगा, उसका पंडित बनना कठिन है। भारतीय जनता का विश्वास है कि उसका नेता सर्व शक्तिमान है। वह एक ओर सुमेरु ला सकता है तो दूसरी ओर सोने की लंका को फूँकने में भी समर्थ है। किसी इनसान के लिए हनुमान होना शायद संभव न हो तो फिर प्रचार-तंत्र का उपयोग ही क्या है? यह उसी का कमाल है कि वह एक साधारण इनसान को सिर्फ अपने प्रयास व प्रचार से हनुमान बनाने में कारगर है। तभी एक सामान्य आदमी महामानव का अवतार धरता है। ज्ञान के सागर में से एक बूँद भी ग्रहण करना आसान नहीं है, पर प्रचार-तंत्र उसे हर विषय का ज्ञानी सिद्ध करने में सफल है। यही उसकी उपयोगिता है, वरना उसका होना, न होना अर्थहीन है। भारत का नेता विकास से लेकर बड़े-से-बड़े अर्थशास्त्री को टक्कर देने में इसलिए कामयाब है, क्योंकि उसे प्रचार-तंत्र ने ऐसी छवि प्रदान की है। भले ही गरीबी से उसका दूर-दूर का रिश्ता न हो, पर वह उन सबका सगा है, क्योंकि उसने गाँव की झोंपड़ी में रात बिताई है। उनका दर्द समझा हो, न समझा हो, पर वह उनसे अपने को जुड़ा महसूस करता है। यह जुड़ाव वास्तव में हो, न हो, पर प्रचार-तंत्र का जादू है कि वह इसे साकार करता है। उसे गंदे बच्चों से चिढ़ है, पर प्रचार-तंत्र उन्हीं के साथ उनकी गोद लिये तसवीर ऐसे प्रचारित करता है कि लोग उनके साथ उसके लगाव को सच मानते हैं।

हर वर्ष के साथ इंतजार का सिलसिला खत्म नहीं होता है। बस लोगों के मन में एक उम्मीद रहती है कि इस साल लटका रहा, क्या पता, अगले साल निपटारा हो ही जाए? हमें याद है कि हमारे संयुक्त परिवार में एक गूँगे-बहरे सज्जन भी थे। सबसे बुजुर्ग होने के कारण घर में उनका सम्मान था। कभी-कभी हमें उम्र में उनसे छोटे होने के कारण आश्चर्य भी होता कि कोई बरात गुजरती तो सबसे अधिक उत्कंठा और उमंग से वे उसे ताकते रहते। वे तो उसमें शरीक भी हो जाते, पर लोकाचार के कारण शायद यह संभव नहीं था। वह तो उनके हमउम्र ने एक दिन राज खोला कि वे जीवन भर विवाह की आकांक्षा पाले रहे, पर हो नहीं पाया। अब बेचारे बरात और बैंड देखकर ही संतोष कर लेते हैं।

जीवन का ध्रुव सत्य है कि जो जिसके पास नहीं है, वह उसी की इच्छा करता है। कुछ साँवले लोगों द्वारा क्रीम-पाउडर का प्रयोग इसका छोटा सा उदारहण है। कालों का गोरी चमड़ी के प्रति आकर्षण भी इसी श्रेणी में आएगा। भारत प्रारंभ से रंग-भेद के विरुद्ध रहा है। जाने कोई यह क्यों नहीं सोचता कि अपने ही देश में इसका चलन भले ही अपवादस्वरूप हो, पर उसका होना दुखद है। कुछ तो यहाँ तक कहते हैं कि दक्षिण में जयललिता से लेकर नेहरू-गांधी परिवार की लोकप्रियता का एक कारण चमड़़ी का रंग भी है। हम मानते हैं कि यह तथ्य केवल हास्यास्पद से अधिक कुछ नहीं है। फिर भी वस्तुस्थिति चाहे कुछ भी हो, इस स्थिति पर विचार करना उचित है कि किसी भी सभ्य समाज में इस प्रकार की सोच क्या तर्कसंगत है? कोशिश यही होनी चाहिए कि इससे कैसे छुटकारा पाया जाए। सब विद्वान् इसी मत के हैं। भले समाज में उनके कहे पर अमल हो, न हो।

नए वर्ष के आगमन को ऐसे धूमधाम से मनाया जाता है कि जैसे सबकी मनोकामना पूर्ण होने का समय आ ही गया है। हमारे एक मित्र का निष्कर्ष है कि ऐसा नहीं है। संभव है कि सब इस खयाल से खुश होते हों कि पूरा वर्ष बीत गया और न वह किसी दुर्घटना के शिकार हुए न किसी सड़क के माफिया युद्ध के अथवा किसी डॉक्टर की पेशेवर चूक के। वे जानते हैं कि हिंदुस्तान में आलू-भंटे से भी सस्ती इनसान की जान है। एक का दाह-संस्कार हो या दस का, आबादी की ऐसी इफरात है कि फर्क क्या पड़ता है? फिर भी रास्ते वैसे ही भीड़-ग्रस्त बने रहते हैं, जैसे पहले थे और बेरोजगारों की तादाद भी। एक को रोजगार उपलब्ध हो तो सौ बेकारों की कतार लग जाती है अपना अधिकार जमाने केलिए। मूल समस्या आबादी का विस्फोट है। उससे सब आँखें मूँदे बैठे हैं। सब राजनीतिक दल इसका जिक्र करने तक से हिचकते हैं कि कहीं संजय गांधी के ‘हम दो हमारे दो’ जैसी दुर्दशा न हो चुनावी संग्राम में। सबके लिए सत्ता पर कब्जा देशहित से कहीं आगे है। यदि मतदाता को परिवार नियोजन से परहेज है तो उन्हें क्या पड़ी है ‘आ बैल मुझे मार’ का दृष्टिकोण अपनाने की। वोटर अपने अज्ञान में भुगतना चाहता है तो भुगते।

हमें ताज्जुब होता है कि नववर्ष के आगमन पर हर्ष और उल्लास के इस वातावरण पर यदि सामान्य हादसों से बच भी निकले तो अपने आराध्य को धन्यवाद दें, उत्सव-तमाशे की क्या जरूरत है? हिंदुस्तान में इनसान को भगवान् की इच्छा या संदेश सुनानेवालों की कमी नहीं है। ऐसे महापुरुष ज्योतिषी या भविष्यवक्ता कहलाते हैं। उनसे सलाह लें तो वे छूटते ही बता देंगे कि कुंडली में शुभ ग्रहों का प्रभाव अधिक था मारक ग्रहों की तुलना में। ‘‘यदि आप सही-सलामत हैं तो इसी वजह से। आते रहा कीजिए, लाभ ही होगा।’’

जाहिर है कि वे अपनी फीस का बंदोबस्त भी करते चलते हैं। उनसे मिलकर प्रभावित होना लाजमी है। उनके कमरे में देश के बड़े लोग, जैसे प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री आदि के साथ उनकी फोटो की भरमार है। वे उनकी ओर इंगित कर बताते भी हैं, ‘‘इन सबके सत्ता पाने में हमारा योगदान है। यों तो हम बिना ऊपरवाले की कृपा के व्यर्थ हैं। उसने जो कहा, वह हमने इनको सूचित किया, इन्होंने माना भी, वरना क्यों यज्ञ और हवन करवाते? इन सबका प्रताप है कि आज देश के सर्वोच्च पद पर आसीन हैं।’’

इनमें से कई उनके पिता की उम्र के हैं और उनका देहावसान इनके जन्म के समय ही हो चुका है, उन्हें भी सत्ता इन्होंने ही दिलाई है। आनेवाला इतना हड़कता है कि फीस देकर उन्हें साष्टांग दंडवत् करके चुपचाप लौट आता है। दीगर है कि ज्योतिषी महोदय की हर भविष्यवाणी को झुठलाते हुए उसे आज तक नौकरी नसीब नहीं हुई है। हर बार कोई-न-कोई दुष्टग्रह उससे भाग्योदय के अवसर को झटक लेता है। वह बार-बार उनका शिकार हो जाता है। इसमें न ज्योतिषी का दोष है, न सरकार का। लिखनेवाले ने उसकी कुंडली ही ऐसी रची है।

इक्कीसवीं सदी में, कौन कहे कि ऐसे अंधविश्वासी भी हैं? यदि भगवान् हैं भी तो क्या उन्हें इतनी फुरसत है कि हर इनसान के सुख-दुःख में हिस्सेदार बनें? जब पड़ोसी तक पासवाले के सुख-दुःख में रुचि नहीं लेते हैं तो ऊपर बैठे प्रभु क्यों ऐसा करेंगे? हमने तो अकसर देखा है कि यदि पड़ोस की लड़की बिना बताए किसी के साथ भाग जाए तो पड़ोसी मिठाई बाँटता है। पूरा प्रयास जाननेवाले के ‘अहित-साधन’ का है तो हम कैसे मान लें कि भगवान् किसी अनजान के भले-बुरे का इतना ध्यान रखेंगे? इसी कारण विद्वानों का निर्णय है कि ये सब दिल को दिलासा देने के साधन हैं। इनका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। विवशता में हमें उनसे सहमत होना पड़ता है।

इसे देश का दुर्भाग्य ही कहेंगे कि हमने इंतजार को भी काम का दर्जा दे दिया है। मसलन, कोई जब तक एक नौकरी के नतीजे की प्रतीक्षा करता है तो ऐसा नहीं है कि वह हाथ-पर-हाथ धरकर बैठे। वह दूसरी-तीसरी और अन्य जगहों पर भी अर्जी भेजता है। इस प्रक्रिया में समय लगता है और वह सुबह से लेकर शाम तक इसी में व्यस्त है। जैसे घर के नौकरी पाए दूसरे सदस्य काम पर जाते हैं, वैसे ही वह भी नहा-धोकर ‘काल्पनिक’ दफ्तर की ओर सिधारकर अपने मन के इसी भ्रम में जीवित है कि वह भी घर से बाहर पैसा कमाने की होड़ में जुटा है। उसकी जेब के पैसे, जूते-चप्पल के साथ घिसें तो घिसें। बस उसे एक ही चिंता है कि ऊपरवाले की अनुकंपा से कहीं कुछ जुगाड़ हो जाए।

नौकरी का भी अपना नियम है। देखने में आया है कि कुछ किस्मतवाले एक बारगी चार-पाँच हथियाते हैं और कुछ दुर्भाग्यशाली एक तक को तरसते हैं। यह नौकरी का ‘एक से अनेक’ का सिद्धांत है। जैसे पैसा पैसे की ओर आकृष्ट होता है, वैसे ही नौकरी नौकरी की ओर। देखने में आया है कि कई पेट काटकर लॉटरी का टिकट खरीदते हैं और उसमें भी ठगे जाते हैं। जो समृद्ध हैं, लॉटरी को भी उन्हीं की तिजोरी पसंद है। कभी-कभी संदेह होता है कि क्या समाज में कहीं भी न्याय है या नहीं?

जैसे नौकरी में एक से अनेक का सिद्धांत है, वैसे ही प्रतीक्षार्थियों का भी एक से सौ का उसूल है। जैसे-जैसे उनकी तादाद बढ़ती है, नया साल मनानेवालों की संस्था भी। जिनके पास कुछ करने को नहीं है, वे करें भी तो क्या? सब नए वर्ष का हल्ला मचा रहे हैं तो वे भी कुछ नहीं तो हल्ला ही मचा लें। हम तो सोच-सोचकर सिहर उठते हैं कि कहीं ऐसा तो नहीं है कि निर्धन की नियति निर्धन रहना है और प्रतीक्षार्थी की प्रतीक्षार्थी!

गोपाल चतुर्वेदी
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