आम्रपालि परिणय

चक्रमण करते महन्मान ऋषि को शिशु रुद्रन ने चौंकाया,

नवजात बाला को देख ऋषि का हृदय द्रवित हो आया।

पूजा-पाठ-सुधि छोड़ उठा सीने से लगाया,

ईश-कृपा मान संतान रूप में अपनाया।

आम्रवन में उसके मिले होने के नाते,

‘आम्रपालि-आम्रपालि’ कह उसे बुलाते।

ऋषि वात्सल्य में आम्रपालि पलने लगी,

चमत्कृत करता यौवन ले वह खिलने लगी।

समय पूर्व ही आम्रपालि तो युवा हो आई थी,

परिणय की चिंता ऋषि को अब घिर आई थी।

नगर-गाँव आम्रपालि के परिणय की कामना करने लगे,

परिणय के अपने प्रस्ताव ले ऋषि को मिलने लगे।

हर पुरुष की आम्रपालि बन गई थी अभिलाषा,

कैसे मिले आम्रपालि, सोच-सोच रह जाता।

आम्रपालि के इतने चितेरे, ऋषिवर तो घबराए,

परिणय कैसे होगा इसका, सोच-सोच सकुचाए।

असमंजस में ऋषि तो वैशाली संसद् जा पहुँचे थे,

संसद् ही वर चुने अब प्रश्न बारंबार दुहराते थे।

प्रस्ताव ले राजे-महाराजे भी संसद् जा पहुँचे थे,

आम्रपालि मेरी ही परिणीता होगी सारे दुहराते थे।

ढेरों परिणय-प्रस्ताव देख वैशाली संसद् तक घबराई,

किसे स्वीकारे, किसे नकारे परिणाम सोच सकुचाई।

एक चयन से निश्चित ही दंगल और युद्ध होगा,

मंगल अमंगल बन रक्तपात व विध्वंस होगा।

परिणय-प्रश्न पर संसद् ने गंभीर चिंतन किया,

तर्क-वितर्क, विचार कर निरापद निर्णय दिया।

हे आम्रपालि! अति सुंदर व रूपमती,

देश के हित में होगा मात्र यही सही।

अरी, तू पूरे वैशाली नगर की वधू होगी,

जो सम्मान दे चाहेगा, उसकी तू भोग्या होगी।

आम्रपालि! वज्जी गणराज्य सत्ता से आज तू मुक्त होगी,

उसी जीवनदाता आम्रवन की तू अधिष्ठाता होगी।

चारों ऋतु अनुकूल प्रसाद ऐश्वर्य से तू लिप्त होगी,

नृप समान ही आम्रवन की तू संप्रभु-सम्राज्ञी होगी।

रमेश चंदर
डी-७२, सेक्टर-१२
नोएडा-२०१३०१ (उ.प्र.)
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