मेरा मुझमें कुछ नहीं

मेरा मुझमें कुछ नहीं

ट्रेन जब स्टेशन पर पहुँची तो सुबह होने ही वाली थी। उजाला पूरी तरह हुआ नहीं था। प्रभा चार बजे ही उठकर बैठ गई थी। इस साठ वर्ष की उम्र में भी मायके आने का उतावलापन उसे कहीं-न-कहीं पुलकित कर देता है। वैसे देखा जाए तो मायके में न माँ है न भाभी, जो उसके आने पर उसका नेह-छोह करतीं, घर पूरी तरह से स्त्री विहीन है। पिता माँ और भाभी से पहले गुजर गए थे। प्रभा के बड़े भाई साहब को कभी परिवार से मतलब नहीं रहा, ले-देकर प्रभा के दूसरे भाई हैं, जो उम्र में प्रभा से करीब पाँच वर्ष बड़े हैं। पुत्री का विवाह कर चुके हैं और पुत्र दीपक मुंबई की किसी मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी करता है। अपने साथ काम करनेवाली किसी दक्षिण भारतीय लड़की से विवाह कर चुका है। दीपक के विवाह के बाद करीब दो साल होने को आए, प्रभा का अपने भाई यानी कि दादा से मिलना नहीं हो पाया है। प्रभा जब भी आती है तो दादा उसे स्टेशन पर खड़े मिलते। इस बार उसने कह-सुनकर उन्हें स्टेशन आने से मना किया था। अपनी सौगंध तक देने से नहीं चूकी। अपना ट्रॉली बैग लेकर जब प्लेटफार्म पर उतरी तो सामने अखबार वाला दिख गया, उसे आवाज देने ही वाली थी कि वह स्वयं अखबार और चाय का गिलास लेकर सामने आ खड़ा हुआ। इससे पहले कि वह पर्स से पैसे निकालकर उसे देती, उसने चाय पकड़ाई और सिर झुकाकर मुसकराता हुआ जाने लगा, वह बोल पड़ी—‘‘अरे तुम्हारे पैसे कितने हुए?’’

हाथ के इशारे से उसने मना कर दिया और अपना अखबार उठाकर चलता बना। प्रभा ने ध्यान से देखा तो पहचान गई, दादा के घर काम करनेवाली कमली का बेटा नन्हकू था, जो स्टेशन पर अखबार बेचता था। यद्यपि पाँच रुपए की चाय थी, पर नन्हकू के पैसे लिये बिना चले जाने से मायके आने की एक पुलक चाय की गरमाहट के साथ उसके गले से कलेजे तक उतर गई। नानी-दादी गलत नहीं कहा करती थीं कि ‘औरत को तो मायके का कौआ भी प्यारा होता है।’ यह नन्हकू तो जीता-जागता इनसान है। बाहर निकली तो ड्राइवर दादा की गाड़ी लेकर खड़ा था। जाने-पहचाने रास्ते से होकर गाड़ी दादा की सोसाइटी के अंदर दाखिल हुई तो प्रभा को लगा कि वॉचमैन से लेकर लिफ्टमैन तक को उसके आने की खबर है। डोरबेल पर उँगली रखने से पहले दादा की आवाज आई, ‘‘अंदर आ जाओ प्रभा, दरवाजा खुला है।’’

‘‘गजब, इतनी सुबह आप उठकर दरवाजा खोलकर मेरा इंतजार कर रहे हैं।’’ पाँव छूने से पहले प्रभा बोल पड़ी।

‘‘और नहीं तो क्या, तू कौन सा रोज आती है।’’

वही धीर-गंभीर वात्सल्य से भरा हुआ स्वर। अचानक प्रभा को लगा कि इस सजे-सजाए दो कमरे के फ्लैट में दादा बिल्कुल अकेले हैं। इसके पहले वह जब भी आई तो किसी-न-किसी आयोजन में ही आई। घर रिश्तेदारों से भरा रहा करता था, नहीं तो दोनों बच्चों में से ही कोई-न-कोई होता। पहली बार दादा को अकेले देखा उसने। ड्राईंगरूम में सोफा कम-बेड पर अधलेटे से दादा जाने क्यों उसे बहुत कमजोर लगे। पिछले दो सालों में ही इतना परिवर्तन कैसे हो गया। दीपक की शादी में तो स्वस्थ और खुश देखा था उन्हें। पूछ ही लिया उसने—

‘‘दादा, आप बीमार हैं क्या?’’

‘‘अरे नहीं प्रभा, अच्छा भला तो हूँ।’’

‘‘पर मुझे तो आप वीक लग रहे हैं।’’

‘‘उम्र का असर है रे, कुछ खास नहीं।’’

‘‘आप अपना ध्यान नहीं रखते।’’

‘‘रखता हूँ प्रभा।’’

‘‘कमली काम नहीं करती क्या?’’

‘‘करती है न, आती ही होगी।’’

तब तक कमली आ खड़ी हुई, प्रभा को देखते ही बोली—

‘‘आ गई दीदी, अकेले आई क्या, मेहमान नहीं आए?’’

‘‘नहीं, इस बार मैं अकेली ही आई हूँ, उन्हें छुट्टी नहीं मिली।’’

‘‘हाँ, सो तो है ही, इतने बड़े हाकिम हैं।’’

कमली घर में सबके मुँह लगी थी। प्रभा की माँ उसे अपने गाँव से लेकर आई थी उसके पति और बेटे के साथ। दादा का ड्राइवर उसी का पति है। माँ और भाभी के समय से ही वह इस घर में काम करती थी। दोनों के जाने के बाद इस घर को, बच्चों को सँभालने में उसकी बहुत बड़ी भूमिका रही। अब उसकी उम्र हो चली थी, पर घर की सार-सँभाल कर लेती थी।

नाश्ते की टेबल पर अपनी पसंद के सत्तू के पराँठे देखकर उसे अच्छा लगा। उसकी प्लेट परोसती हुई बोली कमली, ‘‘खाओ दीदी, बताओ कैसा बना है, हफ्ते भर से साहेब तुम्हारे आने की तैयारी में लगे हैं।’’

‘‘हफ्ते भर से!’’

‘‘अउर क्या परभा दीदी, तुमको जो-जो पसंद है, सब बनाने का समान मँगाए हैं। अरे इतना किसिम-किसिम का समान तो महीने भर में नहीं मँगाते साहेब।’’

प्रभा कह नहीं पाई कि दो दिन बाद वापसी का टिकट उसके पर्स में धरा है। कमली का बोलना अनवरत जारी था—‘‘आज तुम हो तो घर घर लगता है, चौका में काम पसरा है, नहीं तो साहेब का खाना बस वही रोटी अउर लौकी। कभी-कभी तो उहो नहीं।’’

‘‘क्यों बच्चे आते होंगे, दादा की ससुराल भी तो दूर नहीं है।’’

‘‘बच्चे, अरे कहाँ दीदी, बिटिया तो ससुराल की होकर रह गई, यही ठीक है, अब उही न उसका घर है, पर फउन रोज करती है, नित दिन साहेब का हाल-चाल लेती है।’’

‘‘और दीपू?’’

‘‘अरे उसका क्या पूछती हो परभा दीदी।  न कौनो फउन, न खबर, उसका त कौनो थाहे-पता नहीं मिलता।’’

‘‘मतलब, आता नहीं है।’’

‘‘अरे आया रहा एक बार आपन बहुरिया साथे, चार दिन रहा, जउन-जउन समान उसका मतलब का था, ले गया बटोरि कै।’’

‘‘ठीक तो है, वहाँ इस्तेमाल हो जाएगा, यहाँ फालतू ही पड़ा रहता।’’

‘‘अरे फालतू काहे दीदी, इहो तो उसका घर है। एक ही तो बिटवा है, घर-दुआर किसका है, उसी का न। सो उस घर-दुआर की कौनो चिंता है उसको।’’

‘‘बच्चे भी क्या करें कमली। काम ही इतना रहता है प्राइवेट फर्म में कि पूछो मत।’’

‘‘आरे त अकेले बूढ़े बाप की देख-भाल करना क्या उसका काम नहीं।’’ कमली आदतन बिना लाग-लपेट के दो टूक बोली।

प्रभा को जवाब नहीं सूझा, फिर भी बोली, ‘‘धीरे-धीरे समझ जाएगा, अभी-अभी ब्याह हुआ है उसका, जिम्मेदारी पड़ेगी तो मैच्योर भी हो जाएगा।’’

‘‘आरे यही तो दुःख है न दीदी, कईसा बिहाव हुआ है दीपू का, हम तो कह दिए साहेब से, कैसी बहू लाए हो, इसको कुछौ काम-काज नहीं आता।’’

इतना सुनकर प्रभा आसमान से नहीं गिरी, कमली की जीभ की धार से वह परिचित थी, वरना आजकल ऐसी तीखी बात तो सगी सास भी बहू के लिए नहीं कह सकती, घर में कामवाली की क्या मजाल। पर कमली की बात और है, तीखी जुबान के बावजूद वह भरोसेमंद और जिम्मेदार महिला है। प्रभा की माँ के समय से इस घर में काम करती है, पूरी बीमारी भाभी की सेवा की, उनकी मृत्यु के बाद दोनों बच्चों को सँभाला, क्योंकि दादी-ताई को तो दुःख के मारे अपना ही होश नहीं था, उसका स्थान अपने आप घर के सदस्य की तरह हो गया था, प्रभा जानती थी, इसलिए उसकी बातों को बुरा माने बगैर बोली, ‘‘वह भी सीख जाएगी कमली, आज-कल पढ़ाई-लिखाई, फिर नौकरी, फुरसत ही कहाँ मिलती है उन्हें।’’

‘‘लो और सुनो, तुम क्या अँगूठा-छाप हो, प्रोफेसर हो कि नाहीं, इत्ता मोटा-मोटा पोथी पढ़़ती हो, पर कउन काम नहीं आता तुमको बोलो भला, सिलाई-फराई से लेकर पकवान बनाने तक।’’

‘‘चलो छोड़ो न कमली, अच्छा यह बताओ, दीपू के ननिहाल वाले, वे नहीं आते कभी।’’

कमली चावल की थाली लेकर वहीं जमीन पर बैठ गई। आज खुश थी, दोपहर में पूरा भोजन बनना था, कढ़ी-चावल, सूखे आलू, पापड़ आदि। चावल बीनते हुए तुनककर बोली, ‘‘आ जाते हैं तीज-त्योहार, कउन रोज आते हैं।’’

‘‘अरे, यहीं पास में ही तो रहते हैं।’’

‘‘उससे क्या हुआ, दूरी तो मन का होता है दीदी। अब उनके लिए यहाँ क्या धरा है, वे क्यों आएँगे, ऊपर से साहेब रिटैर भी हो गए।’’

‘‘नहीं-नहीं, ऐसा नहीं है, भाभी के जाने के बाद उन्होंने ही बच्चों को सँभाला है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए।’’

‘‘जनती हैं हम, बच्चन के सँभाला, साहेब ने कुछौ नहीं किया क्या अपने बच्चन वास्ते। आरे जब बहूजी मरी रही, उमिर का रहा साहेब का, उ चाहते तो तुरत दूसर बियाह कयी लेते। पर नाहीं, दूनों बच्चन के अलावा उनका लिए जिंदगी में अउर कुछो नाहीं बचा रहा।’’

एक लंबी साँस लेकर रह गई प्रभा। बात सच थी, जब पत्नी का देहांत हुआ तब दादा की उम्र चालीस के आस-पास रही होगी। परिवार ने दूसरी शादी के लिए मनाने की बहुत कोशिश की, पर वे तैयार नहीं हुए। प्रभा ने जब कहा तो बोले, ‘देखो प्रभा, इन बच्चों की माँ तो रही नहीं। जैसी भी थी, इनकी माँ थी। ये बच्चे बिन माँ के तो हो ही गए, दूसरी शादी करके मैं इनसे इनका बाप भी कैसे छीन लँू।’

सिहर उठी प्रभा, बोली, ‘आप ऐसा क्यों सोचते हैं दादा, आपके बच्चे कभी आपसे दूर नहीं होंगे, हर सौतेली माँ नेगेटिव ही हो, जरूरी तो नहीं।’

‘जरूरी तो बहुत कुछ नहीं होता है रे प्रभा! फिर भी इनसान सबकुछ कहाँ मैनेज कर पाता है। इनसान के हाथ में है ही क्या, कुछ भी तो नहीं।’

‘ऐसा क्यों कह रहे हैं दादा, आपने तो हमेशा सबकुछ सँभाला, पर होनी को कौन टाल सकता है।’

कहने को प्रभा कह गई, पर जानती थी, उसके दादा की जिंदगी में होनी नहीं, अनहोनी हो गई थी। ऊपर से दादा की बात ने उसका कलेजा चीर दिया, ‘जैसी भी थी, इनकी माँ थी।’

दादा की पत्नी यानी अपनी भाभी से वह कभी अभिन्नता से जुड़ नहीं पाई। दादा के विवाह के साल भर के अंदर स्वयं उसका विवाह हो गया। दादा के दहेज की मोटी रकम उसके विवाह में खर्च हो गई थी, वह जानती थी। भाभी संपन्न घर की इकलौती पुत्री थीं। लड़के का पद देखकर उनके पिता ने उनका कन्यादान किया था। प्रभा के परिवार के साथ उनका ताल-मेल कभी नहीं बैठ पाया। निम्नमध्यमवर्गीय बेहद महत्त्वाकांक्षी परिवार की अपेक्षाओं को पूरा करने में तन-मन-धन से लगे हुए पति के साथ शायद वह चाहकर भी चल नहीं पाईं। आज प्रभा महसूस करती है कि दादा अपनी पत्नी के लिए परिवार में स्पेस बनाने में चूक गए, या शायद उन्होंने इस बात पर गौर करने की अलग से जरूरत नहीं समझी, मोहलत ही नहीं मिली। आज प्रभा यह भी महसूस करती है कि अपेक्षाओं और महत्त्वाकांक्षाओं को सीमित किया जा सकता था, पूर्वग्रह को परे करके उस संपन्न घर की कन्या को बिना किसी मीन-मेख के अपनाया भी जा सकता था। आखिर ‘जहाँ राग हो, वहाँ दोष दिखाई नहीं देता, पर जहाँ द्वेष हो वहाँ गुण भी कहाँ दिखता है।’ अविवाहित बहन, अचानक ही तथाकथित बेहद निरीह और जरूरतमंद बन गए बड़े भाई साहब, अनायास ही बेवजह अपनी नई चाची की प्रतिद्वंद्वी बन बैठीं उनकी दोनों बेटियाँ, हर वक्त बीमार रहनेवाली उनकी पत्नी, अपने त्याग और अधिकार के साथ अनवरत मुखर और सतर्क माँ-बाप, दादा की पत्नी के लिए कोई भी रिश्ता नॉर्मल नहीं रह पाया। एक अव्यक्त तनाव हर वक्त परिवार में पसरा रहता, पति-पत्नी के बीच एक अदृश्य दीवार नामालूम ढंग से खिंच गई।

जब भाभी के कैंसर का पता चला, बीमारी अपने आखिरी स्टेज में पहुँच चुकी थी। पत्नी का इलाज कराने के लिए मुंबई जाने के लिए निकले दादा को बीच रास्ते लौटना पड़ा, क्योंकि दीपू डेंगू की चपेट में आ गया। दीपू के स्वस्थ होने के बाद जब तक वे मुंबई पहुँचे, तब तक देर हो गई थी। भाभी के गुजर जाने के बाद बिखरी हुई गृहस्थी समेटते हुए उन्होंने अपने सारे फर्ज पूरे किए। दोनों बच्चों की परवरिश उन्होंने अकेले की। आज प्रभा मानती है कि बच्चों की बुआ होने के बावजूद दोनों बच्चों की जिम्मेदारी लेने की उसने कोई पहल नहीं की। उसकी अपनी गृहस्थी की उलझनें कम नहीं थीं। माता-पिता की उम्र हो चली थी, उन्हें स्वयं देखभाल की जरूरत थी, जो केवल दादा ही कर सकते थे। ऐसे में दादा के ससुराल वाले बच्चों की देखभाल के लिए आगे आए। उन्हें हॉस्टल पढ़ने भेजा, छुट्टियों में भी बच्चे अधिकतर ननिहाल में ही रहते। दादा को थोड़ी राहत तो मिली, पर बच्चों के कच्चे दिमाग में यह बात घर कर गई कि उनकी माँ की मृत्यु परिवार की लापरवाही की वजह से हुई। पिता पारिवारिक जिम्मेदारियों में ऐसे उलझे रहे कि पत्नी की देखभाल के लिए उनके पास समय ही नहीं था। प्रभा उनका दुःख समझती थी, उनकी बेटी असमय चली गई, उनका आक्रोश स्वाभाविक ही था। यही सब सोचते हुए वह दादा के पास आ बैठी, बोली, ‘‘यहाँ अकेले आपका मन कहाँ लगता होगा, बच्चों के पास हो आया कीजिए।’’

‘‘जाता हूँ, बिटिया के पास गया था पिछले महीने।’’

‘‘हफ्ते भर रहकर आया, वह आने कहाँ दे रही थी, बड़ी कठिनाई से आने दिया उसने। समय निकालकर वह भी आ जाती है।’’

‘‘और दीपू?’’

‘‘उसको छुट्टी कहाँ मिलती है, बहू भी काम पर जाती है।’’

‘‘आप ही हो आया कीजिए।’’

‘‘गया था मैं।’’ धीमी आवाज में बोले दादा।

‘‘कब?’’

‘‘साल भर हो गया होगा।’’ जैसे बुदबुदा उठे दादा।

‘‘वह आया?’’

‘‘अरे कहाँ दीदी, फउन तक तो करता नहीं।’’

कमली चाय की ट्रे लिये सामने थी।

‘‘अरे ऐसे कैसे? आप फोन कीजिए।’’

‘‘रहने दे, अभी व्यस्त होगा।’’

‘‘आज संडे है, आप लगाइए फोन।’’

‘‘ले, तू ही लगा ले।’’ उन्होंने अपना फोन दे दिया।

प्रभा ने नंबर लगाया, घंटी बजती रही। दुबारा लगाया, घंटी फिर बजती रही, फोन नहीं उठा।

‘‘वह मेरा फोन नहीं उठाता, प्रभा।’’

‘‘अरे, हो सकता है सो रहा हो, आज संडे है न।’’

अनायास ही प्रभा दीपू की तरफ से सफाई दे उठी।

‘‘अब तू अपने फोन से फोन लगा।’’

‘‘हाँ, अभी लो।’’ अपना आत्मविश्वास बनाए रखा प्रभा ने।

दूसरी घंटी पर फोन उठा। दीपू की आवाज आई—

‘‘हाय बुआ। हाऊ आर यू?’’ तो भाई सही थे, प्रभा का मन बुझ गया, पर आवाज पर कोई असर नहीं पड़ने दिया उसने, बोली, ‘‘अच्छी हूँ बेटा, तुम कैसे हो?’’

‘‘फाईन।’’

‘‘तो बुआ से मिलने कब आ रहे हो?’’

‘‘आय विल ट्राय, दिल्ली का टूर लगाता हूँ।

प्रभा ने दादा की तरफ देखा, उन्होंने इशारे से मना कर दिया।

प्रभा ने स्वयं के पटना में होने की बात नहीं बताई। फोन रखने के बाद बोली, ‘‘यह दीपू आपका फोन नहीं उठाता?’’

भाई कुछ नहीं बोले, छत ताकते रहे।

‘‘आप कुछ कहते क्यों नहीं?’’

‘‘क्या कहूँ, दोनों सुबह काम पर निकल जाते हैं, देर रात घर लौटते हैं, वहाँ रहते हुए भी कई-कई दिन बात नहीं हो पाती।’’

‘‘पर बात-व्यवहार भी कोई चीज होती है।’’

‘‘दीपू ने कभी सीखा नहीं, इसकी जरूरत नहीं समझी कभी, मैं ही नहीं सिखा पाया।’’

‘‘पटना कब से नहीं आया?’’

‘‘करीब डेढ़ साल हो गए, पर आएगा ही, कितने दिन टालेगा, आखिर उसी का घर है।’’

‘‘नाराजगी किस बात की है?’’

‘‘नाराजगी तो कुछ नहीं है प्रभा। थोड़ा निर्लिप्त और लापरवाह है, अकल आएगी तो खुद ही दौड़ा आएगा। कितने दिन बाप से दूर रहेगा।’’

बहुत पहले प्रभा को अपनी ही कही बात याद आ गई। ‘आपके बच्चे आपसे कभी दूर नहीं होंगे।’ भारी मन को हल्का करने के लिए बोली, ‘‘तो आप उसका इंतजार करते रहते हैं।’’

‘‘करूँगा ही, और काम ही क्या है, इसलिए तो रात में दरवाजा भी बंद...।’’

दादा अचानक चुप हो गए।

‘‘रात में दरवाजा क्या?’’

‘‘कुछ नहीं रे, यों ही।’’

प्रभा जानती थी, यह दीपू भाई के कलेजे का टुकड़ा है, पत्नी की मौत के बाद उन्होंने दोनों बच्चों को गले का हार बना लिया। धीरे-धीरे कब दूरी आ गई, पता ही नहीं चला।

रात का खाना खिलाकर कमली जाते वक्त बोल गई ‘‘दरवज्जा ठीक से बंद कर लेना दीदी, आज तो तुम हो घर में।’’

‘‘मैं हूँ मतलब, मैं नहीं रहती तो क्या दादा दरवाजा बंद नहीं करते हैं रोज।’’

‘‘अब ई तो तुम अपने दादा से ही पूछौ।’’

‘‘क्या बात है दादा, यह कमली क्या कह रही है?’’

‘‘अरे कमली की बात, उसका तो दिमाग ही खराब है, दिनभर उसके साथ बक-बक करके तुम्हारा भी दिमाग फिर गया है। कमली की बात का भी कोई मतलब होता है कभी।’’ दादा के बोलने का जाना-पहचाना पुराना लहजा कौंध उठा एक पल के लिए। डाँट सुनकर जी जुड़ा गया। सुबह से उनके इसी स्वर को सुनने के लिए कान तरस गए थे। भाई के सुर में सुर मिलाकर बोल उठी प्रभा, ‘‘दिमाग क्यों खराब होगा, आप पूरी बात बताते भी हैं कभी।’’

‘‘अब इसमें बतानेवाली बात क्या है, सुबह से बोल-बोलकर मेरा सर खा गई है, अब सो जा-जाकर, आधी रात होने को आई।’’ प्रभा समझ गई, भाई बात टालने के मूड में हैं, कल दिन में इतमिनान से पूछेगी।

दूसरे दिन दोपहर में खाने के बाद कमली के लिए लाई साड़ी उसे देते हुए बोली, ‘‘मैं कल चली जाऊँगी, कमली।’’

‘‘क्या दीदी, कल ही जाओगी, अभी रहो न कुछ दिन।’’

‘‘फिर आऊँगी कमली, अभी तो जाना पड़ेगा।’’

‘‘पता नहीं फिर कब आओगी दीदी।’’ साड़ी गोद में लेकर वह वहीं जमीन पर बैठ गई, फिर अचानक बोली, ‘‘अपने दादा को अपने साथ ही ले जाओ दीदी, साहेब ठीक नहीं हैं।’’

अकेले, बूढ़े और विधुर दादा को अपने साथ ले जाने का खयाल प्रभा के मन में नहीं आया हो, ऐसा नहीं है। कल से वह भी यही सोच रही है, लेकिन निर्णय नहीं ले पा रही है। वह आत्मनिर्भर है, नौकरी करती है, अपना घर है, अपना परिवार है, पति है, बेटा है, बहू है। फिर भी अपने बड़े भाई को अपने साथ रखने का निर्णय अकेले लेना कठिन लग रहा है। दो-चार दिन की बात और है, पर स्थायी रूप से साथ रहने पर क्या वह उनका मान रख पाएगी। उस पर दादा का स्वाभिमानी व्यक्तित्व, उनकी भावनाओं को ठेस पहुँचाने के बारे में वह सोच भी नहीं सकती। आज एक बार फिर प्रभा ने अपने आपको वहीं खड़े पाया, जहाँ वह वर्षों पहले भाभी की मृत्यु के समय खड़ी थी। बच्चों से अपार स्नेह रखने के बावजूद वह उन्हें अपने पास रखने की हिम्मत नहीं जुटा पाई थी। अपने दोनों बच्चों के साथ-साथ वह क्या दादा के बच्चों के साथ भी पूरा न्याय कर पाएगी। धर्मसंकट आज भी वही था। कमली की बात सुनकर वह सोच में पड़ गई। बोली, ‘‘क्या बात है कमली, साफ-साफ बोलो?’’

‘‘क्या बोलें, तुम तो देख ही रही हो, तुमको नहीं लगता कि साहेब बहुत बदल गए हैं, सच पूछौ तो सठिया गए हैं समझो।’’

‘‘क्या मतलब?’’ न चाहते हुए भी प्रभा का स्वर थोड़ा रूखा हो गया।

‘‘न कहूँ आते हैं न जाते हैं, दिनभर घर बैठकर कोई भी बीमार हो जाएगा।’’

‘‘सो तो है।’’

‘‘दिन में तो फिर भी ठीक है, अखबार बाँच लेते हैं, कबहूँ टी.भी. देख लेत हैं।’’

‘‘और रात में?’’

‘‘अब क्या बताईं तुमका, तुम देखे नहीं रातभर दरबज्जा खोलकर सोते हैं, दिन में भी दरबज्जा खुल्ले रहता है।’’

प्रभा को याद आ गया, जब वह कल सुबह आई थी तो दरवाजा खुला मिला था। कमली के मुँह से सुनकर चौंक उठी, बोली, ‘‘दिन-रात दरवाजा खुला रहता है।’’

‘‘अउर क्या, कौनो चोर-उचक्का घुस आय तो।’’

बात गंभीर थी, प्रभा ने भाई से बात की, बोली, ‘‘यह क्या कह रही है दादा, आप रात में द्वार बंद नहीं करते।’’

‘‘अरे, ऐसा कुछ नहीं है, कमली की बात का क्या?’’

‘‘पर कल सुबह मैंने भी देखा था।’’

‘‘वो तो तू आनेवाली थी न इसलिए।’’

‘‘अरे नाहीं दीदी, हम तो रोज आती हैं भोर में, रोज तो इहे हाल रहता है।’’

‘‘अच्छा जा तू अपना काम कर, कल चली जाएगी प्रभा, जो-जो बना के खिला सकती है, खिला दे। फिर जाने कब आएगी।’’

‘‘हाँ, जैसे मैं खाने ही तो आई हूँ।’’ प्रभा के भीतर की छोटी बहन जाग उठी।

‘‘अरे नहीं रे, ऐसा थोड़े कहा मैंने।’’

‘‘पर आप द्वार बंद क्यों नहीं करते, रात-बिरात कोई घुस आया तो?’’

‘‘अरे कौन आता है प्रभा?’’

‘‘चोर-उचक्के आपका अपॉइंटमेंट लेकर तो नहीं आएँगे।’’

‘‘लो वे आकर क्या करेंगे, घर में है ही क्या उठा ले जाने को।’’

‘‘जानती हूँ, भाभी के जो दो-चार गहने थे, वो भी दे डाले उठा के आपने दीपू की शादी में।’’

‘‘अब जिसका था, उसको सौंप दिया।’’

‘‘फिर भी इनसान का सतर्क रहना चाहिए कि नहीं।’’

‘‘यहाँ सोसाइटी में कोई डर नहीं है प्रभा, गार्ड हैं, चारों तरफ  कैमरे लगे हैं।’’

प्रभा उठकर रसोई में चली गई, कमली से बोली, ‘‘दादा भी हद करते हैं, सोसाइटी में सिक्योरिटी न हुई, राम-राज्य हो गया।’’

‘‘अरे, काहे का राम-राज्य दीदी, साहेब को मन में वहम हो गया है।’’

इतने सुलझे विचारवाले दादा के मन में वहम, प्रभा दुःखी हो गई, बोली, ‘‘किस बात का वहम?’’

‘‘मर जाने का और क्या?’’ दो टूक बोली कमली।

इस बार प्रभा आसमान से गिरी, बोली, ‘‘क्या कह रही हो कमली?’’

चूल्हा बंद कर कमली फर्श पर बैठ गई, गाल पर हाथ रखकर बोली, ‘‘सही कह रहे हैं दीदी, हम अपना कान से सुने हैं।’’

‘‘क्या सुना?’’

‘‘अरे पिछले दिनों बड़े भाई साहब आए थे, पता नहीं किसके मर जाने की खबर लेकर। अच्छी खबर तो कोई लाता नहीं, हाँ बुरी खबर देने के लिए उन्हें सबसे पहले साहेब ही मिलते हैं।’’ प्रभा जानती थी अपने बड़े भाई साहेब को, अपना हर काम, अपनी हर जिम्मेदारी दादा पर थोप देने के बावजूद अगर वे दो दिन खुश रह लेते तो बीमार पड़ जाते।

‘‘फिर।’’

‘‘फिर क्या, सुनकर साहेब दुःखी हो गए, बोले, ‘‘अरे, वो तो मुझसे भी छोटा था, मुझसे पहले चला गया।’’ इस पर भाई साहेब अपना ज्ञान बघारते हुए बोले, ‘‘अब जीवन का क्या ठिकाना, संसार है, आना-जाना तो लगा ही रहता है, हम सब पके फल हैं।’’ बस उस दिन के बाद से साहेब ने दरबज्जा बंद करना छोड़ दिया।

प्रभा एक लंबी साँस लेकर रह गई। कमली आगे बोली, ‘‘सिरिफ इहे बात नहीं न है दीदी, तुम तो जानती हो इस घर में जो भी आता है, अपना ही रोना रोता है, साहेब का हाल भी कोई पूछता है कभी।’’

प्रभा ने चुपचाप सिर हिला दिया, बात गलत नहीं थी। वह जानती थी कि दादा की पीठ पीछे सभी खाते हैं, पीते हैं, हँसी-मजाक करते हैं, दादा को देखते ही अस्सी मन पानी पड़ जाता है उन पर। गृहणी विहीन इस घर के कई तथाकथित शुभचिंतक थे। यह शिकायत दादा के बच्चों को भी थी, एक बार तो बेटी उसके सामने ही बिफर उठी, बोली, ‘‘ओ माई गॉड बुआ, डैडी के पास जो आता है, निगेटिव बातें ही करता है, पॉजिटिव एनर्जी आए कहाँ से। पता नहीं डैडी इतना सुनने का पेशेंस कहाँ से लाते हैं।’’

पर दादा सबकी सुनते थे, हर संभव मदद भी करते थे, किसी के ऊपर शक नहीं करते थे। दादा के इस निश्छल मन और धीर-गंभीर स्वभाव की वह कायल थी। वही दादा आज वहम के शिकार हो गए हैं, अवसादग्रस्त और साईको हो गए हैं। प्रभा स्वीकार नहीं कर पा रही थी, बोल उठी, ‘‘नहीं-नहीं, कमली दादा ऐसे नहीं हैं।’’

‘‘अरे, तुम बिटिया रानी से पूछ लो दीदी, अभी पिछले महीने आई थी, वह भी कह रही थी।’’ कमली की सूचना का सूत्र प्रभा के हाथ आ गया, बोली, ‘‘क्या कह रही थी?’’

‘‘अरे अपने दूल्हे से कह रही थी कि मुझे डैडी के लिए डर लग रहा है, वे धीरे-धीरे डिपरेस, वो क्या हो जाता है तुम लोगन की, डिप, डिपरेस...।’’

‘‘डिप्रेशन।’’ न चाहते हुए भी प्रभा के मुँह से निकल गया।

‘हाँ-हाँ वही, डिपरेसन हो गया है साहेब को, बिटिया कह रही थी किसी के भी बीमार होने की खबर डैडी सुनते हैं तो लगता है उन्हें भी वही बीमारी हो गई है, मरने की बात सुनते हैं तो लगता है, उन्हें ही कुछ हो जाएगा।’’

‘‘वह जानती है।’’

‘‘अउर क्या, बहुत परेसान थी, कह रही थी, ‘आप ये सब फालतू बातें मत सोचा कीजिए। मेरे साथ चलिए, वहीं चलकर रहिए।’ पर तुम तो जानबे करती हौ न साहेब को, नहीं गए तो बस नहीं गए। जाते समय रो पड़ी बिटिया, बोली तुम और नन्हकू ध्यान रखना, अपने ड्राइवर चाचा से भी कह गई।’’

‘‘क्या?’’ अनमनी सी बोली प्रभा।

‘‘इहे कि उसके डैडी को घुमाया-फिराया करे। घर में बैठे-बैठे निरास हो जाते हैं। उन्हें लगता है कि कहीं उन्हें कुछ हो गया या अकेले घर के अंदर गिर-गिरा गए, बेहोस हो गए तो कोई दरबज्जा खोल के कैसे आएगा, किसी को मदद के लिए कैसे बुलाएगा, इसलिए दरबज्जा बंद नहीं करते। कहते हैं दरबज्जा तोड़ने में तो बहुत समय न लग जाएगा।’’

प्रभा और नहीं सुन पाई, अपने कद्दावर भाई के इस अंजाम की कल्पना नहीं कर पाई वह, कमली को टोक उठी—‘‘नहीं-नहीं, ऐसा क्यों होगा, कभी नहीं होगा, मैं समझाऊँगी दादा को।’’

‘‘जरूर कहना दीदी, बिटिया की तो सुने नहीं। लोग गलत नहीं कहते कि बच्चे की माँ न मरे, न बूढ़े की बीबी, दोनों ही अनाथ हो जाते हैं। बीबी तो बुढ़ापा आने से पहले गुजर गई, उ समय जंजाल एतना रहा कि साहेब को अपने बारे में सोचने का होष ही नहीं था। पर अब क्या करें, हमको तो लगता है दीदी कि जीने के लिए जंजालों का होना जरूरिए है।’’

प्रभा हैरान रह गई सुनकर, कभी-कभी ये अँगूठा छाप औरतें कितनी गहरी बात कह जाती हैं। जिंदगी की इतनी समझ प्रभा जैसी बुद्धिजीवी वर्ग की संभ्रांत महिलाओं में नहीं होती, जो कमली जैसी महिलाओं पर तरस खाकर, उन्हें गाहे-बगाहे साड़ी, पैसा देकर स्वयं को प्रोग्रेसिव समझ लेती हैं।

कमली से पूछ बैठी, ‘‘दीपू को मालूम है यह?’’

‘‘लो, मालूम काहे नहीं होगा, कौनो दूध-पीता बच्चा है। साहेब तो मुँह खोलकर कहे भी थे साथ जाने को।’’

‘‘क्या कहा?’’

‘‘कहे कि मैं यहाँ अकेला क्या करूँगा, मैं तुम लोगों के साथ चलूँ। मेरा पेंशन तुम ही ले लेना, मैं क्या करूँगा पैसे लेकर?’’

‘‘फिर?’’

‘‘फिर क्या, यह सुनते ही दीपू की बहुरिया तो तुरंत उठकर चली गई कमरे में, पीछे-पीछे दीपू भी। बात नहीं खतम हो गया।’’

‘‘बात खत्म हो गई, दीपू ने कुछ भी नहीं कहा, पर मना भी तो नहीं किया न।’’ प्रभा ने जैसे अपने आपको दिलासा देने की कोशिश की।

‘‘आरे दीदी, ई तो मुँह खोलकर मना कर देने से ज्यादे खराब है। बातें नहीं सुनना, बहिर बन जाना। सामनेवाला करे भी क्या, जब कौने बात का जवाबे नहीं मिले। आरे इससे भली तो मेरे नन्हकुआ की बहू है, लड़ती है, झगड़ती है, पर मेरा रास्ता देखती है। मुँह फुलाती है, पर फिर थरिया भी परस के देती है। कल जो तुम सरिया दी न दीदी, हम ले जा के उसको दे दिए, अब दो-चार दिन खुस रहेगी बहुरिया।’’

प्रभा समझ गई, कमली जैसे लोगों को क्यों डिप्रेशन की बला नहीं होती। उसने ठीक ही कहा था, ‘वो जो तुम लोगन की होता है न डिपरेसन।’ उसकी बात से सहमत होती हुई बोली, ‘‘ठीक कहती हो, दीपू भी लड़ता-झगड़ता, पर कम-से-कम साथ तो रहता।’’

प्रभा नई पीढ़ी के इस व्यवहार को जानती थी। सिर्फ बात का ही नहीं, जीते-जागते इनसान का भी नोटिस नहीं लेना। उदासीनता की ऐसी चरम सीमा कि बोलनेवाला व्यक्ति अपना अधिकार, आत्मविश्वास सब खोने लगे। ऐसे व्यक्ति के अंदर अवसाद तो प्रवेश करेगा ही।

‘‘फिर भी साहेब उस दीपुआ का रस्ता देखते हैं। दरबज्जा खोल के रखते हैं। असल बात इहे है, समझी परभा दीदी?’’

खिला-पिलाकर, समझा-बुझाकर रात होते-होते कमली चली गई। दादा को समझाने की कोशिश की उसने, ‘‘आप मेरे साथ चलिए दादा, यों अकेले मत रहिए।’’

‘‘धत, ऐसा भी कहीं होता है, अब इस उम्र में मैं छोटी बहन के घर जाकर रहूँगा?’’

‘‘वह भी तो आप ही का घर है।’’

‘‘सो तो है ही, आऊँगा मैं, बच्चों को देखने आऊँगा।’’

‘‘आपको ऐसे छोड़कर जाने का मन नहीं है।’’

‘‘लो, अच्छा भला तो हूँ, बल्कि मुझे तो तू ही कमजोर लग रही है, अपना ध्यान रखा कर, अभी उम्र ही क्या है तेरी।’’

प्रभा का मन भीग उठा, आज भी कुछ बातें सिर्फ  दादा ही कह सकते हैं। साठ वर्षीया प्रभा को कानों में दादा की बात मिसरी घोल गई, ‘अपना ध्यान रखा कर, अभी उम्र ही क्या है तेरी।’

इस भाई के लिए वह कुछ नहीं कर पा रही है, जोर देकर, जिद करके उन्हें अपने साथ नहीं ले जा पा रही है, स्वयं भी रुकने की गुंजाइश कहाँ है। गृहस्थी की तमाम उलझनें उसका इंतजार कर रही होंगी। पति की सेहत, उनका रिटायरमेंट, पुत्र का उतावलापन, पुत्रवधु की महत्त्वाकांक्षाएँ, अपनी नौकरी, सबको सँभालते हुए अपने उस घर में दादा को कितना स्पेस दे पाएगी। कहीं वहाँ जाकर वे खुद को सहज महसूस न कर सकें तो? आत्मीय संबंध का यह कैसा रूप है, एक-दूसरे से अभिन्न होने के बावजूद न प्रभा उन्हें अपने साथ ले जा पा रही है, न ही वे उसे अधिकार सहित रोक सकते हैं। बेटियाँ क्या सचमुच विवाह के बाद परायी हो जाती हैं, फिर वह चाहे प्रभा हो या दादा की बेटी दिया। कुछ चीजें क्या कभी नहीं बदलती, प्रभा नए सिरे से यह सोचने को मजबूर हो गई।

सांसारिक नजर से समर्थ होने के बावजूद क्या हर कार्य अपने मन-मुताबिक करना संभव होता है, शायद नहीं। दादा ठीक ही कहते हैं, ‘जरूरी तो बहुत-कुछ नहीं होता, फिर भी इनसान सबकुछ कहाँ मैनेज कर पाता है। इनसान के हाथ में है ही क्या, कुछ भी तो नहीं।’ प्रभा को लगा, इनसान के हाथ में नहीं, सज्जन इनसान के हाथ में कुछ भी नहीं होता। सबका मन रखने में ही जिंदगी बीत जाती है। अपने मन की वह सुन ही कहाँ पाता है!

सुबह उसे अपने जाने की तैयारी करनी पड़ी। उसे विदा करने कमली भी आ पहुँची, बोली, ‘‘दो दिन से साहेब खुश थे। अब फिर अकेला हुई गए।’’

न चाहते हुए भी एक अपराध-बोध पसर गया मन के भीतर। कमली उसे चुप देखकर फिर बोली, ‘‘पहुँचते ही फउन कर देना दीदी, फिर जल्दी आना।’’

भरे मन से प्रभा ने सिर झुका लिया। दादा से विदा लेते हुए बोली, ‘‘अपना ध्यान रखिएगा दादा।’’

‘‘हाँ-हाँ, मैं रख लूँगा ध्यान, तू पहुँच के खबर कर देना।’’

प्रभा नहीं कह पाई कि अपने मन में वहम मत पालिए। दरवाजा बंद करके सोया कीजिए। दादा के मन का वहम कहीं नामालूम ढंग से उसे भी तो नहीं छूता जा रहा है। मन-ही-मन थोड़ा हिल गई प्रभा। पर तुरंत सतर्क हो गई, अपने मन में प्रवेश करने से पहले उसने जैसे उस वहम को जी-जान से परे ढकेलने की कोशिश की। अधिकार भरे स्वर में बोली, ‘‘इस बार जब आऊँ तो आप मुझे स्टेशन पर खडे़ मिलिएगा, कहे दे रही हूँ।’’

‘‘लो, मैं तो आता ही हूँ, तुमने ही तो मना कर दिया।’’

‘‘हाँ, मैंने मना कर दिया और आप मान भी गए। जैसे मेरे ही कहे उठते-बैठते हैं।’’

‘‘अच्छा बाबा, गलती हो गई, तू झगड़ा मत कर, खुशी-खुशी जा।’’

दादा ने हमेशा की तरह बिना किसी कसूर के अपनी गलती मान ली। दादा की कार सोसाइटी से निकलकर मेन रोड पर आ गई। अकेले बालकनी में खड़े दादा को एक बार मुड़कर देखा उसने, मन-ही-मन ईश्वर से माँग बैठी—‘अगली बार जब आऊँ तो दादा मुझे अपने ड्राईंगरूम में नहीं, स्टेशन पर खड़े मिलें।’

अपने मन को समझाने लगी प्रभा—‘दादा के मन के वहम को दूर करने से पहले उसे अपने मन के अंदर उस बेकार के वहम को घुसने नहीं देना है, जो बार-बार स्वयं उसके मन के बंद द्वार पर दस्तक देने लगा है।’

कार ने गति पकड़ी और अपने गंतव्य की ओर चल पड़ी।

रश्मि कुमार

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