तुम्हारे शहर में

तुम्हारे शहर में

तुम्हारे इस शहर में सदियों से तंद्रा में डूब यानी जादुई शहर में जब-जब आता हूँ, आँखें कुछ खोजने सी क्यों लगती हैं? खोई-खोई सी उन आँखों में गहरी जिज्ञासा का सा भाव क्यों उभरता है? क्यों यहाँ की बयार में एक प्रकार की चाँदनी, सुगंध का सा अहसास होता है? यह कुएँ की तरह बसा बेढील शहर मुझे सबसे सुंदर शहर क्यों लगता है?

यहाँ की रूखी मिट्टी में एकता का स्पंदन क्यों? पेड़ों की पत्तियों को छूता हूँ तो उनमें सिहरन सी की अनुभूति होती है? खिले हुए फूलों का खिला हुआ स्वरूप एक प्रकार की जीवंतता का सा अहसास क्यों जगाता है! मैंने इस तरह से हँसाते, मुसकराते, खिलखिलाते फूलों को अन्यत्र कहीं नहीं देखा।

तुम्हें सच नहीं लगेगा, पर सच कह रहा हूँ, जब कभी नैनीताल आता हूँ। अकेला ही ऊँची-नीची पगडंडियों में निकल पड़ता हूँ अपने को खोजने के लिए। अपने आप से पता नहीं कितनी बातें करता रहता हूँ। अपने से रूठता हूँ, स्वयं अपने को मनाता हूँ। चलते-चलते थक जाता हूँ तो बाँज या देवदार के हरे वृक्ष के नीचे विश्राम करने के लिए आँखें मूँदे लेट जाता हूँ।

चुपचाप कभी वृक्ष को परस्पर बातें करते सुनता हूँ। कभी मैं भी उनकी बातों में शामिल हो जाता हूँ।

बाँज के एक बूढे़ वृक्ष ने उस दिन मेरी ओर देखते हुए कहा, ‘तुम यहाँ क्यों आते हो? यहाँ क्या है ऐसा, जो तुम्हें दुनिया के किसी कोने से भी यहाँ खींचकर ले आता हूँ?’

मैं उनकी बातों का क्या उत्तर दूँ, मुझे सूझता नहीं। वह फिर मेरी प्रश्नसूचक दृष्टि से मेरी ओर देखता है तो विवश भाव से कहता हूँ, ‘यहाँ कुछ खो गया है, उसे खोजने आता हूँ। बचपन में खो गया था कभी, तब से अपने को खोज रहा हूँ।’

तुम्हें सच नहीं लगेगा, ये सारे वृक्ष जो अब मेरी तरह बुढ़ा गए हैं, इनकी ओर गौर से देखोगे तो तुम्हें कई सजीव चित्र दिखेंगे। इनकी पत्तियों में कई अक्स। जब कभी भटकता-भटकता यहाँ आता हूँ, ये वृक्ष झूमने लगते हैं खुशी से। अपनी टहनियों की बाँहें हिलाकर ये अपने मन का अह्लाद प्रकट करते हैं। इनके पत्तों की हवा मेरे तन में ही नहीं, मन के किसी कोने में अव्यक्त सिहरन भी पैदा करती है।

वृक्षों से संवाद करना मुझे बहुत अच्छा लगता है। ये बच्चों की तरह निश्चल होते हैं, सहिष्णु और स्नेहशील भी। ये मुक्त भाव से सहज हँसी में हँस सकते हैं। तुम्हारे मन की बातें सुन-समझ सकते हैं। कटुता/कुटिलता ये नहीं जानते। ये दोनों हाथों से नेह लुटाना जानते हैं, नेह बाँटना और बदले में कुछ नहीं चाहते!

कल मैं शाम को पाषाण देवी की तरफ घूमने निकल गया था अकेला। वहाँ चट्टान पर बैठा नीचे जल में खेलती मछलियों को देख रहा था। मैंने सुना—एक मछली दूसरी से कह रही थी, ‘तुम्हें इस आदमी को देखकर डर तो नहीं लग रहा?’

‘आदमियों को देखकर मुझे हमेशा डर लगता है, वे जंगली जानवरों से भी अधिक खूँखार होते हैं, पर इसे देखकर नहीं। यह बहुत सरल-सहज है। हाँ, प्राणी के माथे पर लिखा रहता है कि वह क्या है? उस भाषा को जो समझ लेता है, वह सबकुछ जान लेता है।

‘इसके माथे पर क्या लिखा है?’

‘यही कि यह बुरा आदमी नहीं है!’ वह हँस पड़ती है। माथे पर लिखी भाषा से भी अधिक सजीव होती है मन की भाषा। उसे पढ़ने की भी आवश्यकता नहीं होती! हर प्राणी को स्वतः ही अहसास हो जाता है कि सामनेवाला क्या कह रहा है।

जितना महत्त्व लिखित भाषाओं का होता है, उससे कई गुना अधिक महत्त्व होता है उन भाषाओं का, जो लिखी ही नहीं जातीं! मौन से अच्छा संभाषण भी कुछ हो सकता है? इसलिए चुप्पी की भाषा बोलने/लिखने की भाषा से अधिक महत्त्वपूर्ण होती है!

मछलियों की बातें बहुत रुचिकर लगती हैं, पर मैं अधिक वहाँ रुक नहीं सकता। आगे निकल जाता हूँ।

ठंडी रोड पर, फाँसी गंधेर के पास बाँज का एक बहुत बड़ा वृक्ष पहले की तरह अब भी खड़ा है, पर मुझे यह देखकर दुःख होता है कि उसी बाँहें कटी हुई हैं। किसी क्रूर कसाई की करतूत होगी, मैं उसके तन को अपनी हथेली से सहलाता हूँ, तो वह मुसकराता हुआ कृतज्ञता से मेरी ओर देखता है।

माल रोड पर चिनार के पौधे सहमे हुए से चुपचाप खडे़ दिखे। पता चला कि पास के बँगले में अभी किसी वृद्ध की मृत्यु हो गई है। ये पौधे बचपन में कभी उसी ने लगाए थे। वृक्ष शोक मना रहे थे। उस पर बैठे पक्षी भी चहचहा नहीं पा रहे थे।

शाम को बच्चों के साथ अयार पाटा की तरफ निकल जाता हूँ। तनु कहता है, ‘हम  सड़क के किनारे तितलियों से खेलते हुए आएँगे। यहाँ फूल भी कितने खिले हैं? दादाजी, आप जाइए ऊपर! हम तितलियाँ देखते हुए आएँगे।’

ऊपर जाकर मैं हरी घास पर आँखें मूँदे लेट जाता हूँ, बड़ा सुकून मिलता है। घास भी घास जैसी रूखी नहीं, मखमली है। हौले-हौले उसे सहलाता हूँ।

तनु और राया कब ऊपर आ गए, मुझे पता ही नहीं चला। राया अपने फ्रॉक में समेटे ढेर सारे रंग-बिरंगे फूल ले आई है, ‘देखिए दादाजी, आपके लिए कितने फूल लाई हूँ।’

मैं देखते ही चौंकता हूँ, ‘अरी पगली! तू इतने फूल तोड़ लाई बेरहमी से। कभी सोचा तुमने इन्हें डाली से टूटते समय कितना कष्ट हुआ होगा? इनकी मम्मी-पापा कितना रोए होंगे, अपने बच्चों की हत्या होते देख। पगली, फूल तोड़ने के लिए नहीं, देखने के लिए होते हैं। देख-देखकर मुसकराने के लिए। कितनी ढेर सारी सुगंध ये अपने साथ लाए हैं...। तुम्हें इनके साथ ऐसा व्यवहार नहीं करना चाहिए था। तुम्हारे बारे में ये क्या सोचेंगे कि कितने जंगली बच्चे हैं।’

मैंने देखा, राया की बड़ी-बड़ी आँखें नम हैं, ‘आई एम सॉरी दादाजी।’

मैं चुप हो जाता हूँ।

लौटते समय वे सारे फूल बच्चों से वहीं रखवा देता हूँ। बच्चे उन पौधों को प्यार करते हुए क्षमा याचना करते हैं।

यह शहर तुम्हारा है न। नहीं-नहीं तुम्हारा भी नहीं, हमारा हम सबका। मैं उन सड़कों, गलियों में कुछ खोजता, खोया-खोया भटकता रहता हूँ, कभी जिन पर तुम चली थीं। तुम्हारे पाँवों के निशान अभी भी यहाँ की धरती पर अंकित हैं। यहाँ की फूल-पत्तियों पर, वृक्षों पर तुम्हारी देहगंध बिखरी हुई है।

अधिकांश लोग जो समय के साक्षी थे, अब कहीं नहीं दिख रहे हैं। इतने वर्षों में इतिहास के कितने पन्ने पलट गए हैं! कि पन्ने धूमिल हो गए हैं, पीले। किस पर क्या लिखा था, इतना धुँधला गया है कि पढ़ पाना भी कठिन है। मेरी ही आँखें धुँधला गई हैं।

जो नन्हे-नन्हे बच्चे तब गली के नुक्कड़ पर गुल्ली-डंडा खेलते थे, अब वे मोटे ऊनी कपड़ों में लदे कमर झुकाकर चल रहे हैं। आँखों पर मोटे चश्मे हैं, पाँवों में सहज रूप से खडे़ होने की शक्ति नहीं, इसलिए लाठी का सहारा लिये खडे़ हैं।

तिराहे पर जो बालू में सिंकी गरम-गरम मूँगफलियाँ बेचता था, वह चलता-चलता टकरा गया था! जाते-जाते मैंने रोका, ‘पहचान नहीं रहे हो?’

वह अचरज से मेरा मुँह ताकने लगता है।

‘कभी नहीं देखा!’

वह असमंजस में विवश भाव से सिर हिलाता है।

‘इस तिराहे पर आपकी छोटी सी दुकान थी न मूँगफली की! बालू में सिंकी आपकी गरम-गरम मूँगफलियों का जायका अब तक मुँह में है। बादाम भी उसके सामने कुछ नहीं लगते थे...। लोग यहाँ मूँगफली खाने कितनी दूर से आते थे, चिनियाँ बादाम कहते थे।’

जैसे-जैसे मैं बोलता जा रहा था, वह पीछे और पीछे चलता, अतीत में कहीं खो गया था।

‘अरे, आप...आप उस खोखे की बात कर रहे हैं, जो इस नई इमारत के साथ ही ठह गया था। उसमें मेरे दादाजी बैठते थे—राधे शाह!’

दादाजी को गए भी अब युग बीत गया। उनके बाद कुछ दिन पिताजी ने उसके पास ही खोखा लगाया, पर बरसात में घर की दीवार ढह जाने से वे दबकर मर गए थे। आप जानते ही हैं, नैनीताल में कितनी बारिश होती है।

जहाँ खोखा था, अब वहाँ सीमेंट का पक्का फर्श है। उस पर मुझे एक अँगीठी की छाया जैसी दिखती है। पास ही बिखरी हुई गरम रेत और नीचे डामर की टूटी हुई पतली सी सड़क पर मूँगफली के छिलकों के प्रतिबिंब।

थोड़ा आगे बढ़कर झील के किनारे की जमीन पर घूरकर देखने पर मुझे घोड़ों की टापों की छाप दिखती! उनकी टापों से उड़ती धूल सी। मैं मुँह पर रुमाल रख लेता हूँ। तभी सहसा एक झटका लगता है, अरे हाँ, यह तो पुरानी बात थी। अब घोडे़ नैनीताल की सड़कों पर नहीं चलते दिखते। हाँ, हाँफते हुए, दौडते हुए घोड़ों की टापों की आवाज अवश्य मेरी तंद्रा भंग कर रही है। फिर यह आवाज कहाँ से आ रही है! और यह धूल...!

सिनेमा हॉल के बाहरी द्वार पर एक लंबा सा शीशा लगा है। मैं उसके आगे खड़ा हो जाता हूँ। देखता हूँ मेरे स्थान पर वहाँ कोई और खड़ा है। बार-बार आँखें मलकर देखता हूँ। अचरज से शीशे में देखता हुआ पूछ रहा है, आपको कहीं देखा लगता है। इन्हीं सड़कों पर अपने को ढूँढ़ने के लिए इस उम्र में आपको इतनी दूर आना पड़ा, अफसोस है!

किसी मेले में जैसे बच्चे का हाथ छूट जाए, और वह बिछुड़ जाए, इतनी शताब्दियों के बाद उसके अविभावक प्रतिवर्ष लगनेवाले इस मेले में उसे ढूँढ़ने आएँ, उसी स्थान पर, क्या वह कभी वहीं खड़ा मिल सकता है?

हाँ, मिल क्यों नहीं सकता? मैं भी उसी चौराहे पर तो खड़ा हूँ, जहाँ से खोया था कभी! आप मुझे नहीं पहचानते। मुझे नहीं जानते, पर मैं भी क्या अपने को भूल सकता हूँ। स्वयं को भी नहीं पहचानता?

—हिमांशु जोशी

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