कुछ कहना है

कुछ कहना है

दिन जाते देर नहीं लगती। देखते-देखते ४२ वर्ष बीत गए। फिर भी लगता है, जैसे कल ही की बात हो। वह १९५७ का साल था। लोकसभा का दूसरा आम चुनाव होने जा रहा था। पार्टी (भारतीय जनसंघ) जडें जमाने में लगी थी। डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी की छत्रच्छाया उठ चुकी थी। न ख्यातनाम नेतृत्व था, न विस्तृत जनाधार। चुनाव लड़ने के लिए उम्मीदवार मिलना भी मुश्किल था। कौन गाँठ से खर्च कर जमानत जब्त कराए। फिर भी चुनाव तो लड़ना ही था। पार्टी के संदेश को अधिकाधिक लोगों तक पहुँचाने का इससे अच्छा अवसर कब आएगा।

मुझे तीन चुनाव क्षेत्रों से लड़ाने का फैसला किया गया। एक, लखनऊ, दूसरा, मथुरा और तीसरा, बलरामपुर। लखनऊ से मैं लोकसभा का उपचुनाव लड़ चुका था। जीतने का तो सवाल ही नहीं था। हाँ, वोट अच्छे मिले थे। पार्टी का हौसला बढ़ा था। लखनऊ से फिर से लड़ाने का तय हुआ। मथुरा में कोई ढंग का उम्मीदवार नहीं मिल रहा था। जिन्हें ठीक-ठाक कर मुश्किल से लड़ने को तैयार भी किया गया, वे सब विधानसभा का चुनाव लड़ना चाहते थे। एक, खर्चा कम था। दूसरे, जमानत बचने की आशा थी और तीसरे, यदि तुक्का भिड़ गया तो जीतने की संभावना भी हो सकती थी। किंतु लोकसभा के लिए उपयुक्त उम्मीदवार उपलब्ध नहीं था। मुझ पर नजर पड़ी। थोड़ा-बहुत नाम हो गया था। भाषण सुनने लोग आने लगे थे। क्यों न मुझे लड़ा दिया जाए! मेरे नाम पर चुनाव लड़ने भर के लिए धन भी इकट्ठा हो जाएगा।

जहाँ तक बलरामपुर में लड़ने का सवाल है, वहाँ पार्टी की स्थिति अपेक्षाकृत अच्छी थी। स्वर्गीय प्रताप नारायण तिवारी ने पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्णकालिक प्रचारक के रूप में, और बाद में भारतीय जनसंघ के पूर्णकालिक कार्यकर्ता के नाते बलरामपुर क्षेत्र में अच्छा संगठन खड़ा किया था। नौजवान, किसान, कर्मचारी, अध्यापक, दुकानदार काफी संख्या में पार्टी से जुडे़ थे। पार्टी की दृष्टि में बलरामपुर से जीतने की संभावना थी। मैं लखनऊ और मथुरा में नामांकन-पत्र दाखिल करके बलरामपुर पहुँच गया।

इससे पहले मैं बलरामपुर कभी नहीं गया था। न मुझे उसके भूगोल का ज्ञान था, न इतिहास का। गोंडा से गोरखपुर के लिए जो छोटी लाइन जाती थी, बलरामपुर का स्टेशन उसी पर स्थित था। रेलगाड़ी आधी रात को गोंडा से चलती थी और ब्राह्म मुहूर्त में बलरामपुर पहुँचती थी। मैं छोटी लाइन से सुपरिचित था। ग्वालियर और भिंड के बीच तो और भी छोटी लाइन थी। गाडि़याँ आराम से चलती थीं और पहुँचने में काफी समय लेती थीं। उसी टिकट पर, उन्हीं पैसों में, लंबी यात्रा का आनंद मिलता था। मैं गोंडा में गाड़ी में चढ़ा और सँकरी-सी बर्थ पर बिस्तर बिछाकर सो गया। आँख खुली तो गाड़ी एक स्टेशन पर खड़ी थी। खिड़की खोलकर देखा तो सैकड़ों कौए स्टेशन पर लगे पेड़ों पर काँव-काँव कर रहे थे। सारा आकाश गूँज रहा था। मैंने पूछा, यह कौन सा स्टेशन है? उत्तर मिला—कौवापुर।

कौवापुर और इंटिआठोक के बीच में स्थित बलरामपुर स्टेशन नेपाल जानेवाले यात्रियों के लिए विश्राम-स्थल का काम करता है। नगर घाघरा के किनारे बसा है। बलरामपुर एक छोटी सी रियासत थी। १९४७ में उत्तर प्रदेश का अंग बनी। भारतीय जनसंघ के रूप में लोगों को कांग्रेस का एक नया विकल्प मिला। लोग आकृष्ट हुए। जनसंघ की राष्ट्रवादी विचारधारा ने उन्हें प्रभावित किया। राजतंत्र समाप्त हो गया था, किंतु जमींदारी कायम थी। काफी जमींदार मुसलमान थे, जो आर्थिक उत्पीड़न के साथ धार्मिक भेदभाव भी करते थे। अपने चुनावी दौरे में मुझे अनेक ऐसे क्षेत्र मिले, जहाँ घडि़याल और शंख बजाना मना था। स्वतंत्रता के बाद इस स्थिति में परिवर्तन हुआ था, किंतु परिवर्तन की लहर दूरदराज के क्षेत्रों तक नहीं पहुँची थी। जमींदारों से आतंकित छोटे और मझोले किसान भारतीय जनसंघ के साथ जुड़े। नतीजा यह हुआ कि मैं बलरामपुर से लोकसभा के लिए निर्वाचित कर लिया गया। वहाँ कुल ४,८२,८०० मतदाता थे, जिनमें से २,२६,९४८ मतदाताओं ने मताधिकार का उपयोग किया। मुझे १,१८,३८० मत मिले। कांग्रेस के श्री हैदर हुसैन लगभग १०,००० मतों से चुनाव हार गए। यदि कांग्रेस का उम्मीदवार हिंदू होता तो शायद मैं चुनाव न जीत पाता। श्री हैदर हुसैन लखनऊ के नामी वकील थे। लेकिन उनके लिए बलरामपुर में लोगों से संपर्क बनाए रखना सरल नहीं था। वे कांग्रेस के बल पर चुनाव जीतते थे। कांग्रेस-विरोेधी भावना बढ़ रही थी। अतः मुझे चुनाव में सफलता मिली।

किंतु मुझे दो अन्य चुनाव क्षेत्रों से भारी पराजय का सामना करना पड़ा। मथुरा में तो मेरी जमानत जब्त हो गई। ऐन वक्त पर कांग्रेस को हराने के लिए भारतीय जनसंघ के समर्थक भी निर्दलीय उम्मीदवार राजा महेंद्र प्रताप के साथ चले गए। राजा साहब के लिए लोगों के दिल में बड़ा आदर था। वे स्वतंत्रता के संघर्ष में भाग ले चुके थे। विदेश में गठित स्वतंत्र भारत की सरकार के प्रथम राष्ट्रपति रह चुके थे। उनके द्वारा स्थापित ‘प्रेम आश्रम’ शिक्षा के क्षेत्र में अच्छा काम कर रहा था। वे कांग्रेस विरोधी भावना का भरपूर लाभ उठाने में सफल हुए। उनका जाट होना भी उनके लिए सहायक बना। मुझे यह अफसोस जरूर रहा कि पार्टी की स्थानीय इकाई को या तो मुझे वहाँ से लड़ने के लिए विवश नहीं करना चाहिए था, और जब मैदान में उतार दिया था तो फिर सभी वोट मेरे पक्ष में डलवाने के बारे में दृ़ढ रहना चाहिए था। गैर-कांग्रेसवाद की लहर में पार्टी के कट्टर समर्थकों का बह जाना उचित नहीं कहा जा सकता।

लखनऊ में पार्टी को अच्छा जनसमर्थन मिला। कांग्रेस के विजयी उम्मीदवार श्री पुलिन बिहारी बैनर्जी को ६९,५१९ वोट मिले, जबकि मेरे मतों की संख्या ५७,०३४ थी। यदि कम्युनिस्ट उम्मीदवार कुछ अधिक वोट ले जाते तो कांग्रेस को हराया जा सकता था। ऐसा लगता है कि जनसंघ को हराने के लिए वामपंथ की ओर झुकाव रखनेवाले मतदाताओं ने भी कांग्रेस के पक्ष में वोट दिया।

१९५७ में लोकसभा के चुनाव में मुझे मिलाकर जनसंघ के ४ सदस्य चुने गए थे। पार्टी को हरदोई से सुरक्षित सीट पर विजय प्राप्त हुई थी। दो अन्य सदस्य श्री उत्तम राव पाटिल और श्री प्रेमजी भाई आसर महाराष्ट्र से चुने गए थे। महाराष्ट्र में विपक्षी दल संयुक्त महाराष्ट्र के निर्माण के लिए संयुक्त संघर्ष कर रहे थे। जनसंघ उस संघर्ष में शामिल था। चुनाव भी संयुक्त रूप से लड़ने का तय हुआ था। श्री उत्तम राव पाटिल धूलिया से और श्री प्रेमजी भाई आसर रत्नागिरी से चुने गए थे। श्री पाटिल एडवोकेट थे। श्री प्रेमजी भाई आसर व्यापारी। इस तरह जनसंघ के चारों सदस्य एक दृष्टि से पूरे समाज का प्रतिनिधित्व करते थे।

१९५७ के प्रारंभ में यह आशंका थी कि चुनाव समय पर होंगे या नहीं। एक वर्ष पहले राज्यों का पुनर्गठन हुआ था, भाषावार राज्य बने थे। कई क्षेत्रों में अशांति का वातावरण था, किंतु चुनाव समय पर हुए। लगभग २० करोड़ मतदाताओं ने चुनाव में भाग लिया। लोकसभा के साथ विधानसभा के भी चुनाव हुए। कांग्रेस को ४७.८ प्रतिशत वोट मिले और उसकी सदस्य संख्या में पिछले चुनाव की तुलना में ७ की वृद्धि हुई। भारत की कम्युनिस्ट पार्टी को ८.९ प्रतिशत वोट मिले और उसकी सदस्य संख्या १६ से बढ़कर २७ हो गई। प्रजा समाजवादी दल को कम्युनिस्ट पार्टी की तुलना में अधिक वोट मिले। किंतु वह १९ स्थानों पर ही विजय प्राप्त कर सकी। भारतीय जनसंघ अपनी अखिल भारतीय मान्यता बनाए रखने में सफल रहा। अनेक दल अपनी मान्यता खो बैठे। हिंदू महासभा, परिगणित जाति फेडरेशन तथा राम राज्य परिषद् ३ प्रतिशत वोट न मिलने के कारण अपनी मान्यता कायम नहीं रख सके। भारतीय जनसंघ ६ प्रतिशत वोट प्राप्त करने में सफल हुआ था। हिंदू महासभा के अध्यक्ष श्री निर्मलचंद चटर्जी और जनरल सेक्रेटरी श्री विष्णु घनश्याम देशपांडे चुनाव हार गए। उड़ीसा में गणतंत्र परिषद् का प्रादुर्भाव हुआ। तमिलनाडु (मद्रास) में द्रविड़ मुनेत्र कड़गम का उदय एक महत्त्वपूर्ण घटना थी। बंबई प्रदेश को पुनर्गठित कर पृथक् महाराष्ट्र की माँग करनेवाली संयुक्त महाराष्ट्र समिति और पृथक् गुजरात के लिए संघर्षरत महागुजरात परिषद् ने लोकसभा के चुनाव में महत्त्वपूर्ण सफलता प्राप्त की।

चुनाव के बाद श्री जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में जो मंत्रिमंडल बना, उसमें मौलाना अबुल कलाम आजाद, श्री गोविंद वल्लभ पंत, श्री मोरारजी देसाई तथा श्री जगजीवराम जैसे मूर्धन्य नेता शामिल थे। श्री कृष्ण मेनन भी बिना विभाग के मंत्री थे। प्रतिपक्ष में आचार्य कृपलानी, श्रीपाद अमृत डांगे, श्री नारायण गणेश गोरे, प्रो. हीरेन मुखर्जी तथा श्री मीनू मसानी जैसे कुशल सांसद तथा राजनेता उपस्थित थे। श्रीमती विजया राजे सिंधिया उन दिनों कांग्रेस में थीं। उनके अलावा श्रीमती सुचेता कृपलानी, कु. पार्वती कृष्णन, श्रीमती तारकेश्वरी सिन्हा सदन में बड़ी सक्रिय थीं और चर्चा में महत्त्वपूर्ण योगदान देती थीं।

भारतीय जनसंघ के हम चारों सदस्य संसद् में पहली बार आए थे। हममें से कोई विधानसभा का भी सदस्य नहीं रहा था। विधायी कार्य के लिए सर्वथा नए थे। न कोई पूर्व अनुभव था न कोई अनुभवी सदस्य ही सहायता के लिए उपलब्ध था। संख्या कम होने के कारण सभी सदस्यों को सदन में पिछली बेंचों पर स्थान मिले थे। लोकसभा अध्यक्ष की नजर खींचना टेढ़ा काम था। विभिन्न विषयों पर चर्चा में समय पार्टियों के संख्याबल के अनुसार मिलता है। छोटे दलों के सदस्यों को बोलने के लिए पहले भी समय नहीं मिलता था, अब भी नहीं मिलता।

विदेश नीति मेरा प्रिय विषय रहा है। अंतरराष्ट्रीय स्थिति पर चर्चा उन दिनों एक महत्त्वपूर्ण घटना होती थी। प्रधानमंत्री नेहरूजी विदेशमंत्री भी थे। जब विदेश मंत्रालय के अनुदानों की माँगों पर चर्चा होती तो सदन खचाखच भर जाता। दर्शक दीर्घा में भारी भीड़ जुटती। कूटनीतिज्ञों के कक्ष में बैठने की जगह न रहती। प्रमुख विरोधी दल के नाते कम्युनिस्ट नेता अंतरराष्ट्रीय परिस्थिति और उसके संबंध में भारत की नीति पर चर्चा आरंभ करते। प्रजा-समाजवादी दल भी अपनी बात कहता। किंतु भारतीय जनसंघ के लिए बोलने का समय पाने में बड़ी कठिनाई होती। पार्टी के हिस्से में मुश्किल से दो-चार मिनट आते। बहस लंबी खिंच जाती। प्रधानमंत्री द्वारा बहस का उत्तर दिए जाने का समय निश्चित होता।

एक बार तो समय न मिलने के कारण मुझे विरोध स्वरूप सदन त्याग करना पड़ा था। फिर भी जो समय मिलता, उसका जनसंघ सदस्य पूरा लाभ उठाने का प्रयास करते।

विदेश नीति पर मेरे पहले भाषण ने ही सदन का ध्यान आकृष्ट किया था। सदन में अंग्रेजी छाई रहती थी। विदेश नीति पर तो अधिकांश भाषण अंग्रेजी में ही होते थे। समाजवादी दल के श्री बृजराज सिंह जरूर हिंदी में बोलते थे। मेरी प्रांजल भाषा और धाराप्रवाह शैली सदस्यों को पसंद आती थी। २० अगस्त, १९५८ को प्रधानमंत्री श्री नेहरूजी ने पूरी बहस का उत्तर देते हुए अंग्रेजी भाषण को समाप्त करने के बाद अध्यक्ष से हिंदी में कुछ कहने की अनुमति माँगी। सदस्यों ने तालियाँ बजाकर स्वागत किया। जब नेहरूजी ने मेरा नाम लेकर हिंदी में बोलना शुरू किया तो पुनः सदस्यों ने प्रसन्नता प्रकट की।

मुझे इस बात का हमेशा खेद रहेगा कि मैं तीसरी लोकसभा का सदस्य नहीं चुना गया। १९६२ से १९६७ का कालखंड स्वतंत्र भारत के जीवन में बड़ा महत्त्वपूर्ण था। इस बीच देश ने दो लड़ाइयाँ देखीं। दो प्रधानमंत्री हमारे बीच नहीं रहे। चीन के आक्रमण ने श्री नेहरूजी को मर्मांतक पीड़ा पहुँचाई थी। उसके विश्वासघात ने उन्हें अंतरतम तक हिला दिया था। वे पुनः अपनी पुरानी जीवंत मुद्रा में नहीं दिखाई दिए। उन्हें देखकर लगता था कि जैसे उन्हें किसी ने उनके आभामंडल से अलग कर दिया है। श्री लालबहादुर शास्त्री दिल के दौरे से दिवंगत हुए। वे दिल के मरीज रह चुके थे। किंतु जिन परिस्थितियों में उनका निधन हुआ उनमें यह आशंका करना स्वाभाविक था कि उन पर ताशकंद समझौते पर हस्ताक्षर करने के लिए भारी दबाव डाला गया और उनका दिल उस दबाव को सहन नहीं कर सका।

तीसरी लोकसभा में कांग्रेस का बहुमत थोड़ा सा घटा। उसकी सदस्य संख्या ३७१ से कम होकर ३६१ रह गई। कम्युनिस्ट पार्टी के बल में २ सीटों की वृद्धि हुई। भारतीय जनसंघ ने ऊँची छलाँग लगाई। उसके सदस्यों की संख्या ४ से १४ हो गई। स्वतंत्र पार्टी ने २२ सीटें जीतकर प्रतिपक्ष में दूसरा स्थान प्राप्त किया। प्रजा समाजवादी दल ने ७ स्थान खोए। उसके एक दर्जन सदस्य रह गए।

तीसरी लोकसभा की विशेषता यह थी कि आचार्य कृपलानी, लोहिया तथा मसानी जैसे महारथी उपचुनावों में जीतकर आए। देश में गैर-कांग्रेसवाद की हवा बह रही थी। विद्रोही दल मिलकर उपचुनाव लड़े थे। दुर्भाग्य से भारतीय जनसंघ के नेता श्री दीनदयाल उपाध्याय, जो जौनपुर से उपचुनाव लड़े थे, सफल नहीं हुए। उनकी कमी संसद् में लगातार खलती रही।

तीसरी लोकसभा के चुनाव में मेरी हार सर्वथा अप्रत्याशित थी। मैंने अपने चुनाव क्षेत्र की ५ साल तक अच्छी देखभाल की थी। संसद् में, संसद् के बाहर, मैंने बलरामपुर का प्रभावशाली प्रतिनिधित्व किया था। प्रतिपक्ष के सदस्य के नाते मैंने सरकार को अपनी कड़ी आलोचना का निशाना बनाया था। भारतीय जनसंघ के प्रवक्ता के रूप में पार्टी को पुष्ट किया था और पृथक् पहचान बनाने में सफलता पाई थी। पार्टी के बढ़ते हुए प्रभाव से विरोधी परेशान थे। उन्होंने मुझे चुनाव में हराने का षड्यंत्र किया। सांप्रदायिकता विरोधी समिति की अध्यक्षा को हरियाणा से हटाकर मेरे विरुद्ध बलरामपुर में लड़ाने का फैसला किया गया। उन्हें सभी वाममार्गियोें का समर्थन प्राप्त था। उनका यह भी दावा था कि उन्हें नेहरूजी का आशीर्वाद प्राप्त है। उन्होंने चुनाव क्षेत्र में पहुँचते ही भारतीय जनसंघ और विशेषतः राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विरुद्ध जहर उगलना शुरू कर दिया। संघ फासिस्ट है, संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार जर्मनी गए थे और यह कि नाजी पार्टी के नक्शे पर रा. स्व. संघ का गठन किया जा रहा है। इन बेसिर-पैर की बातों का जनता पर प्रभाव पड़ा हो, ऐसा नहीं था, किंतु कांग्रेसजनों को लड़ने का एक मुद्दा मिल गया था। वे आक्रामक रुख अपना रहे थे। उनके पास साधनों की कमी नहीं थी। जिला और स्थानीय अधिकारियों को धौंस देकर, दिल्ली तक पहुँच है, यह डर दिखाकर, चुनाव को प्रभावित करने के उचित-अनुचित हथकंडे अपनाए गए। यहाँ तक कि कांग्र्रेस के समर्थन में ब्राह्मणों के नाम एक अपील भी निकाली गई। क्षेत्र में सांप्रदायिक तनाव पैदा करने का योजनाबद्ध प्रयास हुआ। मतदान के दिन बलरामपुर नगर में छुरेबाजी की घटना करके जनसंघ के मतदाताओं, विशेषकर औरतों को, जो बड़ी संख्या में सवेरे से ही मतदान केंद्रों पर एकत्र हो गए थे, डरा-धमकाकर घर भेजने का षडयंत्र रचा गया। कुछ क्षेत्रों में मतदान रोकना पड़ा। जो मतदाता घर चले गए थे, उनमें से अधिकांश लौटकर नहीं आए।

फिर भी मुझे विजय की आशा थी। कारण, मुझे व्यापक जनसमर्थन प्राप्त था। चुनाव प्रचार के लिए नेहरूजी को लाने के बाद भी कांग्रेस उम्मीदवार की स्थिति में सुधार नहीं हुआ था। वस्तुतः नेहरूजी के भाषण के इस वाक्य ने कि जनसंघ में कुछ अच्छे लोग हैं, मुझे सहायता ही दी। संभव है कि नेहरूजी ने जो कुछ कहा, वह मुझे लक्षित करके नहीं कहा था, किंतु ग्रामीण मतदाता तो यही समझे कि नेहरूजी का इशारा मेरी ओर था। यह प्रायः सभी ने स्वीकार किया कि यदि मैं बलरामपुर से चुनाव न लड़ता तो नेहरूजी वहाँ तक आने का कभी कष्ट न उठाते। बलरामपुर नगर को छोड़कर सभी जगह पार्टी के पक्ष में अच्छा मतदान होने की खबरें थीं।

किंतु अनेक स्थानों से मिली एक शिकायत से मेरा माथा ठनका था। शिकायत यह थी कि कांग्रेस के समर्थकों ने मतदाताओं में भ्रम पैदा करने के लिए यह प्रचार शुरू कर दिया था कि यदि वे लोकसभा के चुनाव में मुझे वोट देना चाहते हैं तो उन्हें गुलाबी मतपत्र पर दीपक पर मोहर लगानी चाहिए। लोकसभा और विधानसभा के चुनाव उन दिनों साथ होते थे। हर मतदाता को दो पत्र दिए जाते थे। दोनों के रंग अलग-अलग होते थे। मेरी लोकप्रियता देखकर कांगे्रसजनों ने मतदाताओं को गलत रंग के मतपत्र पर मुझे वोट देने के लिए कहा। मतदान केंद्रों पर तैनात कुछ अधिकारी भी इसी भ्रम को बढ़ाने में सहायक हुए। जब वोटों की गिनती हुई तो इस सोची-समझी और गहरी साजिश का परिणाम सामने आ गया।

मैं २००० वोटों से चुनाव हार गया। मुझे १,००,२०८ वोट मिले। जबकि कांग्रेस उम्मीदवार को १,०२,२६० वोट प्राप्त हुए। आश्चर्य की बात यह थी कि मेरे नीचे उत्तर प्रदेश विधानसभा के लिए चुनाव लड़ रहे भारतीय जनसंघ के ५ उम्मीदवारों में से ४ उम्मीदवार अच्छे मतों से विजयी हुए। तुलसीपुर से सरदार बलदेव सिंह ६००० से अधिक मतों से जीते। बलरामपुर सुरक्षित सीट से श्री सुखदेव प्रसाद को कांग्रेस की तुलना में २००० वोट अधिक मिले। उतरौला से श्री सूरजलाल गुप्त भी अपने कांग्रेसी प्रतिद्वंद्वी से ४५०० मतों से आगे रहे। सादुल्ला नगर से श्री अवध नारायण सिंह भी चुनाव जीत गए। जनसंघ विधानसभा की केवल एक सीट हारी, किंतु वह हार भी केवल ५५ वोटों से हुई। शायद ही किसी चुनाव क्षेत्र में ऐसा हुआ हो कि कोई पार्टी ५ विधानसभा की सीटों में से ४ सीटें अच्छे वोटों से जीत जाए, किंतु उसका लोकसभा का प्रत्याशी चुनाव हार जाए। ऐसा दो स्थितियों में हो सकता है। एक, विधानसभा के उम्मीदवारों ने केवल अपने लिए वोट माँगे हों और लोकसभा के उम्मीदवार की उपेक्षा कर दी हो। दूसरे, मतदाता मतपत्र के रंग के बारे में भ्रमित कर दिए गए हों और यह समझते हुए कि वे लोकसभा के उम्मीदवार को वोट दे रहे हैं, उनका वोट विधानसभा के उम्मीदवार को मिल गया हो। इस बात की तो बिल्कुल संभावना नहीं थी कि विधानसभा के उम्मीदवार केवल अपने लिए वोट माँगते। सच्चाई यह है कि वे मेरे भरोसे चुनाव की नदी पार करना चाहते थे। लेकिन हुआ यह कि वे तो पार हो गए और मैं मझधार में डूब गया। चुनाव परिणाम आने के बाद अनेक मतदाता मुझे ऐसे मिले, जिन्होंने कहा कि उन्होंने तो मुझे वोट दिया था फिर मैं हार कैसे गया। स्पष्टतः कांग्रेस मतदाताओं में भ्रम पैदा करने में कामयाब हुई।

संसद् सदस्यों और विधायकों से यह आशा की जाती है कि वे अपने चुनाव क्षेत्रों की अच्छी तरह देखभाल करें, उनमें निरंतर जाते रहें और लोगों के सुख-दुःख में शामिल हों। यह आशा उचित भी है। मैं पहली बार लोकसभा का सदस्य चुना गया था। मैंने अपने चुनाव क्षेत्र की पूरी चिंता की थी। मतदाताओं से निकट संपर्क रखा था। बलरामपुर का नाम उजागर किया था। किंतु हारने के बाद मैंने निश्चय किया कि अब मैं बलरामपुर से अधिक संपर्क नहीं रखूँगा। मैं कांग्रेस उम्मीदवार को पूरा काम करने का अवसर देना चाहता था। लेकिन मैं वहाँ से पुनः चुनाव लड़ने के लिए दृढ़प्रतिज्ञ था। मुझे अपनी हार का बदला लेना था। अगले आम चुनाव के पहले कांग्रेस के कतिपय वरिष्ठ नेताओं ने मुझसे कहा कि मैं बलरामपुर की सीट छोड़ दूँ और कहीं और से चुनाव लड़ लूँ। उनका यह तर्क था कि मैं तो और कहीं से भी चुनाव जीत सकता हूँ, किंतु बलरामपुर से विजयी कांग्रेस उम्मीदवार के लिए अब क्षेत्र छोड़ना अप्रतिष्ठाकारक होगा। मैंने उनके सुझाव को स्वीकार नहीं किया। मैं बलरामपुर से पुनः लड़ा और विजयी हुआ। मैं ३१,००० से अधिक मतों से जीता। मुझे १,४२,४४६ मत मिले, जबकि कांग्रेस की उम्मीदवार को १,१०,७०४ वोट प्राप्त हुए। मेरे साथ विधानसभा के भी ४ उम्मीदवार विजयी हुए।

संसद् के इतिहास में ६ मई, १९६१ का दिन हमेशा याद रखा जाएगा। उस दिन संसद् के दोनों सदनों की पहली बार संयुक्त बैठक हुई। इस तरह की बैठक की संविधान में व्यवस्था है। वित्त और धन संबंधी मामलों को छोड़कर दोनों सदनों के अधिकार बराबर हैं। मुझे दोनों सदनों का सदस्य रहने का सुअवसर मिला है। राज्यसभा राज्यों का सदन है, जबकि लोकसभा के सदस्य मतदाताओं द्वारा सीधे चुने जाते हैं और सारे देश का प्रतिनिधित्व करते हैं। सारे देश का प्रतिनिधित्व राज्यसभा के सदस्य भी करते हैं, किंतु वे राज्यों के भी प्रतिनिधि होते हैं। कुछ मामलों में राज्यसभा को कुछ विशेष अधिकार हैं, जो लोकसभा को नहीं हैं।

क्या यह आश्चर्य की बात नहीं है कि दोनों सदनों के बीच मतभेद दहेज जैसी अपेक्षाकृत छोटी सी समस्या को लेकर हुआ! लेकिन सच्चाई यह है कि दहेज कोई छोटी समस्या नहीं है। उसका संबंध सामाजिक ढाँचे से है, पुरानी मान्यताओं से है, परंपराओं से है और धार्मिक विश्वासों से भी है। एक रूढि़वादी समाज में जब कोई सामाजिक सुधार किया जाता है तो वह बड़े विवाद का विषय बन जाता है। हिंदू कोड बिल को लेकर देश में जो बवंडर मचा था, वह सबको विदित है।

वस्तुतः दहेज के प्रश्न पर विचार के लिए संसद् का संयुक्त अधिवेशन इसलिए अधिक आश्चर्यजनक बन गया, क्योंकि लोकसभा की तुलना में राज्यसभा ने अधिक प्रगतिशील रवैया अपनाया। राज्यसभा अधिक परिपक्वों और बुजुर्गों का सदन माना जाता है। दूसरे इस सदन की उपयोगिता ही ‘ब्रेक’ लगाने में समझी जाती है, किंतु दहेज के मामले में राज्यसभा तेजी से आगे बढ़ने के पक्ष में थी।

दोनों सदनों का बहुमत इस राय का था कि दहेज एक सामाजिक बुराई है, इसका निराकरण होना चाहिए। उनमें इस बात पर भी मतभेद नहीं था कि इस सामाजिक बुराई को दूर करने के लिए कानून की आवश्यकता है। मतभेद का मुख्य मुद्दा यह था कि कानून को कितना कड़ा बनाया जाए। राज्यसभा कड़े कानून के पक्ष में थी। अनेक सदस्य इस राय के थे कि लड़की के विवाह में यदि उसका पिता या अन्य संबंधी स्वेच्छा से धन और आभूषण देना चाहते हैं तो उसे दहेज की परिधि से मुक्त रखा जाना चाहिए। किंतु बहुमत ठहरौनी के विरुद्ध था। ठहरौनी से अभिप्राय उस दहेज से है, जो विवाह के पूर्व शर्त के रूप में दिया जाता है। शादी के पहले यह ठहरा लिया जाता है कि लड़कीवाला लड़के के बदले में कन्या के साथ क्या-क्या तथा कितना-कितना देगा। संक्षेप में, दूल्हे का दाम कितना होगा। कानून इस तरह के दहेज को रोकना चाहता था, किंतु कुछ सदस्यों को डर था कि अगर शादी के अवसर पर उपहार या भेंट देने की कानून में छूट दी गई तो दहेज के लिए दरवाजा खुल जाएगा और कानून बनाने के उद्देश्य पर ही पानी फिर जाएगा। इस डर को सरकार द्वारा प्रस्तुत एक संशोधन ने और भी पुष्ट कर दिया। सारा विवाद मुख्यधारा से संबद्ध एक स्पष्टीकरण पर केंद्रित हो गया। स्पष्टीकरण इस प्रकार का था, ‘‘शंकाओं के निवारण के लिए एतत द्वारा घोषित किया जाता है कि विवाद में किसी पक्षकार को उस विवाह के समय नकदी, आभूषण, कपड़ों या अन्य वस्तुओं के रूप में दिए गए किन्हीं उपहारों को इस धारा के अर्थ के अंदर दहेज उस अवस्था में न समझा जाएगा, जिसमें कि वे उक्त पक्षकारों के विवाह के लिए प्रतिफल के रूप में दिए जाते हैं।’’

सरकार ने स्पष्टीकरण को रद्द करने की माँग नहीं मानी। उसका कहना था कि कन्या के विवाह में यदि स्वेच्छा से धन, आभूषण आदि दिए जाते हैं तो उन्हें कैसे रोका जा सकता है। मैंने एक मध्यम मार्ग निकालने का सुझाव दिया। मैंने विवाह के अवसर पर दिए जानेवाले उपहारों को २ हजार रुपए के मूल्य तक सीमित रखने का सुझाव दिया। १९६० में २ हजार एक बड़ी रकम थी। अब तो वह भूँजी भाँग जैसी मालूम होती है। कुछ सदस्यों ने ५१ रुपए रखने का सुझाव दिया। मेरा संशोधन गिर गया। स्पष्टीकरण को हटाने का संशोधन भी अस्वीकृत हो गया। उसके पक्ष में १९२, विपक्ष में २३० मत आए।

विधेयक में दहेज लेना और देना दंडनीय बनाए गए थे। ६ मास तक के कारावास का प्रावधान था। किंतु इसके साथ दहेज माँगना भी एक अपराध की श्रेणी में रखा गया, जिसकी सजा भी ६ मास तक की हो सकती थी। विचित्र बात यह थी कि दहेज माँगने के साथ ‘प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से’ शब्द जोड़ दिए गए थे। प्रत्यक्ष रूप से दहेज माँगने का सबूत तो दिया जा सकता है, किंतु ‘अप्रत्यक्ष’ को कैसे प्रमाणित किया जाएगा? क्या इसका दुरुपयोग नहीं होगा? मैंने संशोधन रखा कि ‘प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से’ यह शब्दावली निकाल दी जाए। सदन ने उसे स्वीकार नहीं किया। कुछ सदस्य चाहते थे कि दहेज के मामले में पुलिस को हस्तक्षेप करने का अधिकार होना चाहिए। किंतु सरकार इस बात पर अड़ी रही कि कोई अदालत दहेज संबंधी किसी अपराध का तब तक नोटिस नहीं लेगी, जब तक राज्य की या उसके द्वारा नियुक्त पदाधिकारी की पूर्व मंजूरी नहीं ली जाती।

निस्संदेह दहेज-विरोधी कानून काफी कमजोर बना था। किंतु संतोष का विषय यह था कि दोनों सदन अपने मतभेद मिटाकर समाज सुधार की दिशा में एक ठोस कदम उठाने में समर्थ हुए। अब तो दहेज ने एक दानव का रूप धारण कर लिया है। सैकड़ों नव-वधुएँ दहेज की वेदी पर प्रतिवर्ष बलि हो रही हैं। दहेज के लोभी बहू पर मिट्टी का तेल डालकर, आग लगाकर, हत्या करने में भी संकोच नहीं करते। कानून काफी कठोर कर दिया गया है। फिर भी दहेज संबंधी अपराध बढ़ते जा रहे हैं। आवश्यकता है कानून का दृढ़ता और ईमानदारी से पालन कराने की। साथ ही जन-जागरण भी जरूरी है। मैंने अपने भाषण में इस बात पर बल दिया था। मैंने कहा था—

‘‘आवश्यकता इस बात की है कि देश की आर्थिक प्रगति की जाए, शिक्षा का प्रचार किया जाए, जात-पाँत के बंधन तोड़े जाएँ और लड़के-लड़कियाँ उन्मुक्त भाव से विवाह करें, शादियाँ परमात्मा के यहाँ से नहीं, आपस में तय हों, तभी दहेज खत्म हो सकता है।’’

चार दशक बीत गए। न अपेक्षित आर्थिक प्रगति हुई, न सबको साक्षर बनाने का सीमित लक्ष्य ही पूर्ण किया जा सका। जात-पाँत के बंधन टूटने के बजाय और कस गए हैं। अंतरजातीय विवाहों की संख्या बहुत कम है। लड़की देना अब भी हेठी का काम समझा जाता है। पढे़-लिखे लोग भी बराती बनकर उच्छृंखल होने का अधिकार पा लेते हैं। हम जैसे-जैसे आधुनिक बनते जा रहे हैं, वैसे-वैसे मानवीय गुणों और मूल्यों को भूलते जा रहे हैं। यह स्थिति हमें कहाँ ले जाएगी, शायद ही कोई जानता हो।

मैं राज्यसभा का सदस्य दो बार निर्वाचित हुआ। पहली बार १९६२ में, दूसरी बार १९८६ में। १९६२ में हमारे दल (भारतीय जनसंघ) के सदन में दो ही सदस्य थे। फिर भी सभापति डॉ. राधाकृष्णन ने मुझे प्रथम पंक्ति में स्थान दिया था। कोई चर्चा ऐसी नहीं होती थी, जिसमें पार्टी का दृष्टिकोण रखने का अवसर न मिलता हो। डॉ. राधाकृष्णन बड़ी शालीनता और गरिमा के साथ सदन की काररवाई का संचालन और नियंत्रण करते थे। बाद में डॉ. जाकिर हुसैन ने अध्यक्ष पद सँभाला। उन्हें प्रश्नकाल के बाद होनेवाले होहल्ला से बड़ी कोफ्त होती थी। राज्यसभा के सदस्यों की संख्या कम होने के कारण वहाँ बोलने के लिए अधिक समय मिलता है। परंपरा के अनुसार गैर-सरकारी प्रस्ताव या विधेयक पर तो सदस्य जितनी देर चाहे बोल सकता है। कम्युनिस्ट सदस्य श्री भूपेश गुप्त ने एक प्रस्ताव पर ६ घंटे का भाषण करके नया कीर्तिमान स्थापित किया था।

१९८६ में जब मैं दूसरी बार राज्यसभा का सदस्य चुना गया, तब सदन का गठन और उसका स्वरूप परिवर्तित हो चुका था। वरिष्ठों की तुलना में तरुणों की संख्या बढ़ गई थी। नव युव प्रधानमंत्री श्री राजीव गांधी के कारण युवक कांग्रेस से संबंधित अनेक नौजवान राज्यसभा के सदस्य बन गए। प्रतिपक्ष संख्या में कम, किंतु गुणवत्ता की दृष्टि से अधिक प्रभावी था।

प्रश्न यह है कि संविधान के निर्माताओं ने जब राज्यसभा के गठन का निर्णय किया, तब उनका लक्ष्य क्या था? क्या वह लक्ष्य पूरा हुआ है? संविधान परिषद् में हुई चर्चा में उड़ीसा के एक सदस्य श्री लोकनाथ मिश्र ने कहा था कि राज्यसभा उसके वर्तमान स्वरूप में अनावश्यक होगी। किंतु उसे स्वीकार नहीं किया गया। श्री अनंतशयनम आयंगार ने राज्यसभा रखने के पक्ष में तीन तर्क दिए। एक, लोगों में राजनीति में भाग लेने के लिए भारी उत्साह है और इसके लिए उन्हें अवसर प्रदान किए जाने चाहिए। उन्हें अपनी प्रतिभा के उपयोग का अवसर मिलना चाहिए। दूसरे, लोकसभा द्वारा जल्दी में बनाए गए किसी भी कानून पर राज्यसभा द्वारा ‘धीरे चलो’ का अंकुश लगाया जा सकता है। तीसरे, राज्यसभा एक स्थायी सदन होगा, जबकि लोकसभा स्थायी नहीं होगी। श्री आयंगार ने कहा कि देश की प्रगति के लिए दूसरा सदन आवश्यक है।

जहाँ तक अधिक लोगों को राजनीति में भागीदारी का अवसर प्रदान करने का प्रश्न है, राज्यसभा इसमें सफल हुई है। किंतु लोकसभा की जल्दबाजी पर अंकुश लगाने का उद्देश्य तो पूरी तरह विफल हो गया है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि भले ही राज्यसभा के सदस्य राज्यों के प्रतिनिधि के रूप में आते हैं, किंतु वे अपने-अपने दल के प्रतिनिधि के रूप में ही काम करते हैं। वे दल के अनुशासन में बँधे होते हैं, सदन में भी दलों द्वारा निर्धारित नीतियों का ही प्रतिपादन करते हैं। इस स्थिति में अंकुश की गुंजाइश ही कहाँ है! प्रारंभ में यह पद्धति जरूर थी कि विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा अपने वरिष्ठ सदस्यों को जो आयु के साथ-साथ अनुभव में भी बड़े होते थे; उन्हें राज्यसभा में भेजकर सम्मानित किया जाता था। अब तो उसका भी पालन नहीं हो रहा है। कहने भर के लिए राज्यसभा वरिष्ठों का सदन रह गया है। दोनों सदनों के गठन, आयुवर्ग की दृष्टि से उनके सदस्यों के वर्गीकरण में कोई विशेष अंतर नहीं दिखाई पड़ता। हाँ, इतना अंतर अवश्य है कि लोकसभा का चुनाव लड़ने के लिए २५ वर्ष की आयु चाहिए, जबकि राज्यसभा का सदस्य बनने हेतु ३० वर्ष की न्यूनतम आयु निर्धारित की गई है।

मुझे लगता है कि राजनीतिक दलों को राज्यसभा के लिए सदस्यों का चुनाव करते समय अधिक सावधानी से काम लेना चाहिए। दलों के वयोवृद्ध नेता राज्यसभा की सदस्यता से सम्मानित किए जा सकते हैं। किंतु उनका अनुभव और ज्ञान की दृष्टि से भी योग्य होना आवश्यक है। यदि राजनीतिक दल सदस्यों का चयन करते समय समाज के विभिन्न वर्गों के योग्य व्यक्तियों को प्रतिनिधित्व देने का प्रयास करें तो इससे दल को भी शक्ति मिलेगी और राज्यसभा का रूप भी अधिक निखरेगा। सुरक्षा सेनाओं के अवकाशप्राप्त अधिकारी, शिक्षा शास्त्री, वैज्ञानिक, उद्योगपति, रचनात्मक कार्यकर्ता अपने योगदान से राज्यसभा के वाद-विवाद को अधिक उपयोगी बना सकते हैं।

१९८४ के आम चुनाव में, जो श्रीमती इंदिरा गांधी की जघन्य हत्या के बाद हुआ था, प्रतिपक्ष को भारी पराजय का सामना करना पड़ा था। कांग्रेस के पक्ष में बही सहानुभूति की लहर ने प्रतिपक्ष के खेमे उखाड़ दिए थे। भारतीय जनता पार्टी को, वोटों के प्रतिशत की दृष्टि से, वही जनसमर्थन मिला था, जो उसे १९७१ में प्राप्त हुआ था। किंतु ७१ में पार्टी की लोकसभा में २२ सीटें आई थीं, जबकि १९८४ में सीटें घटकर केवल दो रह गईं। मैं भी चुनाव हार गया। अन्य विरोधी दलों को भी उत्तर में सहानुभूति लहर के कारण भारी क्षति उठानी पड़ी। लोकदल के लोकसभा में केवल ३ सदस्य निर्वाचित हुए। जनता पार्टी की संख्या भी एक दर्जन तक नहीं पहुँच पाई। भारतीय जनता पार्टी और लोकदल की तुलना में उसकी संख्या अधिक होने का कारण यह था कि सहानुभूति लहर का जितना प्रभाव उत्तर में हुआ था, उतना दक्षिण में नहीं हुआ।

यह धारणा सही नहीं है कि यदि मैं ग्वालियर जाने के बजाय अपने पुराने क्षेत्र नई दिल्ली से ही लड़ता तो मैं चुनाव में विजयी होता। सहानुभूति लहर का असर दिल्ली में भी था। भारतीय जनता पार्टी दिल्ली में लोकसभा का एक भी स्थान नहीं ले सकी थी। नई दिल्ली चुनाव क्षेत्र की स्थिति अपेक्षाकृत अच्छी थी। १९८० में जब भारतीय जनता पार्टी दिल्ली में सभी लोकसभा सीटें हार गई थी, तब भी नई दिल्ली की सीट पार्टी को प्राप्त हुई थी। शायद उसी आधार पर यह कहा जाता है कि १९८४ की हवा में भी मैं नई दिल्ली की सीट को बरकरार रख सकता था।

यह धारणा भी सही नहीं है कि मैं सुरक्षित सीट की तलाश में ग्वालियर गया था। सचाई यह है कि पार्टी के दायित्व के कारण मुझे नई दिल्ली के चुनाव क्षेत्र की ओर जितना ध्यान देना चाहिए था, मैं नहीं दे सका था। मतदाताओं से संपर्क टूट गया था। संगठनात्मक दृष्टि से नई दिल्ली के कुछ क्षेत्र हमेशा से दुर्बल रहे हैं। नई दिल्ली सीट को जीतने के लिए कठोर परिश्रम करने और अधिक समय देने की आवश्यकता थी। सारे देश में चुनाव अभियान के दायित्व को भली-भाँति निभाते हुए नई दिल्ली में अधिक समय देना और अधिक श्रम करना संभव नहीं था। अतः ग्वालियर जाने का सुझाव आया।

मैं वहाँ से पहले भी चुनकर आ चुका था। उन दिनों लोकसभा में ग्वालियर का प्रतिनिधित्व श्री शेजवलकर करते थे। वे पुनः चुनाव लड़ने के लिए उत्सुक नहीं थे। पूर्व महाराजा गुना से चुनकर आए थे। निर्णय करने के पूर्व मैंने उनसे एक दिन लॉबी में पूछा था कि क्या वे ग्वालियर से लड़ने का विचार कर रहे हैं? उन्होंने नकारात्मक उत्तर दिया था। किंतु ऐन वक्त पर उन्होंने ग्वालियर से नामांकन-पत्र दाखिल कर दिया। मुझे इतना भी समय नहीं मिला कि मैं किसी अन्य क्षेत्र से नामजदगी परचा दाखिल कर पाता। मुझे ग्वालियर में बाँध रखने की यह रणनीति किस गुप्त और चतुरतापूर्ण ढंग से बनी, इसकी पूरी कहानी जनता दल के गठन के बाद प्रकाश में आई।

वस्तुतः सारी योजना के पीछे दोहरी चाल थी। पहली, मैं ग्वालियर में ही बँध जाऊँ और कांग्रेस के विरुद्ध प्रचार करने के लिए सारे देश का दौरा न कर सकूँ। दूसरे, चुनाव परिणाम कुछ भी हों, कांग्रेस के एक गुट का राजनीतिक उद्देश्य पूरा होता था। यदि मैं हारता तो प्रतिपक्ष दुर्बल होता। यदि कहीं श्री माधव राव सिंधिया पराजित हो जाते, जिसकी संभावना बहुत कम थी, तब भी उनका सीमित स्वार्थ पूरा होता। किंतु श्री सिंधिया के परास्त होने की कोई संभावना नहीं थी। वे ग्वालियर से पहली बार चुनाव लड़ रहे थे। ग्वालियर राज परिवार के प्रति लोगों में अब भी बड़े आदर का भाव है। अपने पिता के एकमात्र पुत्र होने के कारण इस प्रभाव का उन्हें हमेशा लाभ मिला है। राजमाता विजया राजे सिंधिया का भी कुछ कम प्रभाव नहीं है। राजमाता के महिमामय व्यक्तित्व और सिद्धांतों के प्रति उनकी निष्ठा ने लोगों को पार्टी की ओर आकृष्ट किया है। पुराने जनसंघ और नई भारतीय जनता पार्टी को ग्वालियर क्षेत्र में जो सफलता मिलती रही है उसमें राजमाता सिंधिया का प्रभाव स्पष्ट रूप से बड़ी मात्रा में सहायक रहा है।

मैं नहीं जानता कि यदि १९८४ में ग्वालियर में मेरी जगह राजमाता विजया राजे सिंधिया चुनाव लड़ने का फैसला करतीं और उनकी टक्कर उनके पुत्र श्री माधव राव सिंधिया से होती तो क्या चुनाव परिणाम निकलता! लेकिन इस तरह की कोई टक्कर हम लोग टालना चाहते थे। माँ और पुत्र के बीच में जो खाई पैदा हो गई है, वह कम-से-कम मुझे तो कभी अच्छी नहीं लगी। राजनीतिक मतभेद होना एक बात है, किंतु उसकी वजह से माँ और पुत्र के सहज, स्वाभाविक और ममतापूर्ण संबंधों में कटुता आ जाना बिल्कुल दूसरी बात है।

यह ठीक है कि राजमाता सिंधिया ने मुझसे कहा था कि मैं नामांकन-पत्र भरने के लिए ग्वालियर अकेला न जाऊँ, वे भी मेरे साथ चलना चाहेंगी। किंतु मैंने इसके लिए उन्हें कष्ट देना उचित नहीं समझा। मुझे यह भी डर था कि यदि उन्होंने मेरे साथ ही नामजदगी परचा भर दिया तो आगे उसे वापस लेने में कठिनाइयाँ होगी। बाद में जब कुछ मित्रों ने श्री माधव राव सिंधिया से पूछा कि वे मेरे खिलाफ क्यों खड़े हुए, तो उन्होंने यह उत्तर दिया कि मैंने परचा भरने के बाद उन्हें यह चुनौती दी थी कि वे मेरे खिलाफ चुनाव लड़कर देख लें, उन्हें अपनी औकात का पता लग जाएगी। यह बिल्कुल मनगढ़ंत कहानी है। राजनीतिक विरोधियों के प्रति अशिष्टता का व्यवहार करना मेरे स्वभाव में नहीं है। श्री सिंधिया के प्रति तो मेरा सहज स्नेह और सम्मान का भाव रहा है। उन्हें जनसंघ का सदस्य मैंने ही बनाया था।

यह स्पष्ट है कि श्री सिंधिया पर ग्वालियर से लड़ने के लिए दबाव डाला गया और एक कांग्रेस जन के नाते उनके सम्मुख वहाँ से लड़ने के अतिरिक्त और कोई विकल्प नहीं था। ऐन वक्त पर नामजदगी पर्चा भरकर मेरे साथ जो व्यवहार किया, उसे मैं वचनभंग की संज्ञा तो नहीं दूँगा, किंतु उस आचरण को पारस्परिक संबंधों की कसौटी पर कसने पर उचित भी नहीं ठहरा पाऊँगा। ‘युद्ध और प्रेम में सबकुछ जायज है।’ यह माननेवाले कुछ भी कहें और समझें, किंतु यह तथ्य निर्विवाद है कि मुझे हराने के लिए उन्हें अंतिम क्षण में मैदान में उतारा गया। सहानुभूति की लहर और श्री सिंधिया का व्यक्तिगत प्रभाव दोनों के कारण चुनाव में मेरी पराजय सुनिश्चित थी। यदि राजा द्वार पर आकर वोट की याचना करे तो उसे न कहना कठिन होता है। किंतु यदि इंदिरा लहर न होती तो राजा के प्रति आदर और आत्मीयता की भावना रखते हुए भी भारतीय जनता पार्टी को व्यापक समर्थन मिलता। जम्मू में डॉ. कर्ण सिंह को, जो कांग्रेस के विरुद्ध खड़े थे, उनका भूतपूर्व महाराजा होना विजयी नहीं बना सका।

१९८४ में ग्वालियर में कांग्रेस ने मेरे साथ जो कुछ किया, लगभग उसी तरह का व्यवहार १९९१ में विदिशा में कांग्रेस के साथ हो गया। मुझे ऐन वक्त पर विदिशा से अपना नामजदगी परचा भरना पड़ा। कांग्रेस के उम्मीदवार और उनके समर्थक इस घटनाक्रम से इतने खिन्न हो गए कि उन्होंने पत्थरों से मेरा स्वागत कर डाला। मुझे बाहरी बताकर मेरे खिलाफ प्रचार किया।

मैंने १९९१ में लोकसभा का चुनाव क्यों लड़ा और दो सीटों पर क्यों खड़ा हुआ, इसकी भी एक पृष्ठभूमि है। मैं उन दिनों राज्यसभा का सदस्य था। मैंने घोषणा कर दी थी कि मैं लोकसभा का चुनाव नहीं लड़ूँगा। राज्यसभा में मेरा कार्यकाल अभी बाकी था। किंतु मुझे पार्टी ने लड़ाने का फैसला कर लिया। पार्टी उत्तर प्रदेश में सरकार बनाने की इच्छुक थी। चुनाव अभियान को तीव्र गति देने के लिए किसी ऐसे व्यक्ति को वहाँ से लड़ाना जरूरी था, जो अधिक जनसमर्थन जुटाने में सहायक होता। डॉ. मुरली मनोहर जोशी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष होने के कारण चुनाव न लड़ने का निर्णय कर चुके थे। राजमाता विजया राजे सिंधिया या श्री लालकृष्ण आडवाणी को उनकी जीती हुई सीटों से हटाने का प्रश्न ही नहीं था। इसलिए पार्टी की नजर मुझ पर पड़ी। ज्योतिषियों ने भी इसमें अपना योगदान दिया। मेरी जन्मपत्री देखकर ज्योतिषियों ने कहा...बताया जाता है कि मेरे ग्रह उच्च हैं और मुझे लड़ाना लाभदायक रहेगा। पार्टी को लखनऊ से लड़ने के लिए एक अच्छे उम्मीदवार की आवश्यकता भी थी। मेरा लखनऊ से पुराना संबंध रहा है। मैं पहले वहाँ तीन बार चुनाव लड़ चुका था। इसलिए मुझे वहाँ से लड़ाने का फैसला हुआ।

किंतु जब तय हुआ कि श्री आडवाणी नई दिल्ली के साथ-साथ गांधीनगर (गुजरात) से भी चुनाव लडें़ तो मुझे भी दो स्थानों से लड़ने के लिए कहा गया। नई दिल्ली की सीट उतनी सुदृढ़ नहीं है, यह पहले ही पता था। किंतु लखनऊ से पार्टी की विजय सुनिश्चित थी। यदि कांग्रेस किसी चोटी के फिल्म अभिनेता को लखनऊ से लड़ाती तो उसके लिए भी वहाँ से जीतना सरल नहीं होता। सारा उत्तर प्रदेश राम लहर से आप्लावित था। प्रतिपक्ष विभाजित ही नहीं, बदनाम भी हो चुका था। अयोध्या में कारसेवकों पर हुई ज्यादतियों ने लोगों को विक्षुब्ध कर दिया था। भारतीय जनता पार्टी को हराने के लिए प्रतिपक्ष ने जो रैलियाँ आयोजित कीं, उनमें अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों का बड़ी संख्या में आना और उनके सम्मुख भड़कानेवाले भाषण देना भाजपा के लिए और भी सहायक हुआ। यदि अयोध्या में कारसेवकों पर गोली न चलती और बहुसंख्यक समुदाय की भावना को चोट पहुँचानेवाले भाषण न दिए जाते तो भारतीय जनता पार्टी को चुनाव में इतनी सफलता न मिलती। भाजपा विरोधी वोटों का विभाजन भी सफलता में सहायक हुआ।

लोकसभा में दसवें आम चुनाव के बाद सदन की जो स्थिति बनी, उसमें भारतीय जनता पार्टी ११९ स्थान प्राप्त करके मुख्य विरोधी दल के रूप में प्रतिष्ठित हुई। २२७ स्थान प्राप्त कर कांग्रेस सबसे बड़े दल के रूप में उभरी। राष्ट्रपति वेंकटरमण ने जब कांग्रेस संसदीय दल के नेता श्री नरसिंह राव को सरकार बनाने के लिए बुलाया तो सदन में कांग्रेस पार्टी का बहुमत नहीं था। ऐसी स्थिति में कांग्रेस को सरकार बनाने के लिए कहने से पहले भारतीय जनता पार्टी से भी विचार-विनिमय करना चाहिए था। किंतु शायद राष्ट्रपति पिछले डेढ़ साल की अस्थिरता से इतने खिन्न हो गए थे कि उन्होंने किसी अन्य दल से परामर्श करने तक की आवश्यकता नहीं समझी।

वस्तुतः १९९०-९१ का कालखंड भारतीय राजनीति के इतिहास में राजनीतिक अस्थिरता के कालखंड के रूप में याद किया जाएगा। आम चुनाव में कांग्रेस की पराजय हुई, किंतु राष्ट्रीय मोर्चा को, जिसमें जनता दल शामिल था, स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। भारतीय जनता पार्टी और कम्युनिस्टों ने सरकार में शामिल न होते हुए उसे बाहर से ही समर्थन देना तय किया। इसके बल पर श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह को राष्ट्रपति ने सरकार बनाने के लिए निमंत्रित किया। यदि १९८४ में कांग्रेस को इंदिरा लहर ने भारी बहुमत दिया था तो १९९० के चुनाव में भ्रष्टाचार-विरोधी लहर ने, जिसका प्रतीक बोफोर्स था, कांग्रेस को धराशायी कर दिया।

गैर-कांग्रेसी दलों ने चुनाव में यह वादा किया था कि वे १९७९ के इतिहास की पुनरावृत्ति नहीं करेंगे और मिलकर चलेंगे। लोगों ने इसी भरोसे पर वोट भी दिए। किंतु राष्ट्रीय मोर्चा विशेषतः जनता दल अपनी एकता बनाए नहीं रख सका। पहले दिन ही आपस में जो अविश्वास पैदा हो गया, वह अंत में सरकार ही ले डूबा। १९७९ का कलंकपूर्ण इतिहास, आश्वासनों के बावजूद दोहराया गया। कांग्रेस ने श्री चंद्रशेखर के नेतृत्व में जनता दल से अलग हुए गुट को समर्थन देकर केंद्र में गैर-कांग्रेसी सरकार के दूसरे ऐतिहासिक प्रयोग पर पानी फेर दिया। किंतु इसके लिए कांग्रेस से अधिक गैर-कांग्रेसी नेता दोषी थे।

१९७९ की तरह इस बार भी किसी सैद्धांतिक प्रश्न या नीतिगत मामले को लेकर जनता दल में फूट नहीं पड़ी। सत्ता के अमर्यादित लोभ ने पार्टी में फूट डाल दी। मंडल आयोग की सिफारिशों को तो केवल फूट को वैचारिक जामा पहनाने और विरोधियों को मात देने के लिए शस्त्र के रूप में प्रयुक्त किया गया। यह कार्य भी इतनी जल्दबाजी में और इतने फूहड़ ढंग से हुआ कि सरकार के समर्थक दलों को न तो पूरी तरह विश्वास में लिया गया और न देश के भीतर, विशेषकर नौजवानों में अनुकूल राय बनाने का प्रयत्न किया गया। इसके बावजूद यदि पहले दिन ही यह घोषणा कर दी जाती कि सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन के साथ आर्थिक पिछड़ापन भी देखा जाएगा और सामाजिक दृष्टि से अग्रणी समझे जानेवाले वर्गों के नौजवानों को भी उनकी आर्थिक स्थिति के अनुसार नौकरियों में कुछ सुरक्षित स्थान दिए जाएँगे तो आरक्षण विरोधी आंदोलन उतना जोर नहीं पकड़ता।

उत्तर में पहली बार हुई आत्मदाह की घटनाओं ने पूरे समाज को दहला लिया। नौजवानों को संदेह हुआ कि पिछड़े वर्गों के लिए २७ प्रतिशत आरक्षण देने की घोषणा सामाजिक न्याय की भावना से नहीं, सत्ता कायम रखने की लालसा से प्रेरित है।

आरक्षण का मामला इतना नाजुक है कि उसे बहुत सँभालकर हाथ लगाने की जरूरत है। रोजगार के घटते हुए अवसरों और नौजवानों की बढ़ती हुई अपेक्षाओं में संतुलन कायम रखना ऊँचे दर्जे की नीतिमत्ता की माँग करता है। यह कार्य न तो जातिद्वेष को हवा देकर पूरा किया जा सकता है और न इसे वोट की राजनीति से जोड़कर ही इसका संतोषजनक हल निकाला जा सकता है। एक ओर पिछड़े वर्ग के नौजवानों में सामाजिक अन्याय के विरुद्ध रोष की भावना बढ़ रही है और दूसरी ओर अगड़े वर्ग के नौजवान अधीर होते जा रहे हैं। इस प्रश्न पर एक राष्ट्रीय आम सहमति के आधार पर ही कोई हल निकाला जा सकता है। किंतु गृहकलह में फँसा जनता दल सारे मामले में ऐसा उलझकर रह गया कि उसकी सरकार भी चली गई और आरक्षण का प्रश्न भी न्यायालय में लटका रह गया।

जनता दल के आंतरिक कलह और वामपंथी दलों को उनकी शक्ति से अधिक महत्त्व देने की नीति के कारण अयोध्या का प्रश्न सुलझने के बजाय और उलझ गया। श्री आडवाणी की रथयात्रा संयुक्त सरकार को गिराने के लिए नहीं थी। उनका उद्देश्य अयोध्या में श्रीराम मंदिर के पुनर्निर्माण के पक्ष में व्यापक राष्ट्रीय जन समर्थन जुटाना था। इस उद्देश्य में उसे सफलता भी मिली। जैसे-जैसे रथ आगे बढ़ता गया, यह बात स्पष्ट होती गई कि अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण का प्रश्न बहुसंख्यक समाज के अंतर्मन को बड़ी गहराई तक छूनेवाला प्रश्न है। पिछले ४० साल के कांग्रेस के शासनकाल में सेकुलरवाद के नाम पर जो नीतियाँ अपनाई गई हैं और जो आचरण किए गए हैं, उनसे हिंदुओं के मन में, सही या गलत, यह भावना पैदा हुई है कि उनके साथ उचित व्यवहार नहीं किया जा रहा। शाहबानो के मामले में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का पहले स्वागत और बाद में उस फैसले को पलटने के लिए संविधान में किया गया संशोधन लोगों के हृदय में काँटे की तरह चुभ गया। काश्मीर और पंजाब में देश की एकता और अखंडता को दी गई चुनौतियों ने भी हिंदू मानस को उद्वेलित किया। कांग्रेस तथा वामपंथी दलों की वोट की राजनीति ने उनके मन पर विपरीत ही प्रभाव डाला। रथयात्रा इस सारे असंतोष का कारण बन गई।

यदि श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह अयोध्या के प्रश्न को टालने के बजाय ईमानदारी से हल करने की कोशिश करते तो कोई हल निकल सकता था। किंतु उन्होंने स्वयं को परस्पर विरोधी दबावों में उलझ जाने दिया और इस प्रश्न पर बहुसंख्यक समाज की तीव्र भावना को समझने से इनकार कर दिया। मुसलिम मतदाताओं ने जनता दल को व्यापक समर्थन दिया था। मुसलिम धार्मिक नेता भी बड़ी मात्रा में उसके साथ जुडे़ थे। यदि जनता दल का नेतृत्व उन्हें यह समझाने का प्रयत्न करता कि उन्हें इस प्रश्न पर समझौते का रुख अपनाना चाहिए तो उसे सफलता मिलती। किंतु उसने ऐसा नहीं किया। वह वोटों के समीकरण में ही लगा रहा। उसका गणित था कि अल्पसंख्यक और पिछड़े वर्ग मिलकर इतना बड़ा वोट बैंक बनाते हैं कि जिसके बल पर चुनाव का मैदान मारा जा सकता है। किंतु उसने यह नहीं सोचा कि राम मंदिर के निर्माण का प्रश्न पिछड़े वर्गों को भी प्रभावित कर सकता है और वे अलग ढंग से मतदान कर सकते हैं।

जनता दल की फूट के कारण राष्ट्रीय मोर्चा सरकार ७ नवंबर को गिर गई। राष्ट्रपति भवन राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र बन गया। श्री वेंकटरमण ने नेताओं से विचार-विमर्श आरंभ किया। राष्ट्रपति से कहा गया कि वे दलबदल को बढ़ावा न दें। किंतु राष्ट्रपति के सम्मुख रास्ता क्या था? यदि जनता दल टूट जाता है और टूटे हुए गुट को कांग्रेस समर्थन का आश्वासन देती है और उस समर्थन के बल पर वह सरकार बनाने का दावा करता है तो राष्ट्रपति क्या करेंगे? उनके लिए नए आम चुनाव का विकल्प खुला हुआ था, किंतु उनके सामने यह प्रश्न भी था कि क्या इतनी जल्दी चुनाव कराना उचित होगा? क्या चुनाव से राजनीतिक स्थिरता आएगी? क्या किसी को स्पष्ट बहुमत मिलेगा?

अब यह एक सर्वविदित तथ्य है कि नवंबर, १९९० के प्रथम सप्ताह में जब जनता सरकार का पतन सन्निकट था और जनता दल का एक गुट कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनाने के लिए प्रयत्नशील था, तब राष्ट्रपति श्री वेंकटरमण एक राष्ट्रीय सरकार की आवश्यकता का अनुभव कर रहे थे और इस संबंध में विभिन्न दलों से अनौपचारिक चर्चा भी कर रहे थे। उन्हें देश के भविष्य के बारे में गहरी चिंता थी। राजनीतिक स्थायित्व के अभाव में देश में विद्यमान संकटों से कैसे पार पाया जाएगा? राष्ट्रीय सहमति के अभाव में विभिन्न चुनौतियों का कैसे सामना किया जाएगा?

राष्ट्रीय सरकार के गठन के सुझाव का मैंने सार्वजनिक रूप से स्वागत किया था। बाद में भारतीय जनता पार्टी ने भी उससे सहमति जताई किंतु बात आगे नहीं बढ़ी, क्योंकि अन्य दल इसके लिए तैयार नहीं हुए। इस बार मुख्य बाधा कम्युनिस्टों और भाजपाइयों को साथ बैठाने की नहीं थी। वह अध्याय तो नवंबर, १९९० में ही समाप्त हो गया था। श्री मधु लिमये का यह तर्क भी काम नहीं आया था कि अगर पोलैंड में ‘सोलिडेरिटी’ नामक संगठन, जिसे एक दृष्टि से रोमन कैथोलिक चर्च का विस्तार ही माना जाता है, कम्युनिस्टों के साथ सरकार बना सकता है तो भारत में भाजपा और कम्युनिस्ट, एक न्यूनतम कार्यक्रम के आधार पर काम क्यों नहीं कर सकते? इस बार अन्य बाधाएँ थीं। जनता दल और भाजपा के संबंधों में कटुता आ गई थी। जनता दल का कांग्रेस-विरोधी रुख और तीखा हो गया था। इस स्थिति में क्या राष्ट्रीय सरकार का गठन व्यावहारिक होगा? युद्ध की स्थिति में राष्ट्रीय सरकार की आवश्यकता समझ में आ सकती है, किंतु शांतिकाल में उसका गठन कहाँ तक उचित होगा? फिर अगले चुनाव में क्या होगा? क्या सरकार में शामिल दल मिलकर चुनाव लडें़गे? यदि नहीं, तो क्या अलग-अलग चुनाव लड़ने की तैयारी सरकार के साथ रहते हुए ही शुरू नहीं हो जाएगी? मिली-जुली सरकार का प्रयोग न १९७७-७९ में सफल हुआ, न १९९० में। एक राष्ट्रीय सरकार उनसे किस रूप में भिन्न होगी?

एक प्रश्न जिस पर उस समय भी दबे स्वरों में चर्चा हुई थी और जिसको लेकर आज भी काफी गलतफहमी फैली हुई है, वह यह है कि राष्ट्रपति श्री वेंकटरमण स्वयं प्रधानमंत्री बनना चाहते थे और राष्ट्रीय सरकार के गठन की सारी कवायद इसी दृष्टि से की गई थी।

भारतीय जनता पार्टी के संसदीय दल के नेता के नाते मैं उन दिनों इस मामले पर हुई सभी चर्चाओं में शामिल था। श्री वेंकटरमण के साथ हुई अपनी वार्त्ताओं के आधार पर मैं दृढ़तापूर्वक यह कह सकता हूँ कि राष्ट्रीय सरकार के गठन का सुझाव रखते समय स्वयं उसका प्रधानमंत्री बनने का विचार उनके मन को छू तक नहीं गया था। सत्य तो यह है कि चर्चा के दौरान यदि कभी यह कहा गया कि ऐसी सरकार का नेतृत्व करने के लिए आपसे अधिक उपयुक्त व्यक्ति और कौन हो सकता है, तो उन्होंने उसे तत्काल अस्वीकार कर दिया। उनका कहना था कि राष्ट्रपति के सर्वोच्च पद पर बैठे हुए व्यक्ति को इस प्रकार के विचार को पास तक नहीं फटकने देना चाहिए। जब कभी नेतृत्व का प्रश्न आया, और सत्य तो यह है कि राष्ट्रीय सरकार के गठन का सुझाव इस ठोस स्थिति तक कभी पहुँचा ही नहीं, श्री वेंकटरमण ने डॉ. शंकर दयाल शर्मा का नामोल्लेख किया। इस मामले को लेकर, जिन्होंने श्री वेंकटरमण पर महत्त्वाकांक्षी होने का आरोप लगाया है, उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति के साथ बड़ा अन्याय किया है। उन्हें या तो तथ्यों की जानकारी नहीं है या वे किसी पूर्वग्रह से पीडि़त हैं। यदि वेंकटरमण चाहते तो एक और टर्म के लिए राष्ट्रपति चुने जा सकते थे। किंतु वे स्वेच्छा से, मुसकराते हुए जिस तरह राष्ट्रपति भवन का तामझाम छोड़कर चले गए, वह दूसरों के लिए उदाहरण है।

१९९० और १९९१ की तरह मैं आज भी इस मत का हूँ कि इस विशाल और वैविध्यपूर्ण देश को सुदृढ़ और समृद्ध बनाने के लिए राष्ट्रीय समस्याओं पर एक आम राय बनाना जरूरी है। कोई एक दल या दल समूह केवल शासन और प्रशासन के भरोसे न तो देश को एक रख सकता है और न विकास के तकाजों को ही पूरा कर सकता है। भले ही सरकार संयुक्त न हो, किंतु राष्ट्रीय मानस तो विभक्त नहीं होना चाहिए। ‘संवो मनांसि जानताम्’ का यही संदेश है।

मुझे नेहरूजी से लेकर इंद्रकुमार गुजराल तक सभी प्रधानमंत्रियों को निकट से देखने का अवसर मिला। इन सभी प्रधानमंत्रियों में नेहरूजी ही एक ऐसे व्यक्ति थे, जिन्होंने संसद् पर अपनी अमिट छाप छोड़ी। लोकतंत्र के प्रति पूर्णतः प्रतिबद्ध, नेहरूजी के लिए संसद् की संस्था एक पवित्र मंदिर की तरह थी, जिसकी गरिमा कायम रखने के विषय में वे पूर्णतः सजग थे। वे न केवल स्वयं संसद् में नियमित रूप से उपस्थित होते थे बल्कि अन्य मंत्रियों को भी संसदीय कार्य को पूरी गंभीरता से लेने के लिए प्रेरित करते थे। प्रश्नकाल हो या अन्य विषयों पर चर्चा, नेहरूजी की उपस्थिति जहाँ आवश्यक होती, वहाँ वे अवश्य उपस्थित रहते और सदस्यों की बातों को ध्यान से सुनते। सदन के नेता के नाते अपनी जिम्मेदारी भलीभाँति निबाहते और अध्यक्ष को भी उनके दायित्व के निर्वहन में सहयोग देते। नेहरूजी की उपस्थिति मात्र से सदन का स्वरूप बदल जाता था, उसमें अधिक गरिमा तथा गंभीरता आ जाती थी।

नेहरूजी स्वभाव से लोकतंत्रवादी थे किंतु कुछ हठी भी थे। जिस बात को ठीक समझते थे, उस पर अड़ जाते थे। सदन को साथ लेकर चलने की उनमें अपूर्व क्षमता थी। आवश्यकता पड़ने पर सदन की भावनाओं के अनुरूप आचरण करने में उन्हें संकोच नहीं होता था।

मुझे वह प्रसंग अभी तक याद है, जब नेहरूजी के विशेष सहायक श्री एम.ओ. मथाई ने संसद् सदस्यों के आचरण के विरुद्ध कुछ बातें कही थीं, जिससे सदन में बड़ा रोष था। श्री मथाई के कथन पर प्रायः सभी पक्षों के सदस्यों को आपत्ति थी। उनके विरुद्ध विशेषाधिकार के उल्लंघन की सूचनाएँ दी गईं, सदन की अवमानना का मामला उठाया गया। मेरे प्रस्ताव को लोकसभा अध्यक्ष ने स्वीकार कर लिया। जब उस पर बहस होने लगी तो नेहरूजी ने अपने विशेष सहायक को बचाने के लिए जो कुछ कहा, उसका निचोड़ यह था कि ‘मामला विशेषाधिकार के उल्लंघन का नहीं, इंप्रोप्राइटी, अनौचित्य का है।’ लेकिन नेहरूजी की बात सदस्यों के गले नहीं उतरी। कांग्रेस के सदस्य भी श्री मथाई के आम व्यवहार से संतुष्ट नहीं थे। चारों ओर से माँग होने लगी कि श्री मथाई के मामले को विशेषाधिकार समिति को सौंपा जाए। नेहरूजी ने सारी स्थिति तत्काल भाँप ली। सदन का तेवर देखकर वे समझ गए कि अब श्री मथाई की सफाई में कुछ कहना बेकार है। उन्होंने मामला विशेषाधिकार समिति को सौंपना स्वीकार कर लिया। उस समय नेहरूजी ने सदन में जो कुछ कहा, वह आनेवाले प्रधानमंत्रियों के लिए दिशासूचक है। उन्होंने कहा कि जब सदन का एक बड़ा भाग यह अनुभव करता है कि किसी मामले में कुछ होना चाहिए तो बहुसंख्या द्वारा उसकी भावनाओं को ठुकरा देना ठीक नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि ऐसी कोई बात यहाँ नहीं होनी चाहिए, जिससे लोगों को लगे कि किसी मामले पर परदा डाला जा रहा है या उसे लोगों की नजरों से छिपाने की कोशिश की जा रही है। इस छोटी सी घटना से नेहरूजी के व्यक्तित्व के अनेक उत्कृष्ट पहलू उजागर हो जाते हैं।

नेहरूजी के बाद प्रधानमंत्री के पद पर श्री लालबहादुर शास्त्री का निर्वाचित होना भारतीय लोकतंत्र के वैशिष्ट्य और अंतर्विरोध दोनों को प्रकट करता है। कहाँ राजसी ठाठ-बाट में पले नेहरूजी और कहाँ निपट निर्धनता के पालने में झूले श्री लाल बहादुर शास्त्री! कहाँ इंग्लैंड के क्रैंब्रिज विश्वविद्यालय में पश्चिमी शिक्षा तथा संस्कार प्राप्त बैरिस्टर और कहाँ काशी विद्यापीठ में शास्त्री की उपाधि अर्जित करनेवाले श्री लालबहादुर शास्त्री! किंतु इतनी असमानता के होते हुए भी नेहरूजी का उत्तराधिकार शास्त्रीजी ने सँभाला, जो भारतीय समाज की आंतरिक शक्ति और उसके लचीलेपन को प्रकट करता है।

प्रधानमंत्री बनने से पहले शास्त्रीजी अनेक पदों पर भलीभाँति कार्य करके अपनी योग्यता से सभी को प्रभावित कर चुके थे। मुझे वह प्रसंग अभी तक याद है, जब रेल मंत्री के नाते शास्त्रीजी ने रेल बजट हिंदी में प्रस्तुत किया। इसके विरोध स्वरूप अनेक सदस्य, जिनमें डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी भी शामिल थे, सदन से उठकर चले गए। बाद में डॉ. मुखर्जी ने यह स्पष्ट किया था कि उनका इरादा न तो शास्त्रीजी का अपमान करने का था और न ही हिंदी में बजट पेश करने का विरोध करने का था।

भारत और पाकिस्तान की लड़ाई में शास्त्रीजी के व्यक्तित्व ने भारी ऊँचाइयाँ प्राप्त कर लीं। यदि वे जीवित रहते तो भारतीय राजनीति की दिशा को ही परिवर्तित कर देते।

ताशकंद में शास्त्रीजी का दुखद देहावसान जिन परिस्थितियों में हुआ, उस पर पड़ा रहस्य का परदा अब लगभग हट गया है। इस आशंका का कोई आधार नहीं मिला है कि शास्त्रीजी की मृत्यु स्वाभाविक नहीं थी। शास्त्रीजी के विशेष सहायक श्री सी.पी. श्रीवास्तव द्वारा लिखित शास्त्रीजी की जीवनी से मुझे यह जानकर बड़ी राहत मिली कि उस रात ताशकंद में शास्त्रीजी को चिंतातुर करने में मेरा कोई हाथ नहीं था। बात यह थी कि जब ताशकंद समझौते की खबर दिल्ली पहुँची तो प्रेस ने मुझसे उस पर प्रतिक्रिया माँगी। मैंने समझौते की कड़ी आलोचना की और उसे समर्पण बताया। यह सूचना शास्त्रीजी को ताशकंद में पहुँचा दी गई। बाद में जब दिल का दौरा पड़ने से शास्त्रीजी के निधन का समाचार आया तो मेरे मन में यह अपराध-बोध जागा कि शायद मेरी कठोर प्रतिक्रिया का भी उनके मन पर गहरा असर हुआ होगा। किंतु श्री श्रीवास्तव ने ताशकंद की उस दुर्भाग्यपूर्ण रात का जो विवरण दिया है, उससे मेरे मन का भारी बोझ उतर गया है।

भारत-पाक युद्ध के दिनों में शास्त्रीजी ने यह प्रबंध किया था कि प्रतिपक्ष के नेताओं को प्रतिदिन सायंकाल मोर्चे पर होनेवाली घटनाओं से अवगत रखा जाए। आवश्यकता होने पर शास्त्रीजी स्वयं संपर्क करके उचित जानकारी देते रहते थे। शास्त्रीजी के आकस्मिक निधन ने नए प्रधानमंत्री के चयन की समस्या देश के सामने खड़ी कर दी। उस पद के अनेक दावेदार थे। कांग्रेस अध्यक्ष श्री कामराज ने फिर एक बार निर्णायक भूमिका अदा की। वे श्रीमती इंदिरा गांधी के पक्ष में पहले ही अपना मन बना चुके थे। कांग्रेस के अन्य वरिष्ठ नेता भी श्री मोरारजी देसाई जैसे सशक्त व्यक्ति को प्रधानमंत्री नहीं देखना चाहते थे। इंदिराजी उनके इशारों पर चलेंगी, यह सोचकर उन्होंने उनसे योग्य तथा अनुभवी नेताओं को ताक पर रखकर इंदिराजी को देश की बागडोर सौंप दी।

नेहरूजी के मन में कहीं-न-कहीं यह भाव अवश्य रहा होगा कि उनका उत्तराधिकार उनकी पुत्री इंदिरा गांधी सँभालें, किंतु यदि उनके मन में ऐसी इच्छा थी, तो भी उन्होंने इसके लिए कोई विशेष प्रयत्न नहीं किए जान पड़ते। इंदिराजी को कांग्रेस अध्यक्ष बनाना उन्हें जरूर पसंद आया होगा और अपरोक्ष रूप से उन्होंने इसमें सहायता भी दी होगी, किंतु इंदिराजी को कांग्रेस की अध्यक्षता सौंपने में अन्य कांग्रेसी नेताओं का अधिक हाथ दिखाई देता है, जो इंदिराजी के माध्यम से नेहरूजी को प्रभावित करना चाहते थे।

केरल की प्रथम निर्वाचित कम्युनिस्ट सरकार के विरुद्ध मुक्ति संघर्ष में कांग्रेस की भागीदारी तथा बाद में कम्युनिस्ट सरकार को भंग करने का केंद्र का निर्णय इंदिराजी को कांग्रेस अध्यक्ष बनानेवाले वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं की रणनीति को स्पष्ट करता है।

अपने पिता के विपरीत श्रीमती गांधी संसद् से दूर-दूर ही रहती थीं। प्रारंभ में तो वह इतनी चुप रहती थीं कि उन्हें गूँगी गुडि़या तक कह दिया गया था, किंतु यह उनके साथ अन्याय था। वह कम बोलने में विश्वास करती थीं। सबकी बातें सुनने के बाद अपना मन स्थिर करतीं और सबसे अंत में उसे प्रकट करतीं।

इंदिराजी की तुलना में मोरारजी देसाई का व्यक्तित्व बिल्कुल उलटा था। वह औरों की पूरी बात सुनने से पहले ही अपना मंतव्य प्रकट कर देते थे। उनकी कुछ निश्चित धारणाएँ थीं, निर्धारित मत थे, जिन्हें प्रकट करने में वह कृपणता या संकोच से काम नहीं लेते थे। इंदिराजी इस मामले में अधिक चतुर थीं। सदन में आकर समय गँवाने के बजाय वह अपने कमरे में बैठकर सत्ता की चाभियाँ घुमाती थीं। देश-विदेश में क्या हो रहा है, संसद् में क्या चल रहा है, विरोधी दलों की आंतरिक स्थिति क्या है...इस सब पर उनकी पैनी नजर रहती। उन्होंने १४ वर्ष शासन कर विश्व को चमत्कृत कर दिया और विरोधियों को कई बार पछाड़ा।

जब-जब मैं श्रीमती इंदिरा गांधी से मिला, मुझे लगा कि वह किसी अज्ञात आशंका से आक्रांत हैं। कहीं-न-कहीं उनके मन में असुरक्षा का गहरा भाव बैठा हुआ था। सब पर नजर रखना, खुलकर बात न करना, यह सोचना कि सारी दुनिया उनके विरुद्ध किसी षड्यंत्र में रत है, ऐसी मनःस्थिति का परिचायक है, जिसका गहरा विश्लेषण किए बिना इंदिराजी के व्यक्तित्व और व्यवहार को पूरी तरह नहीं समझा जा सकता।

राष्ट्रपति पद के लिए श्री नीलम संजीव रेड्डी का नामांकन-पत्र दाखिल करने के बाद भी उन्हें चुनाव में हरवाना, इंदिराजी की इसी मनःस्थिति का परिणाम था। वे समझती थीं कि यदि श्री रेड्डी राष्ट्रपति हो गए तो वे उन्हें अधिक दिन तक प्रधानमंत्री नहीं रहने देंगे। बाद की घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया कि श्रीमती गांधी को राष्ट्रपति रेड्डी से कोई खतरा नहीं था और यह सब उनके मन का वहम था।

लोकसभा के लिए अपना चुनाव रद्द होने के बाद यदि इंदिराजी त्याग-पत्र देकर कांग्रेस का नेतृत्व सँभालतीं तो उन्हें चुनौती देनेवाला पार्टी में कोई नहीं था। किंतु उन्हें स्वयं पर विश्वास नहीं था, इसी की परिणति आपातस्थिति लागू किए जाने में हुई। अपनी सत्ता बचाने के लिए उन्होंने लोकतंत्र का गला घोटना स्वीकार किया। इतिहास इसके लिए उन्हें कभी क्षमा नहीं करेगा। बाद में वह पुनः सत्ता में आने में अवश्य सफल हुईं किंतु उनकी कीर्ति में जो कालिख लग गई थी, वह मिटी नहीं।

बँगलादेश के निर्माण में इंदिराजी की भूमिका सदैव ही सराही जाएगी। जिस दृढ़ता तथा नीतिमत्ता से उन्होंने पाकिस्तान को परास्त करने की व्यूहरचना का नेतृत्व किया, जिसके अंतर्गत पाकिस्तानी सेना को ढाका में हथियार डालने के लिए मजबूर होना पड़ा, वह गर्व और गौरव से भरा हुआ प्रसंग है। इस सफलता में तत्कालीन रक्षा मंत्री श्री जगजीवन राम का भी महत्त्वपूर्ण योगदान था, यद्यपि स्वतंत्र बँगलादेश के निर्माण का सारा श्रेय इंदिराजी को ही दिया जाता है। चीन के हाथों जब भारत अपमानित हुआ था तो उसका सारा दोष उस समय के रक्षामंत्री श्री कृष्ण मेनन के ऊपर डाल दिया गया था। श्रेय और दोष का वितरण करने में घटनाचक्र कब किसके साथ अन्याय करेगा, कोई नहीं कह सकता।

मैं भी उन लोगों में शामिल था, जिन्होंने इंदिराजी के बँगलादेश के मामले में सफल नेतृत्व के लिए उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की थी, किंतु यह धारणा गलत है कि मैंने किसी वक्त उन्हें ‘दुर्गा’ के विशेषण से संबोधित किया था। मैंने उनकी तारीफ जरूर की थी किंतु ‘दुर्गा’ नहीं कहा। इस तथ्य को मैं एक से अधिक बार स्पष्ट कर चुका हूँ, किंतु प्रचलित धारणा इतनी बद्धमूल है कि अभी भी लोग मेरी इस बात के लिए प्रशंसा करते हैं कि मैंने उस संकटकाल में सारे राजनीतिक मतभेदों को ताक पर रखकर सरकार को पूर्ण सहयोग दिया था और इंदिराजी को दुर्गा के रूप में वर्णित किया था। जब श्रीमती पुपुल जयकर इंदिराजी की जीवनी लिख रही थीं तो वह उसमें इस बात का उल्लेख करना चाहती थीं कि मैंने इंदिराजी को दुर्गा कहा था, किंतु मेरे मना करने पर उन्होंने उल्लेख तो नहीं किया किंतु इस बात की गहरी छानबीन जरूर की कि मैंने इंदिराजी को दुर्गा कहा था या नहीं। संसद् की काररवाई और उस समय के समाचार-पत्रों को देखने के पश्चात् उन्हें यह विश्वास हो गया था कि मैंने इंदिराजी को दुर्गा नहीं कहा।

प्रश्न यह है कि फिर यह समाचार फैला कैसे? मुझे लगता है कि उस समय किसी और नेता ने इंदिराजी को दुर्गा के रूप में वर्णित किया था और कुछ पत्रों ने उनके कथन को मेरे नाम से छाप दिया था। वे पत्र कौन से हैं, इसका भी अभी तक ठीक-ठीक पता नहीं लगा है।

इंदिराजी के साथ संसद् में मेरी नोक-झोंक होती रहती थी, किंतु राजनीतिक मतभेदों को उन्होंने कभी व्यक्तिगत संबंधों में बाधक नहीं बनने दिया। उनकी निर्मम, त्रासद, क्रूर हत्या ने एक ऐसे व्यक्तित्व को हमारे बीच में से असमय ही उठा लिया, जिन्हें योग्य पिता की योग्य पुत्री के नाते ही नहीं, अपनी निजी योग्यता, कुशलता, निर्णय-क्षमता तथा कठोरता के कारण याद किया जाएगा।

श्री राजीव गांधी बड़ी दुखद परिस्थिति में प्रधानमंत्री बने। उन्हें शासन चलाने का कोई अनुभव नहीं था। राजनीति में उनकी रुचि भी नहीं थी। वे विमान-चालक का दायित्व हँसी-खुशी और जिम्मेदारी के साथ निभाते थे। एक बार जहाज से उतरकर मैंने देखा कि एक नौजवान हैलमेट पहने हुए नीचे खड़ा है और मुझे देखकर नमस्कार करके मुसकरा रहा है। मैं पहचान नहीं पाया कि वह प्रधानमंत्री के पुत्र श्री राजीव गांधी थे। एक अन्य अवसर पर जब वह परिवार के साथ विमान से कहीं दिल्ली से बाहर जा रहे थे तो विमान के रवाना होने में अप्रत्याशित देर हो गई। वह चाहते तो सोनियाजी और बच्चों के साथ घर लौट सकते थे, किंतु उन्होंने हवाई अड्डे के विश्राम कक्ष में समय बिताने का फैसला किया। वह बच्चों के साथ खेलते रहे, गप्पें लड़ाते रहे। किंतु प्रधानमंत्रित्व ने उनके इस सहज और सरल स्वभाव को काफी बदल दिया।

श्री राजीव गांधी शिष्टाचार के बारे में पूरी तरह सजग थे। जब भी मिलते, बड़ी गर्मजोशी से मिलते, दूसरे के दृष्टिकोण को समझने और अपने दृष्टिकोण को समझाने का प्रयास करते, किंतु अनुभव की कमी और सही सलाह न मिलने के कारण उनसे अनेक भारी भूलें हुईं। मैंने उन्हें पायलट के रूप में, कांग्रेस के जनरल सेक्रेटरी के रूप में और प्रधानमंत्री के रूप में निकट से देखा। चुनाव में पराजित होने के बाद उन्होंने बड़ी हिम्मत से काम लिया। प्रतिपक्ष के नेता के नाते वे सरकार को परेशानी में डालने का कोई भी मौका चूकते नहीं थे, किंतु अनुभव की कमी के कारण कभी-कभी उनके निर्णय अनौचित्य की सीमा को छूने लगते थे। जम्मू-काश्मीर की स्थिति के अध्ययन के लिए सर्वदलीय संसदीय समिति के सदस्य के रूप में उन्होंने श्रीनगर में जो व्यवहार किया, उससे उन्हें पसंद करनेवाले सभी लोगों को अच्छा नहीं लगा। इसी प्रकार नामीबिया के स्वतंत्रता के समारोह में उपस्थित होकर उन्होंने न केवल प्रधानमंत्री श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह को वरन् स्वयं को भी बड़ी कठिन परिस्थिति में डाल दिया। उन्हें यह स्वीकार करने में काफी समय लगा कि वह अब सत्ता में नहीं हैं और जिस रचनात्मक राजनीति की वह सत्ता में होते हुए विरोधियों से अपेक्षा करते थे, वह उन्हें करनी है।

श्री नरसिंह राव ने १९९१ में चुनाव नहीं लड़ा था। नई दिल्ली से नाता तोड़कर अपना पुस्तकालय समेटकर वे घर लौटने की तैयारी कर रहे थे, किंतु, नियति का चक्र नई दिशाओं में चल रहा था। चुनाव में कांग्रेस सबसे बड़े दल के रूप में उभरी। पार्टी में मतभेदों के कारण श्री नरसिंह राव को नेता चुन लिया गया। वे प्रधानमंत्री बन गए। वे किसी भी सदन के निर्वाचित सदस्य न होने के बावजूद प्रधानमंत्री बन गए। बाद में लोकसभा का चुनाव जीतकर आए। उनकी सरकार अल्पमत में थी, किंतु वे उसे पाँच साल तक चलाने में सफल हुए। सरकार को स्थायित्व देने के लिए क्या-क्या हुआ, इसकी कहानी अभी अधूरी है। समय आने पर कोई लिखेगा। अल्पमत सरकार को पूरे पाँच वर्ष चलाना अपने में एक उपलब्धि कही जा सकती है। नरसिंह रावजी को इसका श्रेय जाता है।

नरसिंह रावजी ने जब शासन का भार सँभाला तो अर्थव्यवस्था गहरे संकट से घिरी हुई थी। देश का सोना विदेश में गिरवी रखने की नौबत आ गई थी। विदेशी मुद्रा का संकट अनियंत्रित हो रहा था। साम्यवाद की विफलता और सोवियत रूस के विघटन ने विश्व के इतिहास में एक अविश्वसनीय अध्याय जोड़ दिया था। श्री नरसिंह राव ने बड़ी कुशलता से देश की अर्थव्यवस्था को नई आवश्यकताओं, तकाजों के अनुरूप ढाला और विरोध के बावजूद आर्थिक सुधारों का एक लंबा सिलसिला शुरू किया। अनेक सुधार अप्रत्याशित थे। उन्हें अपनाना लीक से हटकर बडे़ साहस का परिचय देना था, किंतु श्री नरसिंह राव ने साहस जुटाया और धीरे-धीरे विरोध को हजम करते हुए आर्थिक सुधारों पर एक आम राय बनाने में काफी हद तक सफलता पाई। आर्थिक सुधारों की जो प्रक्रिया आरंभ हुई, उससे पीछे जाना अब कठिन दिखाई देता है।

श्री नरसिंह राव ने चुनाव में पराजित होने के बाद जिन परिस्थितियों में सत्ता छोड़ी, उन्हें दोहराने की आवश्यकता नहीं है। एक लंबे राजनीतिक जीवन का इस तरह दुखद अंत होगा, यह किसी ने नहीं सोचा था। यदि वे राजनीति में न आते और साहित्य की साधना में समय बिताते तो उनकी लेखनी माँ सरस्वती का भंडार भरने में महत्त्वपूर्ण योगदान देती। तेलुगू, उर्दू, हिंदी तथा अंग्रेजी आदि अनेक भाषाओं पर उनका समान रूप से अधिकार है। हाल में ही अंग्रेजी में लिखी गई उनकी आत्मकथात्मक पुस्तक काफी चर्चा का विषय बनी है।

मैंने नरसिंह रावजी के रूप में एक अच्छा मित्र पाया। कठोर से कठोर आलोचना को वे बड़े धैर्य के साथ सुनते हैं और कटुता का कड़वा घूँट पीकर संतुलन बनाए रखते हैं। मेरी पुस्तक ‘मेरी इक्यावन कविताएँ’ के प्रकाशन-विमोचन के अवसर पर श्री नरसिंह राव ने जो भाषण दिया, वह श्रोताओं के हृदय को हिला गया। थोड़े से समय में काव्य पुस्तक के पन्नों को पलटकर उन्होंने ऐसी पंक्तियाँ ढूँढ़ निकालीं जो कवि की मनःस्थिति को सही रूप में प्रस्तुत करती हैं। वे पंक्तियाँ इस प्रकार हैं—‘इतना काफी है अंतिम दस्तक पर खुद दरवाजा खोलूँ।’

१९९६ के आम चुनाव में कांग्रेस की पराजय हुई और भारतीय जनता पार्टी सबसे बडे़ दल के रूप में उभरी। राष्ट्रपति डॉ. शंकर दयाल शर्मा ने १६ जून, १९९६ को मुझे सरकार बनाने के लिए बुलाया। इसके अतिरिक्त उनके सामने कोई और विकल्प नहीं था। जो दल मिलकर चुनाव नहीं लडे़, इतना ही नहीं, जिन्होंने एक-दूसरे के विरुद्ध उम्मीदवार खडे़ किए थे, वे मोर्चा बनाकर जब सरकार बनाने का निमंत्रण दिए जाने पर जोर देने लगे तो राष्ट्रपति को उसे अमान्य करना पड़ा। संयुक्त मोर्चा सरकार बनाने के लिए इतना लालायित था कि उसे कांग्रेस का समर्थन लेने में भी संकोच नहीं हुआ। सत्ता की लालसा ने गैर-कांग्रेसवाद की धज्जियाँ बिखेर दीं। मुझे सरकार बनाने का आमंत्रण देने के लिए डॉ. शंकर दयाल शर्मा की बड़ी छिछली आलोचना की गई। उन पर जातिवादी होने का आरोप भी लगाया गया। संयुक्त मोर्चा और उसमें शामिल घटक दलों के नेताओं ने मेरी शपथ विधि का बहिष्कार किया। इसे निष्कृट राजनीति का उदाहरण ही कहा जाएगा।

अपने अल्पमत को बहुमत में बदलने के लिए मैंने कोई गलत काम नहीं किया। सदस्यों के क्रय-विक्रय का तो सवाल ही पैदा नहीं होता। सत्ता की चादर को मैंने १३  दिन बाद बेदाग वापस रख दिया। इसके लिए विरोध में शामिल डी.एम.के. के नेता ने मेरी सदन में प्रशंसा की। कांग्रेस के समर्थन से और भाजपा विरोधी गठबंधन के नाम पर, संयुक्त मोर्चा सरकार बनाने में सफल हुआ। श्री देवगौड़ा प्रधानमंत्री बने। कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) ने बाहर से समर्थन दिया। सरकार लोकसभा में विश्वास का मत पाने में सफल हो गई।

देवगौड़ा सरकार को पाँच साल का समर्थन देने का आश्वासन देने के बाद भी कांग्रेस ने उसे नौ महीने में ही अपदस्थ कर दिया। आरोप यह लगाया कि श्री देवगौड़ा कांग्रेस में फूट डालने का प्रयास कर रहे थे। मैंने राष्ट्रपति डॉ. शंकर दयाल शर्मा से पहले ही कहा था कि यदि कांग्रेस सत्ता के बाहर रहती है तो यह सरकार ज्यादा दिन नहीं चलेगी। हुआ भी यही। कांग्रेस के हाथों एक बार धोखा खाने के बाद भी संयुक्त मोर्चा ने कांग्रेस की सहायता से दूसरी बार सरकार बनाने में संकोच नहीं किया।

श्री गुजराल, जो विदेश मंत्री थे, प्रधानमंत्री बने। दूल्हा बदल गया, बाराती सब वही थे। कांग्रेस के बल पर सरकार बनी, किंतु ज्यादा दिन चली नहीं। जैन कमीशन में डी.एम.के. के विरुद्ध कुछ टिप्पणियों का बहाना लेकर कांग्रेस ने डी.एम.के. को सरकार से हटाने की माँग रख दी। संयुक्त मोर्चे के लिए इस माँग को मानना संभव नहीं था। उसे इस्तीफा देना पड़ा। सरकार गिर गई। सरकार के गठन के समय कांग्रेस ने राष्ट्रपति को यह आश्वासन दिया था कि वह पूरे पाँच साल संयुक्त मोर्चा सरकार का समर्थन करेगी। राष्ट्रपति भवन से इस आशय की विज्ञप्ति भी प्रकाशित हुई थी। लेकिन कांग्रेस ने वचन का पालन नहीं किया। परिणाम यह हुआ कि १८ महीने के बाद ही देश को आम चुनाव का सामना करने को बाध्य होना पड़ा। चुनाव में भारतीय जनता पार्टी का सबसे बडे़ दल के रूप में उभरना, राष्ट्रवादी और लोकतंत्रवादी दलों के साथ मिलकर उसका सरकार बनाना, ये इतनी ताजी घटनाएँ हैं, जिन पर टिप्पणी करने की आवश्यकता नहीं है।

भारत संसार का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। १९७५ और ७६ के छोटे से कालखंड को छोड़कर लोकतंत्र की व्यवस्था अक्षुण्ण रही है। बालिग मताधिकार, निष्पक्ष चुनाव, स्वतंत्र न्यायपालिका, बहुदलीय पद्धति तथा स्वतंत्र प्रेस हमारे लोकतंत्र के आधार हैं। लोग चुनाव के माध्यम से सरकार बदलते हैं। १९७७ में तो लोगों ने श्रीमती इंदिरा गांधी जैसी शक्तिशाली प्रधानमंत्री को भी चुनाव में परास्त कर दिया था। १९८० में आपातकालीन ज्यादतियों के विरुद्ध जनरोष के ज्वार पर सत्ता के सिंहासन तक पहुँची जनता पार्टी की सरकार को, जिसे लोकनायक जयप्रकाश नारायण का आशीर्वाद प्राप्त था, अपदस्थ कर दिया गया था। १९८९ में मतदाताओं ने राजीव गांधी की सरकार को, जिसे उन्होंने ५ वर्ष पूर्व ही लोकसभा की ५१७ सीटों में से ४१५ सीटें देकर भारी-भरकम बहुमत प्रदान किया था, उसे भी हटा दिया। राज्यों में भी लोगों ने सरकारें बदली हैं और मताधिकार की निर्णायक शक्ति का प्रकटीकरण किया है।

क्या इसका अर्थ यह है कि भारतीय लोकतंत्र ऊपर से जितना जीवंत दिखाई देता है, भीतर से भी वह उतना ही सबल और शक्तिशाली है? क्या लोकतंत्र की सभी संस्थाएँ अपने दायित्व का भलीभाँति पालन कर रही हैं? क्या देश में लोकतांत्रिक जीवन-मूल्यों की रक्षा हो रही है? क्या लोकतंत्र की जडें़ गहरी जम गई हैं?

इन प्रश्नों का उत्तर खोजते समय बड़ी निराशा होती है। संसद् में वाद-विवाद कम, शोर-शराबा ज्यादा होता है। चुनाव धन-शक्ति और गुंडा-शक्ति के बडे़ पैमाने पर प्रयोग के कारण दूषित हो गए हैं। दलीय पद्धति दल-बदल की अनैतिक प्रवृत्ति के कारण क्षतिग्रस्त हो रही है। न्यायपालिका की निष्पक्षता पर उँगलियाँ उठने लगी हैं। चुनाव आयोग आरोपों-प्रत्यारोपों के घेरे में आ गया है। राजनीति का अपराधीकरण हो रहा है। लोकतंत्र का बाहरी ढाँचा बरकरार है, किंतु उसे भीतर ही भीतर घुन खाए जा रहा है।

लोकतंत्र ५१ बनाम ४९ का खेल नहीं है। हमारी चुनाव पद्धति तो ऐसी है, जिसमें विजयी पार्टी और विजयी उम्मीदवार के लिए ५१ प्रतिशत वोट प्राप्त करना भी आवश्यक नहीं है। वेस्ट मिनिस्टर पद्धति में अल्पमतों के बल पर बहुमत प्राप्त करने का दोष तो पहले ही विद्यमान है, दलों की बहुलता और उससे भी बढ़कर, चुनाव में उम्मीदवारों की अत्यधिकता के कारण वोटों का भारी विभाजन विचित्र स्थिति को जन्म दे रहा है। ३०-३५ प्रतिशत वोटों के बल पर पार्टियाँ सरकार बना रही हैं और उससे भी कम वोट लेकर लोकसभा और विधानसभा में सांसद, विधायक चुने जा रहे हैं। यह पद्धति बुनियादी तौर पर दोषपूर्ण है।

भारत में वेस्ट मिनिस्टर प्रणाली के अनुसार प्रतिपक्ष के नेता को विशेष दर्जा दिया जाता है, उसे मंत्री परिषद् के सदस्यों के समकक्ष वेतन-भत्ते और सुविधाएँ दी जाती हैं। ब्रिटेन की परंपरा का पालन करते हुए भारत में भी लोक लेखा समिति के अध्यक्ष का पद प्रतिपक्ष को जाता है। यहाँ तक कि उपाध्यक्ष का पद भी प्रतिपक्ष को देने की परंपरा का, जैसे-तैसे ही सही, पालन किया जा रहा है। किंतु इन व्यवस्थाओं और परंपराओं के मूल में प्रतिपक्ष का समादर करने की जो भावना निहित है, वह देश में अभाव के रूप में ही दिखाई देती है। समादर तो दूर रहा, यहाँ प्रतिपक्ष के प्रति सहिष्णुता दिखाने की भी मानसिकता नहीं है। प्रतिपक्ष को शत्रु पक्ष समझा जाता है। न केवल समझा जाता है बल्कि इस आशय की सार्वजनिक घोषणाएँ भी की जाती हैं। बढ़ती हुई असहिष्णुता लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर खतरा है।

वेस्ट मिनिस्टर पद्धति के परिणामस्वरूप भारतीय समाज में पहले से ही विद्यमान अनेक भेद और अधिक तीव्र हो उठे हैं। जाति-उपजाति, उपासना पद्धति, भाषा और रहन-सहन के आधार पर बँटा हुआ समाज और भी बिखर रहा है। सांप्रदायिकता खुलकर खेल रही है। जातिवाद का जहर जन-जीवन को जीर्ण कर रहा है। संयोजक तत्त्व विभाजक तत्त्वों में बदल रहे हैं। राजनीति सत्ता का खेल मात्र बनकर रह गई है। येन-केन-प्रकारेण सत्ता हथियाना और हथियाने के बाद जैसे भी हो उसे बनाए रखना, यही राजनीति का चरम लक्ष्य रह गया है। सत्ता के लोभ से प्रेरित होकर राजनीतिक दल विघटन को बढ़ावा देने में भी संकोच नहीं करते, यहाँ तक कि राष्ट्र विरोधी तत्त्वों से भी साँठ-गाँठ करने से भी बाज नहीं आते।

लोकतंत्र की सफलता के लिए दलीय पद्धति का सुदृढ़ होना बहुत आवश्यक है। भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में ब्रिटेन की तरह द्विदलीय पद्धति तो व्यावहारिक नहीं जान पड़ती। किंतु, यह जरूरी है कि जो भी दल हों, वे नीतियों और कार्यक्रमों पर आधारित हों, लोकतांत्रिक तरीकों से चलें, उनमें नियमित रूप से सदस्यता हो, अनिवार्यतः संगठनात्मक चुनाव हों, और वे अपने सुनिश्चित घोषणा पत्र के आधार पर मतदाताओं के समक्ष जाकर उनका समर्थन प्राप्त करें। ऐतिहासिक कारणों से कांग्रेस का स्वरूप एक राजनीतिक मंच का अधिक और एक राजनीतिक दल का कम रहा है। साम्यवादियों से लेकर संप्रदायवादियों तक ने कांग्रेस की छत्रच्छाया में बैठकर राजनीति की है। वह समय के अनुसार जितनी बदली है, उतनी ही पूर्ववत् रही है। समाजवादी समाज की रचना से लेकर उन्मुक्त अर्थव्यवस्था की नई मंजिल तक पहुँचने में उसे भले ही ६० साल का समय लगा हो, किंतु वैचारिक दृष्टि से उसने यह यात्रा बड़ी सरलता से पूरी कर ली है। उसका लचीलापन उसके लिए गुण हो सकता है, किंतु अन्य दलों के लिए वह बड़ी कठिनाई का कारण बना है। व्यवहारवाद और अवसरवाद के बीच में विभाजक रेखा बड़ी बारीक है।

‘जैसी बहे बयार, पीठ तब तैसी दीजे’, आराम से जिंदगी जीने का कारगर नुस्खा हो सकता है। किंतु उससे नवस्वाधीन राष्ट्र को नवनिर्माण के लिए कठोर परिश्रम करने की ओर प्रेरित नहीं किया जा सकता। उसके लिए कुछ जीवन-मूल्यों में गहरी प्रतिबद्धता आवश्यक है।

देश मिली-जुली सरकारों के दौर में प्रविष्ट हो गया है। दो बडे़ दलों के रूप में कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के उभरने के साथ ही क्षेत्रीय दल भारतीय राजनीति का अटूट अंग बन गए हैं। केंद्र में भी वे भविष्य में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाएँगे, इसमें कोई संदेह नहीं है।

मिली-जुली सरकार का गठन सरल है, किंतु उसे चलाना बहुत कठिन है। जब तक सरकार में शामिल सभी दल अपनी-अपनी सीमाओं को नहीं समझेंगे, तब तक यह प्रयोग सफल नहीं होगा और देश राजनीतिक अस्थिरता का शिकार होता रहेगा। अस्थिरता में न तो आर्थिक विकास ही होगा और न कानून वव्यवस्था की स्थिति ही संतोषदायक रहेगी। समय आ गया है, जब राजनीतिक व्यवस्था और चुनाव प्रणाली के बारे में गहराई से चिंतन किया जाए और परिस्थिति के अनुरूप उसमें संशोधन, परिवर्धन और परिवर्तन किया जाए। राष्ट्र की स्वतंत्रता, अखंडता और भारतीय समाज की समरसता को बनाए रखने के लिए सभी दलों को भविष्य की चुनौतियों के बारे में मिलकर विचार करना चाहिए।

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