श्री अटल बिहारी वाजपेयी : मेरी स्मृति में

श्री अटल बिहारी वाजपेयी का नाम सर्वप्रथम मैंने कानपुर में १९४६-४७ में संभवतः अक्तूबर अथवा नवंबर में एक मित्र से सुना था। मित्र का नाम है जगदीश स्वरूप सक्सेना, जो कन्नौज की जिला अदालत के नामी और वरिष्ठ वकीलों में गिने जाते हैं। मैं कन्नौज के डायमंड जुबली इंटर मीडिएट कॉलेज में इंटर के प्रथम वर्ष में उनका सहपाठी हुआ। उनके एक ख्यातिप्राप्त पूर्वज ने महारानी विक्टोरिया की हीरक जयंती के उपलक्ष्य में कॉलेज स्थापित किया था। जगदीश स्वरूप बी.ए. के लिए इलाहाबाद विश्वविद्यालय गए, जहाँ मैंने भी एडमिशन लिया हुआ था। मैं सुंदरलाल होस्टल में रहता था, वे पास ही हॉलैंड हॉल में। इलाहाबाद में जगदीश स्वरूप पक्के कम्युनिस्ट बन गए। हॉलैंड हॉल में कम्युनिस्ट विद्यार्थियों का काफी जोर था। इंटर के दूसरे वर्ष में मैं कानपुर के क्राइस्ट चर्च कॉलेज में भर्ती हो गया था। क्राइस्ट चर्च कॉलेज भी उस समय कम्युनिस्टों का गढ़ था। वहाँ के होस्टल में कम्युनिस्ट विद्यार्थियों के कई नेता भी रहते थे। डीएवी कॉलेज के भी कई जाने-माने कम्युनिस्ट विद्यार्थियों के नेता अकसर क्राइस्ट चर्च कॉलेज के होस्टल में ही अड्डा जमाए रहते थे। इन दिनों (१९४२-४३-४४ में) पाकिस्तान बनने का मामला विशेष चर्चा और विवाद का विषय था। मेरी नोक-झोंक इस मामले में अकसर इन कम्युनिस्ट विद्यार्थियों और कुछ मुसलिम लीग के समर्थक विद्यार्थियों से हो जाती थी। वैसे होस्टल में रहनेवाले जो कम्युनिस्ट विद्यार्थी थे, व्यक्तिगत स्तर पर उनसे हमारे अच्छे रिश्ते थे, मतभेद विचारधारा के स्तर पर था। जगदीश स्वरूप मेरे विचारों से कन्नौज से ही भलीभाँति परिचित थे। वे स्वयं पक्के कम्युनिस्ट भले ही हो गए, पर हमारी मित्रता यथावत् थी। मैं इलाहाबाद विश्वविद्यालय में एम.ए. और साथ में एल-एल.बी. की डिग्री के लिए भर्ती हुआ। जगदीश स्वरूप वकालत करना चाहते थे, अतएव इलाहाबाद से बी.ए. करने के बाद वे कानपुर के डीएवी कॉलेज में भर्ती होकर कॉलेज के होस्टल में रहने लगे। घर जाते समय मैं एक बार जगदीश स्वरूप से मिलने उसके होस्टल (कानपुर) में चला गया। बातचीत के दौरान वे कहने लगे, ‘चलो तुम्हें यहाँ एक विद्यार्थी से मिलवाने ले चलता हूँ, जो बहुत अच्छा भाषण देता है, कवि भी है’ और मुझे ताना देते हुए चुटकी ली कि ‘तुम्हारी जैसी विचारधारा वाला भी है। उसके पिता भी उसके साथ ही एल-एल.बी. की डिग्री के लिए कॉलेज में भर्ती हुए हैं और दोनों साथ ही रह रहे हैं। वहीं चलकर कॉफी पिएँगे और गप्प भी मारेंगे।’ वाजपेयीजी के कमरे में पहुँचने पर देखा, ताला लगा है, तो वापस आ गए। मुझे कन्नौज के लिए छोटी लाइन की ४ बजे सुबह की ट्रेन पकड़नी थी, अतएव वाजपेयीजी से मुलाकात नहीं हो सकी। जगदीश स्वरूप विरोधी विचारों के होते हुए भी अटलजी की वग्मिता और कविता पाठ की शैली तथा सदैव हँसमुख, सबसे मित्रतापूर्वक व्यवहार की प्रशंसा करते रहे। यह बात आई-गई हो गई। मुझे खेद रहा कि मुलाकात न हो सकी। दिलचस्प बात यह है कि वकालत के जमाने में साम्यवादी या कम्युनिस्ट विचारधारा से जगदीश स्वरूप धीरे-धीरे विलग हो गए। अब वे भारतीय जनता पार्टी के समर्थक हैं।

जब वाजपेयीजी पहली बार संसद् के सदस्य चुने गए, उनका नाम सुर्खियों में आने लगा। स्मृति की बिजली कौंध गई। अच्छा ये वही वाजपेयी हैं, जिनके विषय में जगदीश स्वरूप ने डीएवी कॉलेज होस्टल में बताया था। संयोग ऐसा बना कि इसके बाद भी उनको देखने-सुनने या मिलने का कोई अवसर नहीं मिला। वैसे भी सरकारी सेवा में होने के कारण कोशिश करके मिलने को उस समय के राजनीतिक वातावरण में अनुचित माना जाता था। वाजपेयीजी से मेरी व्यक्तिगत मुलाकात और पहचान १९७१ में हुई, जब मैं तत्कालीन दिल्ली शासन का मुख्य सचिव नियुक्त हुआ था। श्री विजय कुमार मलहोत्रा उस समय चीफ एक्जीक्यूटिव अधिकारी, यानी आज की भाषा में मुख्यमंत्री थे। दिल्ली शासन का एक सांस्कृतिक आयोजन था। उसमें वाजपेयीजी मुख्य अतिथि थे। उस आयोजन में विजय कुमारजी ने मेरा परिचय वाजपेयीजी से करवाया। दिल्ली आ जाने पर समय-समय पर इधर-उधर कभी-कभी आयोजनों में उनसे पूर्व परिचय के कारण नमस्कार और बातचीत हो जाती।

जब मैं दिल्ली शासन के मुख्य सचिव के पद पर था, उन्हीं दिनों पूर्वी पाकिस्तान में असंतोष बढ़ता जा रहा था—बँगला भाषा की अवमानना को लेकर, मानव अधिकारों की अनदेखी तथा पूर्वी पाकिस्तान के विकास और कल्याण केप्रति उदासीनता के कारण।

१९७१ का जो आम चुनाव हुआ, उसमें पूर्वी बंगाल की अवामी लीग को अधिक वोट मिले। अतएव पाकिस्तान के राष्ट्रपति को अवामी लीग के नेता शेख मुजीबुर रहमान को प्रधानमंत्री केलिए आमंत्रित करना था। पश्चिमी पंजाब के निवासी और नेता ऐसा नहीं चाहते थे। जुल्फीकार अली भट्टो की इसमें विशेष भूमिका थी। राष्ट्रपति याहिया खाँ और भुट्टो यहाँ आकर गए, समझौते के लिए बातचीत का ढोंग रचा। वे पूर्वी बंगाल के नेता के हाथ में सत्ता का जाना बर्दाश्त नहीं कर सकते थे। पाकिस्तानी फौज भी यह नहीं चाहती थी। ढाका और पूर्वी बंगाल में मार्शल लॉ (फौजी कानून) लागू कर दिया गया। पश्चिम पाकिस्तान के निवासी पूर्वी पाकिस्तान के रहने वाले बंगालियों को हेय दृष्टि से देखते थे। पाकिस्तान की फौज के अत्याचार आरंभ हो गए। वहाँ का नरसंहार इतिहास का एक काला पन्ना है। मुजीबुर रहमान को गिरफ्तार कर पश्चिमी पाकिस्तान ले जाया गया। अत्याचारों से परेशान बंगाली हिंदू और मुसलिम शरण लेने हिंदुस्तान की ओर भागने लगे। इन सब घटनाओं को लेकर पाकिस्तान-हिंदुस्तान के बीच युद्ध और अंत में बँगलादेश की स्थापना हुई। इन सब ऐतिहासिक प्रसंगों से सब परिचित हैं। इंदिरा गांधी की सरकार पर तुरंत मानवीय आधार पर हस्तक्षेप करने के लिए भारतीय जनता दल ने आंदोलन शुरू किया। वाजपेयीजी को रामलीला मैदान में भाषण देकर गिरफ्तारी देनी थी। पुलिस को इंतजाम करना था। मैंने अपने सहयोगी दिल्ली के पुलिस के इंस्पेक्टर जनरल श्री बिष्ठ से कहा कि मैंने वाजपेयीजी का भाषण कभी नहीं सुना है, वाजपेयीजी का भाषण सुनने का आज अच्छा मौका है। बिष्ठ के साथ पुलिस वैगन में बैठकर पहली बार वाजपेयीजी को भाषण देते देखा और सुना। जैसा लोग कहा करते थे, उनकी भाषण शैली, बोलते हुए उनकी भावभंगिमा, कभी हास्य कभी रोष प्रकट करने के लिए शब्दों का प्रयोग वास्तव में जन समुदाय को प्रभावित ही नहीं करता, बल्कि आंदोलित कर देता था। यह मेरा उस दिन का निजी अनुभव रहा। उत्सुकता रहती थी कि कहीं यदि वाजपेयीजी का भाषण हो तो अवश्य चला जाए।

भारत सरकार के गृह सचिव के नाते संसद् की एक समिति में मुझे बुलाया गया। सदस्यों ने तरह-तरह के प्रश्न पूछने शुरू कर दिए। मैं यथाशक्ति प्रश्नों के उत्तर देने की चेष्टा कर रहा था। वाजपेयीजी उस समय मध्य प्रदेश से सांसद थे। उत्तरों में अपनी बात की पुष्टि मैं उदाहरण के तौर पर उत्तर प्रदेश के जिलों के अनुभव का ही हर बार जिक्र करता था। वाजपेयीजी ने प्रश्न तो कोई नहीं पूछा, फब्ती कस दी कि चतुर्वेदीजी, आप हैं देश के गृह सचिव, लेकिन बात केवल उत्तर प्रदेश की ही कर रहे हैं, कुछ मध्य प्रदेश की और अन्य प्रदेशों की स्थिति भी बताइए। समिति के सदस्य ठहाका मारकर हँसने लगे। मैं सकपका सा गया। मैं केवल यह कह सका कि श्रीमान, अभी मध्य प्रदेश तक पहुँचा नहीं हूँ। वाजपेयीजी ने पलटकर कहा, ‘मध्य प्रदेश तक ही नहीं, पूरे देश की ओर ध्यान देने की जरूरत है।’ उनके इस सीधे से कथन ने मुझे अपने अपेक्षित दायित्व का पूरा भान सुगमता से करा दिया।

एक और बैठक थी गृह मंत्रालय की कंसल्टेटिव कमेटी की। उन दिनों पंजाब और आसाम दोनों जगह आंदोलन हो रहे थे। काफी राजनीतिक गरमाहट थी। गृहमंत्री श्री प्रकाश चंद्र सेठी उपस्थित थे। सदस्य बडे़ पैने प्रश्न कर रहे थे। पंजाब में अकाली दल से समझौते की बात भी चल रही थी। वाजपेयीजी ने उसकी प्रगति के बारे में कुछ प्रश्न किए। गृहमंत्री ने उत्तर में कुछ ऐसी बात कह दी कि चलती हुई बातचीत पर जिसका गंभीर प्रभाव पड़ सकता था। मैंने धीरे से सेठीजी को ब्रीफ करने की कोशिश की, पर सेठीजी वाजपेयीजी के प्रश्न की गंभीरता का आकलन नहीं कर सके। मेरे कहे पर भी सेठीजी ने ध्यान नहीं दिया। सेठीजी ने जो कहा, वह सब किसी प्रकार से पत्रकारों को मालूम हो गया, यद्यपि बैठक गोपनीय होती है। पत्रकार वहाँ नहीं होते हैं, पर उनकी पहुँच तो किसी न किसी प्रकार से हो ही जाती है। मैंने पूरे प्रसंग से प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी को अवगत करा दिया, क्योंकि मुझे चिंता थी कि व्यर्थ ही माहौल और बिगड़ सकता है। संयोग से दिल्ली के दैनिक ‘स्टेट्समैन’ के एक वरिष्ठ पत्रकार का मुझसे उस दिन मिलने का समय निश्चित था। मैंने सोचा कि जो पेचीदगी पैदा हो गई है, उसका निराकरण होना चाहिए। जो कुछ गृहमंत्री सेठी ने कहा था, उसके विपरीत दूसरा ही वृत्तांत दे दिया। बैठक के उपरांत सेठीजी को भी अपनी भूल का एहसास हुआ तो वे भी परेशान थे। उनको जब मैंने यह सब बता दिया तो वे चिंतामुक्त हुए। प्रधानमंत्री को भी पुनः सूचित करना ही था। अगले दिन मेरा दिया हुआ वक्तव्य (सेठीजी के कथन का विवरण) स्टेट्समैन में प्रकाशित हुआ। आडवाणीजी का मेरे पास सुबह फोन आया, शायद उनकी वाजपेयीजी से बात हुई होगी। उन्होंने कहा कि चतुर्वेदीजी, आप चाहें तो न बताएँ, किंतु आपसे अपेक्षा यही है कि आप न गलत बात बताएँगे और न मिसगाइड या गुमराह करेंगे, इसीलिए आपको फोन किया है कि आखिरकार जो स्टेट्समैन में मेरे संदर्भ से छपा है, वह सही है अथवा सेठी का बयान सही है या जो कुछ अन्य अखबारों में मैंने उत्तर दिया कि वास्तव में जो सेठीजी ने कहा, वह अन्य अखबारों में आया है, किंतु अब तो आप स्टेट्समैन में छपे को ही सही मानिए। मैं समझता हूँ कि पंजाब समस्या की गंभीरता को अच्छी तरह जानने के कारण आडवाणीजी, वाजपेयीजी ने गृहमंत्री सेठी के बड़बोलेपन में कहे शब्दों का कोई राजनीतिक फायदा नहीं उठाया। कोई विवाद पैदा नहीं हुआ। यह वाजपेयीजी का बड़प्पन ही कहा जाएगा। उनके लिए देशहित दलहित से सदैव ऊपर रहा।

जिस समय मैं भारत के नियंत्रक एवं महालेखाकार के पद पर था, कुछ समय उपरांत मेरे रहने के लिए भारतीय जनता पार्टी के अशोक रोड वाले ऑफिस के पास वाला ९ नंबर बँगला आवंटित हुआ। एक दिन शाम को घर पर काम करनेवाले एक कर्मचारी ने कहा कि वाजपेयीजी फोन पर हैं, बात करना चाहते हैं। मैंने तुरंत फोन ले लिया और कहा कि वाजपेयीजी, क्या आज्ञा है। वाजपेयीजी ने अपने चिरपरिचित लहजे में नमस्कार कर कहा कि भाई, हम पड़ोसी हैं, कभी-कभार भी मिलना नहीं होता। मैंने उत्तर दिया कि आप जब आदेश दें, मिलने आ जाऊँगा, वैसे अंग्रेजी कहावत है—A hedge between keeps the friendship green. मेरे बँगले और बीजेपी के ऑफिस के बीच में उस समय तक बाँस के पेड़ों की ही मेंड़ या बाड़ थी, इनकी बाउंड्रीवाल बाद को बनी। वाजपेयीजी हँसने लगे और कहा कि एक छोटे से मामले में, आप जानते हैं, मैं ग्वालियर से हूँ और आपने ग्वालियर एजी दफ्तर के पंद्रह-बीस कर्मचारियों को नोटिस दिया है कि उनके खिलाफ मेडिकल तथा परिवार के साथ देश में कहीं जाने की सुविधाओं के दुरुपयोग का मामला है। यह कुछ ट्रैवेल एजेंटों ने रैकेट बना रखा है। अरे चतुर्वेदीजी, कोई रास्ता निकालिए, साँप मरे और लाठी भी न टूटे। भ्रष्टाचार तो समाप्त होना ही चाहिए। मैंने वाजपेयीजी को बताया कि यह मामला ग्वालियर का ही नहीं है, कई अन्य राज्यों का भी है। लीव ट्रवल सुविधा और दवाइयों की सुविधा में बहुत घोटाला हो रहा है, धोखाधड़ी नियोजित ढंग से हो रही है, इसीलिए मुझे सख्त रुख अपनाना पड़ा। वैसे मैं भी किसी के पेट पर लात मारी जाए, यह अच्छा नहीं समझता। वैसे कुछ लोग अदालतों में भी गए हैं, लेकिन कुछ बीच का रास्ता निकलने की संभावना है। वाजपेयीजी ने कहा कि मैं केवल इनके परिवार वालों के विषय में चिंतित हूँ, भ्रष्टाचार न पनपने देने के आपके प्रयास का समर्थन ही करूँगा। वाजपेयीजी की आवाज और शब्दों में कोई धौंस या दबाव किंचित् मात्र भी नहीं था। न उनको इस बात से नाराजगी थी कि उनका राजनेता के रूप में एक विशिष्ट स्थान है और मैं तुरंत हाँ में हाँ मिलाकर नोटिस वापस लेने का आश्वासन नहीं दे रहा हूँ। मैं लंबे सेवा काल में कई अन्य नेताओं की बंदरघुड़की समय-समय पर झेलता रहा था, पर वाजपेयीजी का व्यवहार बिल्कुल अलग था। शीघ्र ही मामला सुलझा दिया गया। जिनके विरुद्ध चार्ज था, हर एक कर्मचारी ने अलग-अलग क्षमा माँगी और फिर गलत काम न करने का आश्वासन दिया। यही नहीं, जो एलाउंस गलत तौर पर लिया था, वह वापस किया। जो कुछ कर्मचारी न्यायालय में राहत के लिए गए थे, उन्होंने अपनी याचिकाएँ वापस कर लीं। काफी अंतराल के उपरांत वाजपेयीजी से एक आयोजन में मिलना हुआ, मैंने उनसे कहा कि आपकी बात मैंने मान ली। उत्तर में हँसते हुए बोले कि आपको फोन करने के बाद मैंने भी उन लोगों को अच्छी तरह डाँटा। प्रसन्नता है कि मामला सुलझ गया और अपराधियों को तथा औरों को आगे के लिए नसीहत मिल गई।

१९९० में राष्ट्रपति महोदय ने जब मुझे पद्म विभूषण प्रदान किया, दिल्ली की एक संस्था सिटीजंस कौंसिल, जिसके अध्यक्ष उस समय श्री धर्मवीरजी थे, सम्मानित करने के लिए विट्ठल भाई भवन में एक आयोजन किया। मुख्य अतिथि केरूप में वाजपेयीजी को निमंत्रित किया गया। उन्होंने स्वीकार कर लिया। मुझे माला पहनाते हुए उनके चिर-परिचित भावभंगिमा वाला फोटो मेरे पास आज भी सुरक्षित है। जिस भाँति मेरी प्रशंसा एवं प्रशासन के विषय में जो कुछ कहा, उससे मैं अभिभूत हो गया। धन्यवाद के शब्द कठिनाई से मिले।

डॉ. मुरली मनोहर जोशी और श्री अश्विन कुमार काफी समय से मुझे भाजपा का सदस्य बनने के लिए कह रहे थे। डॉ. जोशी से पुराना परिचय था। इलाहाबाद विश्वविद्यालय की शती समारोह के समय वे बहुत सक्रिय थे। उन पूर्व छात्रों में मेरा नाम भी सम्मिलित था, जिनको सम्मानित करना निश्चित हुआ था। अपने पैर की दुर्घटना के कारण मैं शती समारोह में शामिल होने में असमर्थ था, किंतु बाद को मेरे इलाहाबाद आने के एक अन्य अवसर पर मुझे सम्मानित करने की औपचारिक व्यवस्था की। सीएजी का दायित्य छोड़ने के बाद जैसी मेरी पत्नी की इच्छा थी कि हम लोग जयपुर में अपने मकान में रहें, दिल्ली से भी एक ट्रक में काफी सामान वहीं भिजवा दिया था। पत्नी के न रहने से और पुत्री तथा कनिष्ठ पुत्र की कार्य करने की सुविधा के कारण अपना इरादा बदलना पड़ा। दिल्ली में एक सुविधाजनक मकान की तलाश में था। बोफोर्स की रिपोर्ट के बाद अनेक अनर्गल आक्षेप किए गए थे। धमकियाँ भी दी गई थीं। चित्त खिन्न था। डॉ. जोशी ने कई बार कहा कि आडवाणीजी और वाजपेयीजी चाहते हैं कि मैं शीघ्र भाजपा का सदस्य बनूँ। वाजपेयीजी ने भी फोन किया। कुछ तो विचारों की साम्यता और आडवाणीजी तथा वाजपेयीजी के प्रति श्रद्धा के कारण आखिर निश्चय कर लिया भाजपा का सदस्य बनने का। आडवाणीजी उस समय अध्यक्ष थे, उनकी उपस्थिति में मैं भाजपा का विधिवत् सदस्य बना। प्रेस कॉन्फ्रेंस में किसी ने पूछा कि क्या आप १९९१ के आम चुनाव में प्रत्याशी होंगे। मेरा उत्तर था कि जो पार्टी का आदेश होगा, उसका पालन करूँगा, पर चूँकि मैं राजनीति में नया आया हूँ, पार्टी में काम करना चाहूँगा। एक शाम को रेडियो पर सुना कि मैं कन्नौज से भाजपा का प्रत्याशी रहूँगा। उस क्षेत्र में मेरा जन्म हुआ था, किंतु मेरा शासकीय लंबा जीवन बाहर ही बीता था। कुछ इस कारण हिचकिचाहट थी, किंतु वाजपेयीजी का कुछ रोज पहले फोन आ चुका था कि उनके यहाँ कन्नौज क्षेत्र के १५-२० भाजपा के कार्यकर्ता बैठे हैं और वे कह रहे हैं कि मुझे प्रत्याशी बनाया जाए, नहीं तो वे स्वयं (वाजपेयीजी) कन्नौज से लोकसभा का चुनाव लड़ें। कुछ देर के बाद कन्नौज से आनेवाले सज्जन मेरे निवास-स्थान पर आए और मुझसे भी आग्रह किया। अतएव मैं जान ही गया था कि पार्टी का निर्णय क्या होने वाला है। लोकसभा चुनाव में सफलता नहीं मिली। नंबर दो पर रहा। मुलायम सिंह का शासन था। समाजवादी प्रत्याशी विजयी घोषित हुआ। दो दिन बाद मैं दिल्ली वापस आया। अगले दिन शाम को वाजपेयीजी बिना पूर्व सूचना के मेरे निवास-स्थान पर पधारे। उन्हें चुनाव संबंधी कुछ जानकारी मिल चुकी थी, मेरे से और कुछ पूछताछ की। अपने पहले चुनाव का किस्सा सुनाकर सांत्वना देने का प्रयास किया। इसे मैं उनका बड़प्पन ही कहूँगा।

सदस्य बनने के उपरांत मैं भाजपा के कार्यालय में प्रायः नित्य जाया करता था। के.आर. मलकानीजी के कमरे में इंटेलेक्चुअल सेल की बैठक होती थी। समाचार-पत्रों के आधार पर विभिन्न विषयों पर विचार-विमर्श होता था। यकायक एक रोज कल्याण सिंहजी, जो उस समय तक उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हो गए थे, मलकानीजी के कमरे में आए और मुझे देखकर कहा कि चतुर्वेदीजी, आपको राज्यसभा (उ.प्र.) में भेजना निश्चित हो गया है। किसी मित्र ने लखनऊ टाइम्स ऑफ इंडिया के संस्करण में प्रकाशित समाचार के आधार पर मुझे दो दिन पहले फोन किया था। उ.प्र. से राज्यसभा के लिए विधिवत् चुना गया। राज्यसभा सदस्य चुने जाने के पहले ही पार्टी अध्यक्ष आडवाणीजी ने मुझे विशेष निमंत्रित सदस्य के रूप में त्रिवेंद्रम में होने वाली भाजपा की कार्यकारिणी में भाग लेने का मौका दिया। इस प्रकार संघटन से परिचय और संबंध दोनों बढ़ते गए। पार्टी की ओर से कई संसदीय समितियों में भी नामित कर दिया गया। कार्यकारिणी की कुछ बैठकों में काफी विवादपूर्ण मुद्दे उठे, मैंने कई बार अपने स्पष्ट विचार प्रकट किए। वाजपेयीजी ने पूरा समय मुझे दिया। बीच-बीच में हस्तक्षेप भी मैंने किए। एक प्रस्ताव पंचायजी राज के विषय में था, जो जल्दी में पारित किया जा रहा था। मैंने उसकी भाषा पर एतराज करते हुए कहा कि भाषा में गलती है और उसके कारण जो आपकी मंशा है, उसके विपरीत अर्थ निकलेंगे। वाजपेयीजी और आडवाणीजी ने पुनः पढ़कर संबंधित मंत्री महोदय को सुधार करने के आदेश दिए। विवादित मुद्दों पर भी मुझे अपने विचार प्रकट करने के अवसर मिलें, वाजपेयीजी ने सदैव यह कोशिश की। यहाँ उन मुद्दों में जाने की कोई आवश्यकता नहीं। मेरे कहने का तात्पर्य यही है कि चाहे मंगलवार वाली संसदीय पार्टी की बैठक हो अथवा कार्यकारिणी की हो, मुझे सदैव अवसर देकर प्रोत्साहित किया। मैंने भी कभी जो बैठक में कहा, उसको बाहर भी प्रकट किया, उसके लिए उनका सदैव कृतज्ञ रहूँगा।

वाजपेयीजी विदेश मंत्रालय की स्थायी समिति के अध्यक्ष थे। मैं भी सदस्य था। कितने सुचारू रूप में बैठकों की काररवाई होती थी, यह ध्यान देने लायक था। यदि कोई विदेश से अतिथि आनेवाला होता तो वाजपेयीजी स्वयं आगाह करते थे, ताकि बैठक में बहस सार्थक रहे। जब वाजपेयीजी प्रधानमंत्री बने, यद्यपि विदेश मामलों की समिति भाजपा के हिस्से में थी, उन्होंने श्री आई.के. गुजराल को अध्यक्ष नियुक्त करने के लिए कहा—गुजरालजी की वरिष्ठता और अनुभव के आधार पर। ऐसी थी वाजपेयीजी की दूरदर्शिता और उदारहृदयता। वे व्यक्ति के गुणों का आदर करना जानते थे। उनमें अपने और पराए का कोई भेदभाव नहीं था।

सरकार ने एक लेबर कमेटी या कमीशन नियुक्त किया यह जाँच करने के लिए कि किन कानूनों के परिवर्तन की जरूरत है, ताकि उद्योगों की गति भी अवरुद्ध न हो और श्रमिकों के हितों की पूर्ति होती रहे। हर पार्टी को अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत करना था। बैठक होने के एक दिवस पूर्व वाजपेयीजी ने कहा कि मुझे पार्टी का दृष्टिकोण प्रस्तुत करने के लिए जाना पड़ेगा। मैंने बहुत कहा कि मुझे इसके विषय की कोई जानकारी नहीं है, कोई ब्रीफिंग नहीं है। वाजपेयीजी ने कहा कि इस समय और कोई विकल्प नहीं है, कोई अन्य जानकार संसद् सदस्य उपलब्ध नहीं है, आप तैयारी कर लें, सब ठीक हो जाएगा। आदेशानुसार जितनी तैयारी संभव थी, सीमित समय में करके पार्टी का दृष्टिकोण प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करने की चेष्टा की। प्रयास सफल रहा। उनके इस प्रकार विश्वास व्यक्त करने के कारण मुझे भी अपने दायित्व के निर्वाह करने में प्रेरणा मिली।

उन्होंने मुझे भारत की ओर से यूनेस्को की अंतरराष्ट्रीय एक्जीक्यूटिव कौंसिल का प्रतिनिधि निर्वाचित होने का अवसर दिया। डॉ. मुरली मनोहर जोशी और यूनेस्को में भारत की राजदूत श्रीमती नीलम को पेरिस की बैठक में अन्य देशों के प्रतिनिधियों से कन्वेसिंग की जिम्मेदारी सौंपी। सफलता मिली। जब मेरी नियुक्ति कर्नाटक के राज्यपाल के रूप में हो गई तो मैंने यूनेस्को की एक्जीक्यूटिव कौंसिल से इस्तीफा देना उचित समझा। चुनाव केबाद यदि किसी कारण स्थान रिक्त हो जाए तो उस देश की सरकार किसी को रिक्त स्थान को भरने का निर्णय ले सकती है। डॉ. एल.एम. सिंघवी मेरे बाद पेरिस स्थित यूनेस्को के सदस्य घोषित किए गए। उन्होंने मुझे नेहरू मेमोरियल और लाइब्रेरी की एक्जीक्यूटिव कौंसिल का अध्यक्ष नामित किया तथा मेमोरियल लाइब्रेरी की सोसाइटी का उपाध्यक्ष, प्रधानमंत्री स्वयं अध्यक्ष थे। वाजपेयीजी के इस प्रकार विश्वास करने से सदस्यों में उत्साह बढ़ता था और दायित्व भाव भी। वाजपेयीजी को प्रधानमंत्री के पद पर रहते समय यदि कभी फोन किया अथवा पत्र लिखा और वे यदि फोन पर तुरंत उपलब्ध न हुए, किंतु उसी दिन या दूसरे दिन अवश्य फोन आता था। ऐसी थी उनकी सदाशयता और संवेदना। व्यवहार में शिष्टाचार उनकी जीवनशैली का अभिन्न अंग था। एक बार उन्हें मैंने पत्र लिखा कि उचित होगा कि पं. भीमसेन जोशी को भी भारत रत्न प्रदान किया जाए। दूसरे दिन प्रातः वाजपेयीजी का मेरे पास फोन आया कि चतुर्वेदीजी, इस बार बड़ा दवाब है और पाँच नाम उन्होंने गिनाए, जिनके लिए अलग महानुभावों और राज्यों से सुझाव आए थे। उस वर्ष भारत रत्न की कोई घोषणा नहीं हुई, किंतु अगले वर्ष पं. भीमसेन जोशी भारत रत्न से अलंकृत हुए।

एक प्रकरण राज्यसभा का है, जिसकी चर्चा करना चाहूँगा। प्रधानमंत्री श्री वाजपेयी ने स्वयं विदेश नीति के संबंध में एक महत्त्वपूर्ण बयान दिया। राज्यसभा में स्वयं दिए हुए बयान पर स्पष्टीकरण के रूप में सदस्य प्रश्न कर सकते हैं। श्री नटवरसिंह, जो विदेश सेवा में रहे थे तथा विदेश मंत्रालय में राज्यमंत्री भी रह चुके थे, प्रश्न करते और स्पष्टीकरण माँगते हुए कुछ कटु और अनावश्यक वचन कह गए। सदस्य उद्वेलित हुए। वाजपेयीजी ने उन्हें शांत रहने को कहा। उत्तर देने के लिए जब वाजपेयीजी उठे, नटवरसिंह को संबोधित करते हुए पहले उन्होंने कहा, ‘नटवर सिंहजी, परमात्मा ने थोड़ी-बहुत अक्ल दूसरों को भी दी है।’ बस फिर क्या था, पूरा सदन हँसी से गूँजने लगा। नटवरसिंह पर मानो घड़ों पानी पड़ गया। वे सकपका गए। फिर वाजपेयीजी ने सिलसिलेवार अत्यंत शांत भाव से जो मुद्दे नटवर सिंह ने उठाए, उनका स्पष्टीकरण दिया। संसद् का वे बहुत आदर करते थे। राज्यसभा में प्रश्नोत्तर काल में भी वे प्रायः आते थे। मुझे कभी-कभी आश्चर्य होता था, जब वे वैज्ञानिक विषयों पर संसद् में अथवा संसदीय समिति में कुछ कहते थे। पिछले दिनों उनके वैज्ञानिक विषयों पर डॉ. पवन सिक्का द्वारा संपादित उनके भाषणों का एक संकलन उप्पल प्रकाशक दरियागंज द्वारा प्रकाशित हुआ, उसे देखने का अवसर मिला और यह आभास हुआ कि अणुबम की समस्या तथा वैज्ञानिक विषयों पर उन्होंने कितना चिंतन किया था और इसमें वाजपेयीजी की कैसी गहरी पैठ हो गई थी। इसीलिए विदेश मामलों की स्थायी समिति की एक बैठक में एक विशिष्ट अतिथि की शंकाओं का निराकरण किस खूबी और आत्मविश्वास के साथ किया, इसका कुछ एहसास हो सका। संसद् की हर काररवाई को वे सदैव बड़ी गंभीरता से लेते थे।

डॉ. सिक्का जब वाजपेयीजी प्रधानमंत्री थे, उस समय विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय में परामर्शदाता थे। पुस्तक का नाम है ‘अटल बिहारी वाजपेयी—ड्रीम फॉर प्रासपेरस इंडिया साइंस ऐंड टेक्नोलॉजी इन नेशन बिल्डिंग’ अथवा ‘विज्ञान और प्रौद्योगिकी की राष्ट्र निर्माण में भूमिका’। वाजपेयीजी ने लालबहादुरजी के जय जवान, जय किसान के नारे में जय विज्ञान भी जोड़ा। पुस्तक को पढ़ने से वाजपेयीजी के उस गहन अध्ययन, निष्ठा और अभिरुचि का पता चलता है कि वे किस प्रकार विज्ञान और प्रौद्योगिकी को राष्ट्र-निर्माण और देश के हर व्यक्ति के कल्याण हेतु केंद्रित करना चाहते थे।

कभी-कभी वाजपेयीजी के संसदीय कमरे में अनौपचारिक बैठक होती थी और कुछ सदस्य उपस्थित रहते थे। कभी-कभी हलकी-फुलकी बातें हो जाती थी एक रोज श्री सिकंदर बख्त ने आते ही वाजपेयीजी से कहा कि समाचार-पत्रों में फोटो छपी है, जिसमें आप और सोनियाजी सेंट्रल हॉल में बैठे कुछ गंभीर बातचीत कर रहे हैं। क्या बातें हो रही थीं? वाजपेयी ने कहा, ‘अरे भाई, कुछ नहीं, ऐसे ही शिष्टाचार की बातें।’ पर लोग माने नहीं। जसवंत सिंह भी थे, उन्होंने भी जोर दिया। तब वाजपेयीजी ने बिना सिर उठाए, मुसकराते हुए कहा, ‘‘मेरे अँगने में तुम्हारा क्या काम है।’’ हँसी के फव्वारे फूटने लगे।

ऐसे ही एक बार जब ईरान के तत्कालीन शहंशाह रजाशाह पहलवी और उनकी महारानी सुरैया भारत आए थे। महारानी सुरैया विश्व की अत्यंत सुंदर महिलाओं में गिनी जाती थीं। एक आयोजन में वाजपेयीजी की फोटो छपी थी महारानी सुरैया से हाथ मिलाते हुए। सिकंदर बख्त साहब ने इस बार कहा कि अटलजी, आप किस्मतवाले हैं। मैं आपका हाथ चूमना चाहता हूँ। वाजपेयीजी ने कहा कि यह नहीं हो सकता। एक वही यादगार बाकी है, मैंने तो दाहिना हाथ जेब में रखा हुआ है। सब जोरों से हँसने लगे। ऐसी चुहलबाजी कभी-कभी होती थी। हाजिरजवाबी या प्रत्युत्पन्नमति में उनकी बराबरी का मिलना कठिन है। एक बड़ी रेलवे दुर्घटना के बाद जगजीवन रामजी स्वयं कभी-कभी दोहराया करते थे, जो वाजपेयीजी ने कहा था। बाबू जगजीवन राम उस समय रेल मंत्री थे। हताहतों के संदर्भ में लोकसभा में बोलते हुए वाजपेयीजी ने कहा था कि ‘जग से गए, जीवन से हाथ धोया और राम भी नहीं मिले।’ शब्दों से उनका खिलवाड़ अकसर जनता के मनोरंजन का विषय बन जाता था।

२००८ में वाजपेयीजी के विषय में प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने कहा था कि ‘वे भारतीय राजनीति के भीष्म पितामह हैं।’ उनके निधन के बाद बहुतों ने उन्हें अजातशत्रु की संज्ञा दी। आज भी विपक्ष के सदस्य कहते हैं, ‘वाजपेयीजी की बात और थी।’ किसी भी दल का व्यक्ति हो, उसके दिल में वाजपेयीजी के लिए स्नेह और आदर की भावना थी। मुझे दो आयोजनों का समरण है। चंद्रशेखर तो सदैव उनको ‘गुरु’ कहकर संबोधित करते थे। श्री रामबहादुर राय द्वारा संपादित चंद्रशेखरजी के विषय में पुस्तकें और उनके द्वारा लिखित जेल डायरी आदि किताबों का लोकार्पण वाजपेयीजी ने किया। बहुत देर तक बड़े हँसी-मजाक के वातावरण में आयोजन संपन्न हुआ। उधर जब वाजपेयीजी के अभिन्न मित्र श्री एन.एम. घटाटे ने वाजपेयीजी के भाषणों का सकलन, संसद् में वाजपेयीजी के चार दशक अथवा ‘फोर डिकेडस इन पार्लियामेंट’ (तीन भाग) के विमोचन का आयोजन किया, तो मुख्य अतिथि थे कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता और उस समय के लोकसभा के स्पीकर श्री एल.के. पाटिल। ग्रंथों का लोकार्पण करते हुए उन्होंने अत्यंत भावभीने शब्दों में कहा कि जब वे हैदराबाद में विद्यार्थी थे, वो हर बार वाजपेयीजी को सुनने को आतुर रहते थे। उनके व्यक्तित्व, उनके व्यवहार और वाणी की उन्होंने भूरि-भूरि प्रशंसा की। हर दृष्टि से ‘अजातशत्रु’ शब्द उनके संबंध में औपचारिक नहीं, सार्थक और सर्वमान्य है।

एक व्यक्तिगत प्रसंग को अवश्य कहना चाहूँगा, वाजपेयीजी की कृपा से ही मुझे कर्नाटक के राज्यपाल पद पर जाना पड़ा। आडवाणीजी ने एक रोज तीसरे पहर अपने संसदीय ऑफिस से फोन पर पूछा कि आप कहाँ हैं? मैंने कहा कि मैं घर से बोल रहा हूँ, आवश्यक हो तो आज संसद् भवन आ जाऊँगा। उन्होंने बात आगे बढ़ाते हुए कहा कि हम आपको कर्नाटक भेजना चाहते हैं। मुख्यमंत्री को कई नाम सुझाए, पर वे सहमत नहीं हुए। उस समय सी.एम. कृष्णा कर्नाटक के मुख्यमंत्री थे। हमारी कोशिश है कि राज्यपाल की नियुक्ति जहाँ तक हो सके, सहमति से हो। जब आपका नाम लिया तो वे तुरंत सहमत हो गए। मैंने आडवाणीजी को कहा कि मैं राज्यपाल के पद की महत्ता जानता हूँ, कभी आकांक्षा भी थी, पर जैसा आडवाणीजी को स्वयं मालूम था, मैंने प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंहजी से असमर्थता प्रकट की थी, जब वे पहले जम्मू और कश्मीर तथा बाद में पंजाब के राज्यपाल के पद के लिए मुझे कह चुके थे। मैंने क्षमा माँगते हुए निवेदन किया था कि पत्नी के देहांत के बाद मैं अपनी पुत्री और कनिष्ठ पुत्र के साथ अब दिल्ली में ही रहना चाहता हूँ, कहीं बाहर किसी पद पर जाने की इच्छा नहीं है। चंद्रशेखरजी जब प्रधानमंत्री हुए, तब उन्होंने बुलाकर कहा कि वे मेरा उपयोग गुजरात अथवा उड़ीसा में राज्यपाल के पद पर करना चाहते हैं। उनसे भी क्षमा-याचना करते हुए मैंने अपनी असमर्थता और अनिच्छा के कारण बता दिए। चूँकि मैं सीएजी के पद से निवृत्त हो चुका था, मैंने निवेदन किया कि दिल्ली में यदि कोई कार्य दे सकें तो आवश्य करूँगा। उनका कार्यकाल बहुत कम समय का था, और अब तक मैं भाजपा में सम्मिलित हो चुका था। आडवाणीजी ने कहा कि सोच लीजिए, हम मिलकर बात करेंगे। मंगलवार को होनेवाली अगली संसदीय बैठक के अंत में आडवाणीजी ने इशारे से मुझे रुकने को कहा। आडवाणीजी के आदेश से मैं रुक गया। दूसरी तरफ से प्रधानमंत्री वाजपेयीजी आ गए। कुछ लोग मिलनेवाले थे, उनके तथा सुरक्षा कर्मचारियों के दूर जाने के बाद पार्लियामेंट की एनेक्सी में प्रधानमंत्री वाजपेयीजी व गृहमंत्री आडवाणीजी एक बेंच पर बैठ गए। मुझे भी बैठने को कहा। आडवाणीजी ने पुनः कर्नाटक की बात शुरू की। वाजपेयीजी ने कहा, ‘बहुत सोच-समझकर हम लोगों ने आपका नाम तय किया है।’ मैंने असमर्थता के अपने व्यक्तिगत कारण पुनः दोहरा दिए। मैंने यह भी कहा कि मेरे राज्यसभा की सदस्यता के दो साल बाकी हैं, तीसरे कार्यकाल की आकांक्षा नहीं है, दिल्ली में परिवार के साथ रहना चाहता हूँ। प्रधानमंत्री वाजपेयी ने कहा कि ‘आपकी बात ठीक है, किंतु कभी-कभी पार्टी की आवश्यकता को, व्यक्तिगत कठिनाई के होते हुए भी, अधिक महत्त्व देना पड़ता है।’ मुझे कुछ उत्तर नहीं सूझा और कह दिया कि आपका आदेश शिरोधार्य है। वाजपेयीजी का बात कहने का अपना ही तरीका था। अपनी बात मनवा लेने की उनकी क्षमता और कला अद्भुत थी। किसी के लिए उनकी बात को न मानना आसान नहीं था। मैं तो केवल यही कह सकता हूँ कि वाजपेयीजी और आडवाणीजी ने मुझे इस योग्य समझा, यह उनकी उदारता और अनुकंपा ही थी। भाजपा में मैंने आडवाणीजी और वाजपेयीजी को एक-दूसरे के पूरक के रूप में देखा। कर्नाटक जाने के पहले प्रधानमंत्री से मिलने गया और पूछा कि मेरे लिये कोई आदेश है। हँसते हुए उन्होंने कहा कि आप सब जानते हैं, क्या बताना है। यह उनके विश्वास का ही परिचायक है। वाजपेयीजी और आडवाणीजी का कई बार बंगलौर (अब बंगलुरु) आना हुआ। पूरे कार्यकाल में मेरे ऊपर किसी मामले में कोई दबाव नहीं पड़ा। मैंने निर्णय लेने के पहले कभी भारत सरकार से परामर्श नहीं किया। कई पेचीदा समस्याएँ आईं, मैंने अपने सीमित विवेक से निर्णय लिये, संविधान के अनुसार जैसा राज्यपाल से अपेक्षित है। अगस्त २००७ में पद छोड़ने के बाद वाजपेयीजी से मिलने उनके निवास-स्थान पर गया। सत्ता-परिवर्तन हो चुका था, कुछ अस्वस्थ होते हुए भी उन्होंने बड़ी आत्मीयता से बातचीत की, मेरे कार्यकाल की सराहना उदारतापूर्वक की। यह मेरे लिए संतोष का विषय था।

प्रायः समवयस्क और समकालीन होते हुए कभी भी मैं उन्हें ‘अटलजी’ कहकर संबोधित नहीं कर सका। मेरे हृदय-पटल पर उनके व्यक्तित्व की ऐसी छाप थी। उनके प्रति ऐसी श्रद्धा थी, इस आलेख में भी मैंने उसी परिपाटी का पालन किया है। वाजपेयीजी के गोलोकवास के उपरांत अपनी श्रद्धांजलि मैं पहले भी कुछ निवेदन इस स्तंभ में कर चुका हूँ। वाजपेयीजी की सुखद स्मृति आजीवन साथ रहेगी।

(त्रिलोकीनाथ चतुर्वेदी)

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