मेरी दीवाली तो आज ही है

मेरी दीवाली तो आज ही है

उसका नाम था लावनी। छोटी, बहुत छोटी थी लावनी। होगी कोई सात-आठ बरस की। पर कभी-कभी उसे लगता, भगवान् ने उससे सारी खुशियाँ छीन ली हैं। और यह सोचते ही उसका चेहरा उदास हो जाता। पर फिर अगले ही पल उसे अम्माँ के लाड़-प्यार की याद आती तो वह धीरे से कहती, ‘‘अरे, मैं भी कैसी बुद्धू हूँ। अम्माँ हैं न! मुझे इतना लाड़ करनेवाली अम्माँ। एक पल भी वे मेरे बिना नहीं रह पातीं। तो फिर भला मुझे किस चीज की कमी है?’’

फिर वह झटपट अम्माँ के पास जाकर बातें करने लगती। कहती, ‘‘अम्माँ, अबकी दीवाली आएगी तो तुम दीये जलाना। बहुत सारे दीये। ठीक है न, अम्माँ? मैं देख नहीं पाती तो क्या, मुझे खुशी तो होगी। बहुत-बहुत खुशी।’’

‘‘हाँ, लावनी, जलाऊँगी, जरूर जलाऊँगी। बहुत सारे दीये, तेरे लिए! ताकि तेरे चेहरे पर मुसकान आए।’’ कहकर लाड़ से लावनी की माँ उसका मुख चूम लेतीं और अपने काम में लग जातीं।

पर लावनी को चैन कहाँ! उसके भीतर जो कुछ चल रहा है, वह अम्माँ से न कहे तो किससे कहे?

‘‘आपने मेरा नाम लावनी क्यों रखा?’’ अम्माँ का आँचल खींचते हुए वह पूछती, ‘‘ऐसा नाम तो अम्माँ, मैंने किसी का नहीं सुना।’’

‘‘लावनी तो उसे कहते हैं, जो सुंदर हो। भला तेरे जैसा सुंदर कोई और है? एकदम दीये की लौ की तरह। सुंदर-सुंदर, जगमग करती। तो भला लावनी नाम किसी और का कैसे होता?’’ अम्माँ हँसकर कहतीं, ‘‘मेरी लावनी तो तू ही है, सारी दुनिया में अकेली, और चाँदनी जैसे सुंदर!’’ कहते-कहते अम्माँ उसे अपने आँचल में समेट लेतीं।

लावनी का दिल भीतर-भीतर उमगने लगता। कहती, ‘‘सचमुच अम्माँ, मैं ऐसी ही हूँ? बहुत सुंदर! पर सहेलियाँ तो...?’’ और वाक्य पूरा करने से पहले ही उसकी आँखों से टप-टप आँसुओं की बारिश शुरू हो जाती।

गायत्री अम्माँ जानती थी उसका दुःख। उसे प्यार से गोद में बैठाकर सिर पर प्यार से हाथ फेरती हुई कहतीं, ‘‘पगली रोती है? तेरे पास भला क्या नहीं है। बस आँखें ही तो नहीं हैं न! पर इससे क्या होता है। तेरे पास मन की आँखें जो हैं। कैसी उज्ज्वल आँखें, मोती जैसी। दीये जैसी। उनमें सारी दुनिया के लिए प्यार है। इतनी सुंदर आँखें भगवान् ने तुझे दी हैं तो फिर रोती क्यों है?’’

फिर उसे प्यार से भरकर छाती से लगा लेतीं। कहतीं, ‘‘और फिर कितना सुंदर तू गाती है, ‘श्रीरामचंद्र, कृपालु भज मन...!’ भला कोई गा सकता है और? उस दिन मुरली काका कितनी तारीफ कर रहे थे कि लावनी, तू गाती है तो लगता है, भगवान् रामचंद्रजी सीता मैया और लक्षमणजी के साथ सामने आ खड़े हुए हैं, हाथ में धनुष-बाण लिये। एकदम साकार दिखाई देने लगते हैं।’’

अम्माँ की बातों से लावनी को कुछ तसल्ली मिलती तो वह कहती, ‘‘अम्माँ, आपने उस दिन आधी कहानी ही सुनाई थी न, कि कैसे सीताजी के खो जाने पर वन में भटकते हुए राम और लक्ष्मणजी को हनुमानजी मिल गए और वे सुग्रीव के पास पहुँचे। आज आगे की कथा मैं जरूर सुनूँगी। और हाँ अम्माँ, समुद्र पर बाँध कैसे बनाया उन्होंने? समुद्र तो बहुत बड़ा होता है न! और फिर रावण को भी मारा...’’

‘‘सुनाऊँगी, बेटी, जरूर सुनाऊँगी रामचंद्रजी और सीता मैया की कहानी। पर पहले रसोई का थोड़ा काम निबटा लूँ, फिर आती हूँ। दीवाली आ रही है, तो घर में एकाध मीठा पकवान तो बनना चाहिए न। तेरे लिए खोए के लड्डू बना लेती हूँ। तब तक तू एकाध मीरा का पद गा न। मैं वहीं रसोई में बैठी-बैठी सुनती रहूँगी।’’

और माँ के जाते ही लावनी गुन-सुन करके धीरे-धीरे गाने लगती, ‘‘मैंने राम रतन धन पायो री...!’’

रसोई में मीठे पकवान बनाती गायत्री अम्माँ का दिल कभी खुशी से उमगता तो कभी अचानक डूबने लगता, ‘हे राम, कितनी लंबी जिंदगी है। भला कैसे काटेगी लावनी?’’ लावनी की सहेलियाँ किस तरह बात-बात में उसका मजाक उड़ाती हैं, यह तो खुद उन्होंने भी देखा-सुना है। बेचारी नन्हीं-सी लावनी कैसे यह सब सह पाती होगी?’ सोचकर उनकी आँखें गीली हो गईं। पर उन्होंने चुपके से पोंछ लिया और ध्यान से सुनने लगीं बेटी का सुरीला गीत, ‘मैंने राम रतन धन पायो री...!’

‘ओह, गला कितना मीठा है लावनी का। अपने पड़ोस के मुरली काका यों ही कोई प्रशंसा थोड़े ही करते हैं। अभी कल ही कह रहे थे कि लावनी का गाना दो मिनट भी सुन लो तो लगता है, सचमुच प्रभुजी से दिल का सुर मिल गया।’ सोचते हुए अम्माँ बेटी पर जैसे रीझ-सी गईं।

अम्माँ जानती थीं कि उसके भीतर रात-दिन कौन-सा दर्द, कौन-सी ज्वाला जलती है। कुछ बरस पहले चेचक के कारण लावनी की दोनों आँखें चली गई थीं और उसकी जिंदगी में अँधेरा, एकदम अँधेरा हो गया था। कुछ लोग कहते हैं, अगर सही इलाज होता और समय पर होता, तो उसकी आँखें बच सकती थीं। पर भला कहाँ से इतने पैसे लातीं गायत्री अम्माँ?

आँखें चली जाने से लावनी पर दुःख का पहाड़ टूट पड़ा। पर इससे भी ज्यादा दुःख उसे इस बात का था कि उसकी पढ़ाई अधबीच ही खत्म हो गई थी। बेटी का दिल बहलाने के लिए अम्माँ उसे नई से नई कहानियाँ सुनातीं, गीत और भजन याद करातीं। उसे बातों-बातों में जमाने भर के बारे में बतातीं। सुनकर लावनी उत्साह से भर जाती। सोचती, ‘मैं भी बड़ी होकर कुछ बनूँगी।’

* * * * *

फिर एक दिन लावनी को मुरली काका ने आकर बताया कि बेलापुर में संगीत की दुनिया के महान् गुरु देवलालीकरजी आ रहे हैं। वे पास ही सितारपुर गाँव में अपना आश्रम बनाकर रहते हैं। बच्चों को संगीत की शिक्षा देते हैं। शहर के गाँधी आश्रम में वे ठहरेंगे। सुनकर उसे लगा कि उसके भीतर कोई है, जो पुकार-पुकारकर कह रहा है, ‘‘लावनी, अब तेरे दुख कटेंगे...जल्दी!’’

देवलालीकरजी कोई मामूली आदमी नहीं थे। उन्हें बेलापुर और आसपास के लोग दूसरा गाँधी कहकर पुकारते थे। दूर-दूर तक उनका नाम था। उनका संगीत धरती का संगीत था, जो लोगों के दिलों में कुछ करने की प्रेरणा जगा देता।

उसी रात माँ ने लावनी को देवलालीकरजी की पूरी जीवन-कथा सुनाई। उन्होंने बताया कि ‘‘बेटा, स्वाधीनता संग्राम में भाग लेने के कारण देवलालीकरजी ने बहुत कष्ट झेले हैं। अच्छी-खासी आराम की सरकारी नौकरी थी, ऊँचे अफसर थे। पर गाँधीजी के आह्वान पर उसे लात मारकर गाँव-गाँव घूमते रहे। अब बच्चों को संगीत सिखाने का स्कूल खोला है उन्होंने, पर कोई फीस नहीं लेते!’’

लावनी ने सुना तो जैसे उसकी आत्मा के भीतर कोई प्रकाश-सा हुआ। बोली, ‘‘अम्माँ, मैं उनसे संगीत सीखूँगी।’’

और अगले दिन लावनी मुरली काका के साथ देवलालीकरजी के पास जा पहुँची। थोड़ा डरते-डरते गई और पास जाकर खड़ी हो गई। उसके मुँह से कुछ बोल निकले ही नहीं।

देवलालीकरजी ने बड़े कौतुक से लावनी को देखा, फिर बोले, ‘‘तू गाती है न! मेरा मन कहता है, तू जरूर अच्छा गाती होगी। सुना, अपनी पसंद का कोई गीत सुना दे।’’

लावनी का सबसे प्रिय गीत था, ‘श्रीरामचंद्र कृपालु भज मन...!’ उसने उसी को सुनाना शुरू किया। सुनते हुए देवलालीकरजी की आँखें मुँद गईं, मुँदती चली गईं। कुछ देर बाद उनकी समाधि टूटी, तो वे लावनी के सिर पर हाथ फेरते हुए बोले, ‘‘देख, मैंने कहा था न, कहा था न...!’’

उसी दिन से लावनी की पढ़ाई शुरू हुई। देवलालीकरजी के स्कूल में मिलनेवाली संगीत शिक्षा ने उसके स्वर को निखारा। धीरे-धीरे वह इतना अच्छा गाने लगी कि दूर-दूर तक मशहूर हो गई। लोग कहते, ‘‘एक अंधी गायिका है। बड़ा ही अनोखा गाती है। जब वह गाती है, तो पत्थर भी पिघलने लगते हैं!’’

रात को अकसर उसके गानों की आवाज आती। लोग एक-दूसरे से कहते, ‘‘देखो-देखो, लावनी गा रही है। सुनते हो उसके गानों की आवाज?’’

एक दिन देवलालीकरजी ने उसे पास बैठाकर आशीर्वाद देते हुए कहा, ‘‘बस लावनी, तेरी शिक्षा पूरी हुई। अब तू किसी भी बड़ी से बड़ी सभा में निडर होकर गा सकती है। तू जहाँ भी गाएगी, वहीं संगीत का झरना बह उठेगा।’’

और कुछ दिनों बाद ही ऐसा अवसर भी आ गया। सारे देश में आजादी का अलख जगाते घूम रहे महात्मा गांधी बेलापुर में भी आए। बापू के सम्मान में देवलालीकरजी ने एक बड़े सम्मेलन का आयोजन किया। दूर-दूर लोग वहाँ आए। हजारों लोगों की भीड़। उनमें गाँव के अनपढ़ देहाती थे तो शहर के पढ़े-लिखे वकील, अध्यापक और दूसरे लोग भी। बूढ़े, बच्चे, स्त्रियाँ सभी। हर कोई बापू की एक झलक देख लेना चाहता था। मंच पर बापू के साथ-साथ देवलालीकरजी भी मौजूद थे। लोग सुनने के लिए बेताब थे, भला गांधीजी क्या कहते हैं।

देवलालीकरजी ने जब बोलने के लिए गांधीजी का नाम पुकारा, तो उन्होंने हँसते हुए कहा, ‘‘मैं भाषण तब दूँगा, जब आप...‘वैष्णव जन तो तेणे कहिए रे, जे पीर पराई जाणे रे’ वाला गीत मुझे सुनाएँगे।’’

देवलालीकरजी विनम्रता से बोले, ‘‘वैष्णव जनवाला गीत तो आप सुनेंगे बापू, पर वह मैं नहीं, मेरी शिष्या लावनी सुनाएगी। और यकीन मानिए, वह मुझसे ज्यादा अच्छा गाती है।’’

सुनकर बापू ही नहीं, हर कोई हैरान।

सभा में हजारों लोगों की भीड़ थी। बड़े-बड़े उस्ताद संगीतकार भी वहाँ गाने का हौसला न कर पाते। लावनी ने डरते-डरते गाना शुरू किया। पर गाना शुरू करते ही उसे लगा, उसके अंदर कोई अनोखी शक्ति आ गई है। और देखते-ही-देखते उसके सुरों का जादू हजारों लोगों को रसमग्न करने लगा। पूरी सभा जैसे आनंद-विभोर थी। सचमुच वहाँ संगीत का झरना बह उठा था।

जितनी देर लावनी गाती रही, ऐसा सन्नाटा था, जैसे किसी ने मंत्र की शक्ति से सबको बाँध दिया हो। किसी के हिलने और साँस लेने की भी आवाज नहीं आ रही थी। लावनी के सुरों में सबको अपने दिल का संगीत सुनाई दे रहा था। जब लावनी पूरा गीत गाकर रुकी, तो गुरुजी ने इशारा किया और अब लावनी गा रही थी, ‘श्रीरामचंद्र कृपालु भज मन...!’ और उसके बाद फौरन बाद, ‘वंदे मातरम्...!’

पूरी सभा जैसे लावनी के गीत के सुरों पर बह रही थी। और मंच के बीच में बैठे बापू की तो जैसे समाधि ही लग गई हो। बीच-बीच में धीरे से आनंदमग्न होकर सिर हिलाने लगते। लग रहा था, बापू आज बोलने नहीं, बस सुनने ही आए हैं।

* * * * *

वंदेमातरम् के बाद देवलालीकरजी ने फिर बापू से कुछ बोलने का आग्रह किया। बापू उठे। बोले, ‘‘मैं तो कुछ और ही सोचकर आया था। पर इस नन्हीं बच्ची के गायन ने वह सब भुला ही दिया। लग रहा था, सामने मानो सरस्वती ही बैठी हुई गा रही है। वैष्णव जन में सबके लिए प्यार और हमदर्दी की भावना है तो ‘रामचंद्र कृपालु भज मन’ सुनकर मन उन राम की शरण में चला जाता है, जो हर किसी को हिम्मत और हौसला देते हैं। और जब ‘वंदेमातरम्’ गा रही थी यह बच्ची तो मुझे लग रहा था, हमारी मातृभूमि भी तो जगजननी सीता ही है, जो आज कष्टों में है। सीता का उद्धार हुए बिना भला हमारे दिलों को चैन कहाँ पड़ेगा?’’

बापू एक क्षण के लिए रुके। सामने उपस्थित लोगों पर एक नजर डाली। फिर प्यार से लावनी की ओर देखते हुए बोले, ‘‘कितना कमाल है कि भक्ति, वैराग्य और देशप्रेम ये तीनों सुर इस छोटी-सी बच्ची लावनी के संगीत में ढलकर एक हो गए। बच्ची छोटी-सी है, पर इसके सुर बड़े हैं। अगाध समुद्र की तरह। लगा, चारों ओर झिलमिल-झिलमिल रोशनी हो रही है, और हजारों दीये एक साथ जल उठे हैं।...कितना सुंदर है इस बच्ची का गायन। मेरा आशीर्वाद है कि लावनी बड़ी होकर बड़ी संगीतकार बने। देश के लिए गाए और हजारों-लाखों दिलों को प्रकाशित करे।’’

और लावनी...! बापू जब बोल रहे थे, तो उसे लगा कि उसके दिल में सचमुच राम-सीता आकर बस गए हैं और उनके चारों ओर अनगिनत दीये झिलमल-झिलमिल करते हुए प्रकाश बिखेर रहे हैं।

तभी उसे गुरु देवलालीकरजी की आवाज सुनाई दी, ‘‘उठो बेटी, देखो बापू तुम्हें आशीर्वाद दे रहे हैं।’’ लावनी एकाएक उठ खड़ी हुई। बापू पास खड़े उसी से कह रहे थे, ‘‘आँखें नहीं हैं, तो दुःखी मत होना बेटी। दो आँखें नहीं हैं तो क्या हुआ? तुम्हारे भीतर झिलमिल-झिलमिल करते इतने सारे दीये तुम्हारी हजारों आँखें ही तो हैं, जो तुम्हें रास्ता दिखाएँगी और कभी भटकने नहीं देंगी।’’

कुछ देर बाद लावनी माँ के साथ वापस लौट रही थी, तो उसके भीतर खुशी समा नहीं रही थी। बोली, ‘‘माँ...माँ, आज बापू का आशीर्वाद मिल गया। अब तो लगता है, मैं जरूर अच्छी गायिका बन जाऊँगी। बड़ी होकर मैं बहुत गाऊँगी माँ, बहुत!’’

‘‘हाँ बेटी गाना, जरूर गाना।’ बेटी को खुश देखकर गायत्री अम्माँ की खुशी का भी कोई ओर-छोर नहीं था। मन में उमगते उत्साह के साथ बोलीं, ‘‘दीवाली तीन दिन बाद है बेटी। पर मेरी दीवाली तो आज ही है, जब तुझे इतना खुश देखा है। घर जाकर मैं तो आज ही दीये जलाऊँगी।’’

लावनी खुश होकर बोली, ‘‘जलाना माँ, और मैं भी उन्हें देख लूँगी। सच्ची-मुच्ची। सचमुच मेरे अंदर की आँखें खुल गई हैं।’’

लावनी जब यह कह रही थी, अम्माँ ने मन-ही-मन उसकी बलैयाँ लेते हुए कहा, ‘‘ऐसी बेटी तो भगवान् सबको दे, जिसकी बातों से मन में दीये जलते हैं।’’

५४५ सेक्टर-२९, फरीदाबाद-१२१००८ (हरियाणा)
दूरभाष: ०९८१०६०२३२७
—प्रकाश मनु

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