निमाड़ की पारंपरिक दीवाली

पर्व और उत्सवों की प्रकृति नदी के जल जैसी होती है, वे कुछ पीछे छोड़ते हैं, कुछ नया लेते रहते हैं। पर्व का वैशिष्ट्य तो तब है, जब वह सबके लिए हो, सबके हित में हो और सार्वकालिक हो, चिरायु होता है, और सबको आनंदोल्लास देता है। दीवाली इन सभी कारकों के आयामों की पूर्ति करती है। दीपोत्सव दीर्घकाल से चला आ रहा है। जैसे सूर्य सबको समान प्रकाश देता है, वैसे ही यह पर्व भी सबको समान ज्योति-प्रकाश देता है, सबका अंधकार दूर करता है, चाहे फिर वह अंधकार अज्ञानता का हो, दरिद्रता का हो, वैमनस्यता का हो, अकर्मण्यता का हो या किसी का भी हो। इस पर्व से समाज के सभी वर्गों का सरोकार रहता है। सबको ज्योति के दर्शन होते हैं। चाहे वह ज्ञान की ज्योति हो, सौहार्द की ज्योति हो, संपन्नता और सद्भाव की ज्योति हो, आजीविका की ज्योति हो, समरसता की ज्योति हो, चाहे माटी के दीये की ज्योति हो, यह सब दीवाली पर्व को मनाने की परंपरा के मूल से जुड़ा दिखता है। दीवाली का मुख्य केंद्र है, नेह और नेह से भरा गाढ़ी का नन्हा सा दीपक तथा बाती। प्रकाश पर्व का यह दीया कितने ही जीवों की आजीविका का साधन है।

कुम्हार को लगता है, यह पर्व मेरा ही है और मात्र मेरा ही है। यह पर्व मुझसे ही प्रारंभ होता है। मेरे बिना तो दीवाली दीवाली ही नहीं। मैं दीये गढ़ूँगा, तभी तो वे टिम-टिम कर जलेंगे। शरीर की कल्पना दीपक से की जाती है। कुम्हार कहता है, ‘‘शरीर नहीं तो आत्मा कहाँ रहेगी। शेष सब क्रियाएँ तो गौण हैं।’’ दीये के साथ ही वह छोटे-छोटे घड़े और ग्वालन भी गढ़ता है। पूजा के समय उनमें नवान्न भरकर लक्ष्मीजी के समक्ष रखे जाते हैं। वह दूध की दुतलियाँ भी गढ़ता है, जो गोवर्धन पड़वा के दिन भगवान् के प्रसाद के लिए दूध से भर दी जाती हैं।

तेली को लगता है, ‘‘यह पर्व मेरा है, मैं ही तो तिली-फली के दानों से तेल निकालता हूँ। जो दीपक और बाती को सार्थक कर देता है। नेह ही तो दीपक में प्राण भरता है। नेह ही तो समाज का नैतिक संबल है, जो लोगों में स्नेह की जोत जलाए रखता है।

निमाड़ का किसान खुशहाल है। किसानों को लगता है, ‘‘मेरी खेती ने खरीब का अन्न उगला है ज्वार, मूँग, चावल, मूँगफली, उड़द, कपास आदि। मेरे द्वारा उपजाया अन्न-फली-कपास दीवाली की अन्न लक्ष्मी है। कपास की बाती फली के तेल और दीपक के साथ मिलकर प्रज्वलित होकर अंधकार को दूर करने का प्रण करती है।’’ किसान को लगता है, नवान्नागमन का ही तो पर्व है दीवाली। गोवंश द्वादशी यानी बजबारस के दिन गाय-बछड़े की पूजा कर उन्हें चवला-ज्वार खिलाया जाता है। और रसोई में भी इसी अनाज का भोजन बनाकर सबको खिलाया जाता है। इसीलिए किसान को इस पर्व के साथ निजता का आभास होता है, आत्मीय का बोध होता है।

इमरात अर्थात् बसोड़, ‘झाड़ू बुनकर’ को लगता है, ‘‘इस पर्व का मुख्य बिंदु तो मैं ही हूँ। हम झाड़ू बनाते हैं, दीवाली आगमन का सर्वप्रथम उपक्रम तो हमसे ही प्रारंभ होता है, लक्ष्मीजी तो शुचिता, स्वच्छता, शुद्धता और पवित्रता प्रेमी है। मेरी झाड़ू से ही दीवाली की तैयारियाँ शुरू होती हैं। घर की स्वच्छता के लिए कार्यारंभ ही दीवाली आगमन की सूचना शुभ है। मैं ही तो विषैले, कँटीले जंगल से बेतरतीब सिंध की टहनियों को लाकर सुंदर और मुलायम रूपायित करता हूँ। तब धन की देवी लक्ष्मी के साथ गृहस्वामी मेरे द्वारा बनाई गई झाड़ू की पूजा करता है। झाड़ू बरकत का एक प्रतीक है। इसीलिए दीवाली की तैयारी में सबसे पहले अप्रत्यक्ष रूप से मैं ही स्मृत रहता हूँ।’’

सामान्य धारणा तो यही है कि दीवाली वणिक और व्यापारियों का ही त्योहार है, तिजोरियों के खनखनाने का त्योहार है। वर्षोपरांत नदी-नालों ने अपनी ऊपरी सीमाएँ बाँध लीं। सभी मार्ग यातायात के लिए सुलभ हो गए। फसलें पक-पककर घर में आ गईं। घर में अन्न धन के अंबार लग गए। व्यापार लेन-देन के लिए और क्रय-विक्रय के लिए बाजार खुल गए। अच्छी फसलों के आने से व्यापारियों को अपनी उधारी का धन मिलने की आशा जाग उठती है। वणिक खाता-बही बदलने का पर्व मनाता है। उसका मूल मय ब्याज के लौट आता है। दीवाली वणिक के आनंद का पर्व है, दीवाली उसकी तिजोरियाँ भर जाने का पर्व है।

सुनार की आँखों में लक्ष्मीजी की चमक चमचमाने लगती है। खेतिहर किसान सोने की पाटली नहीं तो चाँदी का पाट तो खरीदेगा ही। बहू के लिए कंठीमाला नहीं तो मुंदरी ने ऊर, आयल तो खरीदेगा ही, जिससे घर में बहू लक्ष्मी के पैर की रुनुक-झुनुक की रौनक बिखरेगी। इतना भी नहीं, तो वह गिरी हालत में नाक की लौंग तो खरीदेगा ही। सोना याने धन, धन याने, लक्ष्मी लक्ष्मी याने सुनार की बिक्री। लक्ष्मी पूजा में परंपरानुसार सोने की पूजा तो की जाती है। इसीलिए सुनार को लगता है कि उसके बिना तो लक्ष्मीजी की पूजा असंभव है। अतः दीवाली आगमन से सुनार के चेहरे पर सोने-सी ही चमक जाग जाती है। उसे लगता है, यह पर्व उसके लिए ही है।

गो-रक्षक और गोस्वामी के लिए तो उसका अपना ही आनंद है दीवाली। गोस्वामी को हर वस्तु में अपने गोधन की उपस्थिति नजर आती है। उसकी धारणा है कि गोवत्स से ही कृषि संभव हुई, जो भी समाज में आनंद है, वह प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से गोवंश के कारण ही है। गोरक्षक का विश्वास है, यह पर्व उसका अपना है। वह अपने गोधन की पूजा के साथ ही यह पर्व प्रारंभ करता है। उसी की पूजा और उसके प्रति उपकृत भाव से वह इस पर्व को बिदाई देता है।

गाँव का नाई ठाकुर तो मन-ही-मन गुनगुनाता हुआ उस्तरा पत्थर पर घिसकर धार तेज करता है। गाँव का कोई भी व्यक्ति नहीं चूकेगा सुंदर दिखने के लिए, वह नाई के सामने सिर नीचा कर बैठेगा ही। जैसे ही दीवाली की तैयारियाँ शुरू होती हैं, नाई ठाकुर का पूरा परिवार काम में जुट जाता है, पलाश के हरे पत्तों को बुन-बाँधकर पत्तल-दोने बनाता है। अन्नकूट के दिन हर घर में पत्तल दोने की आवश्यकता होती है।

लक्ष्मी पूजन में लक्ष्मीजी पर चर ढुलाने का नेग और साल भर का भाता, नए वस्त्र, सब ही नाई को इसी दिन मिलते हैं। कुछ लोग अपने घर होनेवाली लक्ष्मी पूजा का बुलावा नाई के द्वारा डोंडी पिटवाकर देते हैं। डोंडी पीटने का नेग भी नाई कभी कलदार, तो कभी अनाज के रूप में पाता है। इसे ‘भाता’ कहते हैं। यह उसके लिए साल भर की उगाहवनी का दिन है, नाई ठाकुर का लक्ष्मी-पूजा का दिन है।

चरवाहे-ग्वाले का मन भी हरे-भरे चारागाह जैसे हरा-भरा हो थिरकने लगता है। यह वही व्यक्ति है, जो गोवर्धन करवाता है। वह गोवर्धन पड़वा के दिन उन घरों में जाता है, जिनके पशु वह चारागाह चराने ले जाता है। घरों में जाकर वह गोरक्षक-गोस्वामियों की प्रशंसा एवं गोधन की प्रशंसा के गीत गाता है। इन गीतों में गोवंश का महत्त्व व गोरक्षक की उदारता की स्तुति होती है। इन गीतों को ‘हीड़’ कहते हैं। वह डफली बजाकर गाता है, उसे गोरक्षक घरों से अन्न के रूप में भाता देते हैं। नए वस्त्र एवं गोचराई की नगद राशि भी मिलती है। दीवाली के दूसरे दिन से ही पशुओं को चारागाह भेजा जाता है। वर्षाकाल में पशुघर पर ही रहते हैं। गोवर्धन पड़वा से पशुओं को फिर चारागाह ले जाने की शुरुआत से चरवाहों को प्रसन्नता होती है। यह उनकी आजीविका है। इसलिए दीवाली उसके जीवन में खुशहाली लाती है।

बाजार में दुकानदारों की अपनी एक अलग ही खुशी होती है, इस अवसर पर उनकी आँखों में चमक-दमक जाग उठती है। बाजार सज उठते हैं। सेठ-व्यापारियों को लगता है दीवाली उनका ही पर्व है। उन्हें लगता है, उनके बिना न घरों में रँगाई-पुताई होगी, न सुंदर सजावट होगी, न उनके पशुधन माला मनका सेला चोटी पहनेंगे। बाजार में धान की लाई (धानी) के सफेद पहाड़ के पहाड़़ भड़भूँजा का आनंद है, दीवाली पर वह भी फूली जैसा फूला नहीं समाता, क्योंकि छप्पन पकवान भी हों, सब एक तरफ औैर धान की लाई एक तरफ। बिना उसके लक्ष्मीजी का भोग संभव नहीं। बताशों जैसे मीठा बोल-बोलकर बताशे बेच देता है, ताकि उसके घर भी धन लक्ष्मी आ जाए।

पटाखों के व्यापारियों के मन में तो दीवाली से आने से दो महीने पहले से ही फुलझडि़याँ छूटने लगती हैं। वे जानते हैं कि पटाखे तो दीवाली के पर्याय हैं। दीवाली का नाम लेते ही तड़ातड़ टिकड़ी, धमाधम बम, छर-छर अनार के दृश्य आँखों में रमने लगते हैं। बिना बम के क्या आतिशजबाजी! बच्चों की उमंग तो देखते ही बनती है, जब वे फुलझड़ी छोड़ते हैं, घर्री-अनार को देख-देखकर ताली बजा-बजाकर कूदते हैं। यही रौनक तो बाजार का आनंद बढ़ा देती है।

सबके आनंद का पर्व है दीवाली। दीवाली का असली खालिश मजा देखना हो तो बच्चे किशारों और युवाओं में देखो। उन्हें लगता है, यही एक पर्व है, जहाँ नन्हे-मुन्नों को भी आग-दीये का डर नहीं और किशोरों का तो उत्साह-साहस देखते बनता है। हाथ में ही बड़े-बड़े बम फोड़ लेते हैं। उन्हें मालूम है आज बिना रोक-टोक के बड़े शोर-शराबेवाले बम पटाखे भी चला सकते हैं। दिल खोलकर रोशन कर सकते हैं। खूब मिठाइयाँ खा सकते हैं। छोटे-बड़ों के साथ खूब जश्न मना सकते हैं।

पटाखे चलाने का आनंद भी एक अलग आनंद होता है। यों तो व्यक्ति अपनी हर क्रिया, हर वस्तु गुप्त ही रखना चाहता है, अपनी वस्तु का व्यक्तिगत उपभोग करना चाहता है; किंतु दीवाली एक ऐसा पर्व है, जब व्यक्ति चाहता है, वह जो पटाखे चलाए-जलाए या फोड़े, उस खुशी में सब सम्मिलित हों, सहभागी हों। उनके पटाखों को सब देखें सब प्रशंसा करें। उनके शौर्य की प्रशंसा करे। इस पर्व पर व्यक्ति सब में खुशियाँ बाँटना चाहता है। वह घर द्वार के बाहर पटाखे चलाता है, ताकि उसकी खुशी बहुगुणित हो जाए।

समष्टिगत आनंद ही परिवार की महिलाओं का ध्येय होता है। उन्हें लगता है, दीवाली पर्व पर वे जो भी पकवान, व्यंजन बनाएँं, सभी लोग आएँ और ज्यादा-से-ज्यादा लोग उसे खाएँ और उनके द्वारा बनाई गई भोज्य सामग्री की प्रशंसा करें, वाहवाही दें। यही आनंद उनके खाते का सुख है। भले ही रात-रातभर जागकर गुजिया पपड़ी बनाते-बनाते उनकी हथेलियों की गद्दियाँ लाल हो गई हों, भले ही सूज गई हों और, उनको तलते-तलते कढ़ाई और चूल्हे की आँच से उनका चहरा लाल हो गया हो, पर आँच की यह लाली उनके गालों पर, होंठों पर गुलाबी मुसकान को जन्म दे जाती है।

गृहलक्ष्मी जानती है, उनके लिए दीवाली पर नवीन वस्त्राभूषण आएँगे ही, नहीं ज्यादा तो सोने का एक दाना, तो सोने की एक कील जरूर आएगी ही और उसकी पूजा धनतेरस व लक्ष्मीपूजन के दिन होगी ही। वे प्रसन्न हैं, लक्ष्मी पूजा के बाद घर के पुरुष उन्हें श्री लक्ष्मी स्वरूप मानकर टीका लगाएँगे, इस मान-सम्मान और आदर के आगे, उनके लिए दीवाली पर किया गया अथक श्रम सोना हो जाता है। इस प्रकार पुरुषों द्वारा पूजे जाने पर वह साक्षात् गृह-लक्ष्मी हो जाती हैं। घर-लक्ष्मी, वर-लक्ष्मी, धन-लक्ष्मी, कर्म-लक्ष्मी सभी तो वही हैं। यही तो दीवाली है। जहाँ बहू लक्ष्मी वहाँ सब ही लक्ष्मी प्रसन्न यही प्रसन्नता दीवाली की ज्योति है। यही प्रसन्नता जीवन का सार है। यही प्रसन्नता दीवाली का प्रकाश पर्व है।

१३, समर्थ परिसर, ई-८ एक्स्टेंशन,
बावडि़या कला, पोस्ट ऑफिस त्रिलंगा,
भोपाल-४६२०३९
दूरभाष: ०९४२४४४०३७७
—सुमन चौरे

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