हे उलूकवाहिनी! बरसो छप्पर फाड़ के

हे उलूकवाहिनी! बरसो छप्पर फाड़ के

इधर जब से सुना है कि लक्ष्मी जब भी बरसती है तो छप्पर फाड़ के बरसती है, मैं सतर्क हो गया हूँ, आखिर औरों की भाँति धनवाली लक्ष्मी की चाह मुझे भी तो है, इधर जैसे ही लक्ष्मी के छप्पर फाड़कर बरसने का सुना, उधर मैंने अपने एक इकलौते मकान, जिसे मैंने ‘तन’, ‘मन’ और ‘धन’ अर्पित कर बनवाया था, पहले तो मकान बनवाने हेतु मन बनाने में फिर उस ‘मन’ पर घर के अन्य सदस्यों के ‘मन’ की स्वीकृति की मुहर लगवाने में, क्योंकि जब तक ये प्राथमिक औपचारिकताएँ पूरी नहीं करते, मकान तो क्या! किसी भी काम का श्रीगणेश नहीं हो सकता, खैर, जब अपना मकान बनवाने का मन बन गया व परिवार के सदस्यों की स्वीकृति भी मिल गई तो फिर अपना घर बनवाने के लिए धन की पड़ताल शुरू हुई और इस पड़ताल में तन को तकलीफ देना पड़ा। धन प्राप्ति की इस मुहिम में काफी भटकने, यहाँ-वहाँ हाथ पाँव मारने के पश्चात् जो सार निकला, धन प्राप्ति का कूल फंडा तैयार हुआ, वह था अपना ‘प्रॉविडेंट फंड’। प्रॉविडेंट फंड हर सरकारी कर्मचारी अधिकारी का एकमात्र रक्षा सूत्र होता है, जो अचूक रामबाण होता है, जिसके दम पर ही सरकारी कर्मचारी जीता मरता है और जीवन की उन कठिनाइयों से उबरता है, जो अनायास आती है या फिर निश्चित होती है अस्तु। मैं प्रॉविडेंट फंड से फंड निकलवाने के लिए कार्यालयीन कारोबार में कूद गया। उक्त फंड से फंड निकलवाने में पुनः तन, मन और धन खर्च करना पड़ा। इस मुहिम अर्थात् कार्यालयीन कार्यप्रणाली के चलते कुछ दीपावलियाँ आईं और चली गईं, अंततोगत्वा प्रॉविडेंट फंड से फंड मिल ही गया, फिर तो घर-बाहर दीवाली का मौसम न होने के बावजूद दीवाली मनाई गई। जब प्रॉविडेंट फंड से फंड हासिल हो गया तो फिर बेदाग छवि के नेता की खोज की भाँति प्लॉट की, एक अदद वैध प्लॉट की खोज प्रारंभ हुई। इस प्लॉट खोज अभियान में शनैः-शनैः इष्टमित्र, रिश्तेदार व तथाकथित शुभचिंतक शामिल होते गए, हटते गए, शामिल...। हटते...। अंतत सबके परिश्रम और मेरे प्रॉविडेंट फंड से निकाले गए फंड के एक बड़े अंश के शहीद होने के साथ ही मैं एक वैध प्लॉट का वैध मालिक बन गया। चूँकि प्रॉविडेंट फंड का बड़ा अंश प्लॉट व प्लॉट की खोज की भेंट चढ़ गया था, मकान निर्माण हेतु अतिरिक्त राशि की आवश्यकता थी, क्योंकि बची हुई राशि से या तो नींव का निर्माण हो सकता था या चारदीवारी में से एक-दो दीवारें, अस्तु एक बार फिर तन मन और धन को कष्ट देना पड़ा। इस बार तन, मन, धन को कष्ट देकर जिस लक्ष्य की प्राप्ति करनी थी, वह था अपने प्लॉट पर अपना मकान बनवाने के लिए अतिरिक्त राशि की जुगाड़ और फिर इस जुगाड़ का समापन कर्ज लेकर हुआ। धीरे-धीरे अपने प्लॉट पर अपने मकान का सरकारी फाइलों की गति सा निर्माण संपन्न हुआ। आज उसी मकान की छत को इसलिए तुड़वा रहा हूँ, ताकि वहाँ छप्पर बनवा सकूँ, क्योंकि लक्ष्मीजी के बरसने की कहावत छत फाड़कर बरसने की नहीं, छप्पर फाड़कर बरसने की जो है।

लक्ष्मी उर्फ धन-दौलत बनाम रुपया-पैसा पाने के लिए लोग-बाग क्या-क्या करते हैं और क्या-क्या नहीं करते, ऐसे में मैं तो सात्त्विक व परंपरा अनुसार लक्ष्मी एकत्र करने की कोशिश कर रहा था। लक्ष्मी के छप्पर फाड़कर बरसने के अलावा जो मैंने उनके बायोडाटा कलेक्ट किए हैं, उनसे ज्ञात हुआ है कि उनकी ‘सीट’ कमल है और कमल कीचड़ में खिलता है। कमल के विषय में मैंने यह भी जाना है कि कुछेक विशेष अवसरों पर वह बहुमूल्य हो जाता है, कीमती हो जाता है। वैसे तो लक्ष्मीजी सर्वज्ञ हैं, फिर भी मैं उन्हें बता दूँ कि जो प्लॉट मैंने मकान बनवाने हेतु क्रय किया था तथा जिस पर आज छतवाला मकान है, जिसकी छत तुड़वाकर वहाँ छप्पर बनवा रहा हूँ, वह प्लॉट कभी कीचड़ युक्त तालाब था और कभी-कभी भूले-भटके वहाँ ‘कमल’ खिल जाया करते थे।

जैसे कि मैं सात्त्विक ढंग से लक्ष्मी को प्राप्त करने की कोशिश में था और धन की देवी के विषय में अपना सामान्य ज्ञान भी बढ़ा रहा था। अभी-अभी मुझे ज्ञात हुआ है कि लक्ष्मीजी का वाहन अर्थात् लक्ष्मीजी की सवारी जिस पर सवार हो वे एक छप्पर से दूसरे छप्पर की सैर करती रहती हैं, वह है ‘उल्लू’, तो लक्ष्मीजी को मैं बताना चाहूँगा कि ‘उल्लू’ के मामले में मैं उल्लू से भी एक कदम आगे हूँ, अर्थात् निरा उल्लू हूँ। साहित्यकार, साहित्यिक पुरस्कार प्रदाता, साहित्य के मठाधीश मेरे साहित्यिक अवदान, नाम आदि से परिचित होने के बावजूद मुझे पुरस्कार देने के विषय में उल्लू बनाते रहते हैं। मेरे अपने इस नए मकान के इर्द-गिर्द दिन में और रात में उल्लुओं का डेरा रहता है, जमघट होता है, जहाँ दिन में वे कभी-कभी और रात में हमेशा ही कारगुजारियाँ व वारदातें करते रहते हैं और मैं काठ का उल्लू सा न सिर्फ देखता रहता हूँ बल्कि मौन रहकर उनकी हौसला-अफजाई भी करता हूँ।

अंत में, जब मैं इस लेरख को इसकी नियति तक पहुँचा रहा था अर्थात् लेख-लेखन की इतिश्री कर रहा था तो एक भुक्त-भोगी तथा सदैव लक्ष्मी की चिंता में रत रहे ताजे-ताजे कंगाल हुए धनपति ने बताया कि लक्ष्मी चंचल होती है और एक जगह कभी नहीं रहती, स्विस बैंक में भी कभी वह राजा, अस्तु, इस मामले में भी मैं भाग्यशाली हूँ, क्योंकि एक अरसे से मैं रंक की कतार में ही हूँ।

चलते-चलते कभी रईस रहे सज्जन बोले, श्रीमान लक्ष्मी की एक और विशेषता है चंचल होने के अलावा, वे अँधेरे में और गुफा स्थान में निवास करना पसंद करती हैं, जैसे जमीन के अंदर, तिजोरी में, जेबों में लाकर्स में आदि-आदि, सो यह बिंदु भी मेरे पक्ष का है, क्योंकि विद्युत् विभाग और नगर निगम की संयुक्त मेहरबानियों से मेरे अपने मकान के आस-पास दूर-दूर तक विद्युत् की लाइनें तो हैं किंतु उनमें करंट नहीं है, जहाँ करंट है वहाँ बल्व, ट्यूब लाइट, वेपर लैंप वगैरह-वगैरह नहीं हैं, इसलिए सारा क्षेत्र और मकान घुप्प अँधेरे में डूबा रहता है तथा तिजोरियाँ, जो मैंने इस आशा और विश्वास में बनवाई हैं कि वे भविष्य में धन-दौलत से लबालब रहेंगी, आयकर वालों की विशेष मेहरबानियों से एकदम खाली हैं। जहाँ वर्तमान में मकडि़यों ने अपने अवैध मकान बना रखे हैं।

अतएव हे लक्ष्मी माँ! सारी स्थितियाँ आपके अनुकूल हैं तथा छप्पर जो छत तुड़वाकर बनवा रहा हूँ, वह असली की छायाप्रति है, जिसे ब्रेक करने में आपको कोई मशक्कत नहीं करनी पड़ेगी। इस वास्ते आप बिना ब्रेक के बरस जाइए, मेरा कल्याण होगा।

१६७, ग्रेटर वैशाली,
इंदौर (म.प्र.)
दूरभाष: ९४०७५१५१७४
—ओम उपाध्याय

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