त्योहारों की परिधि में लोक-संस्कृति की ज्योति

त्योहारों की परिधि में लोक-संस्कृति की ज्योति

मानव जीवन में सबसे विशिष्ट और तेज गति से खत्म होती चीज है वक्त। कब वर्तमान अतीत के झरोखे में चला जाता है, पता ही नहीं चलता। आधुनिकता के सैलाब में बहते हुए चिरपुरातन संस्कृति की यादें त्योहारों के माध्यम से ताजा हो जाती हैं। यही कारण है कि हमारी संस्कृति चिरपुरातन होकर भी चिरनवीन बनी हुई है।

भारतीय संस्कृति धर्म, वेद, पुराणों के बीच घिरी हुई है। इतना ही नहीं, भारतीय संस्कृति रूपी वृक्ष में त्योहार, उत्सव, मंगल रूपी फूलों से उसका सौरभ सदा संपन्न रहा है। त्योहारों का महत्त्व सिर्फ धार्मिक ही नहीं, ऐतिहासिक, सामाजिक, राजनीति एवं विज्ञान के आदर्शों को भी स्पष्ट रूप से प्रगट करता है। हिंदुस्तान सिर्फ धन-धान्य से ही श्रीसंपन्न नहीं था, बल्कि शूरवीर योद्धाओं, वैदिक मर्यादा की परंपरा को निभाते हुए जान पर खेल जाना, मानवता और ईमानदारी के बेमिसाल उदाहरणों से भरा पड़ा है।

त्योहार मनाने के पीछे एकता, सहयोग, आदर्श, बंधुत्व की भावना अंतर्निहित होती है। हर त्योहार के पीछे कोई-न-कोई कहानी विशेष रूप से जुड़ी रहती है, जिसमें कभी देवी की शक्ति महिमा की स्तुति, कभी मर्यादा की दृढ़ता पर एकता का विश्वास, कर्तव्य की पराकाष्ठा, असत्य पर सत्य की विजय, बुराई पर भलाई की जीत, अहं पर सरल निश्छल हृदय के टक्कर की कहानी दुहराई जाती है। कुछ सामाजिक रीति-रिवाज और परंपराएँ भी सहयोग की भावना पर आधारित रहती हैं। प्रत्येक त्योहार के पीछे कोई-न-कोई मानवीय कल्याण आदर्श व शिक्षा का भाव विशेष रूप से अंतर्निहित होता है। उसमें मनोरंजन के विशुद्ध उल्लास का आनंद भी समाया रहता है। त्योहार के समय स्फूर्ति, जागरूकता, साफ-सफाई, सजावट के अलावा विभिन्न सुस्वादिष्ट भोज्य पदार्थ के साथ मिष्टान्नों के बनाने की भी अपनी एक परंपरा आज भी भारतीयों में प्रत्यक्ष दिखाई देती है।

सावन के आते ही वर्षा की रिमझिम फुहारों से वसुंधरा पुलकित होने लगती है। इधर त्योहारों का सिलसिल शुरू हो जाता है। वर्षा की बूँदाबाँदी में सभी भगवान् जगन्नाथजी की ‘रथयात्रा’ के उत्सव में शामिल होकर आनंदित होते हैं।

त्योहारों की शृंखला में रथयात्रा का एक विशेष महत्त्व है। वर्ष के आरंभ में आदिशक्ति की आराधना कर नवरात्रि का उत्सव मनाया जाता है। ग्रीष्म की प्रचंड ताप में झुलसती धरती में आषाढ़ की रिमझिम फुहार किसानों के हृदय में आशा की एक नई किरण उत्साह और उमंग का संचार करती है। रथयात्रा एक धार्मिक उत्सव है, जो प्रत्येक गाँव, शहर और नगर में उल्लास के साथ मनाया जाता है। जगन्नाथपुरी का तो यह मुख्य उत्सव है। ज्येष्ठ की पूर्णिमा को जगन्नाथजी, बलभद्र तथा सुभद्राजी को स्नानवेदी पर अक्षयवट के पवित्र कुश से दोपहर में स्नान कराया जाता है। फिर वस्त्र एवं आभूषण से सुसज्जित कर पंद्रह दिनों तक अंदर मंदिर में रखते हैं। आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को भी जगन्नाथजी, बलभद्र और सुभद्राजी को बड़े समारोह के साथ रथ में बैठाकर नगर भ्रमण कराते हुए गुंडिचा मंदिर ले जाते हैं। बड़े, बूढ़े, बच्चे सभी पुण्य लाभ के भाव से श्रद्धा और भक्ति से रथ को खींचते हैं। उत्साह और उल्लास के साथ भगवान् जगन्नाथ का दर्शन कर आनंदित होते हैं। गजामूँग का प्रसाद दिया जाता है। जगन्नाथ स्वामी के प्रसाद का विशेष महत्त्व है। इसका अनादर न करते हुए भक्ति भाव से ग्रहण किया जाता है। वहाँ सात दिन रहकर भगवान् जगन्नाथ फिर वापस अपने सिंहासन पर विराजते हैं। कहा जाता है कि भगवान् की लीला इस संसार में लोगों को धर्म के प्रति आस्था एवं अपने कर्तव्य-बोध की याद दिलाती है। बंधुत्व भाव से मिल-जुलकर आनंदित होना चाहते हैं, प्रसन्न होना चाहते हैं। गजामूँग एक माध्यम है, उसके सहारे जिनके किसी भी प्रकार के खून के रिश्ते में कमी है तो उसकी पूर्ति करने के लिए बड़ी बेसब्री से रथयात्रा उत्सव का लोग रास्ता देखते रहते हैं। जब रथयात्रा उत्सव का दिन आ जाता है, तब हर व्यक्ति जिसे अपनी भाई की चाहत हो या किसी बहन की चाहत हो तो एक-दूसरे को गजामूँग देकर उस रिश्ता को एक नाम दे देते हैं। फिर भाई-भाई, बहन-बहन उस रिश्ते की पवित्रता को जीवनपर्यंत प्राणपण से निभाते चले आते हैं। यह हमारी भारतीय संस्कृति में त्योहारों के माध्यम से एक विशिष्ट अवदान है, जो अन्य किसी देश में नहीं पाया जाता है।

गजामूँग से बने भाई-बहन का परिवार सगे रिश्तों से भी बढ़कर स्नेहिल व आदरणीय माने जाते हैं। यह हमारी भारतीय संस्कृति की अमूल्य धरोहर है।

हरेली के त्योहार में ‘गेड़ी’ की हलचल गाँव में ही दिखाई देती है। लेकिन गेड़ी चलाना भी एक कला है। गाँवों के घरों में बाँस की कमी नहीं रहती है। बच्चों को खेलने के लिए उनके खुशी के लिए मिनटों में बढ़ई दादा, बढ़ई चाचा गेड़ी बनाकर दे देते हैं। गेड़ी चलाते हुए बच्चों को मानसिक संतुलन बनाए रखने का प्रयास करना पड़ता है। तभी गेड़ी में सवार गिरता नहीं है। यही संतुलन आगे चलकर जीवन में संयम और बड़ों की मर्यादा का आदर करना सिखाता है। त्योहारों का सिलसिला बढ़ते-बढ़ते पूर्णिमा के दिन रक्षाबंधन का त्योहार मनाया जाता है। यह भाई-बहन का स्नेह का पवित्र बंधन है। दूसरे दिन भोजली का त्योहार मनाया जाता है। यह भी लोक-संस्कृति का विशिष्ट पर्व है। मुझे याद आ रहा है सन् १९५४-५५ की बात है, जब खैरागढ़ राज में भोजली का त्योहार बड़ी धूमधाम से मनाया जाता था। खैरागढ़ की सबसे बड़ी विशेषता है कि वहाँ गाँवों की सरलता एवं शहरों की समस्त सुविधाएँ सहजता से देखने को मिलती हैं।

रक्षाबंधन के एक सप्ताह पहले ही नवमी के दिन प्रत्येक घर में अँधेरे कमरे में भोजली को अधिष्ठात्री देवी की प्रतीक प्रतिदिन सुबह पत्ते के दोने में मिट्टी और गेहूँ के दाने डालकर भोजली देवी की पूजा की जाती है। प्रतिदिन उसमें पानी डालना एक पूजा की भाँति अनिवार्य कार्य होता है। राखी के दूसरे दिन भोजली की पूजा की जाती है। फिर विसर्जन करने के लिए सभी कुँवारी कन्याएँ भोजली को घर से बाहर निकालती हैं। जिसकी भोजली पीले रंग की दिखाई देती है, उसे देवी की कृपा मानकर लोग प्रसन्न होते हैं। खैरागढ़ के राजमहल में यह एक परंपरा है कि बस्ती के सभी घरों के लोग भोजली को लेकर एक जुलूस के रूप में राजमहल में पहुँचते। वहाँ सर्वश्रेष्ठ भोजली को पुरस्कृत भी किया जाता था। फिर सभी अपने भोजली को लिये नदी की ओर जाते और वहाँ भोजली की पूजा कर नारियल फोड़ते और मिट्टी तथा दोने को नदी में बहा देते थे। भोजली को लेकर घर आ जाते थे। गाँवों में आज भी यह प्रथा है। अपनी सखी-सहेलियों को दो-चार भोजली देकर भोजली बदलने का प्रयास अभी भी कायम है। सीता-राम भोजली कहकर एक-दूसरे की अंतरंग सहेली बन जाती हैं।

यह स्नेह का बंधन अटूट होता है। फिर आदर की भावना से प्रेरित हो अपनी सहेली का नाम नहीं लेते हैं। उससे भोजली कहकर ही बातें करते हैं। इस प्रकार भोजली के त्योहार के माध्यम से गाँव में आपस में मैत्री भाव का एक अति सुंदर रूप देखने को मिलता है। हमारे छत्तीसगढ़ राज्य की यह एक प्राचीन किंवदंती है कि भोजली देवी की पूजा करने से अकाल व सूखाग्रस्त इलाका न बने, इसलिए नौ दिन तक सूर्य की पूजा करते हुए गेहूँ के दाने अँधेरे में उगाए जाते हैं। उसे ही भोजली कहा जाता है। अपने पीले रंग के सौंदर्य से यह सबका मन मोह लेती है। पीला रंग सदैव से ही शुभ कार्य के लिए अति उत्तम माना जाता है। भोजली की सुंदरता से सभी गाँव के बड़े-बूढ़े इसे सूर्य की कृपा मान यह सोचने लगते हैं कि निश्चित ही धन-धान्य की वृद्धि होगी। इस प्रकार सभी भोजली को देख आनंदित होते हैं। इसी प्रकार छत्तीसगढ़ में वर्षा के मेघ को देखकर ‘मघा परमेश्वरी’ के नाम से पूजा की जाती है। ऐसी कितनी ही कथाएँ और कितने ही त्योहारों का सिलसिला वर्षभर चलता रहता है।

बसंत पंचमी मे सरस्वती की आराधना की जाती है। प्रकृति अपने पूर्ण यौवन में रंग-बिरंगे फूलों की सुंदरता से समस्त जनमानस के मन को मोह लेती है। फलों के राजा आम में बौर वसंत पंचमी के समय अपनी पूर्ण मादकता के साथ खिलने लगता है। होली रंगों का निराला त्योहार है, सभी अपने मन की कटुता-बैर के बदरंग को भूलकर रंग-बिरंगे प्रेम के रंग में डूब जाना चाहते हैं। तभी तो यह कहा जाता है कि ‘ब्रज के कान्हा गाँव की गोरी, रंग बरसाती देखी होली’।

कोई भी त्योहार (हम) रोजमर्रा की जिंदगी से हटकर पूजा-अर्चना और बंधुत्व भाव से प्रेरित होकर मनाते आ रहे हैं। आने-जानेवाले मेहमानों को भी अपनी कलात्मक रुचि का परिचय देने का भी यह सुनहरा अवसर होता है। इसी से गृहिणी अपने आँगन को विशेष रूप से साफ कर रंगोली बनाकर अपनी कला-सौष्ठव की कारीगरी से मेहमानों को मुग्ध करने का प्रयास करती है। किसी की रंगोली सरल-सीधी बेल पर ही आधारित रहती है। किसी की रंगोली बड़ी, पर रंगों के समायोजन से उसमें चार चाँद लग जाते हैं। इसमें गृहिणी के मन के भावों का भी सुंदर समन्वय देखने को मिलता है। घर के अंदर की भी साज-सजावट गृिहणी के स्वभाव के अनुरूप ही दिखाई देती है। उसकी सुघड़ता, संपन्नता का परिचय हमें उसके ड्राईंग-रूम में पहुँचते ही अनायास मिल जाता है। कहीं गुलदस्ते में रजनीगंधा के फूल लगे रहते हैं तो किसी के गुलदस्ते में गुलाब, मोंगरे, हिना एक साथ अपनी मोहक सुरभि से कमरे की सुंदरता को द्विगुणित करते हैं। इस प्रकार हँसी-खुशी और उल्लासमय वातावरण में त्योहार मनाने की परंपरा हर भारतीय घरों में पाई जाती है। त्योहार के आगमन से पूर्व ही तैयारियाँ शुरू हो जाती हैं और उनकी त्योहारों की उमंग भरी भावनाओं का जल्द ही पुनरागमन हो, इसी आशा को प्रगट करते हुए परिवार के समस्त सदस्यों द्वारा त्योहारों का समापन होता है।

ये त्योहार हमारे जीवन में खुशी का संचार करने का काम करते हैं। यही कारण है कि छत्तीसगढ़ के लोगों के स्वभाव में आज भी वह भोलापन एवं निष्कपट भाव का सागर लहराता रहता है। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना यहाँ के जनमानस का तो कंठहार ही है। इन्हीं उदार गुणों के कारण आज छत्तीसगढ़ राज्य में प्रायः सभी राज्य के व्यक्ति रोजी-रोटी के लिए आते हैं और यहीं के होकर रह जाते हैं। यह हमारे छत्तीसगढ़ राज्य की सबसे बड़ी विशेषता है।

शिवायन
क्वार्टर. नं. ३-बी, स्ट्रीट नं.-३३,
सेक्टर-१, भिलाई-४९०००१
दूरभाष: ९७५२६०६०३६
—नलिनी श्रीवास्तव

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