मौसम के रंग

मौसम के रंग

मौसम की भी विविधता है भारत में, जैसे खान-पान, पहनावे और भाषा की। फिर भी इस विविधता में एक समानता है। बुजुर्ग बताते हैं कि अधिकांश देश में एक ही ऋतु की प्रधानता है, वह है ग्रीष्म। यों साधन संपन्न लोग पहाड़ों की ओर पलायन करते हैं, जब शहर भट्ठी सा सुलगता है और आदमी स्वयं को अलाव पर तंदूरी रोटी सा महसूस करता है। उच्च वर्ग के भाग्यशाली इनसान हों या निर्धन जनता के ‘गरीब मंत्री’। उनके लिए यूरोप की सैर का इससे बेहतर अवसर क्या है? कुछ वहाँ अपने खरीदे घरों का आनंद लेते हैं तो जनप्रतिनिधि सरकारी आवभगत का। ‘आराम हराम है’ का नारा देनेवाले भले देश के प्रथम प्रधानमंत्री हों, उस पर अमल करनेवाला यदि केवल इकलौता व्यक्ति है तो वह मुल्क का वर्तमान प्रधान सेवक है। कुछ का कहना है कि वह अनिद्रा रोग से पीडि़त है तो कुछ का मत है कि वह काम का जन्मजात लतियल है। गनीमत है कि दोनों में से एक भी रोग संक्रामक नहीं है वरना देश को आजादी के बाद से अब तक विकास का अजीर्ण हो गया होता। ठीक ही है। अति आदमी के पेट की हो या भ्रष्ट के रेट अथवा विकास की, तीनों ही बुरी हैं। दादी का मत है कि त्वरित विकास पर पड़ोसी देशों की नजर लगती है और विरोधी दलों की भी। वे जल-भुन उठते हैं।

देश में कुछ अल्पसंख्यक, समृद्ध या निर्धन ऐसे भी हैं, जो फैशन से भरे-पूरे पर सुरुचि से कोरे-रीते हैं। उनको गरमियों में, रंगीन बनियान धारण कर अर्धनग्न रहने का शौक है। जैसे उनके मन की नंगई बदन पर उतर आई हो। वह सड़क पर चलते हैं तो कनखियों से इधर-उधर ताकते हुए। कितने उनके अद्यतन फैशन से प्रभावित हैं? कौन कहे, कब किस फिल्म निर्माता की नजर भी उन पर अटक जाए? बहुत सी बातें चलते-चलते संभव है। मसलन, सड़क के गड्ढे में पैर फँसना, खुले मैनहोल में टपक पड़ना, किसी छुट्टे साँड़ का बगैर चेतावनी दौड़ा लेना, किसी लड़की से जान-बूझकर टकराना और उसकी सहेलियों की चप्पलें खाना, कान में फोन सटाकर बात करते-करते या गाना सुनते-सुनते किसी वाहन से हिंसक ‘हैलो’ हो जाना अथवा किसी आतंकी इलाके की गोलीबारी का शिकार होना। फिल्म निर्माता की नजर पड़ने से, ऊपर की दुर्घटनाएँ कहीं अधिक मुमकिन है। ऐसे मुल्क में एक अन्य खतरनाक ऋतु है। इसे बजट का मौसम भी कहते हैं। इसमें सब अपनी जेब की खैर मनाते हैं, पर स्थिति वही बकरे की माँ की है, जिसकी जेब की नियति ही कटना है, वह निर्मम सरकारी कटाई से कब तक बचेगी? इसके बावजूद देश में चंद चीजें, अभी भी टैक्स फ्री हैं। इन में सूरज की धूप, हवा, रोशनी, हँसी और उम्मीद करना शामिल हैं। इनमें से बहुतेरे बाद में, ‘करूँ क्या आस निरास भई’ गाते भले हों, पर वे साहसी आस लगाने में फिर भी नहीं चूकते हैं। जब वित्तमंत्री आमदनी बढ़ाने का निश्चय दोहराते हैं, अपना दिल बैठता है। कौन कहे, वित्तमंत्री सूरज की धूप और ठहाकों पर कब टैक्स ठोक दें?

कुछ जन्मजात आशावदी होते हैं। हमारे एक मित्र भी हैं। पढ़े-लिखे, समझदार, बुद्धि से सक्षम, पर शरीर से लाचार। उनकी एक आँख दीपावली के शुभ अवसर पर, पटाखा सुलगाते-सुलगाते, उसके फूटने से चोटिल होकर जाती रही है। बेचारे घर बसाने को उत्सुक, पर लड़कीवालों की बेरुखी से पीडि़त। दहेज के मुखर विरोधी, पर हर गोरी, काली, दुबली-मोटी लड़की की नापसंदगी से आहत। स्वभाव से ऐसे नेक और मिलनसार कि उनसे नेकी भी शर्माए। युवा तो युवा, विधवा महिलाओं तक ने विवाह के नाम पर उन्हें घास नहीं डाली। अब उन्होंने दीवाली मनाना छोड़ दिया है। जब इतने किस्म की वर्तमान देवियाँ रूठी हैं, तब क्या पता, लक्ष्मी भी नाराज हों? ऐसे लक्ष्मीजी को पटाकर कुबेर बनने की उन्हें हसरत भी नहीं है। अकेले कितना उड़ाएँगे, और दुकेले होने की संभावना भी दिनों दिन क्षीण होती जा रही है। जब सारा शहर रोशनी से जगमग है और किसी युद्धस्थल सा बम-पटाखों के शोर से आक्रांत है, तब दो कमरे का छोटा सा माचिस का डिब्बा अंधकार का नन्हा सा टापू, उनकी मौन पीड़ा का गवाह है।

एक दिन हमने उनकी इस अरुचि के प्रति जिज्ञासा जताई तो उन्होंने हमें उपरोक्त दुर्घटना के बारे में बताया ही नहीं, अपने एकाक्षी होने के कारण अविवाहित रहने के विषय में भी। हमें उनसे हमदर्दी है, हमारे मोहल्ले के अधिकांश उनके प्रशंसक है। पर दूसरों में नुक्स निकालना कुछ की पैदाइशी और स्वाभाविक सिफत है। ऐसे अपने परिवार तक को नहीं बख्शते हैं तो हमारे मित्र को क्यों छोड़े? उनका आकलन है, ‘‘जरूर इस नेकी के मुखौटे वाले में कोई न कोई चारित्रिक खोट है, वरना अभी तक कुँवारा क्यों रहता? कौन कहे नपुंसक हो? समलैंगिक भी हो सकता है? रोज घर के काम के लिए नए-नए लड़कों को नौकरी देता रहता है। हम तो ऐसों को अनैतिकता का छुपा रुस्तम मानते हैं। ऐसों से बचकर रहना ही उचित है।’’ कोई कुछ भी कहे, हमारे मित्र को विवाह की उम्मीद अब भी गई नहीं है। हमें उत्सुकता भी है। देखें उनका स्वप्न साकार होता है कि नहीं? यों संदेह भी है। कहीं यह ‘आशा कम विश्वास अधिक है’ वाली बात तो नहीं है?

भारत में एक अन्य विशेषता है। कोई भी मौसम स्थायी नहीं है, ग्रीष्म भी नहीं। गरमी, बरसात, बजट, जाड़ा आदि भी आता है, भले ही थोड़े दिन परिवर्तन की पीड़ा भी सुख देने के लिए। जैसे जब बारिश अपेक्षा और औसत से कम होती है तो सूखे का आगमन उतना ही अनिवार्य है, जितना कैक्टस का हर मौसम में उगे रहना। यदि बारिश आशा के अनुरूप हुई तो बाढ़ आना ही आना। दोनों स्थितियों में जनकल्याण को प्रतिबद्ध प्रजातांत्रिक सरकारें ‘राहत’ का प्रबंध करती हैं। सरकार को जायज शिकायत है कि हर जिले में राहत कार्य होने के वाबजूद जनता त्राहि-त्राहि में लगी रहती है। मंत्री और अफसर राहत की सच्चाई से वाकिफ  हैं। उनके पास फाइलें हैं। उसमें बाकायदा हर जिले की रकम दर्ज है। सचिवालय का बाबू, अधिकारी, मंत्री सब जानते हैं कि इस राशि का कच्चा चिट्ठा। कहाँ-कहाँ राशि गई, यह भी। प्रमुख सचिव आका को समझाता है, ‘‘सर! क्या कहें, सार्वजनिक रूप से कह भी नहीं सकते हैं। वहाँ तो आपका और हमारा जनता को जनार्दन बताना राजधर्म है। पर क्या करें, घरों में कुछ बच्चे रौंदू किस्म के होते हैं। वह खेलने, खाने, सोने, में याने हर वक्त रोते हैं, वैसे ही हमारी जनता भी है। इसे हर अवसर पर रोने की आदत है। तभी तो राहत की राशि कहीं कम तो कहीं न मिलने की शिकायत है। आप और हमारे रात-दिन राहत में जुटे रहने के वाबजूद यह दुर्दशा है।’’ मंत्रीजी की पूरी सरकार में प्रसिद्धि है, गगनभेदी ठहाके और कर्णभेदी आपन्न वायु के विसर्जन के लिए। फिलहाल, उन्होंने ठहाके से काम चलाया। एक तथ्यात्मक प्रेस नोट आपकी ओर से जारी कर देते हैं—‘‘सर! पढे़-लिखे लोग तो वास्तविकता से परिचित हों।’’

मंत्रीजी को प्रस्ताव भाया। उन्होंने मुंडी हिलाकर स्वीकृति दी और बोले, ‘‘कहाँ?’’ प्रमुख सचिव ने उनके हस्ताक्षर का स्थान दिखाया, उन्होंने चिडि़या बनाई और राहत की शिकायत का मुद्दा, अभाव से भुगतते इनसानों के समान चल बसा। मंत्रीजी बोलते तो कैसे बोलते? उनके गले में राहत की रकम अटकी हुई है और उनमें अभी कुछ लाज-शरम शेष है। वहीं अफसर खुर्राट है। उसने कई राहतें डकारी हैं। मंत्री खुश है। अपना हिस्सा पाकर मुख्यमंत्री ने उसकी पीठ जो ठोकी है। बस जो प्रसन्न नहीं है, वह जनता है। पर यह उसकी स्थायी नियति है। जो भी सरकार आती है, वह वादे तो ढेरों करती है किंतु देखने में आया है कि बहुधा पूरा एक भी नहीं हो पाता है। सत्तारूढ़ दल का हर पदाधिकारी, अफसर, बाबू, कर्मचारी आदि सब अपनी अपनी जेबें भरने में वैसे ही लगे रहते हैं, जैसे दीमक फाइलों में या निरक्षर, बच्चे पैदा करने में।

यों तो रोगग्रस्त देश में हर सरकारी या निजी डॉक्टर की चाँदी है, पर बाढ़ या सूखे में मरीजों की संख्या से अकसर उनकी प्रसन्नता उर्फ फीस के मीटर की राशि में पर्याप्त इजाफा होता है। डॉक्टर इसकी शान तो नहीं बघारते हैं, पर एक इंजीनियर साहब हैं। वह पाँच बेटियों या लक्ष्मियों के सौभाग्यशाली पिता हैं। वह अब सारी जिम्मेदारियों से निवृत्त हो चुके हैं, उनके पास हर विवाह के खर्चे और दहेज की फाइल है। वह अकसर दोस्तों को बताते हैं, ‘‘सुधा की बाढ़ के प्रसाद की शादी है, शीला की सूखे की।’’ हर कन्या का विवाह किसी न किसी प्राकृतिक आपदा का परिणाम है। उनके ऐसे स्पष्टवादी देश में कम ही होंगे।

ऐसा नहीं है  कि बाढ़ और सूखे में ही गरीब मरते हैं। जाड़े में भी शीत-लहर है, उनके प्राण हरने को। इस पर भी कई विद्वान् अपनी विद्वत्ता झाड़ते हैं, माल्थस के सिद्धांत का हवाला देकर कि जब जनसंख्या में अतिशय वृद्धि होती है, तब प्राकृतिक आपदाएँ उसे घटाने में सक्रिय हो जाती हैं। इसके विपरीत, सर्दी सांस्कृतिक उत्सवों का अवसर भी है। कहीं कवि-सम्मेलन होते हैं, कहीं आयातित अंदाज के ‘लिट-फैस्ट,’ तो कहीं फैशन शो। संपन्न अपनी हैसियत जताने को हैरिस्व्टीड के कोट प्रदर्शित करने वहाँ जाते हैं और आधुनिकता के रंग में रँगी युवतियाँ अर्धनग्नता के नवीनतम परिधानों में सजकर। मौसम कैसा भी हो, वातानुकूलन के युग में अधिक कपड़ों का बोझ लादने की मूर्खता क्यों की जाए?

जब से बंदर-भालू के तमाशों पर रोक लग गई है तब से ही ‘लिट-फैस्ट’ नामक साहित्यिक तमाशा लोकप्रिय हो रहा है। जिन्हें अपनी साहित्यिक सुरुचि का दिखावा करना है, उनका वहाँ पधारना अनिवार्य है। इस साहित्यिक सर्कस में एक ही प्रकार के चुनिंदा शेर, भालू, जोकर वगैरह-वगैरह हर वर्ष इसकी शोभा बढ़ाने पधारते हैं। इन तमाशों में सत्ताधारियों के चिंतन के अनुरूप कभी राष्ट्रप्रेम झलकता है, कभी धर्मनिरपेक्षता, कभी विश्वबंधुत्व।

हिंदी साहित्य की चर्चा भी अंग्रेजी में करने का हुनर जिनको हासिल है, वही ‘लिट-फैस्ट’ के नायक हैं। इसके आयोजकों की ख्याति अपने साहित्य-प्रेम के कारण है। दीगर है कि उन्होंने आजतक हिंदी या अंग्रेजी के साहित्य को पढ़ने की जहमत कभी नहीं उठाई है। कोई का दारू का ठेका है तो किसी की कपड़े की आढ़त। ऐसे ‘गँवार विद्वानों’ में हिल-मिलकर साहित्य सेवा का आकर्षण भी है। लिट-फैस्ट भी यही उपलब्धि क्या कम है? साहित्य अब पुस्तक मेले की चाट-पकौड़ी और लिट-फैस्ट के संर्दभ तक सीमित है। मनोरंजन के लिए टी.वी. नहीं देखा, दोस्तों के साथ पुस्तक मेला देख लिया या लिट-फैस्ट में अकेले स्वयं को प्रदर्शित कर लिया, सामाजिक श्रेष्ठता की तलाश में। हमारे मन में हीनता की ऐसी प्रबल ग्रंथि है कि श्रेष्ठता की तलाश में हम पाश्चात्य साहित्य की दुहाई देते हैं और इसीलिए लिट-फैस्ट में दिखने को व्याकुल रहते हैं। कोई पहचान ले तो कहना ही क्या?

मुल्क का मौसम बदलता रहता है। यों अपने देश का एक अन्य खुशनुमा मौसम भी है। यह हमारे प्रजातंत्र की पहचान है। किसी राज्य में चुनाव होते हैं, तो कहीं उपचुनाव। पूरे वर्ष, कहीं-न-कहीं चुनावी मौसम चलता ही रहता है। जो दल या नेता जनता को भाषण, वादे, प्रलोभन, आश्वासन आदि से ठगने में जितना सफल है, वह इस प्रजातंत्र के उत्सव में उतना ही कामयाब है। बात सब जनहित की करते हैं, जोर अपनी जात पर रहता है। हर दल की मान्यता है कि उसका विरोधी सांप्रदायिक है। दलित उत्पीड़न का सबसे अधिक शोर वह मचाते हैं, जिन्होंने उनके सुधार के लिए क्या किया अपने शासनकाल में उस पर आज भी प्रश्नचिह्न लगा हुआ है। उनकी परंपरा राजसी है, नजरिया सामंती। परिवार के बाहर का कोई प्रधानमंत्री उन्हें बर्दाश्त नहीं है। नहीं तो स्वर्गीय राव के आर्थिक सुधारों को भुलाने के सक्रिय प्रयास वह क्यों करते? सत्ता की आला कुरसी पर उनका जन्मसिद्ध अधिकार है। कोई अन्य इस पर बैठे तो उनकी अनुमति लेकर अन्यथा उसका भविष्य सुरक्षित नहीं है।

ऐसे चुनावी मौसम देश का सर्वाधिक चर्चित मौसम है। कहीं उपचुनाव तक हो तो टी.वी. से लेकर समाचार-पत्र तक, बजट के समान उसके नतीजे पर यों बहस करते हैं, जैसे देश की सरकार का भविष्य उसी पर निर्भर है। हर किस्म के गठजोड़ का आकलन किया जाता है, इस निष्कर्ष के साथ कि अब सत्ता दल का सूरज डूबनेवाला है।

सिर्फ इस उम्मीद भर से दफ्तरों में काम ठप है। अफसर अभी से पुराने संपर्कों को साधने में लगे हैं। पत्रकारों को फिर से उपहारों और विदेशी यात्राओं की आशा जगी है, दूसरे सरकारी प्रधान के साथ। वर्तमान ने तो कितनी नाइनसाफी की है, इस पावन परंपरा को तोड़कर। उसकी इमेज अच्छी बने तो कैसे बने? यों इस मौसम में भी कभी वादों की बाढ़ आती है, कभी नतीजों का सूखा पड़ता है। कभी इनसान महँगाई से ठिठुरता है तो कभी भ्रष्टाचार के बुखार से। कौन कहे, इस कथन में कितनी सच्चाई है कि निर्धन को किसी मौसम में चैन नहीं है? चुनावी मौसम भी, कभी धन, कभी आरक्षण जैसे अधिकतर खोखले आश्वासन देकर चला जाता है। जनता फिर ठगी-की-ठगी रह जाती है। गरीबों का सफर क्या सिर्फ सिफर से सिफर तक का है?

९/५, राणा प्रताप मार्ग
लखनऊ-२२६००१
दूरभाष: ९४१५३४८४३८
—गोपाल चतुर्वेदी

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