न्यायपालिका के बदलते आयाम

इस वर्ष की १२ जनवरी से शीर्ष न्यायालय काफी सुर्खियों में रहा है। कारण कि अप्रत्याशित रूप से यकायक शीर्ष न्यायालय के चार वरिष्ठ न्यायाधीशों ने जस्टिस चेमलेश्वर के निवासस्थान पर एक प्रेसवार्त्ता आयोजित की, जो उस समय मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के बाद सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश थे। यह भी एक संयोग था कि जस्टिस मिश्रा और जस्टिस चेमलेश्वर का शपथ-ग्रहण समारोह एक दिन ही हुआ, किंतु जस्टिस मिश्रा का नाम राष्ट्रपति के आदेश में शीर्ष न्यायालय के प्रस्तावित न्यायाधीश के रूप में पहले था, अतएव वरिष्ठता सूची में जस्टिस दीपक मिश्रा पहले शपथ ग्रहण कर सीनियर हो गए। उम्र में कुछ बड़े होने के कारण जस्टिस चेमलेश्वर का सेवा-निवृत्तकाल पहले था। जस्टिस चेमलेश्वर ने जब जस्टिस ठाकुर मुख्य न्यायाधीश कॉलेजियम पद्धति को अपारदर्शी कहा था। पाँच वरिष्ठ न्यायाधीशों का कालेजियम सर्वोच्च न्यायालय और उच्चन्यायालयों के न्यायाधीशों का चयन कर नियुक्ति के लिए राष्ट्रपति को प्रस्तावित करता है। इसी कारण उन्होंने कॉलेजियम को चयन प्रक्रिया से भी अपने को अलग कर लिया था। तत्कालीन मुख्य न्यायमूर्ति टी.एस. ठाकुर के बहुत अनुरोध करने पर भी वे कॉलेजियम की चयन प्रक्रिया में भाग लेने के लिए सहमत नहीं हुए। उस समय के चीफ जस्टिस केहर सिंह को पीठ के सदस्य के नाते संसद् द्वारा सर्व समिति से पारित न्यायिक कमीशन कानून को संवैधानिक माना था, जबकि अन्य चार जजों ने उसे बहुमत से असंवैधानिक करार दिया। उनका असहमति का माइनॉरिटी निर्णय था। वे कॉलेजियम की चयन प्रणाली को उचित नहीं मानते थे। जस्टिस चेमलेश्वर ने कॉलेजियम को दोषपूर्ण मानते हुए इसमें भाग लेने से इनकार किया था, तभी से कानूनी क्षेत्र में विवाद शुरू हो गया था। कुछ विधिविज्ञों ने उनके दृष्टिकोण को सही कहा, कुछ ने समर्थन नहीं किया। कॉलेजियम के एकमत होकर उच्च न्यायालयों और शीर्ष न्यायालय के न्यायाधीशों के चयन पर मतभेद को एक वरिष्ठ न्यायविज्ञ श्री नारोमन ने कहा कि यह न्यायपालिका के किले में एक दरार की तरह है और उसके परिणाम अच्छे नहीं होंगे। जस्टिस चेमलेश्वर का मत था कि चयन प्रक्रिया खुली होनी चाहिए और कॉलेजियम के सदस्य को अपनी राय लिखकर देनी चाहिए कि वे क्यों किसी का समर्थन करते हैं और क्यों विरोध। इस अपारदर्शिता के कारण कॉलेजियम की चयन प्रणाली पर उँगलियाँ उठाई जा रही थीं। किंतु इस विषय में जस्टिस चेमलेश्वर अपनी राय पर दृढ़ रहे। इस प्रकरण पर हम इस स्तंभ में समय-समय पर विचार करते रहे हैं। अतः अधिक विस्तार में जाने की आवश्यकता नहीं है।

१२ जनवरी की अप्रत्याशित प्रेस कॉन्फ्रेंस के कारण न्यायिक क्षेत्र के विवाद ने उग्र रूप धारण कर लिया। इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में जजों ने अलग-अलग ढंग से कहा कि उन्हें यह अप्रत्याशित कदम उठाना पड़ा, क्योंकि उनके अनुसार न्यायिक स्वतंत्रता और लोकतंत्र खतरे में है। वे प्रेस कॉन्फ्रेंस द्वारा जनता को आगाह कर रहे हैं, और यदि ऐसा नहीं करते तो आनेवाली पीढि़याँ उन्हें दोष देतीं। दो शिकायतें प्रेस-कॉन्फ्रेंस में रखी गईं, उनमें मुख्य थी—चीफ जस्टिस संवेदनशील मामलों में वरिष्ठ जजों को शामिल नहीं करते हैं। दूसरे, मामला जज लोया की आकस्मिक मृत्य का था और उनके अनुसार उसकी पुनः जाँच होनी चाहिए। दूसरा मामला गौण हो गया और बाद में चीफ जस्टिस मिश्रा की बेंच ने सर्वमत से निर्णय दे दिया कि इस मामले में किसी प्रकार के शक-सुबहा की गुंजाइश नहीं है। जज लोया की मृत्यु हृदय गति रुक जाने से हुई थी। बेंच के निर्णय में वरिष्ठ जजों की अवहेलना हो रही है। यह ठीक है कि चीफ जस्टिस मास्टर ऑफ रोल है, यह शीर्ष न्यायालय पहले कई बार निर्णय कर चुकी है, बेंच बनाना उनके अधिकार में है, किंतु वरिष्ठ न्यायाधीशों की अवहेलना नहीं होनी चाहिए। इन जजों का कहना था कि वे लिखकर और बातचीत करके भी चीफ जस्टिस को अपने दृष्टिकोण से सहमत नहीं करा सके, इसीलिए जनता से अपील के रूप में वस्तुस्थिति को स्पष्ट करने के लिए उन्हें प्रेस-कॉन्फ्रेंस बुलानी पड़ी। वैसे जनता क्या कर सकती है, यह समझ के बाहर है। जिसे सिविल सोसाइटी कहा जाता है,  उसकी भी सीमाएँ हैं। संविधान के अनुसार शासन के कार्य तो एक-दूसरे के अधिकार क्षेत्र को ध्यान में रखते हुए विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका को ही अंत में करना है। इसके बाद न्यायपालिका काफी विवादग्रस्त हो गई। दोनों दृष्टिकोणों से मीडिया में बहस होने लगी, आलेख आने लगे। कुछ लोग चीफ जस्टिस के पीछे पड़ गए। भाँति-भाँति के लेख प्रकाशित हुए। मुख्य न्यायाधीश चुप रहे और कोई भी वक्तव्य स्पष्टीकरण का उन्होंने नहीं दिया। यह ठीक ही रहा, क्योंकि उनके स्पष्टीकरण या वक्तव्य से विवाद और रंग ले लेता। फिर भी विरोधी दलों में कांग्रेस और कम्युनिस्ट दलों के सदस्य मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग का प्रस्ताव ले आए। कांग्रेस में भी इस पर एकमत नहीं था। पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने अभियोग-पत्र पर हस्ताक्षर नहीं किए। विरोधी दलों में बीएसपी, तृणमूल कांग्रेस तथा बीजू जनता दल आदि अन्य दल भी इस महाभियोग के अभियान में शामिल नहीं हुए। राज्यसभा के अध्यक्ष एवं देश के उपराष्ट्रपति ने महाभियोग के प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया और उसके कारणों को स्पष्ट भी कर दिया। यह खेदजनक है कि पहली बार एक शीर्ष न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति के खिलाफ इस प्रकार की चेष्टा कुछ सांसदों द्वारा की गई। नतीजा कुछ भी नहीं निकला। हाँ, शीर्ष न्यायालय की गरिमा को धक्का अवश्य लगा।

यही नहीं, फिर कानाफूसी होने लगी कि चूँकि जस्टिस रंजन गोगोई ने १२ जनवरी की प्रेस कॉन्फ्रेंस में भाग लिया था, अतएव चीफ जस्टिस मिश्रा के उपरांत शायद उनका नाम मुख्य न्यायाधीश के लिए न प्रस्तावित किया जाए। यद्यपि वे वरिष्ठता सूची में उसके अधिकारी हैं। इस पर भी मीडिया में काफी उथल-पुथल रही। परिपाटी है कि शीर्ष न्यायालय का सेवानिवृत्त होनेवाला मुख्य न्यायमूर्ति पहले अपने उत्तराधिकारी का नाम प्रस्तावित करता है राष्ट्रपति महोदय की स्वीकृति के लिए। आपातकाल के समय और उसके पहले भी इस परंपरा का उल्लंघन उस समय की सरकार द्वारा हुआ और उसकी बहुत आलोचना भी हुई। लेकिन सब शंकाएँ दूर हो गईं, जब चीफ जस्टिस मिश्रा ने परंपरा का अनुपालन करते हुए जस्टिस रंजन गगोई के नाम का सुझाव माननीय राष्ट्रपति महोदय को अगले मुख्य न्यायाधीश के रूप में प्रेषित कर दिया, जिसे राष्ट्रपति महोदय ने स्वीकार कर लिया। २ अक्तूबर को मुख्य न्यायाधीश मिश्रा का कार्यकाल समाप्त हुआ। ३ अक्तूबर को राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद ने जस्टिस रंजन गोगोई को सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की सपथ दिलाई। आशा है कि कुछ पुराने विवादों और १२ जनवरी को चार जजों द्वारा उठाए गऐ मुद्दों, विशेषता या संवेदनशील एवं महत्त्वपूर्ण मुकदमों को सुनने के लिए बेंचों के बनाने विषयक प्रश्न का हल नए मुख्य न्यायाधीश गोगोई निकाल लेंगे। चीफ जस्टिस रंजन गोगोई एक अनुभवी, विद्वान् और सुलझे हुए न्यायाधीश हैं। उनके पिता असम के मुख्यमंत्री रहे हैं। वे स्वयं जनता के सरोकारों से भली-भाँति परिचित हैं। अपने विषय में उन्होंने कहा कि जैसे वह हैं। अपनी अस्मिता, व्यक्तित्व और अपने विचारों के प्रति प्रतिबद्धता होनी ही चाहिए। कुछ टिप्पणीकारों ने प्रश्न उठाए हैं कि शायद पिछले कुछ फैसलों को ध्यान में रखते हुए कि क्या अब फैसले आइडियोलॉजिकल अर्थात् व्यक्तिगत विचारधारा द्वारा निर्धारित होंगे अथवा संविधान और कानूनों की भाषा के अनुसार। यह ठीक है कि संविधान गतिशील है, वह जड़ नहीं है, उभरती हुई सामाजिक समस्याओं को नई परिस्थितियों में आँकना होता है, किंतु फिर भी संविधान की स्थिरता, शुचिता और विश्वसनीयता बरकरार रहनी चाहिए। संविधान निर्माताओं का क्या मंतव्य था, उसकी व्याख्या बदलती परिस्थितियों में करना कठिन कार्य है, जिसका दायित्व शीर्ष न्यायालय का है। चीफ जस्टिस गोगोई ने अदालतों में बढ़ते हुए मुकदमों के प्रति चिंता व्यक्त की है। उन्होंने उच्च न्यायालयों समेत सभी से कहा कि जब अदालतों केकार्य करने केदिन हों, तो वे अन्य कार्यक्रमों में न जाएँ। इसका असर होगा। उन्होंने कुछ व्यर्थ की तथाकथित जन-याचनाओं पर नकेल लगाई है; शीघ्रता से उनकेमुकदमे सुने जाएँ, इसकी होड़ सोमवार को शीर्ष न्यायालय खुलतेही अधिवक्ताओं द्वारा लग जाती थी, उसको नियंत्रित करने की कोशिश की है। ये सब कदम स्वागत-योग्य हैं।

शीर्ष न्यायालय के विचाराधीन कई संवेदनशील मामले हैं। उनमें हैं—राममंदिर और बाबरी मसजिद का विवाद, जिसमें इलाहाबाद उच्च न्यायालय के तीन जजों की बेंच के निर्णय को चुनौती दी गई है। वैसे शीर्ष न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया है कि वह इस विवादित मामले को धर्म या आस्था के आधार पर नहीं, बल्कि मालकियत के आधार पर देखेंगे कि किसका हक बैठता है। एक अन्य मामला है शीर्ष न्यायालय के पुनर्निरीक्षण था, जिसमें कहा गया था कि मसजिद में नमाज पढ़ना इसलाम का अभिन्न अंग नहीं है। अभी तक शीर्ष न्यायालय के अनुसार नमाज कहीं भी पढ़ी जा सकती है। इसको शीर्ष न्यायालय ने पाँच जजों की बड़ी पीठ में भेजने से इनकार कर दिया। एक पेचीदा मामला और शीर्ष न्यायालय के सामने है, वह है केंद्र सरकार के तीन तलाक वाले सरकार के अध्यादेश के विषय में। शीर्ष न्यायालय ने निर्णय दिया था कि तीन तलाक इसलाम का अंग नहीं है, इसमें संविधान के समता का सिद्धांत भी निहित है। मुसलिम महिलाओं के अधिकार का सवाल भी है। यह सरकारी बिल के संसदीय समिति के विचाराधीन था, किंतु अब राष्ट्रपति का अध्यादेश जारी हो गया है। इसकी वैधानिकता को ही चुनौती दी गई है। विशेषतया इस कारण मुसलिम विधिवेत्ताओं और कुछ मुसलिम संगठनों का विरोध है कि तीन तलाक को अपराध घोषित कर दिया गया है, जब इसलाम में शादी एक सिविल करार, अनुबंध अथवा कॉण्ट्रेक्ट है। इन विवादित विषयों की राजनैतिक पृष्ठभूमि भी है। अतएव इनके फैसलों में शीघ्रता की आवश्यक है। जो भी फैसले संविधान के अनुसार आएँगे, उनके दीर्घकालीन प्रभावों की संभावनाओं से इनकार नहीं किया जा सकता है।

कानून और मानसिकता सामंजस्य

पिछले दिनों शीर्ष न्यायलय ने कई महत्त्वपूर्ण निर्णय लिये हैं, जिनका अनुपालन कठिनाइयाँ पैदा कर सकता है। वैसे संविधान सर्वोपरि है। जो फैसला शीर्ष न्यायालय ने लिया, वही देश का कानून है और उसका अनुपालन करवाना केंद्र व राज्य सरकारों का संवैधानिक दायित्व है। दिक्कत वहाँ आती है, जहाँ समाज की मानसिकता और कानून के बीच एक गहरी खाई हो। पहले समाज की मानसिकता बदले कि कानून बदले? यह वही सवाल है कि पहले अंडा या मुरगी? कानून और सामाजिक परिवर्तन, दोनों का साथ-साथ चलना जरूरी है। उसी स्थिति में कानून प्रभावी होता है। शारदा ऐक्ट के होते हुए भी राजस्थान तथा अन्य राज्यों में खुलेआम कम उम्र के बच्चों के विवाह होते हैं। कानून मजबूर है; इसलिए हम निरंतर इस स्तंभ में जोर देते रहते हैं कि स्वतंत्रता प्राप्त होने के उछाह में हमें यह भ्रम हो गया कि अब स्वयमेव देश की सामाजिक समस्याएँ सुलझ जाएँगी। हमारे समाज-सुधार, सामाजिक पुनर्जागरण, सामाजिक नवोत्थान की प्रक्रिया ही अधूरी रह गई, जिसका दुष्परिणाम देश आज भुगत रहा है। अधिकतर सामाजिक सुधारवादी  संगठन ढीले हो गए, निष्क्रिय हो गए अथवा केवल एक विषय को लेकर चल पडे़। एक और नवजागरण की आवश्यकता है। राजनेताओं को इसके लिए समय कहाँ? राजनैतिक दल कभी-कभी घडि़यालू आँसू बहा लेते हैं। हमारे देश के बडे़-बड़े मठाधीश, शंकराचार्य आदि अपने अरबों की संपत्ति के प्रबंधन में व्यस्त या चैन की नींद सो रहे हैं। कभी-कभी अखबारों और टी.वी. पर नसीहत देते दिखाई दे जाते हैं, जिसे देखकर लोग टी.वी. बंद कर देते हैं। वे स्वयं जनता और सरकार से अपने आडंबरी जीवन-शैली में सम्मान के भूखे हैं। कुछ हैं—रामफल, तथाकथित सच्चा सौदावाला गुरमीत सिंह, आशाराम जैसे अनेक भेडि़ये, जिनकी करतूतों का पर्दाफाश हो गया है। सामाजिक पुनरुत्थान के लिए कहाँ से लाएँ राजा राममोहन राय, स्वामी दयानंद, स्वामी विवेकानंद,  ज्योतिबा फूले, आंध्र के वीर शिलिंगम, ईश्वरचंद्र विद्यासागर, नारायण गुरु, महात्मा गांधी जैसे जीवट के मार्गदर्शक, जिनकी कथनी-करनी में भेद नहीं और जो जनोद्धार के लिए अपने जीवन को होम देने की क्षमता रखते थे। ऐसे समय में वे समाज-सुधार के प्रति समर्पित थे, जब शासन विदेशी था, रजवाडे़ दासानुदास थे और आज की तरह प्रचार के साधन भी नहीं थे। ‘एकला चलो’ उनके जीवन का मूलमंत्र था। अथक आत्मविश्वास और जनोत्थान की प्रेरणा ही उनके संबल थे। जिसे हम भक्तिकाल कहते हैं, उसके संत और महात्मा किस तरह दक्षिण, उत्तर, पश्चिम से पूर्व तक घूम-घूमकर जन-जागरण का प्रयास करते रहे। किसका-किसका नाम लिया जाए। यह लंबी कहानी है। अब तो केवल हर नागरिक को विचार करना है, प्रयास करना है, स्वयं में वह परिवर्तन लाए, जो समाज में लाना आवश्यक है। निज प्रयास और निर्भीकता ही अब पथ-प्रदर्शक हो सकते हैं। वे ही साधन और साध्य हैं पुनरुत्थान के।

सबरीमाला में चुनाव क्यों?

आजकल एक विचित्र बात देखने में आ रही है—घोर विरोध शीर्ष न्यायालय के निर्णय सबरीमाला मंदिर में १० से ५० वर्ष की महिलाओं के प्रवेश के विषय में। महिलाओं के समता, समानाधिकार और मौलिक अधिकारों का सवाल है। सब मंदिरों में उनको जाने का अधिकार होना चाहिए, यह महिलाओं और सब पढे़-लिखे वर्ग की माँग रही है। मुसलिम, ईसाई, पारसी आदि सभी धर्मों की अनुयायी महिलाओं में समता की माँग है। मुंबई में मुसलिम महिलाओं को हजरत अली की मजार में जाने की सुविधा संघर्ष के बाद मिली। इसी प्रकार लंबे संघर्ष के बाद महाराष्ट्र के कई मंदिरों में महिलाओं के प्रवेश पर से अदालत द्वारा निषेध हटा। अब केरल में शीर्ष न्यायालय के निर्णय का विरोध महिलाओं द्वारा हो रहा है। कहा जाता है कि गुलाम को अपनी जंजीरों से प्यार हो जाता है। पिंजडे़ का तोता उड़ना नहीं चाहता।

शायद विरोध का कारण वहाँ की कम्युनिस्ट सरकार के कार्य करने के ढंग का एह प्रकार से विरोध है। विरोध की राजनीति में जाना अनावश्यक है। मंदिर खुल जाने पर भी सबरीमाला में महिलाएँ जा नहीं पा रही हैं, सच्चाई यह है किस प्रकार से राज्य सरकार शीर्ष न्यायालय केनिर्णय का अनुपालन करवा पाएगी, यह विकट समस्या होे गई है। जबरदस्त तनाव है। आवश्यकता सुबुद्धि, आत्म-नियंत्रण और संतुलन की है, ताकि शांति बनी रहे।

कार्यपालिका का दायित्वमान

एक और प्रश्न ध्यान देने योग्य है। ऐसा मालूम होता है कि प्रशासन में चुस्ती की जगह सुस्ती और सावधानी की जगह लापरवाही घर करती जाती है। आए दिन उच्च न्यायालय और शीर्ष न्यायालय काफी सख्त एवं चुभती हुई टिप्पणियाँ करते दिखते हैं, जब जनता की अभाव और अभियोग विषयक याचिकाएँ न्यायालयों के सामने आती हैं। दिल्ली में कूड़ा न हटाने के मामले में कहना पड़ा कि उसे  उप-राज्यपाल के यहाँ क्यों न इकट्ठा करके डाला जाए! यह इस बात का परिचायक है कि अदालत भी खिसियाहट महसूस करती हैं कि उनके आदेशों की अवहेलना हो रही है। सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय से कहा था कि आरोपी विधायकों और सांसदों के मुकदमे का निपटारा शीघ्र होना चाहिए। शीर्ष अदालत ने जल्दी निपटारे के लिए विशेष अदालतें, फास्ट ट्रैक कोर्ट्स स्थापित करने के लिए कहा। कुछ दिनों के बाद शीर्ष न्यायालय को सरकार को लताड़ना पड़ा कि केवल बारह ऐसी अदालतों की स्थापना हुई, जो बिल्कुल नाकाफी हैं। अतएव शीर्ष न्यायालय को फिर एक तारीख निश्चित करनी पड़ी कि उक्त तारीख तक ऐसी अदालतें स्थापित होनी चाहिए। उच्च न्यायालय और शीर्ष न्यायालय को समय-समय पर धमकी देनी पड़ती है कि यदि अबकी कोताही हुई तो राज्य के मुख्य सचिव, डी.जी.पी. अथवा केंद्र के गृह सचिव को पूरी जानकारी स्वयं आकर देनी पडे़गी। इन सबसे शासन की किरकिरी होती है। जनता की दृष्टि में अधिकारियों की विश्वसनीयता और रुतबे में गिरावट आती है। इस विषय में राज्य सरकारों और केंद्रीय मंत्रालयों को अधिक सावधान व संवेदनशील होना चाहिए। इन न्यायालयों के क्या आदेश हैं, उनके अनुपालन का दायित्व जिन अधिकारियों पर है, उन पर अंकुश लगाना चाहिए। यही नहीं, चूँकि जनता के अभाव-अभियोगों की ओर इन मामलों से संबंधित अधिकारी ध्यान नहीं देते, बाहर के दवाब के कारण अथवा भ्रष्टाचार के कारण, और उच्च अधिकारी तक उनकी पहुँच नहीं हो पाती है, अतएव जनता भी सोचती है कि केवल अदालत का ही सहारा है। वकीलों की कमी नहीं, उनकी पौ बारह है। बिना इजाजत के मकान बनाना, सरकारी जमीनों पर कब्जा कर लेना, खतरेवाले पुराने मकानों को न गिराना आदि सैकड़ों ऐसे मामले हैं, जो पुलिस तथा स्थानीय अधिकारियों के नाक के नीचे होते हैं, पर कोई परवाह नहीं करता। जब बड़ा हादसा हो जाता है, तब प्रशासन मीडिया या अदालत की चपत के बाद कुछ समय के लिए हरकत में आते हैं, और इसके बाद फिर कुंभकर्णी नींद अगली दुर्घटना तक। इसकी आखिरकार जिम्मेदारी सत्तारूढ़ विभागीय अधिकारियों और मंत्रियों की ही है। न्यायपालिका लक्ष्मण रेखा का उल्लंघन कर रही है, यह रोना आखिर कब तक चलेगा। कभी-कभी ऐसा आभास होता है कि देश में शासन न्यायपालिका ही करेगी, विधायिका और कार्यपालिका केवल न्यायपालिका का मुँह ताकेंगी और उसकी लताड़ की अनसुनी ही करेंगी। न्यायपालिका का निरंतर हस्तक्षेप सुशासन का स्थायी रास्ता नहीं हो सकता है। आवश्यकता है कार्यपालिका को विशेष आत्मावलोकन और आत्ममंथन करने की।

पिछली सदी के चौथे दशक में हम इलाहाबाद विश्वविद्यालय के विद्यार्थी थे। विश्वविद्यालय खासकर हॉस्टलों में क्लब एवं एसोसिएशन होते थे। समय-समय पर मुख्य न्यायपालिका से विशिष्ट व्यक्तियों को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया जाता था। कभी वे किसी गोष्ठी के अध्यक्ष होते थे, कभी किसी विषय पर भाषण देते। इलाहाबाद में विश्वविद्यालय के शिक्षकों के अतिरिक्त बौद्धिक लोगों का तबका था बार में, यानी प्रसिद्ध वकीलों में अथवा हाई कोर्ट के जजों में। कभी-कभी पं. हृदयनाथ कुंजरू जैसे समाजसेवी और राजनेता भी उपलब्ध हो जाते थे। उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को अकसर आमंत्रित करते थे। वे सत्ता के प्रतीक और विद्वत्ता के भी। उनका कई विषयों पर भाषण होता था विद्वत्तापूर्ण और स्पष्ट। मुकदमों की सुनवाई पर अनावश्यक टीका-टिप्पणी भी नहीं होती थी। व्यर्थ की नोक-झोंक की खबरें नहीं केबराबर होती थीं। इसी प्रकार कभी न्यायाधीशों को साक्षात्कार देते या प्रेस को कुछ कह रहे हों, यह देखने में नहीं आया। अदालत में सुनवाई के समय वे वकीलों से यदि आवश्यक हुआ स्पष्टीकरण माँगेंगे। किंतु किसी प्रकार की टीका-टिप्पणी, जो विवादित मामले से संबंधित हो, न सुनने को मिलती थी, न देखने को। न्यायालय के निर्णय में ही उनके विचार जनमे और पढ़ने को मिलते थे। पर अब परिदृश्य बदलता जा रहा है, ऐसा मालूम होता है। अनेक विषयों पर न्यायाधीश अदालत के बाहर के भाषण होते हैं। कभी-कभी विवादित मसले पर आलेख भी प्रकाशित होते हैं। साक्षात्कार समाचार-पत्रों में और टी.वी. पर देखने को मिलते हैं। संविधान के लागू होने पर प्रारंभ में यह देखने को नहीं मिला। आपातकाल के बाद से शायद संवैधानिक न्यायालय, हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट अधिक मुखर हो गए। शायद यह लोकतंत्र की माँग हो। यह भी कहा जा सकता है कि न्यायाधीश संभवतः अपने अभिव्यक्ति के अधिकार का ही उपयोग कर रहे हैं, जो वे जन-साधारण को उपलब्ध कराते हैं। हो सकता है कि लोकतंत्र में ऐसा अपेक्षित और उचित हो। अब ऐसा नहीं है कि न्यायाधीश कम दिखाई दें या कम सुनाई दें। अब वे दिखते भी काफी हैं तथा और सुनाई भी काफी देते हैं।

गांधी को खोजे कहाँ?

महात्मा गांधी की १५०वीं जयंती का समारोह २ अक्तूबर से प्रारंभ हो गया है। केंद्र सरकार का अपना कार्यक्रम है। राज्य सरकारें भी अपने कार्यक्रम बना रही हैं। हर प्रकार के संस्थान, शिक्षण संस्थाएँ और सिविल सोसाइटी (नागरिक समाज) की संस्थाएँ भी अपने-अपने ढंग से गांधीजी की १५०वीं जयंती मनाने का आयोजन कर रहे हैं। कुछ पूरे वर्ष हर मास किसी प्रतिष्ठित विद्वान् द्वारा एक जन-विषयक भाषण आयोजित करेंगे। २ अक्तूबर के उपरांत जो समाचार प्रकाशित हुए हैं, उससे भविष्य में होनेवाली गतिविधियों की झलक दिखाई देती है। नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने द्वितीय विश्वयुद्ध के समय राष्ट्रपिता के रूप में गांधीजी को संबोधित किया था, उसमें बड़ी सार्थकता है। अमरीका की प्रसिद्ध ‘टाइम’ मैगजीन ने १९३० में नमक सत्याग्रह के बाद उनको ‘मैन ऑफ द इयर’ का दर्जा दिया। अमरीका में रेवरेंड जे.एच. होम्स ने १९२० में ही उनको विश्व का सबसे महान् व्यक्ति घोषित किया था। महात्मा गांधी ने भारतीय मानस पर एक विशेष छाप छोड़ी। इसको परिभाषित करना कठिन है। कोई भी प्रश्न चाहे समाज का हो या व्यक्ति का, ऐसा नहीं है कि गांधीजी ने उस विषय पर अपने विचार प्रकट न किए हों। जो भी उनको पत्र लिखता, उसका वह उत्तर देते और उसे सभी के जानने के लिए प्रकाशित भी कर देते थे। भाषणों और अपने समाचार-पत्रों में वे भाँति-भाँति के प्रश्नों और शंकाओं पर विचार प्रकट करते।

उनका समग्र साहित्य १०० ग्रंथों में छपा है। नई सामग्री फिर भी निकलती रहती है। उनके कृतित्व, व्यक्तित्व और विरोध विचारों के विषय में भी काफी साहित्य है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने २ अक्तूबर को ‘अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस’ घोषित किया है। वैसे दिलचस्प बात है कि जहाँ तक नोबल शांति का पुरस्कार न टालस्टॉय को दिया गया और न महात्मा गांधी को, जो पिछली सदी के सबसे बड़े शांतिदूत रहे थे। जिन्हें शुद्ध गांधीवादी कहा जाता था, वह पीढ़ी तो कब की बीत गई। फिर भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और देश में भी गांधी की देन की चर्चा होती रहती है। इस वर्ष शायद यह और अधिक घनीभूत ढंग से होगी।

प्रतिदिन देश में व्याप्त विसंगतियाँ और विकृतियाँ स्वाभाविक रूप से प्रश्न प्रस्तुत करती हैं कि गांधी को कहाँ खोजा जाए। हर क्षेत्र में विडंबनाएँ दिखाई देती हैं। यह मानना पड़ेगा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का स्वच्छता अभियान काफी हद तक कामयाब रहा है। इसकी उपयोगिता का भाव जन-साधारण में हो रहा है। बालक-बालिकाओं में स्वच्छता के प्रति आकर्षण उत्पन्न हो रहा है। यह मान लेना कि अभियान का उद्देश्य पूरा हो गया है, केवल आत्मप्रवंचना होगी। समस्या विकट और विशाल है। अभियान जारी रखना होगा। इसका सीधा संबंध स्वास्थ्य से है। शौचालय और मूत्रालय निर्माण की निगरानी निरंतन होनी चाहिए। इधर एक विसंगति है कि अभी भी जगह-जगह से गंदगी होने के समाचार मिलते हैं। यही नहीं, शहरों में सीवर, बंद नालियाँ साफ करने में गरीब सफाई कर्मचारियों की जानें प्रतिवर्ष जाती हैं। यह संदेहास्पद है कि राज्य सरकारें या म्यूनिसपैलिटी इन दुर्घटनाओं से वास्तव में चिंतित हैं। इसी प्रकार कूड़ा-कचरा के अंबार भी जगह-जगह दिखाई देते हैं, जन-साधारण जानता है कि कौन इसके लिए उत्तरदायी है। वह फिर भी अपने को असहाय पाता है। इसका एक उपाय है, जिसे Associational Democracy कहते हैं, जिसमें सिविल सोसाइटी सक्रिय होकर जवाबदेही माँगेगी। बात Participating Democracy की होती है, यानी जन की भागीदारी। यह एक जुमला बन जाता है, सत्यता नहीं। वास्तविकता नहीं है। केवल चुनाव के पहले ही नेता जनता की खुशामद में जाते हैं। यदि निरंतर संपर्क रखें तो तरह-तरह की यात्राओं की न आवश्यकता रहे, न धन का अपव्य हो।

कुछ उदाहरण लीजिए, जिससे पता चलता है कि कितनी सामाजिक कुरूपताएँ और विद्रूपताएँ व्याप्त हैं। गांधी छुआछूत को समाज का कोढ़ कहते थे। इस रोग का निदान वे स्वराज प्राप्ति से अधिक महत्त्व का कहते थे। अब भी समाज में अनटचेबिलिटी, अस्पृश्यता भयंकर रूप में व्याप्त  है। स्कूलों में अछूत और दलित अलग बैठाए जाते हैं तथा तरह-तरह के अत्याचार होते हैं। वे शादी में घोड़े पर नहीं बैठ सकते, वे अपने गाँव से अपनी बरात का जुलूस नहीं निकाल सकते हैं। यद्यपि संविधान के अनुसार छुआछूत समाप्त हो गई है। उनसे मरे जानवरों के उठाने की अपेक्षा की जाती है और फिर उनकी पिटाई होती है कि गाय को उन्होंने मार दिया। वे धर्म-परिवर्तन कर लें तो उनकी तरफ तथाकथित उच्च वर्ग के लोग आँख उठाने की हिम्मत नहीं कर सकते। उनकी महिलाओं और बालिकाओं के साथ ज्यादतियाँ होती हैं, पर पुलिस आँख मूँद लेती है।

वैसे भी देखिए कि कैसा सामाजिक विघटन हो रहा है। दो साल की बच्चियों से लेकर वृद्ध महिलाओं के साथ बलात्कार के समाचार नित-प्रति समाचार-पत्रों में पढ़ते हैं। निरीह बच्चियों के साथ बलात्कार और फिर हत्या। भ्रूण हत्या का सिलसिला जारी है। नवजात बच्चियाँ कूड़े के ढेर पर पाई जाती हैं, कभी मरी, कभी साँस लेती हुई। यह दशा है देश में, जहाँ महिलाओं को देवीस्वरूप माना गया है। प्रधानमंत्री मोदी ने ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ का नारा दिया, किंतु उनकी सुरक्षा नहीं। स्कूल, कॉलेज जाते समय वे यौन उत्पीड़न की शिकार होती हैं। सजा दिलाने की बात तो दूर, प्राथमिकी लिखाने में भी पुलिस आनाकानी करती है। महात्मा गांधी महिलाओं को परदे से निकालकर जन-जीवन में लाए। आशा बँधी कि वे समाज का नेतृत्व करेंगी, स्वावलंबी होकर देश के विकास में भागीदार होंगी, पर उनको चिंता है अपनी सुरक्षा और इज्जत बचाने की।

अमरीका के बाद अब यहाँ भी ‘मी टू’ का आंदोेलन प्रारंभ हो गया है। सर्वोच्च न्यायालय ने कामकाजी स्थानों पर महिलाओं की सुरक्षा के नियम बनाए थे, क्या अनुचित व्यवहार कहलाएगा उसको भी सूचीबद्ध किया था। अब गड़े मुरदे उखाड़े जा रहे हैं, कहाँ तक यह प्रक्रिया जाती है, देखने की बात है। अच्छा हुआ, गंदगी बाहर आ गई है। पढ़ी-लिखी महिलाओं ने हिम्मत की और उनके साथ हुए यौन दुर्व्यवहार के विवरण दिए। पहले आंध्र में एक एक्ट्रेस ने इस मामले को उठाया, पर उसकी अनदेखी कर दी गई। एक वरिष्ठ पत्रकार और मंत्री, यू.पी.ए. के पूर्व मंत्री, कई डायरेक्टर, संगीतज्ञ, प्रसिद्ध अभिनेता आदि के विरुद्ध सोशल मीडिया आदि में शिकायतें आई हैं तथा और भी आ रही हैं। एक मंत्री ने इस्तीफा दे दिया है। मुकदमेबाजी भी शुरू हो गई है। बहुत कुछ मीडिया, लिखित और दृश्य में आ रहा है। आशा कर सकते हैं कि शायद भविष्य में इन गलत गतिविधियों की रोकथाम हो सकेगी। यह तो बात रही शिक्षित, शहरी और मुखर महिलाओं की, पर गाँवों की अशिक्षित, दब्बू व पीडि़त महिलाओं की क्या दुःखभरी कहानी है, उसका पता नहीं? चूँकि एक प्रक्रिया अभी शुरू ही हुई है, अतः अधिक लिखना उचित नहीं है। यह हाल है, जब हम गर्व से कहते हैं कि एक भारतीय महिला राष्ट्र संघ की पहली अध्यक्ष रही है। इंदिरा गांधी एशियाई देशों में दूसरी प्रधानमंत्री रही हैं। कितनी ही महिलाएँ गवर्नर, उच्च न्यायालयों और शीर्ष न्यायालय की सदस्य रही हैं। एक महिला देश की राष्ट्रपति भी बनी। आज एक अनुभवी महिला लोकसभा की सभापति हैं। आज देश की विदेश और रक्षा मंत्री महिलाएँ हैं। विडंबना फिर भी यह है कि देश की महिलाएँ असुरक्षा महसूस करती हैं।

एक विकट प्रश्न है गांधी के आर्थिक व्यवस्था विषयक विचारों का, उसका समय-समय पर विवेचन होगा। पर प्रधानमंत्री मोदी ने हाल में ही कहा है कि बेरोजगारी की समस्या का हल चौथी औद्योगिक क्रांति के उपरांत होगा। यह संभव है, किंतु समस्या यह है कि तकनीक अधिकतर कैपिटल इंटेंसिव होती है, अधिक धन की आवश्यकता होती है। गांधी का कहना है कि भारत जैसे बड़े आबादी वाले देश में आवश्यकता है ऐसी टेक्नोलॉजी की, जो लेबर इंटेंसिव हो, अर्थात् जिसके द्वारा अधिक-से-अधिक लोग काम में खप सकें। चौथी औद्योगिक क्रांति यदि बेरोजगारी दूर कर सके तो शुभ है। समस्या यह है कि नई टेक्नोलॉजी के सफल होने में एक गैप होता है, अंतराल होता है। उस समय बेरोजगारी और बढ़ती है। नए-नए कौशल विकसित होने में समय लगता है। अंतराल की कठिनाइयाँ अर्थव्यवस्था में बहुत पेचीदगियाँ पैदा करती हैं। क्या हमने उसका कुछ हल सोचा है?

राजनीति सिद्धांतहीन होती जा रही है, भ्रष्टाचार में कमी होती नजर नहीं आती, तरह-तरह के माफिया उभर रहे हैं, बाहुबलियों और धनवानों का बोलबाला है। दादागिरी पर कोई नियंत्रण नहीं है। दिन-दहाड़े बैंक और दुकानें लूटी जाती हैं। अराजकता बढ़ रही है। छोटे और बडे़ अपराधों में वृद्धि हो रही है। कभी-कभी यह महसूस होता है कि देश के रहनेवाले समुदायों में मनमुटाव बढ़ रहे हैं। हिंदू, मुसलमान एवं अन्य अल्पसंख्यक समुदायों केबीच तनाव का वातावरण बढ़ता जाता है। राजनीति अपने स्वार्थ में आहुति डालने का काम करती है। सौहार्द आए कहाँ से? लगता है कि धीरे-धीरे प्रशासन अपनी सार्थकता और विश्वसनीयता खो रहा है। उधर मादक पदार्थों की बिक्री बढ़ती जाती है। तरह-तरह के ड्रग नई पीढ़ी को बरबाद कर रहे हैं। गांधी ने इन सब विषयों पर रोशनी डाली है। वातावरण और पॉल्युशन भी गांधी की दूरदृष्टि से बचे नहीं हैं। बढ़ती आर्थिक विषमताएँ और बढ़ती जन आकांक्षाओं में एक टकराव तथा तनाव बढ़ता जाता है। सादा जीवन और मितव्ययिता केवल कहने की बाते हैं। महिलाएँ और बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। लड़कियाँ दिल्ली जैसे शहर में और गाँवों में भी रोटी के बिना मर जाती हैं। प्रशासन कारणों की जाँच का आश्वासन देता है। यही हाल स्वास्थ्य सुविधाओं या असुविधाओं का है। लाश को घरवाले किसी तरह घसीटकर अथवा सिर पर रखकर ले जाते हैं। तसवीरें छपती हैं, पर प्रशासन आँख मूँद लेता है, अथवा क्यों ऐसा होता है, जाँच होगी, ऐसा कहा जाता है। अधिक मुद्दों की चर्चा करना व्यर्थ है। पूरा परिदृश्य कभी-कभी एक निराशा और अवसाद का वातावरण पैदा करता है, इसलिए सवाल उठता है। गांधी को कहाँ ढूँढ़ा जाए। उसे अंतर्मन में ही खोजना होगा। गांधी का लेखन और कथन इसमें सहायक है। गांधी में न जड़ता है, न रूढि़वादिता।

वे अपनी गलती स्वीकार करने में हिचकते नहीं। यह भी कहते हैं कि उनके विचार समय और परिस्थितियों के साथ बदलते हैं, अतः जो उन्होंने किसी विषय पर जिस बात को कहा, वही मान्य होना चाहिए। उसे ही उनका विचार माना जाए। इसमें कोई विरोधाभास नहीं। वास्तव में गांधी साहित्य के अवलोकन में ही अवसाद या नैराश्य की भावना का काट दिखाई देता है। गांधी केवल एक व्यक्ति नहीं, एक दृष्टि है। उनके सुखी, समरस और समृद्ध नए भारत का अपना स्वप्न है। इसे समझना और आत्मसात् करना आवश्यक है। गांधी साहित्य के मंथन में ही भविष्य के भारत की, गांधी की कल्पना का मृत्युंजय मंत्र निहित है। कहावत है कि माँ गंगा की आराधना गंगाजल से ही होती है। गांधी का सम्मान उनके विचारों को समझने और अनुसरण से होगा। एक फ्रेंच विचारक मिशलेट ने अपनी पुस्तक ‘The Bible of Humanity’ में लिखा है—‘Man must rest, get his breath, refresh himself at the great living wells, which keep the freshness of the eternal.’

गांधी की विचार सरणी ऐसा ही जीवंत स्रोत है जो चिरंतन, शाश्वत प्राणवान, ताजगी और ऊर्जा प्रदान करती है। गांधी साहित्य इसी मंतव्य की पूर्ति, गांधी की प्रासंगिकता और सार्थकता को व्यक्त एवं प्रतिष्ठित करने का सशक्त तथा सुलभ साधन है। पर उसके लिए कितनों के पास समय है अथवा ललक है?

(त्रिलोकी नाथ चतुर्वेदी)

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