अयोध्या अपराजेय आस्था की नगरी

अयोध्या अपराजेय आस्था की नगरी

कल-कल बहती सरयू के जल में अठखेलियाँ करती नावों की लंबी सी पंक्ति, किनारे दूर-दूर तक फैले घाटों की सीढि़यों पर पूजा-अर्चना के उपक्रम में लगे साधु एवं गृहस्थ और सरयू-किनारे बने ढेर सारे प्राचीन मंदिरों से उठकर नदी की लहरों से टकराती घंटा-घंटियों की मधुर ध्वनि, सचमुच अयोध्या को नैसर्गिक सौंदर्य उन्नीस सौ बानबे के रामजन्मभूमि बाबरी मसजिद कांड के बाद भी फीका नहीं पड़ा है। सच तो यही है कि खोखली आस्था मन को बाँध नहीं पाती और बाबरी मसजिद श्रीरामजन्मभूमि विवाद ने अयोध्या के प्रति मन में विरक्ति ही पैदा कर दी थी। आज तक जो भी अयोध्या यात्रा करके लौटा, उसके यात्रा-वृत्तांत का केंद्र रामलला का जन्मस्थल उसके चारों ओर फैली थका देनेवाली बैरीकेटिंग, सी.आर.पी.एफ. के जवानों की घेराबंदी और इन सबको पार करने के बाद जन्मस्थल के नाम पर एक तंबू में श्रीराम की मूर्ति रखी है, जैसी सूचनाएँ ही रहीं। इसी कारण जब मेरे योग परिवार के साथियों ने अयोध्या भ्रमण की योजना बनाई तो स्वीकृति देनेवालो में मेरा नाम अंतिम था और अयोध्या पहुँचने तक भी वही अन्मयस्कता मेरे मन को घेरे हुए थी। वैसे उ.प्र. के फैजाबाद जिले में बसी, अवध प्रदेश की इस प्राचीन राजधानी, मुसलिम काल में अवध प्रांत के गवर्नर की सीट रह चुकी अयोध्या, जिसे गौतम बुद्ध के काल में तत्कालीन पाली भाषा में ‘अयोझा’ कहा जाता था, तक पहुँचने के सभी मार्ग सुगम एवं आम आदमी की पहुँच के भीतर हैं। दिल्ली से ५५५ कि.मी. पूरब में बसी प्राचीन कौशल राज्य की राजधानी तक सड़क एवं रेलमार्ग से आसानी से पहुँचा जा सकता है, किंतु हम सभी को पूर्व अनुबंधित मिनी बस द्वारा जाना ही सुविधाजनक लगा।

अयोध्या हिंदुओं की पवित्रतम ७ नगरियों (सप्त पुरियों—काशी, उज्जैन, हरिद्वार, मथुरा, जगन्नाथ पुरी, कांची) में शीर्षस्थ मानी जाती है।

इतिहास की बात करें तो १२७ ईसवीं में कुणाल वंश के सफल शासक कनिष्क ने ‘साकेत’ नाम से प्रसिद्ध इस अयोध्या नगरी पर विजय प्राप्त की और इसे अपनी पूर्वी राजसत्ता का प्रशासनिक केंद्र बनाया था, लेकिन पौराणिक दृष्टि से राजा मनु द्वारा निर्मित राजधानी के रूप में प्रतिष्ठित यह नगरी सूर्यवंशीय राजाओं द्वारा शासित विश्व की प्राचीनतम हिंदू नगरियों में से एक है। इसे मोक्षदायिनी नगरी का सम्मान प्राप्त था। इस नगरी का क्षेत्रफल २५० कि.मी. तक फैला हुआ था। राजा दशरथ सूर्यवंशीय पीढ़ी के ३६वें शासक थे, जिनके घर श्रीराम का, जिन्हें उनकी अभूतपूर्व क्षमताओं, योग्यताओं एवं चमत्कारिक पराशक्तियों के कारण विष्णु का ७वाँ अवतार माना गया, जन्म हुआ।

जैनधर्म के प्रवर्तक ऋषभदेव सहित यह पाँच तीर्थंकरों की जन्मभूमि भी मानी जाती है। मौर्य एवं गुप्त साम्राज्य-काल में यहाँ कई बौद्धमंदिरों के होने के प्रमाण भी मिलते हैं। स्वामीनारायण संप्रदाय के संस्थापक स्वामीनारायणजी का बचपन भी इसी नगरी में बीता। उन्होंने नीलकंठ के रूप में अपनी सात वर्षीय यात्रा यहीं से प्रारंभ की। ६०० ईसा पूर्व यह नगरी व्यापार का प्रमुख केंद्र थी। यह स्थल बौद्ध धर्म का केंद्र भी रहा और यहाँ गौतम बुद्ध का कई बार आगमन हुआ। फाहियान ने यहाँ के बौद्ध धर्म का जिक्र किया है। भारत के प्रथम चक्रवर्ती राजा भरत एवं सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र भी इसी नगरी में जनमे। अयोध्या नगरी की विश्वव्यापी लोकप्रियता का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि थाई राजधानी अयोध्या एवं इंडोनेशिया सल्तनत योग्या कर्ता नाम अयोध्या नाम से प्रेरित होकर ही रखा गया। १४वीं शताब्दी में रामानंदजी ने इसे रामभक्ति आंदोलन का आध्यात्मिक केंद्र बना दिया।

ऐसे पौराणिक स्थल पर स्थानीय सूत्रों के अनुसार यदि साढ़े छह हजार मंदिर हैं तो इसमें आश्चर्य क्या! निश्चित रूप से बाकी सारे मंदिरों का महत्त्व कम नहीं है और उनमें से कम-से-कम एक दर्जन मंदिर तो ऐसे हैं ही, जिन्हें पौराणिक एवं पर्यटन दोनों ही दृष्टि से दर्शनीय माना जा सकता है। लेकिन बावरी मसजिद कांड के बाद श्रीरामजन्मभूमि को जो विश्वव्यापी लोकप्रियता मिली और भारतीय हिंदू समाज में इसके प्रति जो क्रेज पैदा हुआ, उसका परिणाम सामने था, यानी हमारे साथ आए सभी १२ परिवारों ने धर्मशाला में रुकते ही पहली इच्छा यही जाहिर की कि सरयू स्नान के बाद श्रीरामजन्मभूमि का दर्शन ही प्रथम कार्यक्रम रहेगा। रात्रि के नौ बज रहे थे, इस कारण इस इच्छा की पूर्ति तो सुबह ही होना संभव थी, इस कारण हमने तुरंत फैसला किया हनुमान गढ़ी जाने का।

रात्रि प्रारंभ हो चुकी थी, इस कारण श्रद्धालुओं की भीड़ न तो सड़कों पर थी, न ही मंदिर में। हनुमानगढ़ी नगर के लगभग बीचोबीच स्थित है और कहीं से भी वहाँ तक आसानी से पहुँचा जा सकता है। हम सब भी मुश्किल से दस मिनट की पैदल यात्रा करके वहाँ पहुँच गए। सामने किले की तरह सुरक्षित हनुमानगढ़ी की सीढि़याँ हमारा स्वागत कर रही थीं। चारों ओर से चौकोर दीवारों से घिरे इस मंदिर के चारों कोने (दीवालों के) गोलाकार हैं। इस कारण वहाँ खड़ा होना बेहद मुश्किल है। संभवतः यह निर्माण सुरक्षा की दृष्टि से किया गया था।

तथ्यों के अनुसार अवध के तत्कालीन नबाव ने १०वीं शताब्दी में यह भूमि दान में दी और उसके ही एक हिंदू दरबारी ने इस मंदिर का निर्माण करवाया। बाद में अंग्रेजी शासन काल में नबाव मंसूर अली ने अपने दरबारी टिकैत राय के द्वारा इसे गढ़ी (किले जैसा) रूप दिया। जन मान्यता है कि जन्मभूमि अथवा रामकोट की रक्षार्थ पवनपुत्र हनुमान यहाँ सूक्ष्म रूप में निवास करते हैं। ७६ सीढि़याँ चढ़कर जब हम ऊपर पहुँचे तो मंदिर के पावन वातावरण ने हम सब को ही प्रभावित किया। अंदर गुफानुमा मंदिर में माता अंजनी की गोद में शिशु हनुमानजी की मूर्ति दर्शनीय है और श्रद्धा जगाती है। हरिद्वारी पत्ती, बसंतिया पत्ती उज्जैनिया पत्ती एवं सागरिया पत्ती नाम से संतों के ४ दल हैं, जिनका प्रमुख ‘गद्दीनशील’ कहलाता है और इस गढ़ी का प्रबंध देखता है।

लगभग १५ मिनट की हनुमानगढ़ी की इस आनंद यात्रा के बाद रात्रि सुखद रही और हम सब सुबह रामघाट पर थे। रामघाट सरयू का सबसे व्यस्त स्थल है, लेकिन इस समय यहाँ बिल्कुल ही सामान्य सी चहल-पहल थी और हमें सरयू के पावन स्पर्श का पूर्ण आनंद भी मिला। वैसे अयोध्या में सरयू के किनारे अगर घाटों की चर्चा करें तो अनेक महत्त्वपूर्ण घाटों का नाम चर्चा में आता है। रामघाट जहाँ हम सबने स्नान किया, निश्चय ही इस दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है कि रामनवमी अर्थात् श्री राम अवतरण दिवस पर यहाँ स्नान अत्यंत पुण्यदायक माना जाता है। सभी नर, नाग, यक्ष, गंधर्व एवं देव सूक्ष्म रूप में इस अवसर पर यहाँ स्नान कर श्रीराम के भव्य स्वरूप का दर्शन पाते हैं। ऐसा विश्वास जन-जन में व्याप्त है। गुरु वसिष्ठ ने भी इस पर्व के स्नान को मोक्षदायी बताया है। प्रत्येक वर्ष कार्तिक शुक्ल नवमी को लगनेवाली चौदह कोसी परिक्रमा एवं कार्तिक शुल्क एकादशी को लगनेवाली पंचकोसी परिक्रमा के बाद यहाँ स्नान की सदियों पुरानी परंपरा है।

लेकिन इस घाट के अतिरिक्त अन्य महत्त्वपूर्ण घाटों में कंचन भवन के पास ऋणमोचन घाट, जहाँ स्नान कर ऋण न चुकाने के पाप से मुक्ति मिल जाती है, ऋणमोचन घाट के दक्षिण में राजघाट, जहाँ प्रसेनजित् के राजकाल में कल्पमुनि का आश्रम था और जहाँ निकट ही बने ऋषभदेव उद्यान में जैन धर्म के प्रवर्तक ऋषभदेव की प्रतिमा स्थापित है। लक्ष्मण घाट के पश्चिम में गोला घाट, जहाँ माघकृष्ण चतुर्दशी का स्नान कुसंग जनित पाप से मुक्ति दिलाता है और लक्ष्मण घाट, जिसे सहस्र धारावाला घाट माना जाता है, सर्वाधिक उल्लेखनीय है। लक्ष्मण घाट के निकट ही एक छोटा सा किला भी है, जिसे लक्ष्मण किला कहा जाता है और रीवा के दीवान दीनबंधु द्वारा बनवाया आकर्षक मंदिर भी है।

वर्ष १९६४-८५ में कुंभ आदि के महापर्व पर ऋद्धालुओं की बढ़ती संख्या देखते हुए एक बृहत् पक्के घाट का निर्माण भी उ.प्र. सरकार द्वारा करवाया गया, जिसमें पंपसेटों द्वारा सरयू का जल ही आता रहता है। इसे ‘राम की पैड़ी’ नाम दिया गया। लेकिन आज भी सामान्य रूप में श्रद्धालु परंपरागत घाटों पर स्नान को प्राथमिकता देते हैं। सारे अन्य तीर्थस्थलों के समान यहाँ भी पंडों की बहुतायत है और श्रद्धालुजनों से उनकी पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही परंपरा कायम भी है।

स्नान के बाद तो सबका एक ही लक्ष्य था, जल्दी-से-जल्दी श्रीरामजन्मभूमि का दर्शन। यों संपूर्ण अयोध्या नगरी बहुत बड़ी नहीं है। किंतु फिर भी हमें वहाँ पहुँचते-पहुँचते साढ़े नौ बज ही गए। हमें पहले से ही बता दिया गया था कि वहाँ किसी भी वस्तु को ले जाना मना है। इस कारण लगभग सभी लोग अपना मोबाइल, कैमरा आदि धर्मशाला में ही छोड़ गए। यों वहाँ लाकर की बहुत सुविधाजनक व्यवस्था है। जहाँ नाममात्र के शुल्क पर आपका सामान सुरक्षित रखा जाता है। श्रीराममंदिर क्षेत्र की सीमा प्रारंभ होते ही परंपरागत प्रसाद, पुष्प, तसवीरें आदि की दुकानों से सजा बाजार नजर आता है। लेकिन लाकर रूम से मुड़ते ही सामने इतनी लंबी लाइन थी कि हममें से कई को यह लगा कि ग्यारह बजे अर्थात् दर्शन बंद होने की सीमा तक शायद ही मंदिर निर्माण स्थल तक पहुँच सकें। किंतु जब यहाँ तक आए हैं, तो और उपाय भी क्या था।

श्रीरामजन्मभूमि और बावरी मसजिद विध्वंस कांड इस सदी की प्रमुखतम महत्त्वपूर्ण धार्मिक-राजनैतिक घटना मानी जाती है, लेकिन सच तो यह है कि अयोध्या जिसका अर्थ ही ‘वह स्थल, जिसके विरुद्ध कभी युद्ध न किया जा सके’ और उसका हृदय स्थल सदियों से ध्वंस एवं निर्माण का इतिहास रचते रहे हैं। इतिहास गवाह है कि मौर्य शासनकाल को दौरान जब बौद्ध धर्म का प्रभाव अपनी चरम सीमा पर था, एक तिरिक राजा मिरांदा बौद्ध भिक्षु का भेष बनाकर आया और फिर उसने अयोध्या पर धोखे से आक्रमण कर न केवल अयोध्या पर अधिकार कर लिया वरन् श्रीराम जन्मस्थल पर बने मंदिर को भी ध्वस्त कर डाला। लगभग १५० ईसा पूर्व से इस मंदिर पर प्रथम आधिकारिक आक्रमण था। लेकिन ३ माह बाद ही शुंगवंशीय राजा द्युमुत सेन से मिरांदा पराजित हुआ और मारा गया। अयोध्या स्वतंत्र हो गई और विक्रमादित्य द्वारा इस मंदिर का पुनर्निर्माण कराया गया। इतिहास में विक्रमादित्य नाम के छह राजाओं का उल्लेख है। इनमें से यह मंदिर किस विक्रमादित्य ने बनवाया, इस पर इतिहासकार एक मत नहीं हैं। किंतु यह सभी मानते हैं कि विक्रमादित्य ने न केवल यह मंदिर वरन् अन्य ३६० मंदिरों का निर्माण कराया।

इस संदर्भ में एक उल्लेखनीय तथ्य यह भी है कि श्रीराम को विष्णु के अवतार के रूप में ईसा से कुछ शताब्दीं पूर्व ही प्रतिष्ठा मिली। चौथी शताब्दी के प्राप्त शिलालेखों में राम का वर्णन विष्णु अवतार के रूप में किया गया है। बाद में साहित्यकारों ने श्रीराम को विष्णु अवतार मानते हुए अनेक ग्रंथों की रचना की।

कालिदास का रघुवंश इसका महत्त्वपूर्ण उदाहरण है। संस्कृत कवि भास ने श्रीराम को अर्चना अवतार काव्य-ग्रंथ में जोड़ा। इस बात के भी प्रमाण मौजूद हैं कि १२वीं शताब्दी में अर्थात् बावर के आक्रमण से तीन शताब्दी पूर्व अयोध्या में पाँच प्रमुख मंदिर मौजूद थे, जिनमें भारत भर के श्रद्धालु पूजा-अर्चना हेतु आते थे। ये थे—गोपताहार का गुप्त हरी मंदिर, स्वर्गद्वार का चंद्रहरी मंदिर, चक्रतीर्थ हार का विष्णुहरी मंदिर, स्वर्गद्वार का धर्महरी मंदिर एवं जन्मभूमि स्थल का विष्णु मंदिर।

बारहवीं या १३वीं शताब्दी में लिखे गए ग्रंथ अयोध्या माहात्म्य में इन सबका एवं रामनवमी पर अयोध्या आकर स्नान-दर्शन करने से व्यक्ति पुर्नजन्म से मुक्ति पाकर मोक्ष को प्राप्त करता है, इसका विस्तृत वर्णन किया गया है। बाबर ने भारत में सन् १५२६ में प्रवेश कर लिया था और अपना राज्य स्थापित करने के बाद उसने १५२८ में अपने सिपहसालार मीर बाकी को अयोध्या पर आक्रमण कर इस मंदिर को ध्वस्त कर मसजिद बनाने का फरमान जारी कर दिया। अयोध्या में भयंकर युद्ध हुआ और २३ मार्च, १५२८ तक इस युद्ध में एक लाख तिहत्तर हजार लोग अयोध्या को बचाने के लिए वीरगति को प्राप्त हुए और अयोध्या न केवल पराधीन हो गई वरन् विक्रमादित्य का बनवाया हुआ मंदिर भी नेस्तनाबूद कर डाला गया। देखा जाए तो मिरांडा के बाद यह दूसरा अवसर था, जब मंदिर पूरी तरह ध्वस्त हुआ। मीर बाकी ने बाबर के आदेशानुसार मसजिद बनवानी प्रारंभ की। इस क्रम में एक रहस्यमय घटना हुई, जिसका उल्लेख बाबर लिखित पुस्तक ‘जोग बाबर’ में भी है। कहते हैं कि इधर मसजिद की दीवारें दिनभर बनाई जातीं और शाम ढले ही गिर जातीं। मीर बाकी परेशान हो उठा, उसने बाबर को इस बात की सूचना दी। बाबर स्वयं इस नजारे को देखने पहुँचा और यह देखकर चकित रह गया कि जो कुछ मीर बाकी ने कहा, सच था। दीवारें दिनभर बनाई जाती थीं और शाम को गिर जाती थीं । बाबर ने तुरंत कुछ हिंदू फकीरों-संतों को बुलवाया और उनसे मदद माँगी। संतों, फकीरों ने कई दिनों के विचार-विमर्श के बाद बाबर को पाँच सुझाव दिए। पहला सुझाव था कि मसजिद का नाम सीता रसोई या सीता-पाक रख दिया जाए। दूसरा सुझाव था कि मंदिर की परिक्रमा को जारी रखा जाए। तीसरे सुझाव में संतों ने कहा कि सदर (मुख्य) गुंबद के दरवाजे में लकड़ी लगा दी जाए। चौथा सुझाव था कि मीनारें गिरा दी जाएँ और पाँचवाँ सुझाव था कि हिंदू महात्माओं को इस स्थल पर भजन करने की अनुमति दी जाए।

बाबर ने पाँचों सुझावों को मान लिया और फिर मसजिद बनने में कोई भी बाधा नहीं आई। अगर यह घटना सत्य है तो कोई भी जागरूक व्यक्ति यह सवाल उठा सकता है कि संतों-फकीरों को ऐसे सकारात्मक सुझाव देने की क्या आवश्यक्ता थी। निश्चित रूप से यदि फकीरों-संतों ने सुझाव न दिए होते तो मसजिद का बनना नामुमकिन था। सत्य जो भी हो, लेकिन मंदिर तो दूसरी बार ध्वस्त हो ही गया। हुमायँू एवं अकबर के काल तक हिंदू राजाओं ने रामजन्मभूमि को मुक्त कराने के बीसियों प्रयास किए, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। ऐसे प्रयास करनेवालों में देवीदीन पांडे, महाबख्त सिंह, राणा रणविजय, रानी जयराज कुमारी एवं स्वामी महेश्वरानंद का नाम प्रमुख रूप से लिया जा सकता है।

अकबर क्योंकि भारत की जनता की नब्ज पहचानता था एवं उदारतावादी था, अतः उसने नर्मी बरतते हुए और हिंदुओं की भावना का सम्मान रखते हुए मसजिद के बिल्कुल आगे एक चबूतरा बनाने एवं उस पर पूजा करने का अधिकार हिंदुओं को दिया। उस चबूतरे को ‘राम चबूतरा’ नाम दिया गया। अकबर ने राम-सीता चित्र मुद्रित सिक्के भी ढलवाए, जिन्हें उसने ‘राम टका’ नाम दिया। इसके साथ ही उसने रामायण की सचित्र प्रतियाँ भी तैयार करवाई। अबुल फजल ने अपनी पुस्तक में इस स्थल को राम जन्मभूमि माना है। इस तरह इस स्थल पर एक तरह से हिंदुओं का अधिकार हो गया, लेकिन औरंगजेब ने पुनः इस सौहार्द भरे वातावरण को नष्ट करने का बीड़ा उठाया। उसने अपने सरदार जाँबाज खान को अयोध्या भेजा, लेकिन गुरु गोविंद सिंह के अकालियों ने उसे हरा दिया। इस असफलता से क्रोधित होकर सन् १६६४ में औरंगजेब स्वयं गया और अयोध्या पर हमला कर राम चबूतरा ध्वस्त कर डाला। इस युद्ध में १०००० लोग मारे गए। इस प्रकार एक बार फिर यह स्थल अपनी प्रतीकात्मक छवि भी खो बैठा, लेकिन अयोध्या में रामनवमी उत्सव फिर भी जोर-शोर से होता रहा। इसके बाद भी कई बार हिंदुओं ने इसे मुक्त करवाने का प्रयत्न किया, लेकिन वे सफल नहीं हुए और फिर १९८४ में विश्व हिंदू परिषद् के द्वारा जो आंदोलन छेड़ा गया, उसकी परिणति स्वरूप लाखों लोगों ने बाबरी मसजिद ढाचे को सन् १९९२ में ध्वस्त कर डाला। इसके देशव्यापी घातक परिणाम और फिर लंबी कानूनी प्रक्रिया सर्वज्ञात है। लेकिन इससे जो वातावरण निर्मित हुआ, उसके कारण संपूर्ण विश्व के ध्यान का केंद्र तो यह स्थल बन ही गया।

जैसा सुनता आया था, वैसी ही ऊबाऊ प्रक्रिया लंबी लाइन में होकर कैदखानेनुमा घुमावदार गलियारे, बाहर सी.आर.पी.एफ. के पहरा देते जवान और रामलला के जन्मस्थल पर रखी श्रीराममूर्ति के आगे एक क्षण रुकने की अनुमति, फिर लगभग धकिया कर आगे बढ़ने के संकेत के साथ बाहर आकर जब चैन की साँस ली, तब पहला विचार मन में यही आया कि श्रद्धा और राजनीति के इस अखाड़ा बने केंद्र को अगर श्रीराम स्वयं भी आकर देखते तो वितृष्णा से भर उठते। लेकिन इस विश्वस्तरीय लोकप्रिय स्थल के अलावा अभी अयोध्या में बहुत कुछ था, जो मेरे जैसे ज्ञान-पिपासु को राहत देनेवाला था और उनमें से प्रथम स्थान था कनक भवन।

कनक का सीधा सा अर्थ है सोना। कहते हैं कि मूल रूप से स्वर्ण से मढ़े इस महल को श्रीराम की पत्नी सीताजी को कैकयी ने मुँह दिखाई में भेंट किया था। श्रीराम एवं सीता के गोलोकवासी होने के बाद उनके पुत्र कुश ने इसे मंदिर का स्वरूप देकर श्रीराम एवं सीता के विग्रह यहाँ स्थापित करवाए। एक अन्य कथा के अनुसार द्वापर युग में श्रीकृष्ण ने इस मंदिर का पुनर्निर्माण कराकर श्रीराम-सीता की प्रतिमाएँ यहाँ रखवाईं।

लगभग २०१६ वर्ष पूर्व महाराजा विक्रमादित्य ने, तत्पश्चात् महाराज समुद्रगुप्त ने पुनः इसका जीर्णोद्धार करवाया और अंतिम बार इस भवन का जीर्णोद्धार ओरछा राज्य की महारानी विश्वभानु कुँवरि ने करवाया। इस प्रकार यहाँ तीन युगल देव मूर्तियाँ स्थापित हैं। प्रस्तर युगल मूर्ति में श्रीराम एवं सीता दोनों के मुखमंडल जीवंत लगते हैं। निश्चय ही कारीगर ने दोनों प्रतिमाओं में प्राण फूँक दिए हैं। अंदर से वृहद् विशाल सभागार एवं बाहर से आकर्षक महल के मुख्य द्वार का रूप, इस भवन की समृद्ध स्थापत्य कला प्रमाण है। मंदिर के बाहर आँगन में सीता कूप है और ऊपर विश्राम कक्ष, जहाँ चाँदी की एक पतली परत पर चारों भाइयों के चरण-चिह्न उकेरे गए हैं। कनक भवन का शांत किंतु आस्था युक्त वातावरण और विग्रहों का स्वरूप निश्चय ही दर्शनीय एवं आनंददायक है।

वासदेव घाट क्षेत्र में वाल्मीकि भवन दूसरा महत्त्वपूर्ण स्थल है, जिसे आधुनिक होने के बावजूद स्थायी आकर्षण माना जाता है। बाबा मणिरामदास की छावनी स्थित इस भवन की दीवारों पर संस्कृत में संपूर्ण वाल्मीकि रामायण लिखी हुई है, साथ ही श्रीराम कथा से संबंधित विशाल चित्र भी हैं। यहाँ लव-कुश के साथ वाल्मीकिजी की भव्य प्रतिमा है, साथ ही लाइब्रेरी में संस्कृत के मूल्यवान गं्रथों का भंडार सँजोया गया है।

नृत्य गोपालदास के निर्देशन में यहाँ अंतरराष्ट्रीय सीताराम बैंक का संचालन भी किया जाता है। रामकथा लेखक के प्रति यह सच्ची श्रद्धांजलि है। कनक भवन के निकट ही रत्न सिंहासन भवन है। जहाँ सचमुच रत्नों के सिंहासन पर ही रत्न जड़ी श्रीराम-सीता की काले पत्थर की प्रतिमाएँ विराजित हैं। साथ ही तीनों भाई भी विराजमान हैं और ऊपर कल्पवृक्ष की छाया है। बिल्कुल निकट ही जांबवान, विभीषण, गुरु वसिष्ठ, विश्वामित्र, सुग्रीव एवं अंगद की प्रतिमाएँ भी स्थापित की गई हैं। इसी कारण इस मंदिर को ‘राजगद्दी’ भी कहा जाता है।

इन महत्त्वपूर्ण स्थलों के अतिरिक्त दर्शनीय स्थलों में हनुमानगढ़ी चौराहे से ५०० मीटर दूर हनुमान बाग स्थित दिव्य शीश महल, जिसमें राम, लक्ष्मण एवं सीताजी की प्रतिमाएँ एवं कट ग्लास का आकर्षक काम है। रामगंज चौराहे पर नेशनल हाइवे से ३०० मीटर दूर बना तुलसी स्मारक भवन, रविदास मंदिर, रंगमहल, त्रेता के ठाकुर (यहाँ राम ने अश्वमेध यज्ञ किया), गुप्तार घाट (जहाँ राम ने शरीर छोड़ा), धीरेश्वरनाथ मंदिर (जिसे कौशल्या ने सीताजी के लिए बनवाया), सीता रसोई, कालाराम मंदिर (राम की पैड़ी के निकट स्वर्गद्वार क्षेत्र में यहाँ विक्रमादित्य के काल की मूर्तियाँ हैं), गुरुद्वारा ब्रह्मकुंड (ब्रह्मघाट के निकट, कहते हैं यहाँ ब्रह्माजी ने ५००० साल तप किया एवं गुरुनानक, गुरु तेगबहादुर एवं गुरु गोविंद सिंहजी ने भी यहाँ ध्यान लगाया) का नाम लिया जा सकता है। राम की पैड़ी के निकट धर्महरी महल पर आषाढ़ शुक्ल एकादशी पर विशाल उत्सव मनाया जाता है। कहते हैं कि धर्मराज ने श्रीविष्णु से यहाँ सदा रहने का वर माँगा, इस कारण भावरूप में दोनों यहाँ विराजमान हैं।

जैसा कि मैं पहले ही कह चुका हूँ कि अयोध्या जैन धर्म अनुयाइयों के लिए भी श्रद्धा का केंद्र है, क्योंकि जैन धर्म के आदि प्रवर्तक आदिनाथ सहित यह पाँच जैन तीर्थंकरों की जन्मस्थली है। नबाब फैजाबाद के कोषाध्यक्ष केसरी सिंह ने इन जन्मस्थलों को चिह्नित कर ५ मूर्तियाँ बनवाकर १७८१ विक्रम संवत् में स्थापित कराई। ये स्थल हैं स्वर्ग द्वार के निकट आदिनाथ मंदिर, गोलाघाट पर अनंतनाथ मंदिर, रामकोट के निकट सुमंतनाथ मंदिर, सप्तसागर के निकट अजीतनाथ मंदिर एवं सराय के निकट अभिनंदन नाथ मंदिर। रामगंज में २१ फीट ऊँची आदिनाथ की प्रतिमा भी दर्शनीय है।

अयोध्या नगर निश्चय ही पर्यटन की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण एवं आकर्षणों से युक्त स्थल है और न केवल श्रद्धालु वरन् आम पर्यटक भी यहाँ पूर्ण आनंद ले सकता है। लेकिन खेद है कि इसके प्रचार केंद्र में केवल श्रीरामजन्मभूमि है, इस कारण अन्य विशिष्ट स्थलों की ओर देश-विदेश के रुचिवान पर्यटक का ध्यान नहीं जाता है। यदि अन्य स्थलों का समुचित प्रचार-प्रसार किया जाए तो अयोध्या कोविश्व पर्यटन मानचित्र पर भी एक प्रमुख पर्यटन केंद्र के रूप में रेखांकित किया जा सकता है।

३६, अयोध्या कुंज ए,
आगरा-२८२००१ (उ.प्र.)
—सुशील सरित

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