वो नन्हा फरिश्ता

वो नन्हा फरिश्ता

२५ मार्च, २०१७ : निशा का अवसान हो रहा है, प्रातः होने को है। यह वेला ऐसी कही गई है कि बीमार भी चैतन्य महसूस करता है, और फूल भी हँसने लगते हैं। पर मेरे घर को शोक की घोर अँधियारी ने घेर लिया है। मंद-मृदुल समीर भी तीर सा चुभ रहा है। पक्षियों का कलरव कर्णकटु हो गया है। इसी वेला में वह छत पर नित्य दैनिक क्रिया से निवृत्त होने के लिए जाया करता था। एक पल भी शांत न बैठनेवाला वह नन्हा फरिश्ता आज निःचेष्ट पड़ा है। हमारे नकली रोने पर वह विह्वल-अबोध बालक सा उद्विग्न हो जाया करता था, आज पूरा घर दहाडें़ मारकर जार-जार रो रहा है, पर वह इन सबसे बेखबर चिरनिद्रा में सो रहा है। हमारे घर को खुशियों से भर देनेवाला वह फरिश्ता उन खुशियों को साथ ले अनंत की यात्रा पर निकल पड़ा है। हम उसे कहीं से लाए नहीं थे, किसी से माँगा भी नहीं था, ऊपरवाले ने भेजा था, अपने आप!

आज से कई साल पहले एक दबंग की दबंगई से हमारा जीवन नरक सा बनकर रह गया था। पूरे घर में श्मशान सी मुर्दनी छाई रहती। मेरे बच्चे घर में रहना ही नहीं चाहते थे। प्रातः ही घर से निकल जाते, इधर-उधर समय बिताते। गृहस्वामिनी भी रोते-धोते पूरा दिन दुश्चिंता में बिता देती। एक-दो मित्र और पिताजी के अलावा सांत्वना देनेवाला भी कोई नहीं था। यार-दोस्त, रिश्तेदार, यहाँ तक कि रक्त-संबंधों ने भी दूरी बना ली थी। हँसना-खिलखिलाना हम पूरी तरह भूल गए थे। जिंदगी को सब लोग बस जैसे-तैसे ढो रहे थे। पूरा घर गहरे अवसाद में जी भर रहा था। शायद ऊपरवाले से हमारा यह दुःख देखा न गया और २०१५ की दीपावली की पूर्व संध्या पर मेरी बेटी रिचा की एक सखी एक गिफ्ट-बास्केट लेकर हमारे घर पधारी—देवदूत सी। गिफ्ट-बास्केट में से निकला एक नन्हा सा गोल-मटोल मखमली फरिश्ता—लेब्रा डॉगी। नाम बताया, ‘रफ्तार’।

दो दिन तक मुझे इस नन्हे मेहमान की भनक न लगी। मेरे बच्चों ने इसे मुझसे छिपाकर रखने की हर कोशिश की, पर एक दिन उसका-मेरा आमना-सामना हो ही गया। मेरे बेटा-बेटी ने बहाना बनाया कि यह हमारा नहीं है। मैंने बच्चों को डाँटते हुए समझाया कि डॉगी पालने से आस-पड़ोस में झगडे़ होते हैं, घर गंदा रहता है, और फिर यहाँ इनसानों को रहने के लिए पर्याप्त जगह नहीं है, तो डॉगी कहाँ रहेगा? मेरी डाँट-फटकार और समझाइश सब बेकार गई, कारण—विरोध करने वाला मैं अकेला, बाकी सब उसके तरफदार! वह नन्हा फरिश्ता गैलरी में शौच-पेशाब करता, तो मेरे बच्चे गहरी नींद से भी उठकर तुरंत साफ-सफाई कर देते। पूरी-पूरी कोशिश करते कि मुझे चिल्लाने और शिकायत का कोई मौका न मिले। वह इतना छोटा था कि ठीक से कुछ भी ग्रहण नहीं कर पाता था, पतला करने पर बस सेरेलक ही चाट पाता था, पर रिचा और पीयूष उसकी ऐसी ममतामयी माँ बन गए कि कोई भी शिशु का पालन-पोषण करना इनसे सीख सकता है। अब श्मशान सरीखे इस घर में मानव-गतिविधियाँ होने लगीं, देखते-ही-देखते घर का माहौल बदल गया। बच्चे स्कूल-कॉलेज जाते तो उन्हें शीघ्रातिशीघ्र घर लौटने की जल्दी रहती। उस नन्हे फरिश्ते की तीमारदारी में श्रीमतीजी को समय का कुछ पता ही न चलता! घर में पसरी मायूसी भाग खड़ी हुई। घर के कोने-कोने में दुबकी पड़ी खुशियाँ बाहर निकल आईं। अब पूरे घर में केवल नन्हे रफ्तार की पुकार सुनाई देती। बच्चों के चेहरों पर आई खुशी ने मुझे बाध्य कर दिया कि मैं इस नन्हे फरिश्ते का विरोध न करूँ।

मैं नहीं जानता कि उसे कैसे पता चला कि घर का मालिक और उसका विरोध करनेवाला मैं ही हूँ। उसने सबसे पहले मुझे ही अपने मोह-पाश में बाँधा। दिनोदिन उसका यह मोह-पाश कसता चला गया। मैं कुरसी की अपेक्षा स्टूल पर बैठकर लिखा करता हॅँू। सर्दी हो गरमी, वह मेरे पैरों में आकर बैठता। मैं अपना काम करता रहता, वह नीचे बैठा स्टूल की टाँगों पर अपने दाँतों की आजमाइश करता रहता। मेरे स्टूल पर उसके पैने दाँतों की छाप निशानी के तौर पर रह गई है। कभी मौज में आकर नीचे बराबर में रखी रैक में रखी फाइलों से कागज खींच लेता, मैं उसे मना करता, वह मान जाता। खैर, अब तो मुझे भी उससे लगाव हो गया था। जब बच्चे घर पर नहीं होते और रफ्तार शौच कर देता, तो मैं उठाकर फेंक दिया करता।

शायद इस नस्ल के डॉगी जन्मजात समझदार होते हैं या फिर रफ्तार ही समझदार था। नन्हे रफ्तार के लिए अंदर के लिविंग-रूम के एक कोने में उसके रहने-सोने के लिए गद्दी लगा दी थी, वह रहता-सोता वहीं था, पर शौच और लघुशंका करने कमरे से बाहर गैलरी में ही जाता था। महीने भर बाद ही, सर्दियों में पीयूष तड़के ही उसे घुमाने के लिए सड़क पर ले जाने लगा तो वहाँ उसने रोज टहलने आनेवाले एक अंकलजी से दोस्ती गाँठ ली। वे अपना डॉगी छोड़ उसके साथ खेलने लग जाते। जो भी उसे देखता, बस प्यार करने लग जाता। वह था ही इतना भोला और मासूम। उसका चेहरा-मोहरा, चाल-ढाल सब चुंबकीय था। वह दूसरे डॉगियों की तरह टाँग उठाकर पेशाब नहीं करता था और न ही शौच। ठीक एक बालक की तरह पेशाब करता और शौच करते हुए ऊँ-ऊँ की आवाज निकालता। कुछ महीने बाद उसके दूध के दाँत गिरने लगे, हम सब बडे़ हैरान थे, पहले कभी कुत्ते के दाँत गिरते हुए नहीं देखे थे। एक-दो दाँत तो मेरे छोटे बेटे ने अभी भी सहेजकर रखे हुए हैं। उसके नए दाँत आ गए थे। कठोर चीजों पर वह उनकी आजमाइश करता रहता तो उसे बनावटी हड्डी लाकर दे दी गई। कई बार वह हड्डी छिपाकर भूल जाता और फिर दूसरी हड्डी ले लेता।

छोटे बच्चों से उसे बड़ा लगाव था। बच्चे भी उसके साथ खेलना चाहते। वह जब घर के अंदर होता तो मोहल्ले के बच्चे हमारे दरवाजे पर आकर उसे ‘बाबू-बाबू’ और ‘रफ्तार-रफ्तार’ कहकर पुकारते। वह बाहर निकल उनके साथ खेलने के लिए मचलता, पर हम लोग उसे बाहर जाने न देते थे। कारण—वह बच्चों के पीछे दौड़ता, उन्हें चाटकर अपना प्यार जताता तो बच्चे चीख-पुकार मचाने लगते। किसी का बच्चा डर न जाए या उसके दाँत न लग जाएँ, हमें इसी का डर लगा रहता। हालाँकि वह काटता बिल्कुल नहीं था। हमारा पूरा हाथ या पैर का पंजा अपने मुँह में ले लेता और ताज्जुब! अपना जबड़ा उतना ही दबाता कि दाँत न गढ़ें। उसकी समझदारी पर बड़ी हैरानी होती। छोटा बेटा पीयूष प्रातः उसे पार्क में घुमाने ले जाता। वहाँ तो उसने अपने चाहने वाले और दोस्तों की पूरी एक जमात खड़ी कर ली थी। बेटे के दोस्त उसके पक्के दोस्त बन गए थे। कई बार रफ्तार ऊपर छत पर होता और बेटे का कोई दोस्त हमारे घर के आगे आकर पीयूष को पुकारता तो वह उसकी आवाज तुरत पहचान जाता। बिना भौके ही छत से सीढि़यों पर ऐसी दौड़ लगाता कि पल भर में नीचे आकर उनके साथ मस्ती करने लगता। मस्ती और ऊधम का वह बड़ा शौकीन था। आधुनिक हीरो की भाँति चश्मा लगाकर उसने बेटे के सब दोस्तों के साथ अलग-अलग पोज में कितने ही फोटो ख्ंिचवा रखे हैं—किसी में जीभ निकाले, किसी में होंठ दबाए। उसे जैसा बोला जाता, वह वैसा ही स्टैच्यू सा बन जाता।

स्कूटी पर बैठकर घूमने का उसे बड़ा चाव था। पीयूष जब कॉलेज या अन्यत्र कहीं से घर लौटता तो उसकी स्कूटी की आवाज वह तुरत पहचान जाता। जैसे ही दरवाजा खोला जाता, वह फौरन बाहर गली में निकल स्कूटी पर बैठ जाता और अंदर आकर खड़ी करने से पहले ही कूद जाता। स्कूटी किसी की भी हो, उसे तो चड्डू खाने से मतलब। हमारे सामनेवाले पड़ोसी वासू के पापा सुबह अपनी स्कूटी लेकर ड्यूटी के लिए निकलते और हमारा दरवाजा खुला होता तो वह जिद्दी बालक की तरह दौड़कर झट से उनकी स्कूटी पर बैठ जाता, और फिर वे बेचारे उसे आगे सड़क या चौक तक घुमाकर लाते, तब ही वह स्कूटी पर से उतरता। पार्क में घूमने जाते हुए अपनी स्कूटी पर इस शान से बैठता कि गरदन टेढ़ी करके लोगों को देखता जाता। तब वह सबके आकर्षण का केंद्र बन जाता। हमारी श्रीमतीजी रात्रि में मिर्च जलाकर उसकी नजर जरूर उतार देतीं। भला अपने सबसे प्यारे बच्चे पर पड़ने वाली कुदृष्टि को वे कैसे बरदाश्त करतीं! जैसे-जैसे वह बड़ा हुआ तो शौच के लिए छत पर जाने लगा। जितनी बार भी शौच लगती, वह छत पर ही जाता था। आस-पड़ोस या गली में उसने कभी शौच नहीं की। जब उसे शौच या पेशाब लगता तो ऊँ-ऊँ कर मेरी कोहनी पकड़कर खींचता। मैं उसे शांत रहने के लिए कहता तो वह कुछ पल रुककर फिर मेरा ध्यान अपनी ओर खींचता, तब मैं समझ जाता कि रफ्तार को शौच लगी है। मैं कलम रख इतना भर कहता, ‘चलो भाई!’ और वह तब तक चार सीढि़याँ चढ़ जाता और फिर पीछे मुड़कर देखता कि मैं आ भी रहा हूँ कि नहीं?

एक ब्राह्मण परिवार में पला-बड़ा होने के कारण वह जीवन-पर्यंत शुद्ध शाकाहारी रहा। हम जो भी खाते, सब वह बडे़ चाव से खा लेता, कभी नखरे नहीं करता था। रोटी, चावल, खिचड़ी, दाल, सब्जी, दूध, लस्सी—सबकुछ रुचि के साथ खाता। गृहस्वामिनी उसे दिन में तीन बार भोजन करातीं। जब उसे भूख लगती तो रसोई के दरवाजे पर या श्रीमतीजी के पैरों में आकर बैठ जाता। यदि वह छत पर होता या दूसरे कमरे में, ‘रफ्तार, रोटी खा ले’, श्रीमतीजी के इतना पुकारने पर फौरन हाजिर हो जाता। पूरी साबुत रोटी सामने रख देने पर उसे सूँघता भी नहीं था, तोड़कर दूध-लस्सी या सब्जी में मिलाकर उसके बरतन में रख देने पर खा लेता। पीयूष तो उसे अपने सामने बिठा छोटे बच्चे की मानिंद रोटी का एक-एक टुकड़ा सब्जी के साथ अपने हाथ से खिलाता, जैसे कोई माँ अपने छोटे बच्चे को खाना खिलाती है। इसमें वह बड़ा सुख मानता था। खाना खाने के बाद उससे कहते, ‘रफ्तार, जाओ पानी पी लो,’ तो वह अपने बरतन में पानी पी लेता। कभी-कभी रसोईघर से कच्चा आलू उसके हाथ लग जाता तो पहले बॉल की तरह उससे खेलता, फिर उसे कुतर-कुतरकर खा जाता। खीरा, गाजर भी बडे़ शौक से खाता, लेकिन आम, चीकू और पपीते का वह बड़ा शौकीन था। जब मैं सायं को बेड पर बैठा आम खा रहा होता और वह नीचे बैठा देख रहा होता तो उसके मुँह के दोनों ओर से बेतहाशा लार टपकने लगती, वह आम देने के लिए कूँ-कूँ कर बार-बार मुझे ध्यान दिलाता, पर जब धैर्य चुक जाता तो दो पैरों पर अकड़ू बालक-सा खड़ा होकर माँगता। मेरे आम देने पर वह आम खाने लगता तो उसके मुँह में से आम फिसल जाता, वह बड़ी फुरती से उसे अपने पंजों में दबा उस पर पिल पड़ता और फिर छिलके-गुठली तक का नाम-निशान मिटा देता, लेकिन पूरा फर्श चिपचिपा हो जाता तो फिर से पोंछा लगाना पड़ता।

उसके पपीता प्रेम की कहानी भी बड़ी मजेदार है। एक बार रफ्तार को जबरदस्त पीलिया हो गया। कुछ भी खा नहीं रहा था। डॉक्टर ने दवाई दी, पथ्य में पपीता तथा आइसक्रीम खिलाने की हिदायत दी। सुबह-शाम एक-एक रसगुल्ला भी खिलाना था, जिससे उसके रक्त में प्लेटलेट्स कम न हो जाएँ। पपीता व आइसक्रीम बिना हील-हुज्जत के खा लेता। कई दिनों तक उसका यही आहार रहा, फिर खीरा भी देने लगे, पर पपीते का स्वाद उसकी जुबान पर ऐसा चढ़ा कि बड़ा बेटा अंकुर अकसर अपने लिए पपीता लाया करता है। जब वह बाइक खड़ी कर पपीते की पोलीथीन लटकाए घर में प्रवेश करता, तो रफ्तार उसके हाथ में पपीता देखते ही खुशी के मारे उछलने-कूदने लगता और नदीदे बालक की तरह टेबल पर रखे पपीते को जीभ लपलपाकर एकटक देखता वहीं बैठा रहता, तब अंकुर उसे पपीता जरूर खिलाता। छोटा बेटा पीयूष जिम जाया करता है, तो कसरत के बाद फलों में चीकू-केला आदि खाता है। रफ्तार को चीकू के स्वाद का पता न था। एक बार मैंने ऑफिस से घर पहुँचने के बाद चीकू खाया तो आधा चीकू उसे भी दिया। उसने बड़ा रस लेकर खाया। एक दिन स्टील की फ्रूट टोकरी में आठ-दस चीकू नीचे ही रखे थे। सब लोग छत पर गए हुए थे कि रफ्तार ने सारे चीकू साफ कर दिए। प्रातः जब पीयूष ने अपने खाने के लिए चीकू देखे तो वहाँ दो-चार बीज और छिलके ही पडे़ थे। वह सबसे पूछने लगा कि मेरे चीकू किसने खाए? इतने चीकू खाकर रफ्तार का हाजमा बिगड़ गया, उसकी शौच में चीकू के बीज निकले तो मामला सामने आया कि चीकू रफ्तार ने खाए थे। अंगूर, संतरा के अलावा कुलफी भी वह बडे़ मजे लेकर खाता था।

वह नन्हा फरिश्ता ऊँच-नीच, घृणा-प्यार और मान-सम्मान भी खूब समझता था। प्यार पाने के मामले में वह बड़ा स्वार्थी था। जब श्रीमतीजी किसी का बच्चा अपनी गोद में लेकर उसके सामने ‘बाबू-बाबू’ कहकर प्यार-दुलार करतीं तो वह इसका बहुत बुरा मानता। पहले तो भौंककर अपनी नाराजगी व्यक्त करता, उसकी बात न सुनने पर वह रूठकर अपने बिस्तर पर अपने पैरों में मुँह गढ़ाकर बैठ जाता। लाख पुकारने पर मुँह उठाकर देखता भी नहीं था, इस दौरान उसकी भौंहें दाएँ-बाएँ जरूर चलती रहतीं। हारकर उसे मनाना पड़ता, गोद में बिठा ‘बाबू-बाबू’ कह उसके सिर पर हाथ फेरते और देर तक मान-मनौवल करते तो मान जाता। उसे कोई जोर से दुत्कार देता तो भी वह मुँह फुला लेता, इतना ही नहीं, उसकी आँखों की कोरें भीग जातीं। एक बार पीयूष ने उसकी शरारत पर डाँटकर उसे एक थप्पड़ लगा दिया। इसके बाद वह ऊपर कमरे में जाकर लैपटॉप पर कुछ काम करने लगा। शाम को लगभग साढ़े आठ बजे मैं ऑफिस से घर पहुँचा तो रोज की तरह रफ्तार दरवाजे पर नहीं आया। मैंने अंदर आकर उसे पुकारा तो भी वह मेरे पास नहीं आया। पत्नी ने बताया कि पीयूष ने डाँट दिया है। मैंने उसके पास जाकर उसे मनाने की बहुत कोशिश की, पर उस दिन वह माना नहीं। मैंने देखा, उसकी आँख की कोर भीगी हुई हैं। मैंने ऊपर जाकर बेटे को डाँटकर कहा, ‘‘रफ्तार रो रहा है, तुमने उसे क्यों मारा? नीचे जाकर तुम्हीं उसे मनाओ!’’ बेटा फौरन नीचे गया, तरह-तरह से उसे मनाने लगा। बात बनती न देख बेटे ने उसे गोद में भर लिया और खुद भी रोते हुए बोला, ‘‘रफ्तार, मेरे बाबू! तू बुरा मान गया। तू भूल गया, मैं रात-रात भर तुझे गोद में लेकर बैठा हूँ, तेरी सेवा करता हूँ।’’ बेटा उसके मुख को अपनी दोनों हथेलियों में थाम, उसकी आँखों में आँखें डाल उसे मना रहा था। आखिर वह मान गया, फिर तो दोनों ने गिला-शिकबा भूलकर खूब देर तक खूब मस्ती की।

दिन में सब लोग उसे प्यार करते तो पीट भी देते, तब बेचारा कुछ न बोलता। जब मैं शाम को घर पहुँच जाता तो फिर वह मेरा साथ न छोड़ता। मेरी उपस्थिति में कोई उसे कुछ बोलता या छेड़ता तो तुरंत भौंककर प्रतिरोध करता। तब मेरे बच्चे कहते, ‘‘दिन में इसे कितना ही पीटो, तब तो यह चूँ भी नहीं करता। पापा के आने पर तो शेर बन जाता है।’’ वह कितनी भी शरारत करता, मैं उसे कभी मारता नहीं था। बच्चे को डाँटने की तरह मैं थप्पड़ दिखाकर मारने का नाटक करता। वह अच्छी तरह जानता था कि मैं उसे मारूँगा नहीं। मेरी श्रीमतीजी शिकायत करतीं, ‘‘थप्पड़ ही दिखाते रहते हैं, मारते तो हैं नहीं।’’ मुझे वह कुछ अधिक ही चाहता था। ऑफिस से घर लौट अपनी साइकिल खड़ी कर जब मैं दरवाजे की कुंदी खटखटा इतना ही कहता, ‘रफ्तार, दरवाजा खोलो!’ मेरे बच्चे अब कहने लगे थे कि पापा हमारा किसी का नाम नहीं लेते, जैसे रफ्तार ही दरवाजा खोलेगा। वह तो साइकिल की आवाज सुनकर ही दरवाजे पर हाजिर हो जाता, उछल-उछलकर दरवाजे पर पैर मारता, सब लोग अंदर कमरे में सामने ही बैठे उसकी बेचैनी का मजा लेते। उसे चिढ़ाते, ‘‘तू ही पापा का लाड़ला बेटा है, अब तू ही दरवाजा खोल!’’ वह उन्हें बुलाने दौड़कर अंदर जाता, भौंककर अपनी भाषा में दरवाजा खोलने के लिए कहता। इतनी सी देर में वह अंदर-बाहर दरवाजे के तीन-चार चक्कर लगा देता। आखिर उनमें से कोई आकर दरवाजा खोलता। मेरे अंदर आने से पहले ही वह बाहर निकल आता, फिर मेरे ऊपर अपने दोनों पंजे जमा देता। मैं ‘चलो-चलो, अंदर चलो’ कहता अंदर आता। वह कोई चप्पल उठा लेता, तेजी से पूँछ हिलाता मेरे आगे-आगे चलता और खेलने की इतनी उतावली होती कि मुझे कपडे़ उतारना भी मुश्किल हो जाता। फिर मैं उसके साथ छुआछुई खेलता। खेल होता—उसके मुँह से चप्पल या कोई कपड़ा छीनने का। वह यहाँ-वहाँ, कभी सोफे पर दौड़ाकर मुझे नचा देता या कभी उसके मुँह से कपड़ा छीनने की रस्साखींच प्रतियोगिता होती। वह खूब हाँफने लगता। आखिर मैं उसके दोनों कान पकड़ लेता और वह तुरत चारों खाने चित्त हो जाता। मैं उसकी गरदन के नीचे खरेरी करता, तब वह अपना एक पंजा मेरे हाथ पर रख लेता। खुजली करने के बाद वह आराम की अवस्था में आ जाता। फिर मैं बाथरूम में हाथ-मुँह धोने जाता। वह वहाँ भी पहुँच जाता और बच्चे की तरह मेरे चुल्लू से पानी पीता। यह सब तो हम दोनों का रोजाना का खेल था।

जिस दिन उसे स्नान कराया जाता, उस दिन उसके प्राण गले में आ जाते। अघोरी बालक की तरह नहाने से बचने के लिए इधर-उधर छिपता फिरता। आखिर कहीं शरण न मिलती तो मेरे स्टूल के पीछे आकर सिकुड़कर बैठ जाता। मेरी बेटी रिचा उसे डाँटती हुई आ पहुँचती, ‘पापा क्या तुझे बचा लेंगे?’ रिचा को जब वह पानी की बालटी, साबुन, शैंपू आदि जुटाते देख लेता तो फौरन समझ जाता कि उसके स्नान की तैयारी हो रही है, बस तभी से छिपना शुरू कर देता। आखिर रिचा के आगे उसका वश न चलता। वह लाचार-निरीह आँखों से मेरी ओर देखता, मैं भी इतना ही कहता, ‘रफ्तार भाई! नहा लो, कुछ नहीं होगा। जाओ!’ तब रिचा उसका पट्टा पकड़कर ले जाती और वह आज्ञाकारी पर ढीठ बालक की तरह बेमन से नहाने बैठ जाता। बेटी टूथ-ब्रुश से पहले उसके दाँत साफ करती। वह दाँती भींच डाँट खाते हुए अपने दाँत साफ करवाता। बेटी उसे डाँटती जाती, ‘‘रोज दाँत साफ किया कर, नहीं तो ये सड़ जाएँगे, समझा कि नहीं?’’ वह भौंहें ऊपर-नीचे कर देखता रहता। शैंपू से स्नान होता, कान साफ किए जाते। फिर सूती कपडे़ से पोंछ छत पर धूप में खटोले पर बिठा दिया जाता। वहाँ वह अपना शरीर सुखाता। सूखने पर एकदम मखमली सफेद हो जाता।

सर्दियों में वह छत पर खूब धूप सेंकता। लेकिन नीचे दरवाजा खटकने पर अपनी ड्यूटी बजाने फौरन नीचे भागता। दरवाजा बंद होता तो नीचे वाले छज्जे की रेलिंग से गरदन बाहर निकाल बाहर की स्थिति का जायजा लेता। जब बच्चे गली में खेल रहे होते तो रेलिंग में से गरदन बाहर निकाल बच्चों का खेल देख-देखकर खुश होता। बच्चे भी गली से या अपनी छतों से ‘रफ्तार-रफ्तार’ पुकारते रहते। शाम को वह छत पर बैठा चारों ओर टकटकी लगाकर देखता। आसमान में जहाज को वह टेढ़ी गरदन करके आँखों से ओझल होने तक देखता रहता था।

बीमारीरोधी, एंटी रेबीज टीके पीयूष ने उसे बचपन में ही लगवा दिए थे। उसका कार्ड भी बनवा लिया था। पीयूष अपने खर्चे दरकिनार करके कभी उसका पट्टा ले आता, कभी सर्दी के कपडे़। उसकी जंजीर भी स्टील की बढि़या वाली लेकर आया। पर उसे जंजीर से बाँधकर नहीं रखा जाता था, पूरे घर में स्वच्छंद घूमता रहता। रात्रि को अंदर वाले कमरे में अपने गद्दे पर, और दिन निकलते ही बाहर वाले कमरे में सोफे पर बैठता या सो जाता। बेटी सुबह जल्दी कॉलेज जाती है तो तड़के ही झीने का दरवाजा खोल देती, वह छत पर शौच करने जाता, फिर वहीं खाली डिब्बा, छड़ी या कपडे़ से खेलता रहता, जब मन भर जाता तब तक वह नीचे आ बाहर वाले सोफे पर बैठ जाता। शौचादि के बाद मैं वहीं हल्का व्यायाम करता, वह मौन हो देखता रहता। इसके बाद मैं सोफे पर बैठ अखबार पढ़ता, वह मेरी बगल में से मुँह निकाल मेरी जाँघ पर अगले दोनों पैर रखकर बैठ जाता, लगता जैसे अखबार पढ़ रहा हो! शुरू-शुरू में बच्चे कहते भी थे—‘मम्मी, देखो, रफ्तार पापा के साथ अखबार पढ़ रहा है।’

इस समय नित्य श्रीमतीजी चाय-नाश्ता दे जातीं या छुट्टी वाले दिन मैं खुद ले आता। मैं चाय में बिस्कुट डुबोकर खाता। जितना बिस्कुट चाय में भीग जाता, उतना मेरा और बाकी बचा रफ्तार का होता। चार बिस्कुट में हम दोनों आधा-आधा खाते, यह भी लगभग रोज का नियम था। मैं कुछ भी खाता, उसमें रफ्तार का हिस्सा जरूर होता। घूमने का वह बहुत शौकीन रहा। रात्रि को खाना खाने के बाद हममें से कोई मजे लेने के लिए जरा सा कह भर देता, ‘चलो-चलो, घूमने चलें’ या ‘पीयूष, रफ्तार को घुमा ला’। फिर तो वह पीयूष का बैठना भी मुश्किल कर देता। भौंक-भौंककर उसे जल्दी चलने के लिए उकसाता, कभी उसकी पैंट पकड़कर खींचता, कभी उसका हाथ या कोहनी मुँह में पकड़ लेता। पीयूष भी मजे लेने के लिए खड़ा होकर बैठ या लेट जाता, तब हठीले बालक की तरह ऊँ-ऊँ करके वह फैल जाता। उसकी अधीरता का सब लोग खूब आनंद उठाते। मजबूरन पीयूष जाने को तैयार होता तो वह दौड़कर उससे पहले दरवाजे पर पहुँच जाता। दरवाजा खोलते ही बेहद उमंग और खुशी में उछलता हुआ गरदन फुलाकर पीयूष के आगे-आगे चलता। घूमकर आने के बाद वह बड़ा चैतन्य और संतुष्ट दिखाई देता। शौच कराने के लिए मुझे तथा घूमने के लिए पीयूष को पकड़ता।

उसे हम घर पर अकेला मजबूरी में ही छोड़कर जाते थे। अकेला होने पर वह बड़ा मासूम सा हो जाता। उसे खाना खिलाकर, उसके बरतन में पीने का पानी रखकर बाहर वाला कमरा भी उसके लिए खुला रखते थे। इस बार फरवरी में मेरी ममेरी बहन की शादी थी। मैं ऑफिस से ही उधर चला गया था, बाकी सब लोग रात नौ बजे के करीब शादी में जाने के लिए घर से निकले थे। शादी में भी सबको चिंता रफ्तार की ही थी। करीब ग्यारह बजे मैं ही सबसे पहले घर लौटा। सामने वाली बहनजी से चाबी लेकर ज्यों ही दरवाजा खोला, वह अनाथ बालक सा ऊँ-ऊँ कर बड़ी करुण आवाज निकालता मेरे से बुरी तरह चिपट गया, जैसे शिकायत कर रहा हो कि मुझे यों अकेला छोड़कर क्यों गए? मैंने उसे गोद में भर लिया और फिर उसे अंदर लेकर आया। बाहरवाले कमरे में जैसे ही घुसा, कमरे की हालत देखकर दंग रह गया। उसने गुस्से में सोफे की गद्दियाँ घायल कर फर्श पर बिछा दी थीं, सोफा-कवर भी नीचे पड़ा था। कुछ कागज भी चिंदी-चिंदी कर डाले थे। पहले भी हम लोग कई बार उसे अकेला छोड़कर गए थे, पर ऐसा गुस्सा उसने कभी नहीं दिखाया था, न ही कभी कोई चीज इधर-से-उधर की थी।

घर का कोई सदस्य कुछ दिन उसे दिखाई न दे तो उसको याद करता। इस जनवरी में मैं अपने मित्रों के साथ आठ दिन के लिए द्वारका-सोमनाथ-डाकोर की तीर्थयात्रा पर गया था। तीसरे दिन ही श्रीमतीजी ने फोन पर बताया कि रफ्तार तुम्हें रोज तुम्हारे कमरे में देखने जाता है। ठीक साढ़े आठ बजे (मेरे ऑफिस से घर लौटने का समय) दरवाजे पर तुम्हारा इंतजार करता है। आज यह बहुत उदास बैठा है, लो इससे बात करो, और उन्होंने मोबाइल फोन रफ्तार के कान पर लगा दिया। मैंने कहा, ‘‘रफ्तार! कैसे हो? बाबू, चिंता मत करो, मैं तीन-चार दिन में आकर तुम्हारे साथ खेलूँगा।’’ श्रीमतीजी ने बताया कि तुम्हारी आवाज सुनकर रफ्तार कनखियों से इधर-उधर देख रहा है कि आवाज कहाँ से आ रही है? अब यह उठ बैठा है और पूँछ हिला रहा है। मेरी आवाज वह खूब पहचानता था। इतने भर से वह काफी चैतन्य हो गया। मुंशी प्रेमचंद ने अपने एक उपन्यास में कहीं कहा है कि दुखी मन को सांत्वना के दो बोल भी कम प्यारे नहीं होते! प्यार की भाषा जानवर इनसानों से ज्यादा समझते हैं, फिर रफ्तार की तो बात ही क्या!

हमारे घर में, दूसरी मंजिल के शौचालय की दुछत्ती में कबूतरों ने अपना बसेरा कर लिया। उनकी आबादी और उनके उत्पात इतनी तेजी से बढ़े कि हमें इन्हें भगाने के उपाय करने पर मजबूर होना पड़ा। कबूतरों का परिवार अपनी शौच से दिन-रात घर के आगे और वाश-बेशिन को तो गंदा करता ही, छज्जे पर स्थित बल्ब का होल्डर भी बैठ-बैठकर तोड़ डाला। अब दुछत्ती में ढक्कन लगवा दिया गया। जब कबूतर आपस में झगड़ते या एक-दूसरे में गुँथकर किलोल करते तो उनकी फड़फड़ाहट की आवाज रफ्तार को नागवार गुजरती और वह उन्हें सबक सिखाने के लिए दौड़कर ऊपर जाता, उन पर झपटता। पर वे परिंदे थे, उड़कर ऊपर बैठ जाते। रफ्तार ज्यादा से ज्यादा उछल ही सकता था। रेलिंग पर दो पैरों से खड़ा हो उन्हें पकड़ने की कोशिश करता। कई बार अचानक धावा बोलकर रफ्तार एकाध को धर दबोचता, परंतु तुरंत छोड़ देता, उन्हें मारता नहीं था। वह तो उसके घर पर अवैध रूप से किए गए अतिक्रमण से चिढ़ता था। खिड़की लगाने के बाद भी कबूतरों ने उस स्थान को नहीं छोड़ा। सर्दियों में हमने पूरे छज्जे को पन्नी से ढक दिया। लेकिन कबूतर भी बेदिमाग नहीं होते। दिन या रात, जैसे ही छत का झीना खुलता, आँख बचाकर वे वहाँ से अंदर आ जाते। छज्जा ही नहीं, अब वे अंदर के कमरे तक अपनी घुसपैठ बनाने लगे, पर रफ्तार उन्हें बराबर खदेड़ता रहता, आखिर वह इस घर का रखवाला था। रफ्तार के न रहने पर अब कबूतरों की फिर से मौज हो गई है।

घर में अकसर आस-पड़ोस से छोटी-छोटी चुहिया घुस आतीं। पत्नी और बच्चे तथा कभी-कभी मैं भी ‘चुहिया पकड़ो’ खेल में शामिल होता, परंतु इस खेल का सबसे बेस्ट खिलाड़ी था रफ्तार। श्रीमतीजी झाड़ू फटकारकर सिलेंडर या डिब्बों आदि के पीछे से चुहिया को निकालतीं, हुस्स-हुस्स की आवाज करतीं, रफ्तार हम सबसे आगे कूदकर वहाँ अपना मुँह घुसेड़ देता। कई बार चुहिया बाहर निकल आती और रफ्तार पंजा मार देता, पर उसे जान से न मारता। कई बार हमारी पकड़ में आई चुहिया को वह अपनी उछल-कूद और उतावली से भागने का मौका दे देता। चुहिया पकड़ने का उसे बड़ा जुनून था। अगर वह कभी हमारे बहुत पुकारने पर भी छत पर से नीचे नहीं आ रहा होता तो बस हमारे ‘चुहिया-चुहिया’ चिल्लाते ही वह सिर पर पैर रखकर आ पहुँचता और मना करने के बावजूद घर का कोना-कोना छान मारता। इसी तरह वह हमारी श्रीमतीजी और बेटी के साथ छुपमछुपाई खेलता। श्रीमतीजी चुपचाप रसोईघर के दरवाजे के पीछे छिप जातीं और बड़ी बारीक आवाज में उसे पुकारतीं—‘रफ्तार!’ वह दौड़-दौड़कर अंदरवाले कमरे के परदों के पीछे, बेड के नीचे, फिर बाथरूम और फिर बाहर वाले कमरे में ढूँढ़ता। प्रथम प्रयास में वह गच्चा खा जाता, आवाज की दिशा का अनुमान न लगा पाता। परंतु दूसरे-तीसरे प्रयास में उन्हें जरूर ढूँढ़ निकालता। इस तरह अकसर दोनों यह खेल खेलते और हम लोग उन्हें देखते, कोड वर्ड में उसकी मदद भी करते। उनको जब वह ढूँढ़ लेता तो उनकी साड़ी पकड़कर उन्हें बाहर लाता और उछल-उछलकर खूब खुश होता। मतलब कि घर में खूब मस्ती का आलम रहता!

रफ्तार की एक आदत और मजेदार थी। जैसे छोटा बालक पालने या बिस्तर में पड़ा-पड़ा किलकारी मारकर अकेला ही खेलता रहता है। ठीक उसी तरह रफ्तार सोफे या अपने बिस्तर पर किसी कपडे़ या लकड़ी का टुकड़ा अथवा खाली बोतल को उछाल-उछालकर खेलता रहता और प्रसन्नता में हल्की घुरघुराहट की आवाज निकालता रहता। वह सोते समय खर्राटे भी लेता और नींद में चारों पैर ऊपर कर लेता, मानो नींद में कभी आसमान गिर पडे़ तो उसे पैरों पर ही थाम ले।

सर्दियाँ अभी समाप्ति पर थीं कि रफ्तार को जोरों के दस्त लगे। पानी जैसी शौच कब-कहाँ निकल जाती, उसे पता न चलता। खाना-पीना सब छोड़ दिया था, पूरा घर कई-कई बार फिनाइल से धोना पड़ता। परंतु रफ्तार बहुत कष्ट में था। उसकी पीड़ा और बेबसी उसकी आँखों में साफ दिखाई देती। हम सब उसकी हालत देखकर बहुत घबरा गए, पर पीयूष ने हिम्मत नहीं हारी। सिंह डॉग क्लीनिक पर बराबर ले जाता रहा। पूरी-पूरी रात जागकर उसकी साफ-सफाई और देखभाल कर समय पर दवाइयाँ देता रहा। उस समय बेटी और श्रीमतीजी हिमाचल की तीर्थयात्रा पर गई हुई थीं। वे बराबर फोन पर उसका हाल-चाल लेती रहतीं। वहाँ उन्होंने रफ्तार की सलामती के लिए हर तीर्थ पर दुआ माँगी। इस बीमारी में रफ्तार इतना कमजोर हो गया था कि सीढि़याँ चढ़कर छत पर जाने में असमर्थ था। हम गोद में उठाकर उसे शौचादि कराने ले जाते। धीरे-धीरे दवा और शायद दुआ ने भी अपना असर दिखाया। चार-चार इंजेक्शन उसे रोज लग रहे थे। उसके दस्त रुक गए। दो दिन हमने उसे ग्लूकोज के पानी पर तथा दो दिन दाल के पानी पर रखा। उसके परहेज में हमने कोई चूक न होने दी। अगले दिन उसे पतली खिचड़ी बनाकर खिलाई, उसने पूरे मन से खाई। प्रातः मैं जल्दी उठकर रसोई बना देता, फिर ऑफिस चला जाता। दोपहर-शाम को पीयूष उसके लिए खिचड़ी बना लेता। धीरे-धीर रफ्तार पूर्ण स्वस्थ हो गया और पहले की तरह मस्ती करने लगा। कुछ दिनों बाद यानी सर्दियों में मस्ती करते हुए उसके पिछले बाएँ पैर में मोच आ गई। वह अपनी एक टाँग उठाकर कष्ट के साथ चलता। पहले तो घर पर ही पैर पर फिटकरी का पानी ढाला, पैर पर हल्दी-गुड़ बाँधा, इससे कुछ आराम जरूर आया, लेकिन एक दिन पीयूष उसे डॉक्टर के पास ले गया। उसने रफ्तार की जाँच की, फिर बोला, ‘‘पैर तो ठीक हो जाएगा, कोई विशेष बात नहीं है, लेकिन गंभीर बात यह है कि तुम लोग इसकी इतनी सेवा क्यों करते हो, इतना ज्यादा क्यों खिलाते हो? जितनी इसकी उम्र है, उस हिसाब से इसका वजन आधा होना चाहिए। इसका हीमोग्लोबिन बहुत ज्यादा हो गया है। कुछ दिनों बाद यह अपनी चुस्ती-फुरती खो बैठेगा। इसके कान इतने लाल हैं कि रक्त अभी चू पडे़गा।’’ हमने डॉक्टर की हिदायत पर तीनों समय उसकी एक-एक रोटी कम कर दी, पर रफ्तार को जोरों की भूख लगती। वह कुछ भी खाने के लिए लालायित रहता। सर्दियाँ बीत गईं। सबकुछ ठीक चल रहा था, होली पर उसने होली खेली, होली मिलने आनेवालों ने गुलाल से उसका चेहरा भी लाल-पीला कर दिया।

२२ मार्च को वह थोड़ा सुस्त जरूर था, पर सायं को मेरे साथ खूब खेला और छत पर शौच करने भी गया, परंतु २३ मार्च को उसे उल्टियाँ होने लगीं, खाना उसने बिल्कुल त्याग दिया। पीयूष उसे रोहिणी स्थित सिंह डॉग क्लीनिक लेकर गया, डॉक्टर ने इंजेक्शन लगाए और उसे पानी न देने की हिदायत दी, लेकिन दवाई से कोई आराम नहीं आया, जरा सा ग्लूकोज का पानी भी पी लेता, फौरन उल्टी कर देता। सुबह मैं पौधों में पानी लगाने गया अैर पाइप से पानी देने लगा, वह पीछे से कब छत पर पहुँच गया, मुझे पता न चला, मैंने देखा तो वह टोंटी से टपकता पानी पी रहा था, उसे प्यास बराबर लग रही थी। जब तक मैं उसे हटाता, वह काफी पानी पी गया था। २४ मार्च को पीयूष अपने एक दोस्त के साथ रफ्तार को लेकर पुनः डॉक्टर के पास गया। उसने फिर इंजेक्शन लगाए और बताया कि इसे पपीता और आइसक्रीम खिलाना। दो दिन में ही वह काफी कमजोर हो गया। जब पीयूष क्लीनिक से रफ्तार को लेकर लौट रहा था तो पंजाबी बस्ती (नांगलोई) में रफ्तार स्कूटी से उतरकर पंजे लंबे कर सड़क पर लेट गया। आसपास के दुकानदार इकट्ठा हो गए, बोले, इसको क्या हुआ है? पीयूष ने बताया—यह बीमार है, इसे डॉक्टर से दिखाकर आ रहा हूँ। उन्होंने यह सुनकर आसपास झुक आए लोगों को दूर हटा दिया और बोले कि इसे थोड़ा आराम कर लेने दे। कुछ देर आराम करने के बाद भी रफ्तार बेहद थकान महसूस कर रहा था। बहुत कोशिश करने के बाद भी वह स्कूटी पर बैठने की हिम्मत नहीं जुटा सका, तब मार्केट वालों ने एक रिक्शा करवा दिया। पीयूष बड़ी कठिनाई से उसे घर लेकर आया, पीयूष को यहाँ-वहाँ उसके पंजों की खरोंचें लग गईं। घर आकर वह फर्श पर लेटा रहा, तब भी काफी चैतन्य था। पीयूष उसके लिए आइसक्रीम ले आया और फिर जिम चला गया।

साढे़ आठ बजे जब मैं घर पहुँचा तो श्रीमतीजी बोलीं कि कपडे़ बाद में उतारना, पहले पपीता ले आओ, कल से रफ्तार ने कुछ नहीं खाया। मैं तुरंत बाजार गया और पौने दो किलो का एक पपीता ले आया। हमने थोड़ा सा पपीता काटकर उसके बरतन में डाला, पर रफ्तार ने सूँघा तक नहीं। जब पीयूष जिम से लौटा तो उसने भी उसे खिलाने की कोशिश की, नाममात्र को उसने आइसक्रीम जरूर चाट ली। आज रफ्तार को तेज बुखार भी था। उसकी हालत देखकर पीयूष बहुत बेचैन हो रहा था। अभी भी रफ्तार की हालत में कोई सुधार नहीं हुआ था। तब रात साढ़े नौ बजे पीयूष ने प्रेम नगरवाले सुनील शर्मा चाचाजी के बताने पर नांगलोई के सोनू क्लीनिक वाले डॉक्टर से फोन पर बात की और सारी स्थिति बताई। उसने उल्टी रोकने की दवा लिखवाई। दवा लेने पीयूष फौरन स्कूटी पर नांगलोई के लिए दौड़ गया। दवाई एक पतला कागज जैसा था, जो रफ्तार की जबान पर चिपकाया। यह मुँह में अपने आप गल जाता है और उल्टियाँ रुक जाती हैं। बुखार की टेबलेट भी खिलाई। पर ग्यारह बजे रफ्तार ने फिर उल्टी कर दी और काँपने लगा। उसकी हालत देख पीयूष बेहद विचलित हो गया, तुरंत डॉक्टर को फोन पर मरीज की ताजा स्थिति बताई। डॉक्टर ने सलाह दी कि इसे अस्पताल ले जाओ। रात के साढ़े ग्यारह बजे आनन-फानन में तैयार हो दोनों भाई रफ्तार को उसके कंबल में लपेट राजौरी गार्डन स्थित संजय गांधी एनीमल केयर सेंटर ले गए। पीयूष ने हमें फोन पर बताया कि रफ्तार को ग्लूकोज लगा दिया है, आप चिंता मत करो। फिर घंटा भर बाद फोन आया कि डॉक्टर कल सुबह नौ बजे इसका ब्लड टेस्ट करेंगे।

मैंने दोनों बच्चों को सलाह दी कि तुम्हें नौ बजे तक वहाँ रुकना पडे़गा। दिन भर तुम भागे-दौडे़ हो, रफ्तार को घर ले आओ। तुम लोग थोड़ा आराम भी कर लोगे, सुबह जल्दी लेकर चले जाना। रात के लगभग ढाई बज रहे थे, दोनों भाई रफ्तार को लेकर आ गए। रात को हल्की सर्दी हो गई थी। रफ्तार फर्श पर लेट गया, मेरे पुकारने पर पूँछ हिलाने लगा। रफ्तार अब काफी सचेत लग रहा था। अंदर वाले कमरे में उसके लिए कंबल बिछा दिया, ताकि रात को ठंड महसूस हो तो रफ्तार इस पर बैठ जाएगा। अंकुर ऊपर वाले कमरे में सोने चला गया, पीयूष उसके पास ही अंदर बेड पर सोया। हम बाहर वाले कमरे में सो गए। रफ्तार रात को बाहर से उठकर अंदर कमरे में कब गया, यह किसी को पता नहीं। लगभग पौने पाँच बजे पीयूष की आँख खुल गई, क्योंकि वह रफ्तार को अस्पताल जल्दी लेकर जाना चाहता था। जगते ही पीयूष ने रफ्तार को देखा तो रोते हुए चीखा—‘मम्मी! रफ्तार को क्या हो गया?’ हम उठकर तुरंत अंदर दौडे़। मैंने रफ्तार के शरीर पर हाथ फेरा, वह नन्हा फरिश्ता शांत हो चुका था। मैं स्तब्ध रह गया। हा-हा! विधाता, यह क्या किया? रुँधे गले से इतना ही बोल पाया, ‘बेटा, रफ्तार चला गया।’ बड़ा बेटा भी नीचे आ चुका था। छोटे दोनों बहन-भाई दहाड़ें मारकर रोने लगे, श्रीमतीजी भी अपने आँसू नहीं रोक पाईं। घर का मुखिया होने के नाते मुझे बच्चों के सामने रोने की इजाजत नहीं। पर अंदर मेरे हाहाकार मचा हुआ है। शायद अंतिम बार आई हरी-पीली उल्टी उसके पास से बहकर सूख गई और पास में ही उसका कंबल ज्यों का त्यों बिछा हुआ है।

मन को कड़ा कर बच्चों को मैं बहुतेरी सांत्वना देने की कोशिश कर रहा हूँ, पर बच्चे रो-रोकर बेसुध हो रहे हैं। शोक और पीड़ा से विह्वल पीयूष अनर्गल प्रलाप करने लगा, भगवान को अपशब्द कहने लगा। अपने आँसुओं को जब्त कर मैंने उसे समझाने की असफल कोशिश की, ‘‘बेटा, स्वार्थी न बनो, भगवान् बड़ा दयालु है। तुमसे ज्यादा किसी और को उसकी जरूरत आ पड़ी है, इसीलिए भगवान् ने उसे किसी और रूप में वहाँ भेज दिया है, फरिश्तों का तो काम ही यही है। तुम पढ़े-लिखे समझदार हो, दोनों बहन-भाई चुप हो जाओ।’’ फिर दोनों को सीने से लगाकर चुप कराने की कोशिश की। फिर मैंने बडे़ बेटे से पूछा कि बेटा, अब क्या करना चाहिए? जो भी करें, जल्दी करें, इनका रो-रोकर बुरा हाल हो रहा है। बेटा बोला, ‘‘पापा, मैंने अपने दोस्त मन्नू को बुलाया है, वह आता ही होगा।’’ श्रीमतीजी सामने आंटी के घर फावड़ा लेने गईं तो सब हाल सुनते ही आंटी फौरन हमारे घर दौड़ी आईं, दोनों बच्चों को अपने अंक में भरकर उन्हें सांत्वना दी, तरह-तरह से समझाकर चुप कराया। श्रीमतीजी दो-ढाई मीटर सफेद नया कपड़ा ढूँढ़कर ले आईं। मैंने कहा, थोड़ा गंगाजल और ले आओ! गंगाजल के छींटे देकर मैंने रफ्तार के पार्थिव शरीर को पवित्र किया, फिर बडे़ बेटे और मैंने प्यारे रफ्तार को कफन में लपेट दिया। अभी थोड़ा अँधेरा ही है। अंकुर का दोस्त आ गया। अंकुर रफ्तार को गोद में लेकर स्कूटी पर बैठ गया। नमक की एक थैली साथ रख ली। रफ्तार को बेहद प्यारा कंबल भी उसके साथ रख दिया। हम सब ने आँसुओं की सौगात दे उस फरिश्ते को अंतिम विदाई दी। कैसा संयोग है कि स्कूटी पर घूमने का बेहद शौकीन रफ्तार अपनी अंतिम यात्रा के लिए स्कूटी पर जा रहा है। दोनों मित्र उसे ले जाकर बडे़ पार्क के पास भूमि-समाधि दे आए।

रिचा और पीयूष रोते-रोते बेड पर अचेत से औंधे पडे़ हैं। उनके किनारे श्रीमतीजी अपने पल्लू में मुँह छिपा सुबक रही हैं। बड़ा बेटा ऊपर है। मैं बाहर वाले कमरे में आ सोफे पर बैठ गया हूँ। अब तक किसी तरह रोके रखा आँसुओं का सैलाब तटबंध तोड़ फूट पड़ा। जितना मैं आँसुओं को रोकने की कोशिश कर रहा हूँ, हिचकी के साथ ये बार-बार उतने ही वेग से फूट पड़ते हैं, तब मैंने इन्हें बह जाने दिया। समय जैसे ठहर गया है। पूरे घर में डरावना सा सन्नाटा पसर गया है। लगभग घंटा भर बाद उठकर मैंने ही जैसे-तैसे चाय बनाई। किसी ने चाय नहीं ली। चाय लेकर मैं रोज की तरह अपने स्टूल पर बैठा। आज बिस्कुट नहीं लिये, मेरा बिस्कुट पार्टनर जो नहीं है। वह मेरे हर रोज के नाश्ते का पार्टनर था। चाय पीते हुए उस पर कुछ लिखने की कोशिश की, पर आँसुओं के वेग ने तीन पंक्तियों से ज्यादा नहीं लिखने दिया।

नहा-धोकर ऊपर के कमरे में स्थित पूजा-स्थान में धूपबत्ती करने गया, रोज ही जाता हूँ। योगेश्वर कृष्ण के सम्मुख हाथ जोड़ खड़ा हुआ कि जोरों की अश्रुधारा बह चली। भीगी आँखों मुझे भगवान् की सूरत भी दिखाई नहीं दे रही है। जैसे दुःख या घोर संकट की घड़ी में किसी हिमायती या संरक्षक के आने पर व्यक्ति फूट-फूटकर रोने लगता है, मेरी स्थिति ठीक वैसी ही है। मेरा हिमायती मेरा कन्हैया है। हाथ जोड़ मैंने उनसे इतना ही कहा, ‘प्रभु! आप जो करते हैं, अच्छा ही करते हैं, आपकी लीला कोई समझ नहीं पाता है, पर इस फरिश्ते को मेरे घर में कुछ दिन और रहने देते तो अच्छा रहता। मैं किंकर्तव्यविमूढ़ हूँ, आप ही बताइए, मैं क्या करूँ? इन बच्चों को कैसे सांत्वना दूँ?’ पूजा के बाद कपडे़ पहन अपने रोजाना के समय पर मैं ऑफिस चला गया। आज घर में खाना नहीं बना। ऑफिस से ग्यारह बजे पत्नी को फोन किया कि पीयूष के दोस्तों को फोन करके बुला लो। वे इसे अपने साथ ले जाएँगे, घर से बाहर इसका कुछ तो मन बहलेगा। उन्होंने ऐसा ही किया। उसके दोस्त यह खबर सुनकर दुखी हो गए, सब दौडे़ चले आए, रफ्तार इन सब का भी दोस्त था। वे पीयूष को अपने साथ ले गए। बहुत तरह से समझाया भी। लेकिन पीयूष की पीड़ा गहरी है। शाम को मैं घर पहुँचा, स्थिति जस-की-तस लगी। रात को खाना बना, सबने मुश्किल से एक-एक, दो-दो रोटी खाई। वह नन्हा फरिश्ता चित्त से हटता ही नहीं।

रात को पीयूष फर्श पर उसी स्थान पर सोया, जहाँ पर रफ्तार ने शरीर छोड़ा था। अब तो सोते-सोते अचानक ‘रफ्तार-रफ्तार’ चिल्लाने लगता है। मैंने रफ्तार के चेन, पट्टा, खाने का बरतन उठाकर रख दिए थे, उसने ढूँढ़कर निकाल लिये। उसके बरतन में रोज पानी भरकर रखता है कि मेरा रफ्तार क्या प्यासा रहेगा? उसका चेन, पट्टा भी अपनी आँखों के सामने रखता है, जिम जाना भी छोड़ दिया है। सुबह-शाम रफ्तार के लिए रोटियाँ बनवाता है, रात को खूब गाढ़ा दही जमवाता है, प्रातः दही के साथ रोटी ले जाकर सड़क पर कुत्तों-पिल्लों को अपने हाथ से खिलाता है। घर आकर बड़ा विह्वल होकर बताता है कि मम्मी, उन पिल्लों ने बिल्कुल रफ्तार की तरह मेरे हाथ से रोटी लेकर खाई! मैंने पत्नी को बोल दिया है कि यह जो बताए, वैसा कर दिया करो, किसी तरह इसके मन को तसल्ली तो मिले! सयाने लोग सलाह देते हैं कि जल्दी-से-जल्दी एक डॉगी ले आओ। चार दिन ऐसे ही निकल गए। पीयूष के चित्त से रफ्तार का ध्यान हटता ही नहीं है। दिन में लैपटॉप पर रफ्तार के फोटो और मोबाइल में बनाए उसके वीडियो देखता रहता है।

आखिर कोई उपाय न देख बड़ा बेटा अंकुर ३१ मार्च को मोती नगर से एक लेब्रा डॉगी ले आया। मुश्किल से महीने भर का होगा। बहुत कमजोर भी है। अब पीयूष इसकी सेवा-शुश्रूषा में लग गया है। तीन-तीन घंटे बाद रात को जागकर भी उसे सेरेलक खिलाता है। अब काफी हद तक उस अवसाद से उबर गया है, जिम भी जाने लगा है। पर जूनियर रफ्तार को बाहर वाले किसी को देखने नहीं देता है, छिपाकर रखता है। नजर आदि से बचाने के लिए इसके मस्तक के बाईं ओर काजल से काला टीका लगा दिया है। गली के छोटे बच्चों को पता चल गया है, जूनियर रफ्तार की एक झलक पाने के लिए हमारे दरवाजे के आगे से बार-बार गुजरते हैं। पीयूष से उसकी एक झलक दिखाने का आग्रह करते हैं, पीयूष कहता है—अभी नहीं, तीन महीने बाद दिखाऊँगा। जूनियर रफ्तार भी पूरे घर में दौड़ा फिरता है और यह भी अपने नन्हे-नन्हे दाँतों की मेरे स्टूल पर आजमाइश करता है।

लेकिन उसमें और इसमें फर्क है—वह आया था अपने आप, भगवान् का भेजा हुआ, इसे लाया गया है सयत्न, रफ्तार की प्रतिपूर्ति के लिए। मेरे जेहन में अब भी ये पंक्तियाँ बराबर गूँजा करती हैं, ‘ओ नन्हे से फरिश्ते! तुम से यह कैसा नाता, कैसे ये दिल के रिश्ते। ओ नन्हे से फरिश्ते!’ रफ्तार की जगह कोई नहीं ले सकता। उसने हमें ढेरों खुशियाँ दीं, हम क्या दे रहे हैं उसे? चंद आँसू ही तो बहा रहे हैं उसकी याद में! ओ नन्हे फरिश्ते! मैं तुम्हारा कर्जदार रहना चाहता हूँ, ताउम्र—जीवन की आखिरी साँस तक!

जी-३२६, अध्यापक नगर,
नांगलोई, दिल्ली-११००४१
दूरभाष : ९८६८५२५७४१
—प्रेमपाल शर्मा

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