नारी

नारी

ओ नारी!

तुझे अबला कहें, सबला या बेचारी

क्षमा करना देवी, तेरी भावनाओं को

आहत करने की मंशा नहीं है

इस वीभत्स पुरुष का

अनाचार अभी तक रुका नहीं है,

मैं सोच रही थी कि

अगर उस समय भी संविधान होता

तो मैं कोर्ट के चक्कर लगाती रहती

और दुशासन बड़ी शान से बरी होता,

मेरे केश तो खुले रह जाते

और यह हृदय सदा के लिए छलनी होता

तुम्हारी सरकार का यह कैसा इनसाफ है

बालिग अपराध करके नाबालिग की सजा माफ है

आज भी न्याय किसी सभा में परास्त हो रहा है

तेरा इन अंधे, बहरे, अहंकारियों के बीच

हास-परिहास हो रहा है।

ये चाहते तो ऐसा सम्मान कराते

उस क्रूर को राष्ट्रपति के हाथों सिलाई मशीन दिलवाते

इस पत्र का अंत इस बात से करती हूँ—

जो दिखता है, वही छीन लिया जाता है,

चीर तो चीर है,

किसी सभा में भी खींच लिया जाता है।

तेरा आत्मसम्मान इस अस्मिता से कहीं बड़ा है,

याद रखना, इसी गौरव के आगे पूरा कौरव वंश

कुरुक्षेत्र की रणभूमि पर हारकर गिरा पड़ा है,

रीति-रिवाज हमसे हैं हम उनसे नहीं हैं

मन की पवित्रता

किसी के गिराने से गिरी नहीं है

गली में चलते हुए

कोई पागल कुत्ता काट जाए,

तो घर से निकलना बंद नहीं करना,

मैं भी नहीं डरी, तू भी न डरना

आज तू कितने दुशासन और जयद्रथों से घिरी पड़ी है।

सच तो यह है कि तू द्रौपदी से भी बड़ी है

हाँ, तू द्रौपदी से भी बड़ी है।

एक्स १८०५, राजगढ़ कॉलोनी
गली नं.१६, दिल्ली-११००३१
दूरभाष : ९८९९४९६९८६
—स्वाति ग्रोवर

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