ए.टी.एम.

‘‘दोसाल हो गए बिटिया को यहाँ काम करते हुए, अब तो काम भी सीख गई है, दुगनी तनख्वाह बढ़ाओ तब बिटिया को यहाँ छोड़ूँगी, नहीं तो मैं इसे लेकर चली।’’ कहती हुई कामवाली बाई कार्टून देख रही अपनी बिटिया पूजा की ओर लपकी।

बाहर मालकिन और माँ की बातचीत से अनजान वह दस साल की अबोध माँ को देखकर बोली, ‘‘हम न जाई, हमको यहाँ पर सब लोग बहुत चाहत है, कल गाड़ी से जाकर भाभी हमें नई गुलाबी फ्रॉक दिलवाएँगी।’’ पर उस समय गुस्से के मारे उसकी माँ राजकुमारी को कुछ नहीं सूझ रहा था। कसकर उसका हाथ मरोड़कर बोली, ‘‘चलती है कि नहीं हरामिन, मुँह लड़ाती है, मैंने तुझे जन्म दिया चंडिका और आज ये तेरी माँ बन बैठी।’’ उसके मुँह पर दो थप्पड़ मारकर वह उसे तेजी से खींचकर अपने घर ले जा रही थी और उधर पूजा बिटिया का रो-रोकर बुरा हाल था। उस समय वो रो-रोकर चिल्ला रही थी, ‘‘मालकिन बहुत अच्छी है, तुम्हारे घर में घमौरियाँ हैं, यहाँ ठंडे-ठंडे ए.सी. में अच्छा लागत है। ये लोग मुझे गाड़ी में घुमाते हैं, होटल में खाना खिलाते हैं, हमका यहाँ पर अच्छा लागत है, हम घर न जाईब।’’ कहकर उसने माँ से अपना हाथ छुड़ाना चाहा।

उधर से मालकिन बोली, ‘‘काहे मारती हो बिटिया को!’’ कहकर उन्हें शांत करवाने की कोशिश कर रही थी। उसके चेहरे की खिसियाहट मुझे साफ नजर आ रही थी। पर पड़ोसियों के मामले में भला मैं होती कौन हूँ बालनेवाली?

फिर भी दिल न माना। मेरे घर के पास से जब पूजा की अम्माँ गुजरी तो उसको शांत करवाते हुए मैंने सुबह घटा सारा माजरा जानना चाहा, मेरी सहानुभूति पाकर वह फट पड़ी, ‘‘देखो टप्पी की मम्मी, आप ही बताओ कि ढाई हजार रुपए में लौंडिया से चौबीस घंटे बेगार करवावत हैं और फिर गरीब के बच्चे को ए.सी., टी.वी., मोटरकार और होटल की गंदी लत लगवाकर बड़ी भली बनती हैं ये बँगलेवाली। (बिटिया के मुँह पर फिर से एक तमाचा मारते हुए) उस पर यह लौंडिया भी अब मेरा कहना नहीं मानती, जाने कौन सा जादू-टोना कर दिया है लौंडिया पर।’’ इस प्रकार बोलती-बड़बड़ाती वह अपनी ही धुन में चली जा रही थी।

उस समय अपने बँगले के गेट पर खड़ी मैं सोच रही थी, ‘आज नन्ही पूजा अपनी माँ को दुश्मन और मालकिन को अपनी माँ से बढ़कर मान रही है, पर वह अबोध इस दुनिया का कमीनापन क्या जाने? एक तरफ माँ-बाप उसे जन्म देकर वक्त से पहले ए.टी.एम. मशीन बना देना चाहते हैं, वही माँ-बाप से टूटी यह बच्ची मालकिन के मीठे जहर भरे चंगुल में समाती जा रही है। सच तो यह है कि उनमें से कोई भी उसकी शिक्षा की बात नहीं करता, जबकि इस उम्र के बच्चों के लिए हर जगह सरकार ने मुफ्त पढ़ाई की व्यवस्था कर रखी है।’

उस क्षण ‘ऐसी बदकिस्मत नसीमन के लिए क्या रोएँ और क्या हँसे?’ इस प्रकार सोचते हुए मैं गंभीर हो गई।

७/२०२ स्वरूप नगर
कानपुर (उ.प्र.)
दूरभाष : ७६०७३४५६७८
—लता कादंबरी

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