संस्कृतियों को प्रश्नांकित करनेवाले नायपॉल

संस्कृतियों को प्रश्नांकित करनेवाले नायपॉल

भारतीय मूल के ब्रिटिश लेखक, बुकर व नोबेल पुरस्कार से सम्मानित और भारत को ‘गुलामों का देश’ कहनेवाले अंग्रेजी लेखक वी.एस. नायपॉल का ८५ बरस की उम्र में ११ अगस्त, २०१८ को लंदन स्थित उनके घर में निधन हो गया। उनका जन्म १७ अगस्त, १९३२ को त्रिनिदाद, गाँव चगवानस के एक भारतीय प्रवासी ब्राह्मण के घर में बतौर ब्रिटिश नागरिक हुआ था। वी.एस. नायपॉल को ‘सर विद्या’ के नाम से भी जाना जाता था, जिनका मूल नाम विद्याधर सूरजप्रसाद नायपॉल था। सर नायपॉल के पुरखे संभवतः गोरखपुर पूर्वी उत्तर प्रदेश से बतौर गिरमिटिया त्रिनिदाद गए थे। ‘नाइटहुड’ की उपाधि से सम्मानित नायपॉल ने इतिहास, धर्म, संस्कृति, राजनीति, आदर्शवाद और उपनिवेशवाद आदि विभिन्न विषयों पर लगभग छह दशक तक लेखन कार्य किया। उनका लेखन विश्वास, उपनिवेशवाद और मानवीय अवस्थाओं की गहरी पड़ताल करता है। ऐसा नहीं है कि भारत के बारे में उनके सोच-विचार को लेकर ज्यादातर लोगों में उनकी छवि भारत विरोधी की ही रही है, लेकिन उन्हें यों ही भारत से निर्मम ममता रखनेवाला लेखक भी नहीं कहा जाता है।

भारत और भारतीय समाज के बारे में अंतरराष्ट्रीय धारणा क्या है, क्या हो सकती है अथवा क्या होना चाहिए; इन सवालों को लेकर यूरोप और पश्चिमी देश अकसर ही किसी-न-किसी द्वंद्व के शिकार रहे हैं, जिन्हें आग्रह या पूर्वग्रह भी कहा जा सकता है। अतिरंजना में कोई चाहे तो सर नायपॉल और सलमान रश्दी में समानता के समान आधार-स्तंभ भी ढूँढ़ सकता है, किंतु अगर उनके औपन्यासिक यात्रा-वृत्तांतों को थोड़ी सूक्ष्मता से देखा जाए तो उनके लेखन का एक आंतरिक सिरा गहरे तौर पर भारत और भारतीय समाज से भी जुड़ा मिलेगा। ऐसे में जरूरी हो जाता है कि बिना किसी आग्रह, दुराग्रह और पूर्वग्रह के, पहले नायपॉल को बहुतायत से पढ़ा जाना चाहिए, जबकि इधर इस देश में प्रखर राष्ट्रवाद का दौर प्रखर प्रवाह लिये मचल रहा है। अंग्रेजी आलोचक हरीश त्रिवेदी ने उन्हें ‘सत्यमेव जयते’ का उपासक कहा है।

वी.एस. नायपॉल के विरोध में एक तर्क यह दिया जाता है कि वे भारत को एक यायावर दृष्टिकोण से ही देखते थे और अपने इसी दृष्टिकोण के वशीभूत वे भारत की एक ऐसी तसवीर प्रस्तुत करते हैं, जैसाकि वे यथार्थ में कदापि नहीं हैं। सर नायपॉल की रचनात्मक संवेदनशीलता के संदर्भ में यह एक अर्धसत्य टिप्पणी है। भारत सिर्फ एक भौगोलिक और राजनीतिक इकाई भर नहीं है। यह देश बहु-विकसित से कहीं ज्यादा बहु-विस्तारित सभ्यता-संस्कृति का देश है। यहाँ रहनेवालों को अपने संपूर्ण जीवन-चक्र के दौरान भिन्न-भिन्न यातनाओं, प्रश्नों और भिन्न-भिन्न निष्ठा-उदारताओं से गुजरना पड़ता है। नायपॉल की दृष्टि जितनी पैनी है, उनकी लेखनी, उतनी ही पारदर्शी है। उनका लिखा हर यात्रा-वृत्तांत विश्वास जागनेवाला सच प्रतीत होता है। वे व्यक्ति और समाज की विसंगतियों को दरशाने के मामले में जितने ईमानदार व निर्मम हैं, उतने ही सहज भी। उनका लेखन उत्तर-औपनिवेशिक यातनाओं का प्रामाणिक तथा ऐतिहासिक दस्तावेज है।

तकरीबन एक सदी पूर्व वी.एस. नायपॉल के पूर्वज गंगा के मैदान से बतौर गिरमिटिया उस त्रिनिदाद पहुँच गए थे, जहाँ उन्होंने अन्य लेगों के साथ मिलकर एक ऐसा समाज बनाया, जो भारतीय समाज से कहीं अधिक आपसी मेलजोल रखता था। यह वही समाज था, जिसका वर्ष १८८३ में महात्मा गांधी से साक्षात्कार हुआ था। वर्ष १९६२ में वी.एस. नायपॉल जब पहली बार इस देश को देखने-समझने भारत आए तो चकित रह गए। उन्होंने पाया कि एक सदी का समय यहाँ के धार्मिक संस्कारों से रूबरू होने के लिए पर्याप्त था। नायपॉल मानते हैं कि अनेक भारतीय रुझानों को समझे बगैर भारत को समझ पाना असंभव है। भारतीय समाज की समग्रता उसकी विभिन्न विचित्रताओं में तालमेल बैठाने से ही है। भारत में सामंजस्य ही समग्रता का पर्याय है, जिसे आज की राजनीतिक भाषा में ‘साझा विरासत’ से परिभाषित किया जा रहा है। जाहिर है कि इस परिभाषा से देश को समझने के लिए उग्र राष्ट्रवादी राजनीति से दूर जाना होगा और अपनी टेबल पर रखे कुछ कथित फोटो सेट बदलने होंगे।

भारत की सभ्यता-संस्कृति कभी भी तोड़नेवाली नहीं, बल्कि जोड़नेवाली ही अधिक रही है। विभिन्न विचित्रताओं के बावजूद भारतीय समाज में सभ्यतागत बहुलता की जो उदारता है, वही इस देश की महानता है।

वर्ष २००१ में जब सर विद्या को साहित्य का ‘नोबेल पुरस्कार’ प्रदान किया गया, तो यह उनके रचनात्मक योगदान की वैश्विक स्वीकृति थी, क्योंकि उन्होंने अपनी जड़ों से कट चुके लोगों की त्रासदी का मार्मिक चित्रण किया था। अपनी जिंदगी के आखिरी वक्त में वे उन्हीं लोगों के साथ थे, जिनसे उन्हें लगाव था। वरिष्ठ अंग्रेजी आलोचक हरीश त्रिवेदी ने उन्हें भारत से निर्मम ममता रखनेवाला लेखक यों ही नहीं कहा है। वी.एस. नायपॉल की इस निर्मम ममता को सूक्ष्मता व संवेदनशीलता से परखने की जरूरत है। नायपॉल जब भी भारत की बात करते थे तो वे सिर्फ हिंदू या मुसलमान होकर नहीं, बल्कि दोनों के प्रति ही सहानुभूतिपूर्ण नजरिया रखते हुए भारतीय सभ्यता की बात करते थे। उन्होंने ‘नोबेल पुरस्कार’ से पुरस्कृत होते समय अपनी जन्मभूमि त्रिनिदाद का नहीं, बल्कि उन्हीं दो देशों का नाम लिया था, जिनसे वे जुड़ाव रखते थे—इंग्लैंड जहाँ वे रहे और भारत जो उनसे कभी भी छूटा ही नहीं।

सर विद्याधर सूरजप्रसाद नायपॉल के जीवन में हिंदू, हिंदू धर्म और भारतीय धार्मिक मान्यताओं की अनूठी प्रभावशीलता सदैव ही बनी रही, जबकि वे कोई हिंदूवादी लेखक नहीं थे। नायपॉल मानते थे कि भारतीय सभ्यता के अलावा दुनिया में ऐसी कोई दूसरी सभ्यता नहीं रही, जिसने कि बाहरी दुनिया से निपटने के लिए इतनी न्यूनतम तैयारी कर रखी हो। भारत जितनी आसानी से बाहरी आक्रमणों और लूटपाट का शिकार हुआ, वैसे शायद ही कोई अन्य देश कभी हुआ होगा।

वे कहते थे कि भारत मेरे लिए एक जटिल देश है। यह मेरा गृह-देश नहीं है एवं मेरा घर हो भी नहीं सकता, लेकिन फिर भी मैं न इसे खारिज कर सकता हूँ और न ही इसके प्रति उदासीन हो सकता हूँ। मैं इसके दर्शनीय स्थलों का पर्यटक मात्र बनकर नहीं रह सकता; मैं एक साथ इसके बहुत निकट और बहुत दूर भी हूँ...भारत के बारे में छानबीन करने के लिए तत्काल राजनीति से परे जाना होगा। यह पड़ताल भारतीय रुझानों के बारे में होगी...यह पड़ताल स्वयं इसकी सभ्यता के बारे में होगी...मैं भारत में एक अजनबी हूँ और इस पड़ताल का आरंभिक बिंदु में स्वयं रहा हूँ; क्योंकि शैशव की क्षणिक छवियों की भाँति मेरे बचपन तक, प्राचीन भारत की चमत्कारी स्मृतियाँ मौजूद हैं, जो मेरे लिए उस संपूर्ण तिरोहित जगत् की प्रस्तावना प्रस्तुत करती हैं...परंतु मैं समझ रहा हूँ कि भारत संबंधी मेरी स्मृतियाँ उस भारत की हैं, जो अतल अतीत में उतरने के चोर दरवाजों जैसी हैं।

सच्चाई को बेबाकी से बयान करनेवाले सर नायपॉल को प्रसिद्धि उनके चौथे उपन्यास ‘अ हाउस फॉर मिस्टर बिस्वास’ से मिली। उनका यह उपन्यास वर्ष १९६१ में छपा था। इस उपन्यास का मुख्य चरित्र नायपॉल के पिता पर आधारित है, जो पत्रकार और लेखक थे। इस कृति में स्वयं नायपॉल की किशोरावस्था का भी मार्मिक चित्रण है। यहाँ संयुक्त परिवार के उलझते-सुलझते रिश्तों की बेहद विनोदात्मक तसवीर उपलब्ध है, जिसमें पात्रों की असफलताओं और असमर्थताओं के प्रति सहानुभूति है, उपहास नहीं। उनके लेखन में तीव्र तल्खी तो बहुत बाद में आई; जब उन्होंने देखा और पाया कि उपनिवेशवादी ताकतों ने इंडोनेशिया से अफ्रीका और अफ्रीका से लातिनी अमरीका तक जहाँ-जहाँ राज किया, वहाँ-वहाँ उन्होंने मनुष्य एवं समाज को अपनी नकल का गुलाम बनाकर छोड़ दिया। उनका एक उपन्यास ‘द मिमिक मैन’ (नकलची लोग) इन्हीं विडंबनाओं को पुरजोेर तरीके से रेखांकित करता है, जो वर्ष १९६७ में प्रकाशित हुआ था।

तब तक नायपॉल त्रिनिदाद छोड़कर इंग्लैंड आ गए थे और ऑक्सफोर्ड में पढ़कर बी.बी.सी. में नौकरी करने लगे थे। वे समझना चाहते थे कि आखिर वे हैं कहाँ के और अब रहें कहाँ? वे तीन पीढ़ी बाद यह तलाशने सिर्फ एक बरस के लिए भारत आए कि क्या अपना प्रवास समाप्त करते हुए भारत में रहा जा सकता है? हालाँकि वर्ष १९५० में उन्होंने एक सरकारी स्कॉलरशिप जीत ली थी, जिसके मुताबिक उन्हें उनकी मनचाही यूनिवर्सिटी में दाखिला मिला सकता था; लेकिन उन्होंने ऑक्सफोर्ड जाना पसंद किया। यह जानकर हैरानी हो सकती है और यह उनके भारत-प्रेम को भी दरशाता है कि उन्होंने लंदन में रहते हुए ही भारत स्थित तीन नौकरियों के लिए आवेदन दे दिए थे। किंतु अब वे खुद भारत आकर संभावना तलाशना चाहते थे।

ऐसा नहीं है कि भारत आने पर वे भारतीयों और भारतीय समाज की हर एक विसंगति को देखकर क्षुब्ध ही हुए। यहाँ के हालात देखकर वे इस हद तक विचलित हुए कि अपनी यात्रा के बाद उन्होंने वह सब अपनी पुस्तक ‘ऐन एरिया ऑफ डार्कनेस’ (अंधकार का दायरा) १९६४ में जस-का-तस ईमानदारी से लिख दिया। ‘ऐन एरिया ऑफ डार्कनेस’ में भारत की भयानक गरीबी, संपन्न लोगों द्वारा उसका तीव्र तिरस्कार, खुले मैदान में शौच की प्रवृत्ति, अत्याचार व असमानता सहते रहने की प्रवृत्ति, धर्मांधता, भुखमरी, नौकरशाही की धौंस, बेकारी, चापलूसी, विदेशी वस्तुओं के प्रति अंध-मोह और बौद्धिक पाखंड आदि, यह सबकुछ बेहद ही प्रभावशाली और स्वीकार्य लगता है। इस कृति में कुछ-कुछ वैसा ही मोहभंग चित्रित हुआ है, जैसा कि चार वर्ष बाद छपे श्रीलाल शुक्ल के ‘राग-दरबारी’ में देखा जा सकता है। नायपॉल के लेखन में जीवन व राजनीति, व्यक्ति और समाज तथा सभ्यता एवं संस्कृति सहित उपनिवेशवाद एवं आदर्शवाद का रचनात्मक ही नहीं, बल्कि आलोचनात्मक चित्रण भी है। भारतीय बौद्धिक समाज का उनके प्रति उदासीन या विरोधी रहना अपनी अपूर्णता ही नहीं दरशाता है, बल्कि लेखकीय अन्याय भी है। एक तरफ सलमान रश्दी अगर नायपॉल से असहमत रहते थे तो तस्लीमा नसरीन उन्हें मुसलिम विरोधी करार दती थीं। किंतु वे न तो किसी के समर्थक थे और न विरोधी। वी.एस. नायपॉल सभ्यताओं के अँधेरे में रोशनी तलाशते दो संस्कृतियों को प्रश्नांकित करनेवाले लेखक थे।

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राजकुमार कुंभज

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